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पति ने जिसका एनकाउंटर किया, पत्नी ने उसके लिए व्रत रखा

मां की ज़िद पर आईपीएस बने विक्रम सिंह एक उम्र में सन्यासी ही बन गए थे

Updated On: Apr 15, 2018 09:59 AM IST

Sanjeev Kumar Singh Chauhan Sanjeev Kumar Singh Chauhan

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पति ने जिसका एनकाउंटर किया, पत्नी ने उसके लिए व्रत रखा
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हर इंसान के अतीत में कुछ ऐसे वाकए पेश आए होते हैं, जिन्हें याद करके उसे अपने वर्तमान में गुदगुदी सी महसूस होने लगती है. दबंगई से जुड़े तमाम काम करने के साथ-साथ ऐसे ही तमाम मजेदार किस्सों से भरी पड़ी है भारतीय पुलिस सेवा (यूपी कॉडर के 1976 बैच के आईपीएस) के इस दबंग आला पुलिस अफसर की यादों की किताबें. इन्हीं किताबों के पन्ने पलटकर देखते-सुनते हुए ध्यान ही नहीं रहता है कि, यह वही विक्रम सिंह हैं, जो कभी उत्तर-प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (डीजी यूपी पुलिस) हुआ करते थे.

इस बार ‘संडे क्राइम स्पेशल’ में उन्हीं रिटायर्ड आईपीएस विक्रम सिंह ने पुलिस सर्विस के उन तमाम अनकहे-अनछुए पहलूओं से रु-ब-रु कराया, जो अब तक बीती ज़िंदगी में सिर्फ और सिर्फ उन्हें खुद को और या उनके खून के रिश्तों को ही पता थे. वही विक्रम सिंह जो इंटर करने के बाद ‘बैराग’ ले ‘सन्यासी’ होकर घर-परिवार छोड़ आश्रम चले गए थे. जिद्दी मां लक्ष्मी देवी ने भी मगर उसी बैरागी और गुस्सैल बेटे को आईपीएस बनाकर ही दम लिया.

encounter

मई 1950 में उत्तर-प्रदेश के देवरिया का कंहौली गांव

22 मई, 1950 को गांव कंहौली जिला-देवरिया, यूपी के मूल निवासी ठाकुर मार्कण्डेय सिंह और लक्ष्मी देवी के यहां छह संतान (तीन बेटे और तीन बेटी) में सबसे छोटी संतान के रुप में पुत्र ने जन्म लिया. नाम रखा गया विक्रम सिंह. ठाकुर मार्कण्डेय सिंह उत्तर प्रदेश प्रशासनिक सेवा के अफसर थे और पत्नी लक्ष्मी देवी गृहणी. विक्रम सिंह ने सन् 1967-68 में गवर्मेंट इंटर कॉलेज इलाहाबाद से बारहवीं की परीक्षा पास की. वनस्पति शास्त्र और पर्यावरण में एमए करने के लिए इलाहाबाद यूनिवर्सिटी चले गए. यह बात है सन् 1972 की. पीएचडी की उपाधि सन् 1990 में कुमायूं यूनिवर्सिटी नैनीताल (अब उत्तराखंड) से लेकर देश के इस दिलेर आईपीएस ने डॉक्टरेट की उपाधि भी हासिल कर ली.

