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पार्ट 1: आईएस की दहशत और क्रूरता से आजादी तो मिली लेकिन बगदादी की मौत बिना जश्न अधूरा

इस्लामिक स्टेट की क्रूरता की बात जब भी होगी तो याद आएगा अयलान कुर्दी का चेहरा तो याद आएगा सिंजर पहाड़ियों में आईएस का मचाया यजीदियों का कत्लेआम तो याद आएगा जॉर्डन का वो पायलट जिसे पिंजरे में बंद कर जिंदा जलाया गया था.

Kinshuk Praval Kinshuk Praval Updated On: Dec 12, 2017 09:58 PM IST

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पार्ट 1: आईएस की दहशत और क्रूरता से आजादी तो मिली लेकिन बगदादी की मौत बिना जश्न अधूरा

तकरीबन 3 साल तक चली क्रूरता की इंतेहाई के बाद आखिरकार इराक को निजात मिली उन काले लिबास और नकाबों वाले यमदूतों से जिन्होंने लाखों बेगुनाहों की जान ले कर दहशत की सल्तनत कायम की थी.  इराकी सेना ने इराक से खूंखार संगठन आईएस यानी इस्लामिक संगठन के खात्मे का ऐलान कर दिया. आईएस के खात्मे के इस ऐलान से उन लाखों दिलों को पुरजोर सुकून मिला होगा जो अपना वतन, अपना घरबार छोड़कर, अपने परिवार के सदस्यों की बेरहम हत्याओं की दुखद यादों को लेकर कभी समंदर तो कभी बारूदी सुरंगों से भरे रेगिस्तान के रास्ते भागने को मजबूर हुए थे.

उन्हीं भागते हुए लोगों की तकलीफ, त्रासदी, खौफ और नियति को नुमाया करती तस्वीर अयलान कुर्दी के रूप में सामने आई थी जिस पर दुनिया रो पड़ी थी.सिर्फ एक ही नहीं अयलान था जिसके कफन पर आईएस का नाम लिखा था. हजारों मासूम बच्चों और बेगुनाह औरतों को मौत के घाट उतारने वाला इस्लामिक स्टेट पूरी दुनिया के लिये नासूर बन चुका है.

इराक से आईएस का खात्मा एक आगाज भर ही है क्योंकि अभी आईएस का सरगना अबू बक्र अल बगदादी जिंदा है और सीरिया में आईएस के आतंकी  छिपे हुए हैं. जबकि लाखों की तादाद में इराक और सीरिया से बेदखल लोग शरणार्थी कैंपों में मौत से बदतर जिंदगी जीने को मजबूर हैं.

तीन साल के शासन में आईएस ने सिर्फ और सिर्फ इराक के खूबसूरत शहरों और सभ्यता को मलबे में बदलने  का काम किया तो सामूहिक कब्रों के ढेर लगा कर अपनी दहशत बढ़ाने का काम किया. इराक के बड़े हिस्से पर इस्लामिक स्टेट ने कब्जा किया था लेकिन उसका असली मंसूबा कई देशों के हिस्सों पर कब्जा कर इस्लामिक स्टेट बनाने का था.

इस्लामिक स्टेट की क्रूरता की बात जब भी होगी तो याद आएगा अयलान कुर्दी का चेहरा तो याद आएगा सिंजर पहाड़ियों में आईएस का मचाया यजीदियों का कत्लेआम तो याद आएगा जॉर्डन का वो पायलट जिसे पिंजरे में बंद कर जिंदा जलाया गया था.

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अयलान कुर्दी और दूसरे शरणार्थियों की तकलीफों को बयां करती ब्राजील में सड़क किनारे बनाई गई एक पेंटिंग. (रायटर इमेज)

आईएस अपनी दहशत फैलाने के लिये अपनी बर्बरता के वीडियो बना कर सोशल मीडिया पर पोस्ट करता था. जमीनी जंग के अलावा वो मनोवैज्ञानिक जंग भी छेड़ता था जिसकी वजह से सिर्फ आईएस के लड़ाकों के आने की अफवाह भर से ही शहर खाली होने लगते थे और इराकी सेना अपने हथियार फेंक कर भाग खड़ी होती थी. जो लोग बच जाते थे उन्हें इस्लामिक स्टेट दिल दहला देने वाली मौत देता था और उनकी हत्या के वीडियो बना कर दुनिया भर में अपने प्रचार के तौर पर इस्तेमाल करता था.

इराक से आईएस का सफाया मुमकिन नहीं होता अगर इराकी सेना को अमेरिकी और गठबंधन सेना की मदद नहीं मिलती. करीब दो साल पहले इराकी सेना ने गठबंधन सेना के साथ मिलकर आईएस के सफाये के लिये अभियान छेड़ा. इसी साल सबसे बड़ी कामयाबी तब मिली जब मोसुल को इस्लामिक स्टेट के शिकंजे से आजाद कराया गया. मौसुल की जीत ने साबित कर दिया कि इस्लामिक स्टेट का खात्मा किया जा सकता है क्योंकि दुनियाभर की सेनाओं के हमलों के बावजूद इस्लामिक स्टेट का फन नहीं कुचला जा सका था.

