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DP की DIARY (Part 4): जेब में ‘चवन्नी’ नहीं और इरादा ‘चीनी-मिल’ मालिक बनने का...!

‘यह किस्सा है 1960-65 के आसपास का. मेरी उम्र रही होगी 14-15 साल. मामा सुमेर सिंह के साथ रझैड़ा गांव (पहले यूपी का बक्सर अब सिंभावली इलाका) से सिंभावली चीनी मिल जाने पर मेरा दिल कुलांचें मारता कि, मैं भी ऐसी ही चीनी-मिल लगाऊं!'

Updated On: Nov 25, 2018 07:01 PM IST

Sanjeev Kumar Singh Chauhan Sanjeev Kumar Singh Chauhan

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DP की DIARY (Part 4): जेब में ‘चवन्नी’ नहीं और इरादा ‘चीनी-मिल’ मालिक बनने का...!

‘जिसने गांव से शुरू किए सफर का लुत्फ भारत की संसद तक लिया. राजनीति के तमाम मुगलिया सल्तनती कुनवों से सीधा मुचैटा (भिड़ते-भिड़ाते) लेते हुए. जो शख्स कालांतर में 7 हजार की उधारी से आज करोड़पति बना. सजायाफ्ता कैदी के रूप में जेल की कोठरी में बैठकर. वही इंसान कुबूल करे कि, एक पिता की धन कमाने की ‘अंधी-चाहत’ ने, कैसे एक बेटे के ‘विकास’ के तमाम रास्ते तबाह कर दिए! ‘संडे क्राइम स्पेशल’ की इस खास किश्त में पढ़िए एक ऐसे ही सजायाफ्ता कैदी और पूर्व बाहुबली नेता की ‘जेल-डायरी’. फिलहाल इलाज के लिए जेल से बाहर अस्पताल में दाखिल होने के दौरान हुई बातचीत के खास अंश. बिना किसी अपराध या अपराधी का कोई महिमा-मंडन किए. उसी शख्शियत की मुंहजुबानी. 70 साल की अनकही-अनसुनी कहानी पहली बार.

जेब में चवन्नीनहीं, इरादा चीनी-मिलका!

‘यह किस्सा है 1960-65 के आसपास का. मेरी उम्र रही होगी 14-15 साल. मामा सुमेर सिंह के साथ रझैड़ा गांव (पहले यूपी का बक्सर अब सिंभावली इलाका) से सिंभावली चीनी मिल जाने पर मेरा दिल कुलांचें मारता कि, मैं भी ऐसी ही चीनी-मिल लगाऊं! यह अलग बात है कि उन दिनों, जेब में फूटी कौड़ी या कानी-चवन्नी भले मौजूद नहीं थी. इरादे मगर बुलंद और खुली आंखों के सपने हसीन थे. जेल के अंदर बैठकर लिखी जा रही इस सच्चाई का दूसरा पहलू यह भी है कि, हमारे परिवार में आज 5 चीनी-मिल (2 पंजाब, 2 उत्तर प्रदेश और 1 बिहार में) हैं. इतना ही नहीं यह बात है सन् 2013 के आसपास की. नेपाल में माओवाद चरम पर था. उसी दौरान नेपाली प्रधानमंत्री कोईराला के बेटे अरुण से उसकी बंद पड़ी चीनी मिल को लेने तक की बात चली, मगर वो सिरे अंजाम नहीं चढ़ सका.’

शादी मेरी, रिश्ता पंडित-नाई ‘OK’ कर आए!

15 मई सन् 2017 सुद्धोवाला जेल, देहरादून. ‘गढ़मुक्तेश्वर (यूपी) के पास स्थित है गांव सिकन्दरपुर. इसी गांव के निवासी जगवीर सिंह की बेटी उमलेश से मेरा विवाह होना था. मैं कुछ सोच-समझ पाता उससे पहले ही लड़की (मेरी होने वाली पत्नी) देखकर उसे गांव के जोधा पंडित और बिहारी नाई पुराने रीति-रिवाजों के अनुसार ‘OK’ यानी रिश्ता पक्का कर आए. शादी से पहले मैंने होने वाली पत्नी (उमलेश) और मेरे परिवार ने घर में आने वाली नई बहू का चेहरा तक नहीं देखा. बारात गई रथ और बैलगाड़ी पर. शादी के वक्त मैं 16 साल का और पत्नी उमलेश महज 13 साल की थीं.’