जिद्दी मां और गुस्सैल ‘बैरागी’ बेटा विक्रम

बेबाक विक्रम सिंह बताते हैं कि, -‘मैं गुस्सैल और मां जिद्दी थीं. पिताजी का हमेशा मुझे ‘सपोर्ट’ रहा. सपोर्ट मां का भी था, मगर उनकी ठानी हुई बात के आगे सबको नतमस्तक हो जाना पड़ता था.’ बताते हुए हंसने लगते हैं विक्रम सिंह. अतीत के पन्नों को पलटते हुए बताते हैं कि,- ‘उन दिनों इंटर किया ही था. तभी मन में ‘बैराग’ लेकर साधू बनने की ललक जाग उठी. मां को पता चला तो विरोध में उन्होंने घर सिर पर उठा लिया. मेरे बैराग लेने के मत से पिता सहमत थे. लिहाजा 1968 में ‘बैरागी-बाबा’ होकर मैं अयोध्या के कई आश्रमों में रहा. एक दिन मन में विचार आया कि, जीवन में पहले कुछ कर लें, क्यों न उसके बाद ही बैराग लिया जाए? लिहाजा खुद ही घर वापिस लौट आया.’ जीवन के अनछुए पहलूओं को सुनाते-सुनाते देश के दबंग आईपीएस रहे चुके डॉ. विक्रम सिंह जोरदार ठहाका मारकर हंस पड़ते हैं.

मां ने ‘साधू’ बेटे को आईपीएस बनाकर चैन लिया

IPS Bikram singh encounter specialist

घंटों चली बेबाक बातचीत के दौरान बताते हैं विक्रम सिंह कि, - ‘कालांतर में मेरा (विक्रम सिंह का) आईपीएस बनना भी मां की महज एक अदद जिद का नतीजा आज देश के सामने है. पुलिस में भर्ती होने की इच्छा कभी नहीं थी. हमेशा शिक्षक बनने की सोचता था. सन् 1974 में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया, एअर इंडिया सहित और भी कई केंद्रीय सेवाओं में सलेक्ट हुआ. सलेक्शन विकल्प में सबसे ऊपर ‘ऑडिट एंड एकाउंट्स’ का और सबसे नीचे था भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) का विकल्प. मां को जब पता चला कि, बेटे का इरादा पुलिस अफसर बनने का नहीं है, तो वह बिगड़ गईं. बोलीं सब विकल्पों में से जो (आईपीएस) आखिरी नंबर पर है, उसे बदलकर तुम अपना वही पहला विकल्प (आईपीएस) फार्म में दुबारा से बदलकर भरो.

मां ने सामने बैठाकर मुझसे आईपीएस का जो विकल्प सलेक्ट करवाया/ भरवाया (उस जमाने में फॉर्म में पूर्व में भरे गए विकल्प का क्रम बाद में भी बदलने की सुविधा थी), वो फार्म लिफाफे में बंद करवाकर मुझसे ले लिया. मां ने खुद ही उस लिफाफे को डाकघर से रजिस्टर्ड (एडी) पोस्ट करवाया. इसके पीछे मां की मंशा थी कि, आईपीएस की च्वॉइस वाले विकल्प का फॉर्म मैं कहीं जमा ही न करवाऊँ. बेसाख्ता खिलखिलाते हुए बताते हैं विक्रम सिंह- ‘और इस तरह मां की हठ ने गुस्सैल और बैरागी बेटे को आईपीएस बना डाला.’

एक बार मैने भी किया था ‘सरेंडर’!

‘सन् 1976 में मेरे आईपीएस बनते ही मां मेरा विवाह कराने पर आ डटीं. मैं जानता था विरोध से जीत हासिल होने की गुंजाईश नहीं है. लिहाजा मां के सामने ‘सरेंडर’ करके मुझ जैसे गुस्सैल इंसान ने नजीर पेश कर दी. परिणाम यह हुआ कि, जनवरी 1976 में नेशनल स्कॉलरशिप होल्डर पद्मा सिंह से विवाह हो गया. पद्मा सिंह हाईस्कूल से एमए (अंग्रेजी) तक स्कूल और इलाहाबाद यूनिवर्सिटी की टॉपर थीं. उस जमाने में पद्मा एअर इंडिया में असिस्टेंट मैनेजर पद पर सलेक्ट हो गईं. इसके बाद भी उन्होंने नौकरी करने के बजाए घर-गृहस्थी को प्राथमिकता दी. मैं आईपीएस से रिटायर हो चुका हूं, मगर पत्नी पद्मा आज भी गृहणी के ही रुप में ही बिना रिटायरमेंट लिए मेरे साथ हैं.’

