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फेमिनिज्म या मौकापरस्ती: फिल्म रिलीज़ से पहले क्यों जरूरी है कॉन्ट्रोवर्सी!

सामजिक-आर्थिक असमानता से भरे हुए बॉलीवुड का महिलावाद न जाने क्यों तब ही अपना सर उठाता है जब किसी सो-कॉल्ड फेमिनिस्ट फिल्म की रिलीज़ की तारीख नज़दीक होती है

Anu Shakti Singh Updated On: Sep 21, 2017 04:19 PM IST

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फेमिनिज्म या मौकापरस्ती: फिल्म रिलीज़ से पहले क्यों जरूरी है कॉन्ट्रोवर्सी!

सिमरन रिलीज़ हो चुकी है. एक औसत फिल्म होने के बावजूद, कंगना रानौत की इस फिल्म को अच्छे-खासे दर्शक मिल गए हैं. फिल्मों में रुचि रखने वाले अधिकांश लोग इसे देख कर आ चुके हैं. जिन्होंने नहीं देखा है उन्हें भी पता है कि ‘सिमरन’ कंगना रानौत की एक फिल्म है. उसी कंगना रानौत की जिसका एक इंटरव्यू कुछ दिन पहले राष्ट्रीय मुद्दा बन गया था. फेमिनिज्म के ध्वज़-वाहक माने जा रहे इस साक्षात्कार पर इतनी चर्चाएं हुईं जितनी किसी भी और मुद्दे पर हालिया कुछ दिनों में नहीं हुई हैं.

पिछली कहानियां

यह पहला मौका नहीं था जब एक फिल्म के दर्शकों के सामने आने से पहले चर्चाओं और विवादों की श्रृंखला शुरू हो जाए. सितंबर 2016 का पहला हफ्ता. ‘फेमिनिज्म’ पर बॉलीवुड की माइलस्टोन रही फिल्मों में से एक ‘पिंक’ रिलीज़ होने वाली थी.

फिल्म का ट्रेलर काफी दमदार था. देखने वालों ने पहले ही इस फिल्म का स्वागत करना शुरू कर दिया था. ऐन मौके पर, रिलीज़ से ठीक ग्यारह दिन पहले, फिल्म में एक अहम किरदार निभा रहे अभिनेता अमिताभ बच्चन एक खुला ख़त लिखते हैं. इस ख़त का कंटेंट उनकी पोती और नतिनी के नाम समर्पित था. अमिताभ बच्चन उन दोनों से यह अपील कर रहे थे कि जिंदगी के हर दौड़ में अपने फैसले लें. लोग क्या कहेंगे उस पर ध्यान कम दें.

फिर शुरू हुआ विवादों का सिलसिला

अमिताभ के इस ख़त से विवादों का एक नया सिलसिला शुरू हो गया. जहां कई लोगों ने उनके ख़त को सराहा, बहुत सारे लोगों ने इसे फिल्म के प्रचार का नया तरीका करार दिया.

दूसरा मामला 'लिपस्टिक अंडर माय बुर्का’ नाम की फिल्म से जुड़ा हुआ है. इस फिल्म को विवादों में खुद सेंसर बोर्ड लेकर आया था. सेंसर बोर्ड का कहना था कि यह फिल्म हद से ज़्यादा महिला-केन्द्रित फिल्म है. सेंसर बोर्ड के इस बयान ने महिलावाद और फेमिनिज्म पर एक अलग तरह की बहस की शुरुआत कर दी.

लगभग ऐसी ही बहस तब भी हुई थी जब देवगण परिवार द्वारा निर्मित और लीना यादव द्वारा निर्देशित फिल्म ‘पार्च्ड’ रिलीज़ होने वाली थी. फिल्म को सेंसर कर दिया गया था. निर्माता, निर्देशक का कहना था कि सेंसर बोर्ड को फिल्म का महिलावादी रवैया पसंद नहीं आ रहा है.

पार्च्ड को एक ऐसी फिल्म के रूप में प्रचारित किया गया था जो भारतीय समाज को स्त्रीवाद की बिलकुल नई रूप-रेखा प्रदान करने वाली थी. यह बात और है कि लीना यादव की इस फिल्म ने सेक्स से जुड़े हुए कुछ एडवेंचर के अलावा कुछ ख़ास नहीं दिखाया था.

विवाद से बाज़ार

ऐसा नहीं है कि यहां दर्ज की गई फिल्मों के अलावा कभी किसी फिल्म से पहले विवाद नहीं हुए. 2001 रिलीज़ हुई धर्मेश दर्शन की फिल्म 'हां, मैंने भी प्यार किया है' से पहले, फिल्म के मुख्य अभिनेता ‘अभिषेक बच्चन’ और अभिनेत्री ‘करिश्मा कपूर’ के प्यार के किस्से काफी गर्म थे. राम-गोपाल वर्मा की ‘कंपनी’ विवादों का पूरा-पूरा ज़खीरा थी.