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जागीरदारीबची नहीं फिर भी बदनाम!

‘जब मैं दसवीं में पढ़ रहा था. एक दिन बचपन के दोस्त सुभाष शर्मा और मैंने फिल्म देखने का प्लान बनाया. स्कूल की फीस के पैसों में से कुछ पैसे चुराकर ‘उपकार’ फिल्म देख ली. इसी के बाद सिर पर भूत सवार हुआ फिल्मी-हीरो बनने का. सो जा पहुंचा माया नगरी मुंबई. दोस्तों-भाईयों से सरकारी नौकरी के लिए रिश्वत देने के नाम पर 10 हजार उधार लेकर. उन दिनों नम्रता मूवीज की फिल्म ‘चौकीदार’ बना रहे थे रल्हन ब्रदर्स. मुझे फिल्म में रोल मिला ‘जागीरदार’ का. किस्मत वहां से भी कोल्हू के बैल सा खाली हाथ वापिस सर्फाबाद गांव ले आई. बाद में वही रोल किया विनोद खन्ना ने.’

एक दंगल समारोह में महाबली सतपाल के साथ पूर्व बाहुबली सांसद धर्मपाल यादव

सांप के बिलपर पांव रखे खड़ा था

‘बचपन में एक दिन खेत में पानी भर रहा था. खेत के अंदर जाकर देखा एक जगह पानी गहरे बिल (छेद) में लगातार घुसते जाने की वजह से फसल को नहीं मिल पा रहा है. मैंने पैर के अंगूठे से उस बिल को ऊपर से बंद कर दिया. ताकि पानी बिल के भीतर जाना बंद हो जाए. मेरे द्वारा पांव के अंगूठे से छेद बंद करने के बाद भी साइड में काफी खाली जगह बची रह गई थी. जब नजर दोबारा छेद की ओर गई, तो मैं बेदम-बेसुध हो गया. मेरे अंगूठे से उस बिल की खाली बची हुई जगह में से ही काला-स्याह नाग (कोबरा) बाहर आकर मुझसे एक-डेढ़ फुट की दूरी पर पहुंचकर मुझे घूरने लगा. उस दिन महसूस किया कि.....

‘चंद सांसों पर खड़ा है यह ख्याल-ए-आसमां, खून का गारा बना और ईंट समझो हडिड्यां. मौत की पुरजोर आंधी जब इससे टकराएगी, तो टूटकर ये इमारत खाक में मिल जाएगी’

खैरात में दुपट्टे से कोई खून नहीं पोंछती है

‘मैने वॉलीबॉल में भारत का प्रतिनिधित्व किया है. एक दिन महानंद मिशन इंटर कॉलेज गाजियाबाद के मैदान पर मेरठ कॉलेज से वॉलीबॉल मैच चल रहा था. उसी दौरान बड़ा कांच मेरे घुटने में घुस गया. ज़ख्म इस कदर गहरा हुआ कि, घुटने में घुसे कांच को बाहर खींचते ही घाव से खून का फव्वारा फूट पड़ा. उसी दौरान ग्राउंड पर मैच देख रही एक लड़की (कॉलेज की ही स्टूडेंट) भीड़ को तितर-बितर करती हुई आई. गले में पड़ा अपना दुपट्टा (चुन्नी) खींचा और उसे मेरे खून-आलूदा ज़ख्म पर खुद ही लपेट दिया. उस अजनबी हसीना का चेहरा आज तक जेहन में बसा हुआ है. बाद में उसके पिता रिश्ता लेकर सर्फाबाद (मेरे पुश्तैनी गांव) भी पहुंचे थे. परमात्मा को हमारा मिलन मंजूर नहीं था. बहाने बन गए और हम नहीं मिल सके.’

20-22 साल की उस अल्हड़ उम्र में घटी उस घटना को आज 70 साल की उम्र में याद करते हुए डीपी यादव जलील मानकपुरी की लाइनें सुनाकर मुद्दे से हटना चाहते हैं.

‘हम तुम मिले न थे तो जुदाई का था मलाल, अब ये मलाल है कि तमन्ना निकल गई’

बचपन की हसरत जवानी में पूरी की

कालांतर में सर्फाबाद जैसे पिछड़े गांव से संसद तक पहुंचे धर्मपाल यादव खुद का अतीत भूलना नहीं चाहते हैं. उनके मुताबिक, ‘अतीत ही इंसान के वर्तमान और भविष्य को बनाता है. मैं बिना पुती गांव की बूढ़ी पाठशाला में पढ़ा था. सो जैसे ही ईश्वर ने किसी काबिल बनाया, मैने सबसे पहले पैतृक गांव में 1980 के दशक में दो स्कूल (छात्र-छात्राओं के) खुलवाए. सहसवान में डिग्री कॉलेज, मेरठ में इंजीनियरिंग कॉलेज सहित करीब 12 से ज्यादा शैक्षणिक संस्थाएं पिछड़े और गरीब तबके के बच्चों की शिक्षा के लिए खुलवाईं.’

राजनीति में कोई किसी का हमेशा दोस्त या दुश्मन नहीं रहता...सब वक्त पर निर्भर है...बायें से दायें भारत के पूर्व रक्षामंत्री मुलायम सिंह यादव, अमर सिंह के साथ डीपी यादव

राजनीति में कोई किसी का हमेशा दोस्त या दुश्मन नहीं रहता...सब वक्त पर निर्भर है...बायें से दायें भारत के पूर्व रक्षामंत्री मुलायम सिंह यादव, अमर सिंह के साथ डीपी यादव

सात हजार उधारी से शराब ठेकेदार बना

‘जीवन में उन दिनों उचित मार्ग-दर्शन का अभाव था. ऐसे में 1970 के दशक में मुलाकात हुई दिल्ली में दो मशहूर शराब कारोबारियों से. बाद में इस काम में मेरा साथ दिया दिल्ली के एक शराब व्यापारी ने. उनके साथ मिलकर सरकारी शराब का पहला ठेका लिया दादरी-सिकन्दराबाद में. इसके लिए रिश्तेदारों से 7 हजार रुपए उधार लिए. वो उधारी करीब 2 साल बाद निपटा पाया. सन् 1979 में बुलंदशहर में शराब की चार और दुकानें कर लीं. इसके साथ ही एक किसान के बेटे के पांव व्यापार की पगडंडियों पर चलने लगे. धीरे-धीरे ही क्यों न सही.’

ब्लॉक प्रमुखी से उठे पांव संसद में ठहर गए

‘शराब कारोबार चल निकला. आमदनी-इज्जत दोनों हासिल हो चुकी थीं. उन्हीं दिनों बिसरख का ब्लॉक-प्रमुख बन गया. यह बात है 1980 के दशक की. ब्लॉक-प्रमुख से बढ़ते-बढ़ते कई बार यूपी विधानसभा में विधायक, एक बार पंचायती-राज मंत्री. फिर संभल से लोकसभा और राज्यसभा सांसद बनने तक का सफर तय किया. 1996 में लोकसभा में पहुंचते ही सबसे पहले गांव-किसान के गरीब बच्चों की शिक्षा के लिए धनारी में स्कूलों का इंतजाम किया. इटावा के उसी खानदान से जूझते-मुचैटा लेते हुए जो कभी, डीपी के लिए पलक पांवड़े बिछाए रहता था. यह अलग बात है कि, इटावा का वह कुनवा आज सत्ता के लिए अपनो के ही खून का प्यासा बन बैठा है! जैसे मानों ‘मुगलिया-सल्तनत’ के वारिसान हों.’

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झुग्गी-झोपड़ी में छिपकर रहा परिवार

‘कहने को मैं तीसरी बार विधायक बना था. राजनीतिक दुश्मनी मगर मेरी विधायकी पर भारी पड़ रही थी. लिहाजा मुझे काबू करने के लिए उस वक्त की राज्य सरकार ने, मेरे ऊपर रासुका (NSA) लगा दी. ताकि मेरी वैसाखियां हटाकर इटावा कुनवा राजनीति में ‘लंगड़ा’ कर दिया जाए! ‘रासुका’ लगाने के बाद पुलिस मेरी गिरफ्तारी के लिए खाक छान रही थी. घर-दुकान सब सील कर दिए गए थे. ऐसे में पत्नी उमलेश छोटे-छोटे बच्चों को लेकर सड़क पर आ गई. परिवार ने राजनगर रेलवे स्टेशन के करीब एक झोपड़ी में छिपकर जान बचाई. तब लगा था एक बार को कि, दुश्मनों को नेस्तनाबूद करके आत्महत्या कर लूं.’

