S M L

इमरजेंसी के बाद चुनाव: इंदिरा गांधी को लगा था कांग्रेस जीतेगी, लेकिन हुआ उल्टा

इंदिरा गांधी ने इस लिए देश में आमचुनाव कराने का घोषणा की क्योंकि उनको लग रहा था कि लोग डर के मारे निकलेंगे नहीं और हमारे समर्थक निकलेंगे. इस तरह से कांग्रेस जीत जाएगी

Ram Bahadur Rai Updated On: Mar 21, 2018 08:33 AM IST

0
इमरजेंसी के बाद चुनाव: इंदिरा गांधी को लगा था कांग्रेस जीतेगी, लेकिन हुआ उल्टा

18 जनवरी 1977 को इमरजेंसी के दौरान ही देश की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी या उनकी सरकार ने चुनाव कराने का फैसला लिया. उस समय देश के लोगों में आम धारणा घर कर गई थी कि अब शायद आम चुनाव हो ही न. लेकिन देश में आम चुनाव कराने के प्रयास को लेकर कई स्तरों पर प्रयास किए जा रहे थे. इंदिरा गांधी ने क्यों आम चुनाव कराने का निर्णय लिया इसका काफी लंबा इंतिहास है.

एक घटना का जिक्र कर इसे समझाने का प्रयास करता हूं, जिससे मालूम चलेगा कि इमरजेंसी के दौरान किन-किन लोगों ने चुनाव कराने को लेकर अंदरखाने इंदिरा गांधी और सरकार पर दबाव डालने का काम किया.

29 दिसंबर 1977 यानी चुनाव की घोषणा से ठीक 18-19 दिन पहले नवंबर महीने में मैं और मेरे कुछ साथी जेल से बाहर आ गए थे. देश में कई स्तर पर अंडर ग्राउंड वर्किंग चल रही थी. ऑल इंडिया स्तर के पांच-सात वर्करों की एक टीम, जो पूरे मूवमेंट को कोऑर्डिनेट कर रही थी, की गुपचुप तरीके से मीटिंग बुलाई गई.

यह मीटिंग जनसंघ के ऑफिस दिल्ली के विट्ठल भाई पटेल हाउस के 24-25 नंबर फ्लैट में थी. उस समय जनसंघ के कार्यकारी अध्यक्ष ओमप्रकाश त्यागी थे. क्योंकि, लाल कृष्ण आडवाणी जनसंघ के उस समय के अध्यक्ष थे और वो जेल में बंद थे. इसलिए ओमप्रकाश त्यागी ही उनका काम संभाल रहे थे.

हमलोगों की मीटिंग हो गई. मीटिंग में ये फैसला हुआ कि जितने भी बड़े नेता हैं, उनसे मिलने का सिलसिला शुरू किया जाए. मैंने उस समय देश के जितने भी बड़े नेता थे, उनसे मिलने की कोशिश शुरू कर दी.

इसकी शुरुआत चौधरी चरण सिंह से हुई. अगले दिन हमलोग ओमप्रकाश त्यागी से मिले. उन्हें बताया कि हमलोग क्या-क्या कर रहे हैं. हमारी बात सुन कर खुश हुए ओमप्रकाश त्यागी ने कहा यह बात आपलोग वाजपेयी जी को जरूर बताएं. मैंने ओमप्रकाश त्यागी जी से कहा कि वाजपेयी जी के यहां अभी जाने का मतलब है दोबारा गिरफ्तार होना और मैं नहीं चाहता.

इस पर ओमप्रकाश त्यागी जी ने कहा कि नहीं आप चार बजे उनके पास जाइए. वाजपेयी जी के आवास पर पुलिस जरूर है, लेकिन वहां पर गिरफ्तारी का डर नहीं है. वाजपेयी जी हाउस अरेस्ट पर हैं और सरकार जानती है कि कोई जानबूझ कर गिरफ्तार होने वहां नहीं जाएगा. मैं ठीक चार बजे 1 फिरोजशाह रोड कोने वाली कोठी पहुंचा, जहां वाजपेयी जी रहते थे. वाजपेयी जी से मिलते ही हमने उनसे कहा कि अखबारों में खबर छपी है कि आपसे मिलने ओम मेहता आए थे !

इंदिरा के बाद दूसरे पॉवरफुल आदमी

उन दिनों इंदिरा गांधी के बाद दूसरे नंबर के ताकतवर व्यक्ति ओम मेहता थे. ओम मेहता उस समय थे तो गृह राज्य मंत्री, लेकिन वो काम संभाल रहे थे देश के गृह मंत्री का. संजय गांधी के खास विश्वासपात्रों में से एक थे.

ओम मेहता जम्मू के रहने वाले थे. इंदिरा गांधी की सरकार में उन दिनों वे लोग ज्यादा महत्वपूर्ण थे, जो संजय गांधी से जुड़े हुए थे. ओम मेहता, विद्याचरण शुक्ल और बंशीलाल उनमें से एक थे.

इमरजेंसी के दौरान देश के होम मिनिस्टर तो ब्रह्मानंद रेड्डी थे, लेकिन ब्रह्रमानंद रेड्डी को ये भी पता नहीं था कि देश में इमरजेंसी लगने वाली है. उस समय कोई खुराना कर के होम सेक्रेटरी थे. उनको भी देश में इमरजेंसी लगने के बारे में कुछ पता नहीं था. इमरजेंसी के दौरान जो ऑपरेशन होते थे, चाहे वह दिल्ली का तुर्कमान गेट तोड़ना हो या फिर जामा मस्जिद का ऑपरेशन हो सभी निर्णय ओम मेहता के निर्देश पर दिल्ली के एलजी या पुलिस कमिश्नर या डीडीए के वायस चेयरमैन लिया करते थे.

क्या दिया अटल जी को जवाब

AtalbihariVajpayee1

वाजपेयी जी मेरे पूछे सवाल पर व्यंग्य के लहजे में कहा, ‘ओम मेहता बहुत बड़े आदमी हैं. वह मुझसे मिलने नहीं आए थे बल्कि, मैं ही उनसे मिलने गया था.’

मैंने पूछा, ‘क्या बात हुई?’ उन्होंने बताया कि ओम मेहता का कहना था, ‘इमरजेंसी के दौरान देश में काफी तोड़-फोड़ हुई है और इसकी जिम्मेदार एबीवीपी है.’ उन्होंने दूसरी बात कही कि मैं इस कोशिश में लगा हूं कि इंदिरा गांधी चुनाव कराने को लेकर तैयार हो जाएं.

उन दिनों चुनाव कराने को लेकर कई लोग काम कर रहे थे उनमें पीएम के सचिव प्रो. पी. एन. धर भी लगे हुए थे. पी. एन. धर पर्दे के पीछे काम कर रहे थे. हर वर्ग के लोग इंदिरा गांधी को समझाने में लगे हुए थे. कुछ पत्रकार भी इंदिरा गांधी के संपर्क में लगातार थे. हिंदुस्तान टाइम्स के उस समय के एडिटर हिरण्मय कारलेकर भी चुनाव कराने को लेकर इंदिरा गांधी से संपर्क में थे. अंतत: इंदिरा गांधी ने चुनाव कराने का फैसला किया.

जब चुनाव की घोषणा हुई तो संगम किनारे था

जिस दिन देश में चुनाव कराने की घोषणा हुई थी, उस दिन मैं प्रयाग के कुंभ मेले में था. दिल्ली में मीटिंग करने के बाद हमलोग कुंभ मेले के कैंप में आराम से रह रहे थे. थोड़ा-बहुत पर्चा भी बांटा करते थे. जिस दिन चुनाव की घोषणा हुई थी, उस दिन कुंभ में मौनी अमावस्या का स्नान था.

प्रयाग में 18 जनवरी 1977 को भारी भीड़ थी. मुझे याद है कि उस दिन जैसे ही रेडियो पर लोकसभा चुनाव कराने की घाषणा हुई. कुंभ में उत्सव का माहौल हो गया.

मैं प्रयाग से सीधे बनारस पहुंचा. बनारस आते ही मैंने नेताजी (राजनरायण जी) के छोटे भाई से कहा कि आप नेताजी से पूछ कर बताइए कि वह रायबरेली से चुनाव लड़ेंगे कि नहीं?

राजनारायण जी के छोटे भाई राजनारायण जी से मिलकर कहा कि रामबहादुर राय ने आपसे पूछने के लिए मुझे भेजा है कि क्या आप रायबरेली से चुनाव लड़ेंगे? इस पर राजनरायण जी ने अपने छोटे भाई से कहा कि रामबहादूर से कहना, ‘अटल बिहारी वाजपेयी बड़े नेता हैं, वही जाकर रायबरेली से चुनाव लड़ें हमें नहीं लड़ना है.’

इसके बाद सुंदर सिंह भंडारी और चंद्रशेखर जी से अपनी भेंट हुई. चंद्रशेखर जी को राउस एवेन्यू में एक कोठी में हाउस एरेस्ट कर रखा था. चंद्रशेखर के साथ मोहन धारिया भी थे.

सभी विपक्षी नेता थे परेशान, संघ बना संकटमोचक

चुनाव के घोषणा के बाद बड़े नेताओं को लग रहा था कि देश में अभी भी इमरजेंसी लगी हुई है. हमलोग चुनाव प्रचार कैसे करेंगे? कार्यकर्ता नहीं मिलेंगे. ये तमाम चिंताएं बड़े नेताओं के दिमाग में थीं.

चुनाव की घोषणा के बाद दो-तीन दिनों के भीतर ही जनता पार्टी बन गई थी, जिसकी कोशिश जयप्रकाश नारायण मुंबई में सालभर से कर रहे थे. जनसंघ, कांग्रेस(ओ), चौधरी चरण सिंह की पार्टी, सोशलिस्ट और कुछ अन्य छोटे दलों को मिलाकर जनता पार्टी का गठन हुआ.

मोरारजी देसाई उसके अध्यक्ष बन गए. एक ढांचा तो बन गया, लेकिन बड़े नेताओं को तब भी विश्वास नहीं हो रहा था कि हमलोग चुनाव लड़ेंगे कैसे !

लेकिन, आरएसएस ने इमरजेंसी के दिनों में भी और इमरजेंसी के दौरान चुनाव में भी संगठन की कमी को पूरा किया. आरएसएस ने पहली बार खुलेआम समर्थन दिया और संगठन की कमी को पूरा किया.

कांग्रेस से टूटकर अलग दल की हुई घोषणा

3 फरवरी 1977 को देश में एक बड़ी घटना हुई जिसने देश की राजनीतिक फिजा को बदल कर रख दिया. जगजीवन राम, हेमवती नंदन बहुगुणा और नंदिनी सत्पथी तीनों कांग्रेस के नेताओं ने 3 फरवरी को दोपहर में घोषणा कर दी कि हमलोग कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी(सीएफडी) बना रहे हैं.

babu jagjivan ram 1

3 फरवरी को हमलोग लखनऊ के मोती महल में थे. यह चंद्रभान गुप्त का घर था. हम लोग योजना बना रहे थे कि चुनाव कैसे लड़ा जाएगा और चुनाव प्रचार करने कौन कहां जाएगा. इसी बीच चंद्रभान गुप्त को दिल्ली से फोन आया कि कांग्रेस में टूट हो गई है और सीएफडी बन गई है.

मुझे याद है कि चंद्रभान गुप्त ने उस वक्त मीटिंग को स्थगित कर दिया. लोग उनके घर आने लगे. चंद्रभान गुप्त ने बाजार से खूब मिठाई मंगवाई और खूब मिठाई बंटवाई.

3 फरवरी 1977 को कांग्रेस से इन नेताओं के निकलने के बाद देश में चुनाव का माहौल बदल गया. लोग एक तरह से निर्भय हो गए. लोगों के मन से डर निकल गया. क्योंकि इमरजेंसी में ही चुनाव हो रहे थे.

23 मार्च को हटी इमरजेंसी

देश में इमरजेंसी 23 मार्च 1977 को हटी. अगले दिन मोरारजी शपथ लेने जा रहे थे और इंदिरा गांधी आखिरी कैबिनेट मीटिंग कर रही थीं. इमरजेंसी हटाने का फैसला लिया गया.

इमरजेंसी के दौरान हुए चुनाव में पार्टियां चुनाव नहीं लड़ रही थीं, लोग चुनाव लड़ रहे थे. पार्टियां ने बेशक उम्मीदवार तय किया, लेकिन उस चुनाव में पैसा और सभी प्रकार की मदद जनता खुद कर रही थी. किसी को कहना नहीं पड़ रहा था.

