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तलाश में जिसकी 'सहर' बार बार गुजरी है, उस शायर को 'फ़ैज़ अहमद फ़ैज़' कहते हैं

फ़ैज़ के बारे में कहा जाता है कि वह खुद हैं..खुदा हैं और खुदगर्ज भी हैं. उन्हें फ़ैज़ कहना आसान तो है लेकिन फ़ैज़ जैसा बनना बहुत मुश्किल है

Updated On: Nov 20, 2018 04:00 PM IST

Rituraj Tripathi Rituraj Tripathi

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तलाश में जिसकी 'सहर' बार बार गुजरी है, उस शायर को 'फ़ैज़ अहमद फ़ैज़' कहते हैं

तुम आए हो न शब ए इंतिज़ार गुज़री है, तलाश में है सहर बार बार गुज़री है..जुनूं में जितनी भी गुज़री बकार गुज़री है, अगरचे दिल पे ख़राबी हज़ार गुज़री है..हुई है हज़रत ए नासेह से गुफ़्तुगू जिस शब, वो शब ज़रूर सर ए कूए यार गुज़री है..वो बात सारे फ़साने में जिस का ज़िक्र न था, वो बात उन को बहुत नागवार गुज़री है..न गुल खिले हैं न उन से मिले न मय पी है, अजीब रंग में अब के बहार गुज़री है..चमन पे ग़ारत ए गुलचीं से जाने क्या गुज़री, क़फ़स से आज सबा बेक़रार गुज़री है.

ये खूबसूरत रचना फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की है जिनका नाम शायरी की महफिलों में बड़े एहतराम से लिया जाता है. फ़ैज़ के बारे में कहा जाता है कि वह खुद हैं..खुदा हैं और खुदगर्ज भी हैं. उन्हें फ़ैज़ कहना आसान तो है लेकिन फ़ैज़ जैसा बनना बहुत मुश्किल है.

वो कहते हैं कि..नसीब आज़माने के दिन आ रहे हैं, क़रीब उन के आने के दिन आ रहे हैं..चलो फ़ैज़ फिर से कहीं दिल लगाएं, सुना है ठिकाने के दिन आ रहे हैं. शायरी की दुनिया में अगर फ़ैज़ न हों तो जिंदगी कुछ मायूस सी लगेगी क्योंकि उनका दिया हर शब्द जीने की एक वजह जरूर देता है. आज यानि मंगलवार को उनकी पुण्यतिथि है. पाकिस्तान के लाहौर में 20 नवंबर 1984 को उन्होंने अंतिम सांस ली थी.

फ़ैज़ का जन्म पाकिस्तान के सियालकोट में 13 फरवरी 1911 को हुआ था लेकिन उन्होंने अपना कुछ वक्त भारत में भी बिताया. रूसी महिला एलिस फ़ैज़ से शादी करने के बाद उन्होंने दिल्ली में काफी लम्हे उनके साथ जिए. वह भारत और पाकिस्तान की सरहद को स्वीकार तो करते थे लेकिन उनके दिल में कोई बंदिश नहीं थी. उनके दिल का दरवाजा सभी के लिए खुला था. उनका एक शेर है..तुम्हारी याद के जब ज़ख़्म भरने लगते हैं, किसी बहाने तुम्हें याद करने लगते हैं.

फ़ैज़ को वामपंथी विचारधारा का शायर कहा जाता है लेकिन फ़ैज़ को करीब से जानने वाले लोग हमेशा कहते थे कि विचारधारा कोई भी हो लेकिन फ़ैज़ के दिल में तो इंसानियत धड़कती है जो एक विद्रोही शायर के जरिए लोगों को शब्द देती है. वह लोगों के गमों को अपना समझते हैं, उनके लिए प्यार, क्रांति का दूसरा नाम है.

महबूब के दिल को अपने शब्दों से बुनना भी फ़ैज़ को बखूबी आता था जिसकी कदर दुनिया के हर आशिक ने ताउम्र की. इसलिए उन्हें इश्क और इंकलाब का शायर कहा जाता है. उन्होंने कहा था..और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा, राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा.

ब्रिटिश सेना में कर्नल और 2 अखबारों के रहे संपादक लेकिन मलाल क्रिकेटर न बनने का रहा

FAIZ AHMED FAIZ बहुत कम लोग जानते हैं कि फ़ैज़ ब्रिटिश सेना में कर्नल थे और पाकिस्तान के 2 प्रमुख अखबारों के संपादक भी रहे. उनका हुनर केवल यहीं तक सीमित नहीं रहा बल्कि उन्होंने राजनीति में भी अपना हाथ आजमाया और सरकार में तख्ता पलट के लिए 5 साल के लिए जेल गए.

उन्हें हिंदी, अरबी, अंग्रेजी, उर्दू और रूसी भाषा की भी अच्छी जानकारी थी. एक दौर था कि उन्हें पाकिस्तान से बाहर निकाल दिया गया था लेकिन पूरी दुनिया ने उन्हें गले से लगा लिया. उन्हें नोबल पुरस्कार के लिए भी नामित किया गया था.

दुनिया भर को अपनी शायरी से क्लीन बोल्ड कर देने वाले फ़ैज़ दरअसल टेस्ट क्रिकेटर बनना चाहते थे. उन्हें इस बात का मलाल ताउम्र रहा कि वह क्रिकेटर नहीं बन सके. उनकी शायरी में कई बार यह देखने को मिलता है कि जो नहीं हुआ, उसे वह भूल जाया करते हैं. एक बार उन्होंने शेर फरमाया था..अब अपना इख़्तियार है चाहे जहां चलें, रहबर से अपनी राह जुदा कर चुके हैं हम.

फ़ैज़ मोहब्बत भी बखूबी करते हैं और इंकलाबी भी बेहद सख्त नजर आते हैं. वो कहते हैं कि..आप की याद आती रही रात भर, चांदनी दिल दुखाती रही रात भर. इसके अलावा उन्हें दर्द का भी इल्म है जिसे वो पेश करते हुए कहते हैं..इक तर्ज़ ए तग़ाफ़ुल है सो वो उन को मुबारक, इक अर्ज़ ए तमन्ना है सो हम करते रहेंगे.

जब इंकलाब की बात आती है तो फैज की शायरी सबसे आगे खड़ी नजर आती है. उन्होंने लिखा था...बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे, बोल ज़बां अब तक तेरी है..तेरा सुत्वां जिस्म है तेरा, बोल कि जां अब तक तेरी है..देख कि आहन-गर की दुकां में, तुंद हैं शोले सुर्ख़ है आहन..खुलने लगे क़ुफ़्लों के दहाने, फैला हर इक ज़ंजीर का दामन..बोल ये थोड़ा वक़्त बहुत है,जिस्म ओ ज़बां की मौत से पहले..बोल कि सच ज़िंदा है अब तक, बोल जो कुछ कहना है कह ले.

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