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जब पूर्वी पाकिस्तान में कत्ल-ए-आम हुए और अमेरिका हंसता रहा

अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने सभी भारतीयों को कायर और इंदिरा गांधी को बिच कहा था.

FP Staff Updated On: Jan 11, 2018 08:39 AM IST

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जब पूर्वी पाकिस्तान में कत्ल-ए-आम हुए और अमेरिका हंसता रहा

11 जनवरी 1972 वो तारीख है जब पूर्वी पाकिस्तान ने अपना नाम बदल कर बांग्लादेश कर दिया था. 16 दिसंबर 1971 की जीत के बाद बांग्लादेश नया राष्ट्र बना. इस मामले में अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने बेशर्मी से पाकिस्तान का साथ दिया और वहां हो रहे कत्ल-ए-आम को अनदेखा किया. कहा जाता है निक्सन एक ‘महिला’ लीडर की तुलना में एक फौजी जनरल को ज़्यादा ताकतवर और दोस्ती के काबिल समझते थे. उन्होंने ऑन रिकॉर्ड भारतीयों को बास्टर्ड कहा था. इसके बाद एक फोन कॉल पर (निक्सन नहीं जानते थे कि ये रिकॉर्ड हो रही है) इंदिरा गांधी को बिच और भारतीयों को कायर कहा था.

उस समय वहां रह रहे प्रोफेसर गैरी ब्रास ने अपनी खबर में इसका काफी विस्तार से जिक्र किया है.

प्रोफेसर गैरी बास  ने अपनी किताब द ब्लड टेलीग्राम में लिखा है.

कोलकाता में पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) के शरणार्थी

कोलकाता में पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) के शरणार्थी

उस समय ढाका में अमरीकी काउंसलर रहे ‘आर्चर ब्लड’ ने राष्ट्रपति निक्सन को ढाका में मचे कत्ल-ए-आम के बारे में कई टेलीग्राम भेजे. यूएस काउंसलेट ने अमेरिका को ढाका यूनिवर्सिटी में हुए कत्ल-ए-आम की डीटेल में जानकारी दी. खंडहर बन चुके कैम्पस में प्रोफेसर्स को पकड़कर घरों से बाहर लाया गया और गोली मार दी गई.

ढाका शहर की एक तस्वीर

ढाका शहर की एक तस्वीर

एक अमरीकन जिसने कैम्पस का दौरा किया, उसने लिखा – स्टूडेंट्स को कमरों में ‘मूव डाउन’ करवा दिया गया. आग से जलते रेज़ीडेंस हॉल में मशीनगन से इन सभी पर फायर करवा दिया गया. हिंदू डॉरमेट्री से एक इंग्लिश स्कॉलर को खींच कर बाहर लाया गया और गर्दन में गोली मार दी गई. 6 और फैक्ल्टी मेंबर्स के साथ भी इसके बाद यही हुआ. शायद इसके बाद भी कुछ और लोग मारे गए हों.

मुक्तिवाहिनी का एक सिपाही और भारत आते शरणार्थी

मुक्तिवाहिनी का एक सिपाही और भारत आते शरणार्थी

वॉशिंग्टन में जब राष्ट्रपति निक्सन और उनके NSA हेनरी किसिंजर को इसकी खबर मिली तो उस समय उनकी भारत और प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के प्रति घृणा चरम पर थी. करोड़ों शरणार्थियों के भारत आने की बात जानते हुए भी उन्होंने हिंदुस्तान को कोई मदद देने से इनकार कर दिया. ये भारत और अमेरिका दोनों के लिए मानवता का एक बड़ा टेस्ट था.

प्रोफेसर बास आगे लिखते हैं,

हालांकि कई बार अमेरिका ने युद्ध के समय निर्दोषों की उपेक्षा की है, मगर इस बार ये कदम इतिहास के पिछले सभी अध्यायों से अलग था जब अमेरिका सीधे-सीधे कातिलों के साथ खड़ा हो गया.

बाद में क्या हुआ सबको पता है. भारत, जिसकी प्रधानमंत्री एक महिला थी, ने दुनिया का सबसे बड़ा सैन्य समर्पण कराया और खुद निक्सन वॉटरगेट कांड के चलते सत्ता से बाहर चले गए.

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