S M L

जूनागढ़: जो देश का दूसरा कश्मीर बनते-बनते रह गया...

जूनागढ़ गुजरात की एक ऐसी जगह जो एक नवाब के एक कदम पर नए भारत का दूसरा कश्मीर बन सकती थी

Updated On: Dec 02, 2017 11:57 AM IST

Tulika Kushwaha Tulika Kushwaha

0
जूनागढ़: जो देश का दूसरा कश्मीर बनते-बनते रह गया...

बंटवारा होने के बाद देश के सामने एक बड़ी समस्या विलय की थी. उस वक्त देश में लगभग 500 की रियासतें थीं, जब विलय होने की बात आई तो ब्रिटिश सरकार की ओर से इन रियासतों के सामने शर्त रखी गई थी कि उन्हें या तो भारत का हिस्सा बनना होगा या पाकिस्तान का.

देश में कई रियासतें थीं, जिन्होंने भारत-पाकिस्तान में खुद को बांट लिया. लेकिन कुछ रियासतें ऐसी थीं, जो या तो स्वतंत्र रहना चाहती थीं, या पाकिस्तान में शामिल होना चाहती थीं. लेकिन इसके लिए नेताओं की रणनीतियां, जनता की अलग मांग और भूगोल अड़चन डाल रहे थे.

देश में उस वक्त बहुत सी रियासतें थीं, जिन्हें इन दोनों देशों की सीमाओं में विलय होना था और नई पहचान मिलनी थी लेकिन तीन रियासतों- कश्मीर, हैदराबाद और जूनागढ़ ने इन शर्तों को नामंजूर करना चाहा.

जूनागढ़ का असमंजस

जूनागढ़ आजादी के बाद हुए भारत के विलय के पहले एक नवाबी रियासत थी, जिसके नवाब थे- मुहम्मद महतब खांजी तृतीय. नवाब का झुकाव पाकिस्तान की तरफ था. हालांकि, वहां की बहुसंख्यक हिंदू जनता इसके खिलाफ थी.

यहां तक कि नवाब ने 15 सितंबर, 1947 को लॉर्ड माउंटबेटन की सलाह के खिलाफ जाकर पाकिस्तान में शामिल होने का फैसला किया और इसके पीछे यह तर्क दिया कि जूनागढ़ की समुद्री सीमा पाकिस्तान से मिलती है. हालांकि, जूनागढ़ की दो छोटी रियासतों बाबरियावाड़ और मंगरोल ने हिंदुस्तान में शामिल होने का फैसला कर लिया. लेकिन मंगरोल ने इसे अगले ही दिन वापस ले लिया.

ये भी पढ़ें: गुजरात चुनाव 2017: देश को नमक देने वाले मजदूरों को ढंग की चिता भी नसीब नहीं होती

जूनागढ़ के प्रस्ताव को पाकिस्तान ने स्वीकार कर लिया, जिस पर सरदार पटेल मुहम्मद अली जिन्ना पर बहुत नाराज हुए कि आखिर वो अपने 'मुस्लिम और हिंदू एक देश में नहीं रह सकते', के विचार के बावजूद जूनागढ़ का प्रस्ताव कैसे स्वीकार कर सकते थे.

Sardar-Patel

सेना की तैनाती और जनमत संग्रह

चूंकि, तीन सीमाओं से भारत और एक तरफ से अरब सागर से घिरे होने की चलते जूनागढ़ की स्थिति कमजोर हो गई और नवाब सपरिवार पाकिस्तान भाग गए. भुट्टो के कहने पर समलदास गांधी ने आर्ज़ी हुकूमत यानी टेंपररी सरकार संभाली. सरदार पटेल ने पाकिस्तान से नवाब का प्रस्ताव वापस लेने को कहा. वो यहां जनमत संग्रह कराना चाहते थे. लेकिन ऐसा कुछ न होने पर उन्होंने आखिरकार 9 नवंबर को वहां सेना भेज दी. पाकिस्तान ने इसका विरोध किया था.

एजी नूरानी की किताब 'ऑफ जिन्ना एंड जूनागढ़' के मुताबिक, 20 दिसंबर, 1948 को यहां जनमत संग्रह हुआ. इस जनमत में 99 फीसदी जनता ने भारत के पक्ष में वोट दिया.