उस काली रात में कत्ल होने से बचा!

‘एक दिन गाजियाबाद निवासी इंजीनियर मित्र के साथ अयोध्या जाते वक्त थाना दोस्तपुर (जिला सुल्तानपर) इलाके में यूपी पुलिस ने हमें धर दबोचा. अगले दिन लोकल अखबारों में छपवाया गया कि, ‘फरार चल रहा दबंग डीपी गिरफ्तार’. थाने ले जाकर मुझे अंधेरे कमरे में बंद कर दिया. थोड़ी देर में वहां मेरा पूर्व परिचित स्थानीय खुफिया अनुभाग (L.I.U. UPP) का एक इंस्पेक्टर आया. वो इशारा करके चला गया. सरकारी मशीनरी (यूपी पुलिस) का इरादा ‘नेक’ नहीं लगता है. मैं समझ गया कि, पुलिस मुझे रात के अंधेरे में संदिग्ध हालातों में निपटा लेगी! उस इंस्पेक्टर ने इसके साथ ही आसपास के यादव बाहुल्य पचौता गांव में जाकर पुलिस के घिनौने इरादों की बात फैला दी. रात में ही हजारों ग्रामीणों ने थाना घेर लिया. अगर यह लिखूं कि मैं, उस रात कत्ल होते-होते बच गया. तो गलत नहीं होगा.’

और बस यहीं मैं हार गया....!

‘कोई शक नहीं कि मैंने, शोहरत और सिक्का (धन) खूब कमाया. पत्नी उमलेश गांव की कम पढ़ी-लिखी साधारण गृहणी थीं. मैं मगर महत्वाकांक्षी था. बस यहीं लगता है कि मैं हार गया. इसका सबसे बुरा प्रभाव पड़ा बच्चों पर. आज मैं सहज स्वीकार करता हूं कि, अपने बच्चों की परवरिश में मुझसे कहीं न कहीं चूक जरूर हुई. माता-पिता कतई न भूलें कि, आर्थिक आमदनी की चकाचौंध में अक्सर बच्चे खो जाते है. जिसकी जीवन में दोबारा कभी भरपाई नहीं हो सकती.’

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मेरी चाहत में विकासपिछड़ गया!

‘मानता हूं कि, खुद की व्यस्तताओं के चलते मैं भी बच्चों को समय नहीं दे सका. जिसका परिणाम आज सामने है. मेरे बेटे विकास को बुरी-सोसायटी (गलत संगत) मिलना. जिसके चलते जिंदगी की दौड़ में बेटे विकास का बुरी तरह पिछड़ जाना.’ यहां उल्लेखनीय है कि, डीपी यादव का पुत्र विकास यादव, फुफेर भाई विशाल के साथ कई साल से दिल्ली की तिहाड़ जेल में सजायाफ्ता कैदी के रूप में बंद है. नितिश कटारा हत्याकांड में. जबकि डीपी यादव देहरादून स्थित सुद्धोवाला जेल में 9 मार्च 2015 से उम्रकैद की सजा काट रहे हैं. विधायक महेंद्र सिंह भाटी हत्याकांड में. जेल में बैठकर दुश्मनों के बारे में क्या सोचते हैं? पूछने पर बशीर बद्र की दो लाइनें सुनाकर डीपी कहते हैं, ‘बात खतम करिए.’

‘मुख़ालफ़त से मेरी शख्सियत संवरती है, मैं दुश्मनों का एहतेराम करता हूं.’

(लेख डीपी यादव की जेल में लिखी डायरियों और इलाज के लिए जमानत पर कुछ दिनों के लिए बाहर आने पर उनसे हुई बातचीत पर आधारित है. ‘फ़र्स्टपोस्ट हिंदी और लेखक किसी भी दावे या बयान की पुष्टि नहीं करते)

(लेखक वरिष्ठ खोजी पत्रकार हैं)

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