अभी हाल ही में रिलीज़ हुई बिग बजट फिल्म ‘ऐ, दिल है मुश्किल’ और ‘रईस’ अपने पाकिस्तानी कलाकारों की वज़ह से चर्चाओं का हिस्सा रही. यह पुरानी नीति है कि विवादों के ज़रिए बाज़ार तक का रास्ता आसानी से तय किया जा सकता है. इस नीति का फ़ायदा फिल्म वाले ख़ूब उठाते हैं, परन्तु सिमरन, पिंक, पार्च्ड और लिपस्टिक अंडर माय बुर्का जैसी फिल्मों का उदाहरण देखें तो ऐसा लगता है जैसे इन फिल्मों के बाज़ार तक पहुंचने का शॉर्टकट ‘फेमिनिज्म’ हो.

पॉपुलर फेमिनिज्म या कॉर्पोरेट स्त्रीवाद

वर्तमान परिदृश्य में ‘स्त्रीवाद’ को कुछ सबसे ज्वलंत मुद्दों में से एक माना जाता है, जिसे भुनाने की कोशिश वैश्विक स्तर पर हो रही है. दुनिया भर के बाजारों में स्त्रीवाद को आगे रख कर मुनाफ़ा कमाने की कोशिश की जा रही है. इमोशन और प्रचलित स्त्री-विमर्श के एलिमेंट्स के पकैजिंग में बिजनेस करने के इस ढंग को कॉर्पोरेट स्त्रीवाद का नाम दिया गया है.

कॉर्पोरेट स्त्रीवाद के क्रम में बॉलीवुड की कथित महिला-पोषी फिल्मों के अलावा अन्तराष्ट्रीय महिला दिवस की पूर्व-संध्या पर वालस्ट्रीट में ‘सींग भिड़ाने को तैयार सांड’ के सामने रखी गई ‘निडर लड़की’ की प्रतिमा को भी जोड़ा जा सकता है.

A statue of a girl facing the Wall St. Bull is seen in the financial district in New York

स्टेट स्ट्रीट ग्लोबल एडवाइजर फर्म द्वारा स्थापित इस प्रतिमा का वास्तविक उद्देश्य स्टेट स्ट्रीट के एक पहल का विज्ञापन करना था. स्टेट स्ट्रीट के इस उपक्रम ने कई तरह के विवादों को जन्म दिया, जिसकी ख़बर सुदूर देशों तक भी पहुंची. कल तक जो स्टेट स्ट्रीट फाइनेंस की दुनिया का नाम हुआ करता था, वह तुरंत ही साहित्य पढ़ने वाले, वित्तीय मामलों से दूरी रखने वाले भारतीय छात्र के लिए भी एक जाना-माना नाम हो गया. स्त्रीवाद के ज़रिए बाज़ार को आसानी से अपने हक में कर लिया गया.

विवादित/प्रचलित स्त्रीवाद बनाम स्त्री-विमर्श

सिमरन को प्रदर्शित हुए हफ्ता होने को आया है, कंगना का विवादित साक्षात्कार भी पुराना हो चला है परन्तु यह विवाद अब भी तारी है कि क्या वह स्त्रीवाद था जो कंगना ने कहा था, या फिर सिमरन एक मौलिक स्त्रीवादी फिल्म है?

जब भी लोग ‘पार्च्ड’ या ‘लिपस्टिक अंडर माय बुर्का’ से जुड़े विवादों की बात करते हैं और इन फिल्मों को परिप्रेक्ष्य में लाते हैं तो सवाल यही उठता है कि क्या इन्होंने स्त्रियों से जुड़े मौलिक मुद्दों की बात की या फिर भावनाओं के वेग पर चलते हुए प्रचलित नारीवाद के ज़रिए अपने लिए बाज़ार का रास्ता खोला?

आज के प्रचलित फेमिनिज्म पर टिप्पणी करते हुए गार्डियन.कॉम की लेखिका ने ‘कारा मार्श शेफ्लर’ ने अपने लेख में लिखा है, “कॉर्पोरेट फेमिनिज्म हमेशा स्त्रियों के सामाजिक बराबरी और इंसाफ के संघर्ष के साथ धोखा करता आया है.” हालांकि यह बात लेखिका ने वालस्ट्रीट वाली निडर लड़की के हवाले से कही है, पर पीआर एजेंसियों के हाथों में झूल रहे बॉलीवुड पर भी यह बात सटीक जान पड़ती है.

सामजिक-आर्थिक असमानता से भरे हुए बॉलीवुड का महिलावाद न जाने क्यों तब ही अपना सर उठाता है जब किसी सो-कॉल्ड फेमिनिस्ट फिल्म की रिलीज़ की तारीख नज़दीक होती है.

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