भारत की राजनीतिक विचारधारा का पहला मोड़

सेना भेजने और उसके बाद जनमत संग्रह कराने की यह घटना भारत के निर्माण में एक स्याह पक्ष लेकर आई. कई इतिहासकारों ने इसे जबरदस्ती कराया गया विलय कहा है क्योंकि यहां पहले सेना भेजकर फिर जनमत संग्रह कराने का औचित्य स्पष्ट नहीं हुआ.

ये भी पढ़ें: गुजरात चुनाव 2017: एक गांव जहां मुस्लिमों की तरह दफनाए जाते हैं हिंदू

इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने अपनी किताब 'इंडिया आफ्टर गांधी' में इस घटना के एक पहलू पर प्रकाश डाला है. आजादी के बाद यह देश के निर्माताओं की विचारधारा में आने वाले बदलाव का एक पहला उदाहरण था. बंटवारे के वक्त कमजोर हुए महात्मा गांधी की इस बार भी उपस्थिति बहुत मजबूत नहीं रही. यह इस ओर एक बड़ा संकेत था कि, आने वाले वक्त में भारत की नीतियों और राजनीति में किस कदर बदलाव आने वाला था.

अगर इस मामले पर एक दूसरे पहलू से विचार करें तो यह आशंका दिखती है कि जूनागढ़ भारत का दूसरा कश्मीर बन सकता था. अगर सेना की तैनाती और जनमत संग्रह न हुआ होता या जनमत संग्रह में जनता का पक्ष स्पष्ट नहीं हुआ होता, तो इतिहास कुछ और होता.

लेकिन इसी पहलू से एक और भयावह आशंका निकलती है. अगर जूनागढ़ पाकिस्तान में शामिल हो गया होता, तो आज उसकी हालत पाकिस्तान में वही होती, जो आज भारत में कश्मीर की है. और ऐसा हो भी गया होता, अगर जिन्ना जूनागढ़ को भी उतना ही तवज्जो देते, जितना उन्होंने कश्मीर या हैदराबाद को दिया था. जूनागढ़ के नवाब की चाहत को अगर जिन्ना ने हकीकत में बदल दिया होता तो इस दुनिया में दो कश्मीर होते. वैसे, संयुक्त राष्ट्र में अभी भी जूनागढ़ पर पाकिस्तान की ओर से भारत के खिलाफ दाखिल की गई याचिका लंबित है.

नवाब का क्या हुआ?

नवाब मुहम्मद महतब खांजी ने 15 दिसंबर को पाकिस्तान में शामिल होने का प्रस्ताव दिया था और 24 अक्टूबर को वो अपने परिवार के साथ पाकिस्तान चले गए. कराची में जाकर उन्होंने अल्पकालीन सरकार बनाई.

तस्वीर- न्यूज18 इंडिया से साभार.

तस्वीर- न्यूज18 इंडिया से साभार.

नवाब के कुत्तों से प्रेम को अभी भी याद किया जाता है. नवाब के पास लगभग 2,000 कुत्ते थे, जिनसे वो बहुत प्यार करते थे. जब वो पाकिस्तान गए तो अपने साथ अपने कुत्तों को भी ले गए. विडंबना है कि उनकी मौत भी रेबीज से हुई. नवाब की मौत 17 नवंबर, 1959 को कराची में हुई. हालांकि, नवाब का नाम उनके एक काम के लिए भी लिया जाता है. जानवरों से प्रेम के चलते उन्होंने गिर शेरों, जो कि विलुप्त होने के कगार पर पहुंच चुके थे, उनके संरक्षण को लेकर काफी काम किया था.

एक कहानी चलती है कि आज नवाब के परिवार की हालत बद से बदतर है. उन्हें सरकार की ओर से पेंशन में महज 16 हजार रुपए मिलते हैं, जो किसी चपरासी के वेतन से भी कम है. कराची में रह रही उनकी तीसरी पीढ़ी आज भी नवाब के उस फैसले पर अफसोस करती है.

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो
#MeToo पर Neha Dhupia

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi