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वो IPS अफसर जिसने तलाशी थाने में ‘दफन' कत्ल की रूह कंपा देने वाली कहानी

ज्यों-ज्यों वक्त गुजरता गया. त्यों-त्यों गुरदीप के कत्ल की फाइलों पर धूल-मिट्टी मकड़ी के जाले चढ़ते-बढ़ते गए

Updated On: Feb 02, 2019 09:22 AM IST

Sanjeev Kumar Singh Chauhan Sanjeev Kumar Singh Chauhan

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वो IPS अफसर जिसने तलाशी थाने में ‘दफन' कत्ल की रूह कंपा देने वाली कहानी

मुहब्बत की तमाम इबारतें सिर्फ और सिर्फ विश्वास की बुनियाद पर ही लिखी-टिकी होती हैं. इतिहास गवाह है कि पाक-मुहब्बत, तन्हा जिंदगी को गुलजार कर देती है. हां, प्यार में अगर ‘पाप’, ‘बेईमानी’ ‘शर्तें’ जैसी ‘ठोकरें’ अगर मनमानी पर उतर आएं तो, फिर उसमें तबाही की हदों को भी माप पाना ना-मुमकिन हो जाता है. इसमें भी कोई शक नहीं.

कुछ इसी तरह के ताने-बाने के इर्द-गिर्द. कई साल तक मंडराती-भटकती फिरी. मैली मुहब्बत में हासिल दिल-दहला देने वाली मौत की सच्ची कहानी ‘पड़ताल’ की इस कड़ी में पेश है. जिद्दी मां और एक अड़ियल आईपीएस अगर अपनी पर न उतर आए होते तो न मालूम, मोहब्बत में विश्वासघात की सजा के बतौर मिली रूह कंपा देने वाली उस ‘मौत’ की कहानी कब तलक पुलिसिया फाइलों में ही पड़ी सिसकती रहती. जमाने वालों के सामने आने की उम्मीद में.

2015 का वो मनहूस नवंबर महीना

पंजाब के खन्ना जिले के समराला थाना इलाका अंतर्गत स्थित है लोपो गांव. लक्ष्मण सिंह पत्नी सरवन कौर के साथ इसी गांव में रहते हैं. लक्ष्मण-सरवन का 23-24 वर्षीय पुत्र गुरदीप लुधियाना में रहकर नौकरी कर रहा था. लोपो गांव और थाना समराला में चर्चित कहानियों के मुताबिक गुरदीप ने किसी लड़की से प्रेम-विवाह किया था. वो भी लुधियाना में ही साथ रह रही थी.

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16 नवंबर 2015 को गुरदीप लोपो गांव में मां-बाप से मिलने आया था. दो दिन बाद यानि 18 तारीख को वो गांव से लुधियाना चला गया. गांव में बवाल तो तब मचा जब, 22 नवंबर 2018 को सुबह करीब छह बजे के करीब लक्ष्मण सिंह को, बेटे गुरदीप की लाश अपने ही तबेले में (जानवरों को बांधने का बाड़ा या स्थान) पड़ी मिली.

गांव में गबरू की लाश मिलने से कोहराम मचा

युवा मगर एक बिगड़ैल लड़के की लाश उसी के घर के बाहर जानवरों के तबेले में मिलने से लोपो गांव में कोहराम मच गया. सूचना पाकर उस वक्त समराला थाना प्रभारी रहे इंस्पेक्टर मंजीत सिंह (अब पंजाब पुलिस के डिप्टी एसपी) मय फोर्स मौके पर पहुंच गए. लाश को पोस्टमॉर्टम के बाद परिवार वालों के हवाले कर दिया गया. पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट से खुलासा हुआ कि गुरदीप की हत्या गला घोंटकर की गई थी. पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में वारदात के वक्त गुरदीप के शराब के नशे में होने की भी आशंका जताई गई थी. लिहाजा उसका विसरा आगे की ‘पड़ताल’ के वास्ते सील करके प्रयोगशाला भेज दिया गया.

एसएचओ के साथ ही चली गई ‘पड़ताल’!

गुरदीप हत्याकांड की वजह पता चल पाती उससे पहले ही समराला थाना प्रभारी इंस्पेक्टर मंजीत सिंह का वहां से ट्रांसफर कर दिया गया. मंजीत सिंह थाने से क्या रवाना हुए. उनके बाद चार्ज लेने पहुंचे थाना-प्रभारी और उनके मातहतों ने गुरदीप हत्याकांड की जांच के ऊपर तमाम पुरानी फाइलों का बोझ लाद दिया.

मंजीत सिंह

मंजीत सिंह

इसका परिणाम यह रहा कि ज्यों-ज्यों वक्त गुजरता गया. त्यों-त्यों गुरदीप के कत्ल की फाइलों पर धूल-मिट्टी मकड़ी के जाले चढ़ते-बढ़ते गए. भला पुलिस को क्या पड़ी थी कि हत्यारों को पकड़ कर कानून के हवाले करे? शायद इसलिए क्योंकि मरने वाला गुरदीप समराला थाने में तैनात या फिर पंजाब पुलिस के किसी अफसर या कर्मचारी का रिश्तेदार या ‘अपना’ नहीं रहा होगा!

वो जिद्दी मां जो बिना थके जूझती रही

पंजाब पुलिस में किसी को चिंता नहीं थी कि गुरदीप हत्याकांड का खुलासा किया या कराया जाए. वैसे भी लोपो गांव के लोग गुरदीप हत्याकांड पर कुछ दिन शोर-शराबा करके ठंडे पड़ चुके थे.

भला ऐसे में राज्य पुलिस के आला हुक्मरानों या फिर थाना समराला पुलिस को भला क्या पड़ी थी कि वो ‘आ बैल मुझे मार’ वाली कहावत. खुद पर लागू करके गुरदीप के हत्यारों की धर-पकड़ शुरू करने जैसा बबाल खुद शुरू करे. और वैसे भी बीतते वक्त के साथ मामला फाइलों के बोझ के नीचे दब चुका था.

हां, इस पूरे ढाई साल तक ‘लाल’ के हत्यारों की तलाश में 50 साल की मां सरवन कौर एक दिन भी न चैन से सोई. न ही अधेड़ावस्था में भी उसने अपने घुटनों में थकान महसूस की. बुझे दिल से ही सही मगर जिद पर उतरी सरवन कौन बेटे के कातिलों की तलाश में थाने-चौकी और पंजाब पुलिस (खन्ना पुलिस) के तमाम आला-अफसरों की ड्योढ़ियों पर दिन-रात भूखे-प्यासे ही एड़ियां रगड़ती रही.

अड़ियल आईपीएस ने खोजी कत्ल की फाइल

छोटे बेटे गुरदीप उर्फ निक्का (निका) के कातिलों की तलाश में दर-दर भटकती सरवन कौर की जिंदगी के ढाई वर्ष और गुजर गए. इसी बीच बीते साल यानि जुलाई 2018 में, 2011 बैच पंजाब कैडर के अड़ियल समझने वाले युवा-चर्चित आईपीएस ध्रुव दहिया, खन्ना जिले के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) बनकर पहुंच गए. ध्रुव दहिया इससे पहले होशियारपुर और दसूहा में भी पोस्टेड रहकर खासे चर्चा में आ चुके थे.

हालांकि आईपीएस ट्रेनिंग के बाद उनकी पहली पोस्टिंग बतौर एसीपी लुधियाना में हुई थी. यह वही अड़ियल और दबंग आईपीएस ध्रुव दहिया थे जिन्होंने, तीन महीने की ही आईपीएस की नौकरी में. लुधियाना में (ट्रैफिक) पोस्टिंग के दौरान हरियाणा एंड पंजाब हाईकोर्ट के एक जस्टिस की कार का ही नो-पार्किंग का चालान कटवा डाला.

यह अलग बात है कि उस चालान-कांड से चर्चा में आए ध्रुव दहिया को लुधियाना से हटाकर जालंधर, दसूहा और होशियारपुर आदि-आदि इलाकों में पोस्टिंग काटनी पड़ी. ऐसे ध्रुव दहिया की नजर में जब ढाई साल से थाना समराला में फाइलों के वजन से दबी पड़ी गुरदीप हत्याकांड की फाइल का मामला आया. तो उन्होंने मातहतों को इस कदर आड़े हाथ ले लिया कि उन्हें खुद की ‘नौकरी’ के लाले पड़ते नजर आने लगे.

मर्डर किसी का और ‘मातम’ में मातहत

खाकी वर्दी में सिर्फ-और सिर्फ काम से ताल्लुक रखने वाले तेज-तर्रार युवा आईपीएस ध्रुव दहिया ने गुरदीप हत्याकांड की फाइल ढुंढवाकर पहले खुद पढ़ी. ताकि आइंदा इस बंद पड़े कत्ल के मामले को लेकर, उनके मातहत कहीं उन्हें ही वाहियात ‘ज्ञान’ न बांटने लगें. उसके बाद उन्होंने मातहत पुलिस अफसर हरसिमरत सिंह (डिप्टी एसपी पंजाब पुलिस) तथा समराला थाना प्रभारी भूपिंदर सिंह को तलब कर लिया.

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दोनों ही आला-मातहतों को एसएसपी ने इस सख्त हिदायत (नसीहत कहना भी अनुचित नहीं होगा) के साथ दफ्तर से रवाना किया कि वे गुरदीप हत्याकांड की रोजाना की रिपोर्ट उनके सामने पेश करेंगे. करीब ढाई साल से थाना समराला की धूल फांकती फाइलों में दफन गुरदीप हत्याकांड को लेकर साहब द्वारा कसा गया शिकंजा, भला मातहतों को कैसे भाता? सो कह तो कुछ नहीं पाए मगर मन मसोस कर दफ्तर से चुपचाप निकल गए.

सटीक साबित हुई साहब की ‘घुड़की’

जिला पुलिस कप्तान की मातहतों को दी गई खुली ‘घुड़की’ का असर अगले दिन से ही दिखाई देने लगा. जिसके परिणाम स्वरुप मातहत पुलिस अफसरान एक दिन उन चार संदिग्धों को घेर-बटोरकर साहब के सामने ले आये, जिन्हें गिरफ्तार करने की गुहार गुरदीप की अधेड़ और गरीब मां सरवन कौर बीते ढाई साल से लगाती फिर रही थी. इतना ही नहीं दो दिनों के अंदर ही ध्रुव दहिया के सामने वो पुलिसिया ‘मुखबिर-खास’ (इन्फॉर्मर) भी ला खड़ा किया गया जिसके सामने गुरदीप को कत्ल करने का षड्यंत्र बना.

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इससे इस तथ्य को बल मिलता है कि पुलिस अगर ईमानदारी से चाहे तो वो, सात तालों में छिपे अपराधी को भी खोज लाए. अमूमन मगर ऐसा होता नहीं है. जैसा गुरदीप सिंह के कत्ल के मामले में ढाई साल तक पंजाब पुलिस (समराला थाना पुलिस) ने किया.

मुहब्बत में ‘ब्लैकमेलिंग’ बनी अकाल-मौत

पुलिस हिरासत में लिए गए चारों संदिग्ध (गांव लोपो निवासी मोहन सिंह, गुरमुख सिंह, दविंदर सिंह और बब्बू सिंह) लोगों से पूछताछ की गई. गिरफ्तार चारों संदिग्ध षड्यंत्रकारी आपस में एक ही परिवार के और रिश्ते में पिता, पुत्र, भाई, चाचा और भतीजा थे. एसएसपी ने कई घंटे तक थाना समराला में संदिग्धों से खुद पूछताछ की. वे सब मगर पुलिस कप्तान को कथित रुप से बरगलाते रहे.

अंतत: सीधी उंगली से बात बनती न देख ध्रुव दहिया ने, उस इंसान (चंद सिंह) को संदिग्धों के सामने बुलवाकर खड़ा कर दिया, जिसके सामने, गुरदीप हत्याकांड का ताना-बाना बुना गया था. समराला थाना पुलिस द्वारा कत्ल के इस मामले की ज़मीदोज की जा चुकी ‘पड़ताल’ को अंजाम तक पहुंचाने वाले आईपीएस ध्रुव दहिया के मुताबिक, ‘गुरदीप हत्याकांड,‘ब्लैकमेलिंग’ और ‘विश्वासघात’ का घिनौना प्रतिफल था.

दरअसल गुरदीप, मोहन सिंह की बेटी (पेशे से शिक्षिका) और अपनी बचपन की प्रेमिका से बेपनाह मुहब्बत करता था. दोनो ही बचपन से जवानी तक साथ खेले-पढ़े और बढ़े थे. गांव में पड़ोसी होने के नाते दोनो का एक-दूसरे के घरों में आना-जाना था. इसी रिश्ते को लेकर बाद में दोनो परिवारों में खटास पैदा हो गयी. बाद में यही रंजिश गुरदीप के कत्ल और दो परिवारों की तबाही का सबब बन गयी.’

माफी भी न बचा सकी ‘जिगर’ की जान

पंजाब पुलिस की ‘पड़ताल’ में सामने आए सनसनीखेज तथ्यों के मुताबिक, मोहन सिंह को बेटी और पड़ोसी गुरदीप का मिलना-जुलना बेहद अखरने लगा था. वजह यह थी कि बेटी के प्रेम-प्रसंग के चलते गांव में उनकी बदनामी हो रही थी. बात इस कदर बढ़ी कि कलेश खत्म करने के लिए एक दिन बेटे गुरदीप की हरकतों के लिए लक्ष्मण सिंह और सरवन कौर को मोहन सिंह के घर जाकर उनसे माफी भी मांगनी पड़ी थी.

यह अलग बात है कि, इस हद तलक गुरदीप के मां-बाप का झुकना भी, अड़ियल और जिद्दी मोहन सिंह को रास नहीं आया. मोहन सिंह को शक था कि, गुरदीप ने उसकी बेटी की अश्लील फोटो खींच लीं हैं. जिन्हें वो (गुरदीप) सोशल-साइट्स पर डालकर उसकी बेटी को ‘ब्लैकमेल’ करता है.

इज्जत बचाने की नाकाम कोशिश में मिली जेल

हमेशा-हमेशा के लिए गुरदीप से निजात पाने के लिए. एक दिन मोहन सिंह ने उसे लुधियाना से गांव के बाहर बुलवा लिया. इस बहाने से कि वो अपनी बेटी का रिश्ता उसके (गुरदीप) साथ करने के लिए अंतिम निर्णय लेना चाहता है. मोहन सिंह के विश्वासघाती-षडयंत्र से अनजान गुरदीप जैसे ही सूनसान स्थान पर पहुंचा, मोहन सिंह और उसके रिश्तेदारों ने उसे कत्ल कर दिया.

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सामने आये तथ्यों से यह बात भी पता चली कि वारदात के वक्त हत्यारों का विरोध गुरदीप खुलकर नहीं कर सका था. क्योंकि उस वक्त वो शराब के नशे में था. फिलहाल सभी आरोपी जेल में बंद सजा मुकर्रर होने के इंतजार में हैं.

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सबकुछ निर्भर इस पर करेगा कि मामले की पुलिसिया तफ्तीश यानि ‘पड़ताल’ (मय गवाह और सबूत) अदालत में किस करवट बैठती है? फिलहाल अब तक हुई गुरदीप हत्याकांड की पड़ताल से यह तो तय हो गया कि अगर गुरदीप की मां और पंजाब पुलिस के चर्चित तथा अड़ियल युवा आईपीएस और खन्ना जिले के मौजूदा वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक ध्रुव दहिया अगर, अपनी पर न उतर आये होते तो, समराला थाने की पुलिस ने हत्याकांड जैसी सनसनीखेज वारदात को ‘ज़मींदोज’ करने/कराने कोई कोर कसर बाकी नहीं छोड़ी थी.

(लेखक वरिष्ठ खोजी पत्रकार हैं...संडे क्राइम स्पेशल ‘कोतवाली की कहानी’ में पढ़ना न भूलें, यूपी पुलिस में कभी कोतवाल कप्तान पर भारी और कभी कप्तान करे ‘कोतवाल’ पर सवारी)

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