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एक मामूली हैसियत से भारत के सबसे ऊंचे ओहदे पर पहुंचे राजेंद्र बाबू

उनकी मुद्रा और आंखें भुलाई नहीं जा सकतीं क्योंकि उनमें सच्चाई झलकती थी

Updated On: Feb 28, 2018 12:17 PM IST

Nitesh Ojha

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एक मामूली हैसियत से भारत के सबसे ऊंचे ओहदे पर पहुंचे राजेंद्र बाबू

यह बात आज की पीढ़ी के कम ही लोग जानते हैं कि राष्ट्रपति का कार्यकाल पूरा करने के बाद राजेंद्र बाबू पटना के सदाकत आश्रम के जिस मकान में रहने आए थे, वह रहने लायक नहीं था. जय प्रकाश नारायण ने उसकी मरम्मत करवाई ताकि उसमें राजेंद्र बाबू रह सकें. राजेंद्र प्रसाद का एक आम आदमी से भारत के प्रथम राष्ट्रपति बनने का सफर कतई आसान नहीं था.

दरअसल प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू तत्कालीन गवर्नर जनरल सी. राजगोपालाचारी को राष्ट्रपति बनवाना चाहते थे. जबकि सरदार पटेल तथा कई अन्य बड़े नेता डॉ. राजेंद्र प्रसाद के पक्ष में थे. अन्य नेताओं के कड़े विरोध के बाद तय हुआ कि जवाहर लाल नेहरू और सरदार पटेल मिलकर राष्ट्रपति के उम्मीदवार का नाम तय करेंगे. दोनों बैठे. पहले तो मतभेद रहे. पर जब सरदार राजेंद्र बाबू के नाम पर अड़े तो जवाहर लाल ने कहा कि तो ठीक है आप ही राजेंद्र बाबू का नाम घोषित कर दें. पटेल ने घोषणा कर दी. इस तरह बने डॉ. राजेंद्र प्रसाद देश के पहले राष्ट्रपति.

हिंदुस्तानियत उनमें सोलहों आने थी : जवाहर लाल नेहरू

नेहरू के विरोध के बाद भी जब राजेंद्र प्रसाद को राष्ट्रपति चुना गया तो नेहरू ने भी उन्हें स्वीकार था. 28 फरवरी 1963 को पटना में राजेंद्र बाबू के निधन के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने कहा था, ‘राजेंद्र बाबू का और मेरा 45 बरस का साथ रहा. इस लंबे अरसे में मैंने उनको बहुत देखा और बहुत कुछ सीखा. एक मामूली हैसियत से वह भारत के सबसे ऊंचे ओहदे पर पहुंचे, फिर भी उन्होंने अपना तर्ज नहीं बदला. हिंदुस्तानियत उनमें सोलहों आने थी. व्यक्तित्व की महानता के साथ-साथ उनमें सरलता और नम्रता बराबर बनी रही. हम यदि गलती करते थे, तो वह हमें संभालते थे. उनकी मुद्रा और आंखें भुलाई नहीं जा सकतीं क्योंकि उनमें सच्चाई झलकती थी. उनकी काबिलीयत, उनके दिल की सफाई और अपने मुल्क के लिए उनकी मुहब्बत ने उनके लिए हर भारतवासी के दिल में गहरी जगह पैदा कर दी.’

प्रथम राष्ट्रपति राजेंद्र बाबू एक सच्चे गांधीवादी थे. कहते हैं कि वह अपनी आय का आधा देश के नाम कर देते थे. राष्ट्रपति भवन के मुख्य कक्ष में रहने की बजाय अतिथी कक्ष में रहने का रिवाज भी उन्हीं ने शुरू किया था. जिसे बाद में तमाम राष्ट्रपतियों ने भी अपनाया.

राजेंद्र बाबू जैसा स्वभाव किसी नेता का नहीं : महात्मा गांधी

महात्मा गांधी ने एक बार कहा था कि ‘मेरे साथ काम करने वालों में राजेंद्र बाबू सबसे अच्छों में से एक हैं. वह जब कभी चाहें, मुझे सेवा के लिए बुला सकते हैं. हरिजन कार्य उनका उतना ही है, जितना मेरा और उसी तरह बिहार का काम मेरा उतना ही है जितना उनका.’

गांधी जी इतने पर ही नहीं रुकते हैं. वो कहते हैं कि ‘राजेंद्र बाबू का त्याग हमारे देश के लिए गौरव की वस्तु है. नेतृत्व के लिए इन्हीं के समान आचरण चाहिए. राजेंद्र बाबू का जैसा विनम्रतापूर्वक व्यवहार है, और स्वभाव है, वैसा कहीं भी किसी भी नेता का नहीं है.’

वो न सिर्फ देश के प्रथम राष्ट्रपति  बने बल्कि संविधान सभा के पहले अध्यक्ष भी बने. उनके निधन के बाद के वर्षों में उनकी पोती डॉ. तारा सिंहा को यह मलाल रहा कि देश में सबसे अधिक नजरअंदाज राजेंद्र बाबू हुए हैं. आज भी युवा उनकी शख्सीयत से अंजान है.

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