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साल 2014 से इस्लामिक स्टेट के दुनिया के सबसे दुर्दांत आतंकी संगठन बनने का दौर शुरू होता है. इस्लामिक स्टेट किसी कॉरपोरेट कंपनी की तरह काम करता था. इसमें दुनियाभर से आए लड़ाकों को पहले ट्रेनिंग मिलती थी और फिर सैलरी दी जाती थी. यहां आने के बाद रिटायरमेंट का मतलब सिर्फ मौत ही होता था. एक एक आत्मघाती हमले का रिकॉर्ड रखा जाता था. हर साल की प्लानिंग का खाका पहले ही तैयार किया जाता था.

खतरनाक ऑपरेशन को अंजाम देने के बाद ही सैलरी बढ़ती थी और प्रमोशन दिया जाता था. किसी प्रोफेशनल ऑर्गेनाइजेशन की तरह इस्लामिक स्टेट हर साल अपने हमलों और कमाई की रिपोर्ट पेश करता था. उस रिपोर्ट में एक एक धमाके और खून की एक एक बूंद का हिसाब होता था तो साल भर की कमाई का आंकड़ा भी होता था.

साल 2013 में अल नाबा नाम की एक रिपोर्ट में इस्लामिक स्टेट की दहशत का एक एक दस्तावेज मौजूद है. साल 2013 में जहां इस्लामिक स्टेट के पेरोल पर 15 हजार लड़ाके थे तो वहीं उसने हर महीने 51 करोड़ की उगाही भी की थी. एक साल में आईएस ने 1 हजार हत्याएं की थीं, दस हजार वारदातों को अंजाम दिया था जबकि 4 हजार विस्फोटकों का इस्तेमाल कर धमाके किए थे. इस्लामिक स्टेट ने एक साल में कुल 7,681 ऑपरेशन किए .

आईएस के हमले में इराक और सीरिया के चुनिंदा चेहरों को निशाना बनाया गया था जिसमें पुलिस- सेना के बड़े अधिकारी, धार्मिक गुरू और नाटो सेना के जवान तक शामिल थे. एक साल में हजार से ज्यादा हत्याएं कर आईएस ने खुद की दहशत की सल्तनत कायम की. वो भीड़भाड़ वाले इलाकों और मस्जिदों में सीरीयल ब्लास्ट करता तो दूसरी तरफ अपने शरीया के मुताबिक लोगों को ऊंची-ऊंची इमारतों से नीचे फेंकने, बीच चौराहे सर कलम करने और गोलियों से भूनने की सजा देता था.

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आईएस के लड़ाके गोरिल्ला वॉर के सबसे पेशेवर लड़ाके बन चुके थे जो कि हमला कर छिपने में माहिर थे. यही वजह रही कि शहरों पर कब्जे की जंग में इराकी सेना इनकी रणनीति के सामने ज्यादा दिनों तक टिक नहीं पाती थी. आईएस के आत्मघाती हमलावर कभी किसी कार में सवार हो कर या फिर खुद आरडीएक्स की जैकेट पहन कर भीड़भाड़ वाले इलाकों में अपनी जान देकर सैकड़ों जानें लेने का काम करते थे. बाकायदा इस्लामिक स्टेट ने कत्लेआम और फिदायीन हमलों का ऐसा वीडियो तैयार किया था जो कि सोशल मीडिया में जेहाद का जुनून पैदा करने का काम करने लगा था.

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प्रतीकात्मक तस्वीर

लेकिन दुनिया की नजरों में ये आतंकी संगठन तब आया जब इसने इराक के मोसुल और तिकरित पर कब्जा कर लिया और  1700 इराकी सैनिकों के कत्लेआम का वीडियो सोशल मीडिया पर पोस्ट कर अपनी धमक सुनाई. अपनी क्रूरता और दहशत के दम पर आईएस ने अल कायदा को भी पीछे छोड़ दिया. हालांकि अलकायदा की वजह से ही इस्लामिक स्टेट को इराक में उभरने का मौका मिला. साल 2006 से अल कायदा ही अमेरिकी सेना पर जोरदार हमले कर रहा था. अलकायदा की ताकत सुन्नी आतंकी हुआ करते थे.

इराक के अपदस्थ राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन भी सुन्नी थे. सद्दाम की फांसी के बाद इराक में शिया सरकार के सुरक्षाबलों ने सुन्नियों पर बहुत जुल्म ढाए जिसके बाद सुन्नियों की युवा फौज अल -कायदा और इस्लामिक स्टेट में बदले की भावना से शामिल होते चले गए. अलकायदा ने शियाओं पर हमले तेज किए जिससे इराक में शिया- सुन्नी तनाव भी चरम पर पहुंच गया. कभी सुन्नी बहुल इलाकों में धमाके होते तो कभी शियाओं की मस्जिदों में धमाकों से सैकड़ों लोगों की जान जाती. इसी खूनी खेल में इस्लामिक स्टेट की ताकत बढ़ती रही.

इसी बीच अमेरिकी हमले में अबू मुसाब अल जरकावी की मौत  हो गई जिससे अलकायदा के हमलों में कमी आ गई. उधर  इस्लामिक स्टेट सुन्नी प्रभावित इलाकों में अपनी पकड़ मजबूत बनाता रहा. इस्लामिक स्टेट को दोबारा सर उठाने का मौका अमेरिकी फौज की वापसी से मिला. जिसके बाद इस्लामिक स्टेट देखते ही देखते सबसे दुर्दांत संगठन बन कर उभर गया. अप्रैल 2013 में सीरिया के कुछ हिस्सों पर कब्जे के बाद इस्लामिक स्टेट के नाम के साथ ‘एंड सीरिया’ भी जुड़ गया. जनवरी 2014 में आईएस ने सुन्नी प्रभाव वाले शहर फालूजा और रमादी के बड़े हिस्से पर कब्जा कर लिया.

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वहीं तुर्की और सीरिया की सीमा से सटे इलाकों में इसका कब्जा बढ़ने लगा. सीरिया के रक्का और ओलेप्पो समेत 8 शहरों पर कब्जा हो चुका था. जमीनी कब्जे के साथ ही इस्लामिक स्टेट दुनिया का सबसे अमीर आतंकी संगठन बन चुका था. इसकी बड़ी वजह ये थी कि इराक और सीरिया के कब्जे वाले इलाकों की बड़ी बड़ी रिफाइनरियों पर इसने कब्जा कर लिया था. बैजी रिफाइनरी पर कब्जे और बैंकों में डकैती के बाद से ही इस्लामिक स्टेट के दिन बदल चुके थे. आईएस ने तेल के भंडार वाले शहर मोसुल पर कब्जा करने के बाद बैंकों से अरबों रुपये का सोना और नकदी लूट लिया था.

एक अनुमान के मुताबिक इस्लामिक स्टेट के पास बीस हजार करोड़ रुपये की ताकत तीन साल पहले थी. पूर्वी सीरिया में इस्लामिक स्टेट के कब्जे वाले इलाकों के तेल के कुओं से इसने जमकर कमाई की. यहां तक भी कहा जाता है कि इस्लामिक स्टेट ने तुर्की, सऊदी अरब और सीरिया तक को तेल बेचा है. तेल के अलावा जबरन उगाही, अपहरण-फिरौती, महिलाओं की खरीदफरोख्त कर इस्लामिक स्टेट पैसा कमाता था. यजीदी महिलाओं का गुलाम बना कर उन्हें इराक और सीरिया की मंडी में बेचा करता था.

धीरे-धीरे इस्लामिक स्टेट के पास पैसों के दम पर आधुनिक हथियारों का जखीरा बढ़ता ही चला गया. इराकी सेना से छीने गए अमेरिकी टैंक और गोला-बारूद इसकी ताकत में इजाफा करते चले गए.इस्लामिक स्टेट के पास लड़ाकों की फौज थी तो अकूत पैसों की ताकत भी जिसके दम पर ये दुनिया भर से लोगों को इस्लामिक स्टेट में शामिल होने के लिए ललचाने लगा था. सोशल मीडिया पर इसकी टीम लोगों को जेहाद के नाम पर इस्लामिक स्टेट में शामिल होने के लिये लुभावने ऑफर देती थी.

यहां तक कि उन्हें ये तक कहा ख्वाब दिखाया गया कि जेहाद की मौत मरने पर उन्हें जन्नत की हूरें मिलेंगी. साल भर के भीतर ही इस्लामिक स्टेट में दुनिया भर से प्रोफेशनल लड़ाके भी सैलरी पर नौकरी करने पहुंचने लगे. ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, यूरोपियन देशों के अलावा अरब देशों के भी लड़ाके आईएस में शामिल होने लगे थे. इन लड़ाकों को इस्लामिक स्टेट के वीडियो में दिखाया गया रोमांच और क्रूरता लुभाने लगी.

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प्रतीकात्मक तस्वीर

दुनियाभर में ये आतंकी संगठन कुख्यात हो चुका था. बड़ा सवाल ये था कि इसकी क्रूरता के बावजूद इस पर अमेरिका और नाटो देश कोई कार्रवाई नहीं कर रहे थे. कुछ लोगों का ये मानना था कि खुद अमेरिका नहीं चाहता है कि अशांत इराक और सीरिया में इन संगठनों पर नकेल कसी जाए. दरअसल इसके पीछे की रणनीति ये थी कि जितना भी अरब देशों में उथल पुथल रहेगी और ये देश आपस में लड़ेंगे उतना ही इस्रायल से इन देशों का ध्यान दूर रहेगा और इनकी ताकत कमजोर होती जाएगी.

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लेकिन अमेरिका से उलट कोई और भी था जो कुछ और ही करने का इरादा रखता था. वो शख्स कोई और नहीं बल्कि आतंक की इस दुर्दांत कंपनी को तैयार करने वाला अबू बक्र अल बगदादी था जो आज भी जिंदा है और उसकी मौत की खबरें भी अब दहशत का सबब बन चुकी हैं.

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