चंद्रशेखर जी, जगजीवन राम और जेपी की सभाओं में लाखों रुपए इकट्ठा होते थे. जगजीवन राम, जेपी और चंद्रशेखर की सभा में लाखों लोग आ रहे थे. वाजपेयी जी भी खूब भीड़ खींचते थे.

मुरली मनोहर जोशी की सीट पर नहीं पहुंच पाया था कोई बड़ा नेता

चुनाव के दौरान एक रोचक कहानी है. एक दिन चंद्रभान गुप्त ने हमसे कहा कि देखो मुरली मनोहर जोशी अल्मोड़ा से चुनाव लड़ रहे हैं. वहां पर कोई भी बड़ा नेता अब तक नहीं पहुंचा है और न ही तुम्हारे जैसे नेता भी वहां जा रहे हैं. हमलोग उस वक्त दूसरी-तीसरी कतार के नेता थे. गुप्त जी ने मुझसे पूछा कि क्या तुम अल्मोड़ा जाना चाहोगे? मैंने उनसे कहा हम जरूर जाना चाहेंगे.

मैं और सुभाष छाबड़ा, लखनऊ विश्वविद्यालय के जनरल सेक्रेटरी, निकल पड़े. मेरे और सुभाष की पिथौरागढ़ और अल्मोड़ा जाने की कोई सूचना किसी को नहीं दी गई थी. उस समय सूचना तंत्र भी उतना मजबूत नहीं था.

हमलोग पिथौरागढ़ के जनता पार्टी के दफ्तर में पहुंचे. लोगों को पता चला कि लखनऊ से नेता आए हैं और उनकी सभा होने वाली है. 10 से 15 मिनट में ही रिक्शे पर माइक के जरिए प्रचार कर दिया गया कि सभा होने जा रही है.

2014 लोकसभा के दौरान चुनाव प्रचार की तस्वीर. ( फेसबुक से साभार )

2014 लोकसभा के दौरान चुनाव प्रचार की तस्वीर. (फेसबुक से साभार )

10-15 मिनट की सूचना पर ही पिथौरागढ़ जैसे छोटी जगह में 15 हजार की भीड़ इकट्ठा हो गई. यह सूचना जब अल्मोड़ा पहुंची तो वहां की सभा 50 हजार तक पहुंच गई.

हमारी सभा को डॉ. मुरली मनोहर जोशी अपने घर में बैठ कर सुन रहे थे. उस सभा में मैंने वहां के लोगों से कहा कि आपलोग जोशी जी को जिताइए. जेपी ने नारा दिया है कि राइट टू रिकॉल यानी हम अपने प्रतिनिधि को वापस बुला सकते हैं. डॉ. जोशी अगर ठीक काम नहीं करेंगे तो आप लोग चाहेंगे तो डॉ. जोशी को कान पकड़ कर लोकसभा से बाहर बुला सकते हैं और उनको घर बैठा सकते हैं.

सभा में कही मेरी इस बात को उनके लोगों ने डॉ. जोशी से आधी बात ही बताई. उनके लोगों ने उनसे कहा कि रामबहादुर राय ने सभा में कहा है कि जोशी अगर ठीक काम नहीं करेंगे तो कान पकड़ कर वापस बुलाया जा सकता है.

इस पर डॉ जोशी ने उन लोगों से कहा, देखो तुम लोग रामबहादुर राय की पूरी बात नहीं बताई. हम उसका भाषण सुन रहे थे. रामबहादुर राय ने पहले ये कहा कि जिताओ फिर देखा जाएगा.

इंदिरा की रैली में हो रहा था प्रतिकार

बनारस के बेनियाबाग में इंदिरा गांधी की एक सभा हुई. इंदिरा जब बोलने के लिए खड़ी हुईं तो बनारस की जनता उठ कर जाने लगी. लोगों ने सांकेतिक तौर पर बता दिया कि हम आपके विरोध में हैं. इंदिरा गांधी की हर सभा में करीब-करीब यही चीज दोहराई जाती थी.

लेकिन किसी को यह विश्वास नहीं था कि इंदिरा गांधी भी हार सकती हैं. उस समय इंदिरा गांधी के हारने का अनुमान एक व्यक्ति ने सबसे पहले लगाया था. मैं रायबरेली में था और घूमते-घूमते इंदिरा गांधी के चुनाव दफ्तर में चला गया. मैं जब वहां पहुंचा तो देखा कि माखनलाल फोतेदार निकल रहे थे. मैंने उन्हें परिचय दिया और कहा कि हम जनता पार्टी के लिए घूम रहे हैं और आपसे बात करनी है.

