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तन्हाइयों को तन्हा करना 'गालिब' के हाथ में नहीं, यह 'फिराक गोरखपुरी' का हुनर है

एक शेर को अपने होठों की तान देते हुए फिराक ने कहा था, 'आने वाली नस्लें तुम पर फख्र करेंगी हम-असरो, जब भी उन को ध्यान आएगा तुम ने 'फिराक' को देखा है'

Updated On: Aug 28, 2018 11:39 AM IST

Rituraj Tripathi Rituraj Tripathi

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तन्हाइयों को तन्हा करना 'गालिब' के हाथ में नहीं, यह 'फिराक गोरखपुरी' का हुनर है
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अब तो उन की याद भी आती नहीं, कितनी तन्हा हो गईं तन्हाइयां. ये लाइनें उर्दू के प्रसिद्ध रचनाकार फिराक गोरखपुरी की हैं. तन्हाइयों को तन्हा करने का हुनरमंद अगर कोई शख्स है तो वह केवल फिराक गोरखपुरी ही हैं. यह काम न गालिब कर सकते हैं, न मीर कर सकते हैं और न ही मुसहफी कर सकते हैं.

ऐसा हम बिल्कुल भी नहीं कह रहे बल्कि फिराक की यह रचना खुद बयां कर रही है. उन्होंने लिखा था- 'गालिब' ओ 'मीर' 'मुसहफी', हम भी 'फिराक' कम नहीं. उर्दू गजलों और शायरियों से लोगों के दिलों में रोमांच पैदा कर देने वाले इस शायर का आज यानि मंगलवार को जन्मदिन है.

फिराक एक बेहतरीन उर्दू कवि होने के साथ लेखक और आलोचक भी थे. फिराक गोरखपुरी का जन्म गोरखपुर के एक बहुत पढ़े-लिखे परिवार में 28 अगस्त 1896 को हुआ था. उनका असली नाम रघुपति सहाय था. रघुपति की खासियत यह थी कि पुराने दौर में जब लोग पढ़ाई से कतराते थे, तब उन्होंने उर्दू, फारसी और अंग्रेजी साहित्य में एमए किया था.

वह उस दौर के उर्दू कवि थे जब लोग अलामा इकबाल, फैज अहमद फैज, कैफी आजमी और साहिर लुधियानवी जैसे प्रसिद्ध शायरों को पढ़ा और सुना करते थे.

महात्मा गांधी के लिए ठुकरा दी थी PCS और ICS की नौकरी

फिराक गोरखपुरी प्रोविंसियल सिविल सर्विस और ब्रिटिश कालीन इंडियन सिविल सर्विस के लिए चुने गए थे लेकिन महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन के लिए उन्होंने इन नौकरियों को ठुकरा दिया था और 18 महीनों के लिए जेल चले गए थे. जब वह जेल से छूटे तो पंडित जवाहर लाल नेहरू की सिफारिश से अखिल भारतीय कांग्रेस के ऑफिस में अवर सचिव बन गए.

हालांकि जब नेहरू यूरोप गए तो उन्होंने यह नौकरी छोड़ दी और इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में अंग्रेजी पढ़ाने लगे. यहीं पर उन्होंने बहुत सी उर्दू कविताएं लिखीं. फिराक को अपनी उर्दू रचना 'गुले नग्‍मा' के लिए ज्ञानपीठ और साहित्य अकादमी पुरस्कार भी मिला था.

अपने पूरे जीवन में फिराक ने उर्दू की कई खूबसूरत रचनाएं कीं. उनकी नज्मों में नग्म-ए-साज, रूह ए कायनात, गजलिस्तान, मश्अल, गुलबाग, चिरागां, हजार दास्तान, जुगनू और तरान-ए-इश्क शामिल हैं. उन्होंने सत्यम् शिवम् सुन्दरम् जैसी रुबाइयों की रचना भी की है.

इलाहाबाद के मुशायरे में जब 'फिराक' ने पब्लिक को लगाई लताड़

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एक बार इलाहाबाद में बड़ा मुशायरा चल रहा था. जब फिराक गजल पढ़ने के लिए खड़े हुए तो सामने मौजूद पब्लिक जोर-जोर से हंसने लगी. फिराक को इस बात पर गुस्सा आ गया और उन्होंने भड़कते हुए कहा- लग रहा है कि आज मूंगफली बेचने वालों की औलादें मुशायरा सुनने आईं हैं.

हालांकि बाद में पता लगा कि फिराक की शेरवानी के नीचे उनके पैजामे का नाड़ा लटक रहा था. इसलिए पब्लिक उन पर हंस रही थी. लेकिन मंच पर बैठे लोग भी फिराक को यह बात बताने से डर रहे थे. उस वक्त प्रसिद्ध शायर कैफी आजमी भी मंच पर ही बैठे थे. वह अचानक उठे और फिराक का नाड़ा सही करके अपनी जगह बैठ गए. लेकिन पब्लिक इस बात पर आखिर तक हंसती रही. इस घटना का जिक्र मुंबई के शायर जफर गोरखपुरी ने किया था.

फिराक ने अपनी कई रचनाओं में मय खाने और शराब का जिक्र किया. 'आए थे हंसते खेलते मय-खाने में 'फिराक', जब पी चुके शराब तो संजीदा हो गए.' यह फिराक के सबसे मशहूर शेर में से एक है. एक और शेर को अपने होठों की तान देते हुए फिराक ने कहा था, 'आने वाली नस्लें तुम पर फख्र करेंगी हम-असरो, जब भी उन को ध्यान आएगा तुम ने 'फिराक' को देखा है.'

अपनी शायरियों से लोगों के दिलों को छूने वाले इस शायर ने 3 मार्च 1982 को इस दुनिया को अलविदा कह दिया था. इस मौके पर उनकी एक मशहूर शायरी याद आती है- 'कम से कम मौत से ऐसी मुझे उम्मीद नहीं, जिंदगी तूने तो धोके पे दिया है धोका'

फिराक गोरखपुरी की कुछ मशहूर रचनाएं इस तरह हैं-

'उसी की शरह है ये उठते दर्द का आलम

जो दास्तां थी निहां तेरे आंख उठाने में'

'छलक के कम न हो ऐसी कोई शराब नहीं

निगाह ए नर्गिस ए राना तिरा जवाब नहीं'

'क्या जानिए मौत पहले क्या थी

अब मेरी हयात हो गई है'

'कुछ न पूछो 'फिराक' अहद ए शबाब

रात है नींद है कहानी है'

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