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जन्मदिन विशेष: गोखले की मांग पर अंग्रेज लाए थे मोर्ले-मिंटो सुधार

महात्मा गांधी के गुरु गोपाल कृष्ण गोखले के प्रयास से ही अंग्रेज शासकों ने मोर्ले-मिंटो सुधार लाया था.

Surendra Kishore Surendra Kishore Updated On: May 09, 2018 08:32 AM IST

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जन्मदिन विशेष: गोखले की मांग पर अंग्रेज लाए थे मोर्ले-मिंटो सुधार

महात्मा गांधी के गुरु गोपाल कृष्ण गोखले के प्रयास से ही अंग्रेज शासकों ने मोर्ले-मिंटो सुधार लाया था. उस सुधार के तहत 1909 में भारत परिषद अधिनियम बना. उसी के साथ चुनाव प्रणाली के सिद्धांत को भारत में पहली बार मान्यता मिली. गोखले न सिर्फ गांधी के गुरु थे बल्कि जिन्ना के भी परामर्शदाता थे. यह वह समय था जब जिन्ना ‘मुस्लिम गोखले’ यानी मुस्लिमों के बीच के गोखले बनना चाहते थे.

सन 1905 में कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे गोपाल कृष्ण गोखले ने कहा था कि ‘सार्वजनिक जीवन को आध्यात्मिक बनाना होगा.आध्यात्मिक से उनका आशय किसी धर्म से नहीं था.’ कहा जाता है कि यह उनके जीवन का मंत्र था. उन्होंने कभी इस बात की कल्पना भी नहीं की होगी कि आजादी के बाद एक दिन ऐसा भी आएगा, जब भ्रष्टाचार के आरोप में इस देश का एक नेता जेल जाएगा तो दूसरा नेता जेल से जमानत पर छूटेगा.

गोखले के इस मूल मंत्र पर सन 1966 में तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ.एस.राधाकृष्णन ने सत्ताधारियों को चेताया भी था. पर उसका कोई परिणाम नहीं निकला. समय बीतने के साथ चीजें बिगड़ती ही चली गईं.

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राधाकृष्णन ने कहा था कि गोखले का यह मंत्र और भी अधिक सार्थक बन सकता है. आज हमारे पास अधिकार और सत्ता है. इसलिए इस मंत्र की साधना और भी अधिक जरूरी हो उठी है. राधाकृष्णन ने तभी कहा था कि यह कहना मेरा काम नहीं है कि माल दबाने,घूस लेने और बेईमानी फैली होने की जो शिकायतें हैं,वे कहां तक सही हैं. पर यह बहुत जरूरी है कि सार्वजनिक काम को खरेपन ,साधुता और अपने आप को न्योछावर कर देने की भावना से करने के ही व्रत पर अटल रहा जाए.

आज ऐसे उपदेशों को सुनकर हर क्षेत्र में जड़ें जमाये बेईमान लोग हंसेंगे ही.पर इससे गोखले का महत्व कम नहीं हो जाता. गोखले के निधन पर बाल गंगाधर तिलक ने कहा था कि ‘गोखले महाराष्ट्र के रत्न और भारत के हीरा थे.’ तिलक और गोखले में विचारों की भिन्नता थी. फिर भी तिलक ने गोखले के लिए ऐसी बात कहींं.

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अपनी जीवनी में गांधी ने तो खुद को गोखले का शिष्य बताया है. खुद गोखले जस्टिस महादेव गोविंद रानाडे के शिष्य थे. गोखले का जन्म बंबई प्रेसिडेंसी के रत्नागिरि जिले के कोटलुक गांव में 9 मई 1866 को हुआ था. सिर्फ 49 साल की उम्र में 19 फरवरी 1915 को उनका निधन हो गया.

पर इतनी ही कम उम्र में उन्होंने भारतीय राजनीति और समाज को बहुत प्रभावित किया और अनेक उपलब्धियां हासिल कीं. वे समाज सेवी, विचारक और सुधारक थे. वे शिक्षा के प्रचार के प्रबल समर्थक थे. वित्तीय मामलों की उन्हें अद्भुत समझ थी.

उन्होंने सर्वेंट आॅफ इंडिया सोसायटी की स्थापना की. इस सोसाइटी का उद्देश्य देश सेवा के लिए कार्यकर्ता तैयार करना था. उनकी सौंवी जयंती पर तत्कालीन प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी ने कहा था कि ‘भारत के मानस को गोपाल कृष्ण गोखले ने ही आधुनिक सांचे में ढाला है. इसके लिए भारत उनका ऋणी है.’

इंदिरा जी ने यह भी कहा था कि ‘सार्वजनिक जीवन को आध्यात्मिक बनाने का मंत्र देने के बावजूद गोखले कट्टरपंथी नहीं बने.’ गोखले के पिता का निधन जब हुआ, उस समय वे सिर्फ तेरह साल के थे. गोखले एक गरीब परिवार से आते थे.इसके बावजूद उन्होंने उच्च शिक्षा ग्रहण की. धनोपार्जन के बदले वे देश सेवा के काम में लग गए.

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लंबे समय तक उन्होंने रानाडे के चरणों में बैठकर बहुत कुछ सीखा. सिर्फ तीस साल की उम्र में गोखले भारतीय अर्थ व्यय संबंधी राजकीय आयोग के समक्ष उपस्थित हुए थे.उन्होंने आयोग के समक्ष मजबूती और तर्कपूर्ण ढंग से यह बात रखी कि किस तरह हमारा देश ब्रिटिश शासन के दौरान आर्थिक और प्रशासनिक कुप्रबंधन का शिकार हो रहा है.

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1912 में डरबन में लिए इस ग्रुप फोटो में महात्मा गांधी के ठीक बायीं तरफ बैठे गोपाल कृष्ण गोखले. ( तस्वीर विकीपीडिया से साभार )

33 साल की उम्र में गोखले मुम्बई विधान परिषद के सदस्य बन गए थे. 1903 में वे गवर्नर जनरल की काउंसिल के सदस्य बने. वे 1909 में इंपीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल के सदस्य बने. गोखले, गांधी जी के निमंत्रण पर दक्षिण अफ्रीका गए थे.वहां उन्होंने गिरमीटी प्रथा के अंत के लिए काम किया.वे गांधी के पथ प्रदर्शक बने.

गोखले ने तीन बार इंग्लैंड का दौरा किया. भारत में राजनीतिक सुधार के लिए ब्रिटिश जनमत बनाने का काम उन्होंने किया. इन सब के बावजूद उनके जीवन काल में गोखले को कुछ समकालीन राजनीतिक नेताओं की घोर आलोचनाओं का सामना भी करना पड़ा.

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ऐसा उनके नरमपंथी होने के कारण हुआ. दरअसल उनके गुरु रानाडे ने उन्हें नरमपंथी होना सिखाया था जिस पर वे अंत तक अटल रहे. गोखले भारत में तब पनप रही जातीय-धार्मिक एकता भावना को स्वराज्य चलाने की योग्यता की पहली शर्त मानते थे. वे कहते थे कि इस भावना की नींव तो पड़ गई है पर इमारत बनाने की परवाह हमने नहीं की. यह समस्या आज भी कायम है.

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