माखनलाल फोतेदार ने कहा कि अगर मुझसे बात करनी है तो लखनऊ चलो. हमको जल्दी लखनऊ जाना है. मैं जानना चाहता था कि फोतेदार का रायबरेली चुनाव को लेकर क्या अनुमान है? फोतेदार ने मुझसे रास्ते में कहा कि देखो मेरा अनुमान है कि इंदिरा गांधी चुनाव हार रही हैं. मैं यही बात बताने के लिए दिल्ली जा रहा हूं. मैं इंदिरा को बताने जा रहा हूं कि आप कुछ प्रबंध कीजिए क्योंकि चुनाव तो आपके हाथ से निकल गया है. जब चुनाव परिणाम आने लगे तो जिस तरह से अभी गोरखपुर उपचुनाव के परिणाम को कुछ देर के लिए रोक दिया ठीक उसी तरह इंदिरा गांधी के चुनाव परिणाम को भी रोक दिया गया था.

शायद यह 19 या 20 मार्च की बात होगी कि लोग रात-रात भर रेडियो खोल कर इंदिरा गांधी के चुनाव परिणाम की प्रतिक्षा कर रहे थे. इंदिरा गांधी का चुनाव परिणाम 21 मार्च तक खिसक गया था.

जीत के बाद नेतृत्व का संकट

Jaiprakash Narayan

जय प्रकाश नारायण

जनता पार्टी की जीत के बाद नेतृत्व का संकट आ गया. दावेदारी तीन लोगों की थी. जगजीवन राम, चौधरी चरण सिंह और मोरराजी देसाई.

जनसंघ की पहली पसंद जगजीवन राम थे. जनसंघ चाहता था कि देश का प्रधानमंत्री जगजीवन राम को बनना चाहिए. मेरे समझ से जनसंघ का यह सुझाव मान लिया जाता तो वह सरकार पांच साल तक चलती.

खैर, जनसंघ का सुझाव आगे बढ़ा ही नहीं. इसका कारण था कि इमरजेंसी के बाद तुरंत चुनाव हुए थे और लोकसभा में इमरजेंसी लाने के जो प्रस्तावक थे वह जगजीवन राम थे. इंदिरा गांधी ने प्रस्ताव नहीं रखा था.

जगजीवन राम के नाम पर लोग तैयार नहीं हुए. जेपी और आचार्य कृपलानी पर यह बात छोड़ दी गई कि आप नेताओं से सलाह कर बताइए कि प्रधानमंत्री किसको बनाएंगे? जेपी और कृपलानी ने तब मोरारजी भाई का नाम तय किया.

मोरारजी भाई के नाम पर चौधरी चरण सिंह विरोध में खड़े हो गए. लेकिन, उनको अंतत: राजनारायण ने मना लिया. राजनारायण ने उनसे मोरारजी भाई के समर्थन की चिट्ठी जेपी को लाकर दी.

जगजीवन राम को लेकर पैदा हुई अजीब स्थिति

उस समय जगजीवन राम के समर्थन और विरोध को लेकर पार्टी में अजब स्थिति बन गई थी. 18-19 महीनों के जेल से लोग बाहर आए थे और एक सेंटिमेंट भी अलग था.

जनता पार्टी की केंद्र में पहली बार सरकार बनने जा रही थी. चंद्रशेखर, राजनरायण, जॉर्ज और मधु लिमये के समर्थकों का दबाव उनपर आता था और फिर ये नेता विरोध में खड़े हो जाते थे. जगजीवन राम के नाम पर विरोध करने में राजनारायण भी थे, चरण सिंह भी थे, चंद्रशेखर ने तो विरोध नहीं किया लेकिन दूसरी कतार के नेता जैसे जॉर्ज फर्नांडिस विरोध में थे.

एक घटना है. इसे लोकसभा चुनाव की सबसे बड़ी घटना कह सकते हैं. जार्ज जेल से चुनाव लड़ रहे थे. मुजफ्फरपुर में जॉर्ज के पोस्टर में हथकड़ी और बेड़ी लगा कर लोगों को दिखाया जाता था.