पहली पोस्टिंग का वह बबाल-ए-जान ‘टारगेट’

बतौर एएसपी पहली पोस्टिंग मिली सन् 1976 में मिर्जापुर जिले में. विंध्याचल सब-डिवीजन में पांच थानों का इंचार्ज बना. विंध्याचल थाना क्षेत्र में उन दिनों कुख्यात डाकू ‘बखेड़ी’ गैंग का आतंक था. एक दिन कप्तान (वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक) ने बुलाया और कहा कि,- ‘विक्रम तुम्हारे इलाके में दस्यु सरगना 2000 रुपए का इनामी बखेड़ी डाकू खुद को पुलिस से भी ज्यादा खतरनाक समझ रहा है. बखेड़ी की गलतफहमियाँ दूर करके दिखाओ.’

जंगल में पुलिस ने डाकू और पब्लिक ने पुलिस घेर ली

एसएसपी से डाकू बखेड़ी गैंग के किस्से सुनकर चुपचाप वहां से चला आया. मैने सब-इंस्पेक्टर विजय बहादुर सिंह, अपने ड्राइवर कास्टेबिल गंगा विष्णु, हवलदार दीनानाथ को बुलाया. मेरे पास .32 बोर कोल्ट पिस्टल और 50 जिंदा कारतूस थे. हवलदार दीनानाथ थॉमसन मशीन कार्बाइन (टीएमसी), जिसमें 200 राउंड (जिंदा कारतूस) और 2 मैगजीन (हर मैगजीन में 30 गोलियां) रहती थीं, को चलाने में माहिर था. तीन दिन के अंदर मैंने उन तीन पुलिसकर्मियों के साथ विंध्याचल पहाड़ी के घने जंगलों में दस्यु सरगना डाकू बखेड़ी घेर लिया. तीन-चार घंटे चली अंधाधुँध फायरिंग में बखेड़ी मारा गया. पहले एनकाउंटर का आंखों देखा हाल बयान करते हुए विक्रम सिंह बताते हैं.

भीड़ जब डाकू की लाश के साथ फोटो खिंचाने पर अड़ी

‘उस जमाने में मोबाइल या सेल्फी सिस्टम नहीं था. पब्लिक बखेड़ी डाकू की लाश देखकर इस कदर उत्साहित हो गयी, कि पुलिस टीम और डाकू की लाश के साथ फोटो खिंचाने को भीड़ ने हमें घेर लिया. आलम यह था कि, शहर से फोटोग्राफर के मुठभेड़ स्थल पर जंगल में पहुंचने तक कई घंटे डाकू बखेड़ी की लाश मुठभेड़ स्थल पर ही पड़ी रही. पब्लिक की खुशी का आलम यह था कि, उसने जंगल में ही 51 रुपए का चंदा इकट्ठा करके पुलिस पार्टी के इनाम-इकराम का इंतजाम कर डाला. हांलांकि वो इनाम हमने मंजूर नहीं किया, क्योंकि अपराधियों का सफाया करना पुलिस की ड्यूटी है.’ बताते हैं विक्रम सिंह.

हड़बड़ाए एसएसपी के हाथ से चाय का कप छूट गया!

IPS Bikram singh encounter specialist (1)

‘आतंक के पर्याय रहे डाकू बखेड़ी को मुठभेड़ में ढेर करने के बाद मैं कप्तान साहब (एसएसपी) के सामने पेश हुआ. मैने उन्हें बताया कि, ‘सर बखेड़ी का एनकाउंटर कर दिया है.’ वे बोले- ‘गुड. वेरी गुड जेल भेज दिया शाबास.’ मैने दोहराया, ‘सर जेल नहीं भेज दिया, एनकाउंटर में बखेड़ी मारा गया है.’ जैसे ही एसएसपी साहब हकीकत समझे तो, झटके से गर्दन को आगे लाते हुए कुर्सी से उठकर खड़े हो गए और बोले- ‘क्या...मार दिया?.’ और इसके साथ ही चाय का कप कप्तान साहब के हाथ से छूटकर नीचे गिर पड़ा. एसएसपी साहब बोले- ‘ओके कोई नहीं, तुम देख लेना मैं तो फिलहाल लखनऊ जा रहा हूं. कुछ जरुरी काम है.’ इस वाकए को सुनाते हुए विक्रम सिंह ठहाका मारकर हंसते हुए कहते हैं, ‘वे एसएसपी साहब अभी मौजूद (जीवित) हैं, अपनी इस खबर में उनका नाम मत खोलना.’ और दुबारा बेसाख्ता हंस पड़ते हैं.

मैंने जो डाकू मारा, पत्नी ने उसके लिए ‘व्रत’ रखा

करीब 36 साल की पुलिस नौकरी के तमाम किस्से सुनाते वक्त भी विक्रम सिंह पत्नी पद्मा सिंह की सहृदयता से जुड़े वाकयों को याद करना नहीं भूलते हैं. बताते हैं कि विंध्याचल के जंगल में डाकू बखेड़ी को मेरे द्वारा मार डाला गया. अगले दिन खबर अखबारों में फ्रंट पेज की सुर्खी बन गयी. एनकाउंटर की खबर छपने वाले दिन ही पत्नी ने व्रत रखा था. मैंने पद्मा (पत्नी) से पूछा,- ‘आज किस बात का व्रत रखा है?’ मेरे सवाल का उत्तर देने के बजाए पत्नी ने सवाल दागते हुए कहा- ‘आपने जिस बखेड़ी डाकू को मारा है क्या उसकी आत्मा नहीं है? क्या वो इंसान नहीं था? उसकी आत्मा की शांति के लिए मेरा ‘व्रत’ रखना और पश्चाताप करना जरुरी था. क्योंकि मैं आपसे जुड़ी हूँ. और आपने ही बखेड़ी को मारा है.’ पद्मा की वो बात मैं जीते-जी नहीं भूलूंगा.

एनकाउंटर में लगी गोली के साथ जाकर सो गया

‘बात 1981 में मैं हमीरपुर का पुलिस अधीक्षक था. थाना जलालपुर इलाके में रात भर चले भीषण एनकाउंटर में 3 डकैत मारे थे. हमारे (पीएसी) दो जवान भी शहीद हुए थे. मेरे पेट में गोली लग चुकी थी. इसके बाद भी बम मारकर छत तोड़ी और मकान में घुसकर बदमाशों को ‘शूट’ किया. रात को घर जाकर सो गया. अपने कपड़ों पर खून लगा देखा तो सोचा एनकाउंटर में मारे गए बदमाशों में से किसी का खून होगा. लेकिन वो खून तो मेरे बदन से (पेट) रिस रहा था. तब याद आया कि, मुठभेड़ के दौरान पेट में गोली लगी थी. फिर सरकारी अस्पताल जाकर एमएलसी बनवाई और मरहम-पट्टी कराई.’ दिल-दहला देने वाली उस खूनी रात का किस्सा भी बातचीत के दौरान विक्रम सिंह किसी चुटकुले की तरह सुनाकर हंसने लगते हैं.

वे खूंखार नाम जो अपराध की किताबों से मिटा दिए

‘1983 में मैं एटा का वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) बनकर पहुंचा ही था कि, उन्हीं दिनों पटियाली थाना क्षेत्र में दस्यु ‘काशी-बाबा’ गैंग से मुठभेड़ हो गयी. गर्दन के पास मेरे कंधे में गोली लग गयी. इसके बाद भी काशी बाबा को उस एनकाउंटर में मारकर ही मौके से हटा. 6 घंटे चले उस एनकाउंटर के लिए मुझे राष्ट्रपति शौर्य पदक मिला था.’ गर्व से बताते हैं विक्रम सिंह. सन् 1990 में एसएसपी कानपुर रहते हुए दंगाईयों ने जाँघ में हैंड-ग्रेनेड मार दिया था, मगर मैंने मौका नहीं छोड़ा, वरना शहर के हालात बदतर हो सकते थे.’

पुलिसकर्मियों की हत्या का दिल दहला देने वाला बदला

IPS Bikram singh encounter specialist (3)

1981 की बात है. विश्वनाथ प्रताप सिंह यूपी के मुख्यमंत्री और नरेश कुमार वर्मा पुलिस महानिदेशक  थे. आनन-फानन में मुझे एसएसपी एटा का चार्ज लेने हेलीकॉप्टर से भेजा गया. वहां जाकर पता लगा कि, नथुआपुर जैसे जघन्य सामूहिक हत्याकांड में मारे गए पुलिस वालों का बदला लेना है. उस कांड में अलीगंज थाने के इंस्पेक्टर राजपाल सिंह और थाने में मौजूद 13 अन्य पुलिस वालों को घात लगाकर थाने के भीतर ही घेरकर मार डाला गया था. नथुआपुर कांड का बदला लेने के साथ ही मैंने छह महीने के अंदर अपराध की किताबों से डाकू महावीरा, पोथीराम गैंग का नाम मिटा दिया. उसके बाद यूपी में मौजूद डाकू मेरे नाम से काँपने लगे थे. बहादुरी के किस्से सुनाते हुए विक्रम सिंह बताते हैं.

कप्तान वसूली करेगा तो इंस्पेक्टर लिहाज क्यों करेगा?

हर इंसान को मौत से डर लगता है. मुझे जब मौत ही नहीं डरा सकी तो, नेता क्या डरा पाता. इसीलिए नौकरी में नेताओं से नहीं डरा. दूसरे ‘ऊपरी-कमाई’ या खाने-कमाने का लालच नहीं था. सो पुलिस की नौकरी में दिल खोलकर मनमर्जी की. जब कप्तान ही (आला पुलिस अफसर) इंस्पेक्टर से ‘वसूली’ करेगा! तो फिर इंस्पेक्टर-दारोगा तुम्हारी (आला पुलिस अफसर) अफसरी का लिहाज क्यों करेगा? बकौल विक्रम सिंह, -‘यही वजह है कि पिताजी ने जो फ्लैट दिया था, आज भी उसी में पड़ा हूं. देखने वाले कहते हैं कि, तुम्हारे से (विक्रम सिंह से) अच्छा तो फ्लैट-बंगला पुलिस इंस्पेक्टर का होता है. पत्नी-बच्चे मेरी पूरी पुलिस सर्विस के दौरान कभी सरकारी कार में नहीं बैठे. शायद यही तमाम वजहें रहीं होंगी कि, मुझे अधिकाँश पोस्टिंग्स वहीं मिलीं जहां ‘मरणोपरांत’ तमाम वीर-बहादुरी के चक्र-इनाम-इकराम मिलने की उम्मीद रहती थी.’ खिलखिलाते हुए बताते हैं विक्रम सिंह.

अगले जन्म में भी आईपीएस विक्रम सिंह ही बनूं

जो विक्रम सिंह इंटर पास करके सन्यासी हो गया था. बाद में वही विक्रम सिंह 36 साल आईपीएस रहकर 31 मई, 2010 को रिटायर हो चुके हैं. जो विक्रम सिंह कभी आईपीएस बनना ही नहीं चाहते थे. आज 50-55 साल बाद वही विक्रम सिंह कहते हैं कि- ‘ईश्वर मुझे अगले जन्म में भी यूपी कॉडर में आईपीएस विक्रम सिंह ही बनाए.’ ऐसा क्यों? पूछने पर कहते हैं- ‘वक्त बलवान है और हसरतें न खत्म होने वाली बीमारी.’

(लेखक अपराध मामलों से जुड़े स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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