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बंटवारे की राजनीति से बनता विकास का ‘माया’वी रास्ता

2017 का यूपी विधानसभा का चुनाव नजदीक है. ऐसी संभावना है कि चुनाव से पहले, राज्य के बंटवारे का मुद्दा फिर से बहस में आ सकता है.

Updated On: Nov 20, 2016 12:51 PM IST

Vivek Anand Vivek Anand
सीनियर न्यूज एडिटर, फ़र्स्टपोस्ट हिंदी

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बंटवारे की राजनीति से बनता विकास का ‘माया’वी रास्ता

2017 का यूपी विधानसभा का चुनाव नजदीक है. ऐसी संभावना है कि चुनाव से पहले, राज्य के बंटवारे का मुद्दा फिर से बहस में आ सकता है.

सत्ता के मजबूत दावेदार के तौर पर बीएसपी के उभरने से ये कयास लगाया जा रहा है. कि इस मसले को जनमत संग्रह का विषय बनाया जा सकता है.

2012 के चुनावों के पहले बीएसपी सुप्रीमों मायावती ने राज्य को चार हिस्सों- पूर्वांचल, बुंदेलखंड, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और अवध प्रदेश में बांटने का प्रस्ताव रखा था.

समाजवादी पार्टी ने इस प्रस्ताव का विरोध किया था. उस वक्त यूपी की कमान मायावती के हाथों में थी.

इस मुद्दे पर उन्होंने विपक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पास करवा लिया. बीजेपी और कांग्रेज ने उनके प्रस्ताव का समर्थन किया था.

हालांकि इसके बाद चुनावों में उनकी हार हुई. और प्रस्ताव ठंडे बस्ते में चला गया. बीएसपी के कार्यकर्ताओं को लग रहा है.

कि इस बार राज्य के बंटवारे का मुद्दा पार्टी के चुनावी घोषणा पत्र में शामिल हो सकता है.

सूबे के हर इलाके का समान रूप से विकास और बेहतर कानून व्यवस्था लागू करना. आजादी के बाद से ही यहां के लिए बड़ी चुनौती रही है.

राज्य का बड़ा होना इसकी एक वजह माना गया. मायावती का नजरिया है कि राज्य के बंटवारे से ही विकास का लक्ष्य हासिल किया जा सकता है.

वो इसे साबित करने के लिए प्रतिबद्ध दिखती हैं. यही वजह है कि उन्होंने अखिलेश सरकार को बार-बार अपने निशाने पर लिया है. क्योंकि उनके राज में कानून व्यवस्था की हालत लचर रही है.

बंटवारे के पक्ष में थे अंबेडकर

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1955 में अंबेडकर ने अपनी किताब भाषाई राज्य में भी राज्य के बंटवारे की वकालत की थी.

मायावती ये कह सकती हैं कि वो अंबेडकर की विचारधारा को आगे बढ़ा रही हैं. अपने इस स्टैंड से वो खुद को अंबेडकर की विरासत का असली हकदार भी बता सकती हैं.

बंटवारे की वकालत करने वाले आम लोगों और स्थानीय नेताओं के लिए ये बड़े मौके की तरह है.

ये लोग अपने इलाकों में विकास का काम कर आने भविष्य की राजनीति में खुद की बड़ी भूमिका देख रहे हैं. ये विकास के नए रास्ते खोलने जैसा है.

बंटवारे वाले चारों हिस्सों में मायावती अपने इस कदम से आम जनता के बीच लोकप्रियता हासिल कर सकती हैं.

कोई शक नहीं कि ये बड़ा ही महत्वपूर्ण मसला है. इसके बावजूद पिछले चुनावों में ये माहौल बनाने में नाकाम रहा. तो इसके पीछे कुछ वाजिब वजहें हैं.

पहली बात- मायावती ने ये मसला काफी देर से उठाया. इसलिए ये सिर्फ एक चुनावी मुद्दा बनकर रह गया. दूसरी- प्रचार प्रसार के लिए कम वक्त होने की वजह से ये मुद्दा जमीनी स्तर तक व्यापक तौर से नहीं पहुंच सका.

मायावती फिर से ये मुद्दा उठाएंगी. इस बार हालात अलग हैं. जो उन्हें फायदा पहुंचा सकता है. लोगों को याद है कि सत्ता में रहते हुए, इस मसले पर उन्होंने किस तरह से संघर्ष किया था. ये उनकी खासियत होगी.

खासतौर से पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लोग एक हरेभरे संपन्न सूबे की कल्पना करते हैं. इस इलाके में मायावती की राजनीति का आधार ही है- बंटवारा. जिसके जरिए वो इसे मुमकिन करने के ख्वाब दिखा रही हैं. इस चुनाव में उनका ये कदम वेस्टर्न यूपी में बीएसपी को मजबूती दे सकता है.

बीजेपी का मिलेगा साथ

बंटवारे के मसले पर बीएसपी को बीजेपी का साथ मिल सकता है. क्योंकि बीजेपी हमेशा से ही छोटे राज्यों की तरफदारी करती आई है. उत्तराखंड, झारखंड और छत्तीसगढ़ जैसे छोटे राज्य बीजेपी के वाजपेयी शासन के दौरान ही अस्तित्व में आए.

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हालांकि बीजेपी इस मसले का चुनावी फायदा नहीं ले पाएगी. क्योंकि ये बीएसपी का उठाया मुद्दा है.

कांग्रेस अजीत सिंह की पार्टी के साथ जाने का फैसला कर चुकी है. अजीत सिंह लंबे अरसे से ग्रीन स्टेट और पूर्वांचल-बुंदेलखंड की मांग कर रहे हैं. कांग्रेस की मजबूरी होगी कि वो इस मांग का समर्थन करें.

इस तरह समाजवादी पार्टी अविभाजित उत्तर प्रदेश की बात करने वाली एकलौती पार्टी होगी. इससे फर्क नहीं पड़ता कि कौन सी पार्टी जीतती है. यूपी के बंटवारे का मुद्दा आने वाले चुनाव में बड़ा मुद्दा बनकर उभरेगा.

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