वर्तमान विदेश मंत्री सुषमा स्वराज उस समय शर्ट-पैंट पहनती थीं. सुषमा स्वराज और उनके पति स्वराज कौशल दोनों ने जार्ज के प्रचार में बढ़-चढ़ कर भाग लिया था.

सुषमा स्वराज और स्वराज कौशल दोनों चंडीगढ़ विश्वविद्यालय से वकालत पढ़ कर निकले ही थे. इमरजेंसी के दिनों में और इमरजेंसी के बाद भी बंदियों के केस की पैरवी दोनों ने बढ़-चढ़ कर की. जगजीवन राम के नाम का विरोध करने वालों में ये लोग भी थे.

जगजीवन राम के नाम का प्रस्ताव शुरू में वाजपेयी जी और नाना जी देशमुख ने चलाया था. ये प्रस्ताव जनसंघ के तरफ से आया था और ये प्रस्ताव ठीक था. इन लोगों को राजनीति की व्यावहारिक समझ थी. ये लोग चाहते थे कि परिवर्तन हुआ है तो सरकार पांच साल चले. ये लोग चौधरी चरण सिंह के स्वभाव को लंबे समय से जानते थे. यह बात जेपी को नाना जी देशमुख और वाजपेयी जी ने समझाने की कोशिश कि जगजीवन राम को प्रधानमंत्री बनाएंगे तो सरकार पांच साल चलेगी और बात सच भी थी.

जेपी की पसंद थे मोरार जी देसाई

जेपी दिल से चाहते थे कि मोरारजी भाई देश के प्रधानमंत्री बनें. मोरारजी भाई न होते तो जेपी चंद्रशेखर का नाम आगे बढ़ाते. जेपी चाहते थे कि मोरारजी प्रधानमंत्री बनें और चंद्रशेखर उनकी सरकार में शामिल हों.

Morarji Desai

मोरार जी देसाई

जब चंद्रशेखर का नाम मंत्रिमंडल में नहीं आया तो मुंबई के यशलोक अस्पताल में भर्ती थे जेपी ने चंद्रशेखर से पूछा कि आप मंत्रिमंडल में क्यों नहीं शामिल हो रहे हैं. चंद्रशेखर ने तब जेपी से कहा कि मैं बंबई आकर आपको बताउंगा कि मैं मंत्रिपद क्यों नहीं स्वीकार कर रहा हूं.

मोरार जी को नेता नहीं मानते थे चंद्रशेखर

आपको बता दें कि चंद्रशेखर का कहना था कि मैं मोरारजी भाई को मैं नेता नहीं मानता. मोरारजी भाई से मेरा विरोध है, लेकिन हम उनको सहयोग करेंगे. बाद में जब 1 मई 1977 को जनता पार्टी का विधिवत गठन हुआ तो दिल्ली के रामलीला मैदान में मोरारजी भाई ने ही चंद्रशेखर के सर्वसम्मति से अध्यक्ष बनाए जाने की घोषणा की.

चंद्रशेखर जब अध्यक्ष बने तो उनको कई लोगों ने चेतावनी दी थी कि जनसंघ के नाना देशमुख से आप सावधान रहें. लेकिन,चंद्रशेखर ने बाद में कहा कि जिन लोगों ने हमको नाना जी से सावधान रहने की बात कही थी, उन्हीं लोगों ने जनता पार्टी को तोड़ने का काम किया.

और अंत में...

आपको बताना चाहता हूं कि इंदिरा गांधी ने इस लिए देश में आमचुनाव कराने का घोषणा की क्योंकि उनको लग रहा था कि लोग डर के मारे निकलेंगे नहीं और हमारे समर्थक निकलेंगे. इस तरह से कांग्रेस जीत जाएगी और इमरजेंसी लगाने के हमारे फैसले पर मुहर लग जाएगी. इमरजेंसी के दौरान लिए गए निर्णय को वैधता भी मिल जाएगी, लेकिन जगजीवन राम सहित तीन लोगों की पार्टी से निकलने से कांग्रेस की आत्मा ही निकल गई.

(वरिष्ठ पत्रकार और इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के अध्यक्ष राम बहादुर राय से रविशंकर सिंह की बातचीत पर आधारित)

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो
SACRED GAMES: Anurag Kashyap और Nawazuddin Siddiqui से खास बातचीत

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi