S M L

डेमोक्रेसी इन इंडिया पार्ट 15: लोकतंत्र ने भारतीय सेना में भी सामंतवाद की जड़ें तोड़ीं

मेरी कोशिश ये समझने की है कि ऊपर से लादे गए इस लोकतंत्र के बुनियादी मूल्यों ने भारतीय सेना जैसे विशाल और दर्जों को मानने वाले संगठन पर कितनी गहराई तक असर किया है.

Updated On: Aug 11, 2018 09:14 AM IST

Tufail Ahmad Tufail Ahmad

0
डेमोक्रेसी इन इंडिया पार्ट 15: लोकतंत्र ने भारतीय सेना में भी सामंतवाद की जड़ें तोड़ीं

(संपादक की ओर से- भारत गणराज्य अपने 70 बरस पूरे करने जा रहा है. ऐसे वक्त में पूर्व बीबीसी पत्रकार तुफ़ैल अहमद ने शुरू किया है, भारत भ्रमण. इसमें वो ये पड़ताल करने की कोशिश कर रहे हैं कि देश में लोकतंत्र जमीनी स्तर पर कैसे काम कर रहा है. तुफैल अहमद को इसकी प्रेरणा फ्रेंच लेखक एलेक्सिस डे टॉकविल से मिली. जिन्होंने पूरे अमेरिका में घूमने के बाद 'डेमोक्रेसी इन अमेरिका' लिखी थी. तुफ़ैल अहमद इस वक्त वॉशिंगटन स्थित मिडिल ईस्ट मीडिया रिसर्च इंस्टीट्यूट में सीनियर फेलो हैं. वो भारत भ्रमण के अपने तजुर्बे पर आधारित इस सीरिज में भारत की सामाजिक हकीकत की पड़ताल करेंगे. वो ये जानने की कोशिश करेंगे भारत का समाज लोकतंत्र के वादे से किस तरह मुखातिब हो रहा है और इसका आम भारतीय नागरिक पर क्या असर पड़ रहा है. तुफ़ैल की सीरीज़, 'डेमोक्रेसी इन इंडिया' की ये चौदहवीं किस्त है. इस सीरीज के बाकी लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)

पुणे: भारत में लोकतंत्र किस हालत में है, इसकी पड़ताल करने वाली सीरीज इस किस्त में मेरा मकसद भारतीय सैन्य सेवाओं पर जम्हूरियत के असर को समझने की कोशिश करूंगा. इसके लिए पुणे से बेहतर जगह और कौन हो सकती है? पुणे, भारतीय सेना की दक्षिणी कमांड का मुख्यालय है. यहां पर इस मुद्दे पर चर्चा के लिए बहुत से रिटायर्ड, तजुर्बेकार अफसर आसानी से मिल सकते हैं. अमरीका में लोकतंत्र जमीन से फलते-फूलते हुए ऊपर तक पहुंचा. वहीं, हिंदुस्तान में लोकतंत्र को जनता पर ऊपर से थोपा गया. मेरी कोशिश ये समझने की है कि ऊपर से लादे गए इस लोकतंत्र के बुनियादी मूल्यों ने भारतीय सेना जैसे विशाल और दर्जों को मानने वाले संगठन पर कितनी गहराई तक असर किया है.

रिटायर्ड कर्नल जे.ए. उप्पल श्रीलंका, पूर्वोत्तर भारत और कश्मीर में तैनात रहे थे. वो अब सिविलियन सेक्टर में काम करते हैं. कर्नल उप्पल कहते हैं, 'भारतीय सेना में अधिकारों का हस्तांतरण हुआ है. लोकतंत्र के बिना ऐसा होना मुमकिन नहीं था. पहले सेना के अधिकारी हवलदारों को कम जिम्मेदारियां देते थे.' वो एक गोल्फ कोर्स की मिसाल देते हुए कहते हैं कि पहले इसकी निगरानी का काम सेना का एक अधिकारी करता था. लेकिन अब ये जिम्मेदारी एक हवलदार के पास है.

उप्पल कहते हैं, 'पहले सिर्फ आदेश जारी होते थे, चर्चा नहीं होती थी. लेकिन लोकतांत्रिक जागरूकता के चलते अब अधिकारी अपने मातहतों से चर्चा के बाद आदेश देते हैं. अब किसी भी फैसले पर ज्यादा खुलकर चर्चा होती है. फैसलों में ज्यादा लोगों की भागीदारी होती है. सैनिकों और अधिकारियों के बीच विचारों का लेन-देन ज्यादा होता है. अब किसी भी अफसर के लिए जेसीओ या हवलदार से विचारों को लेक बात करना आसान हो गया है.'

लोकतंत्र का एक असर ये भी हुआ है कि शिक्षा और हुनर का विस्तार हुआ है. उप्पल कहते हैं कि लोकतंत्र हमें ये बताता है कि कौन सा करियर हमारे लिए ज्यादा मुफीद होगा. किस सेक्टर में जाने से ज्यादा पैसे कमा सकेंगे. इसका ये नतीजा हुआ है कि आज कम लोग सेना में आना चाहते हैं. कर्नल उप्पल कहते हैं, 'सेना में भर्ती होने वालों का स्तर घटा है. आज 32 इंच की छाती वाले लोग सेना में नहीं आते. वो दूसरे काम करते हैं. अच्छे, हुनरमंद लोग सेना की नौकरी की तरफ कम ही आकर्षित होते हैं. अगर आप आईआईटी-बॉम्बे या पुणे के फर्ग्यूसन कॉलेज से छात्रों से बात करें, तो, उनमें से ज्यादातर अपनी स्टार्ट-अप कंपनियां शुरू करना चाहते हैं. आज से 20 साल पहले वो सेना की नौकरी को तरजीह देते थे.'

भारतीय नौसेना के पूर्व अधिकारी अतुल भारद्वाज भी कर्नल उप्पल की बातों से इत्तेफाक रखते हैं. वो कहते हैं कि लोकतंत्र की वजह से सेना का ऊंचा दर्जा कम हुआ है. भारद्वाज कहते हैं, 'अंग्रेजों के जमाने में सेना ऊंचे तबके के लोगों का क्लब हुआ करती थी. देश में लोकतंत्र की आमद के बाद सेना का वो दर्जा खत्म हो गया है.' भारद्वाज कहते हैं कि पहले जो युवा छठीं कक्षा तक पढ़ लेते थे, वो भी सेना में भर्ती हो सकते थे. लेकिन लोकतंत्र के असर से आज जनता ज्यादा पढ़-लिख रही है. आज सेना में भर्ती के लिए युवकों को 12वीं कक्षा पास करना जरूरी है. पढ़ाई करने की वजह से वो आधुनिक हथियार और दूसरी मशीनों को अच्छे से इस्तेमाल कर सकते हैं.

भारद्वाज इस बात पर चिंता जताते हैं कि लोकतंत्र की वजह से सेना में राजनीति भी घुस आई है. वो कहते हैं, 'पहले भारतीय सेना का राजनीति से कोई लेना-देना नहीं था. यहां तक कि जब भारतीय सेना के अधिकारी सोवियत संघ के दौरे पर जाते थे, तब भी उन पर सोवियत संघ की विचारधारा का असर नहीं होता था. सेना का ये गैरराजनीतिक मिजाज 1980 के दशक तक बना रहा था.'

सेना के राजनीति से दूर रहने की एक वजह ये भी थी कि नए आजाद हुए देश में सैन्य अधिकारियों को देश के प्रति अपनी वफादारी साबित करनी होती थी. अतुल भारद्वाज एक अहम बात कहते हैं, 'सेना के अधिकारियों में इस बात की शर्मिंदगी थी कि वो आजादी की लड़ाई का हिस्सा नहीं थे. क्योंकि वो ब्रिटिश साम्राज्यवाद के हितों की हिफाजत में लगे हुए थे. इसलिए आजादी के बाद सेना अपना भारतीयकरण करना चाहती थी. इसलिए अधिकारी देश के प्रति अपनी वफादारी को अच्छे से साबित करना चाहते थे. उन्होंने खुद को राजनीति से दूर कर लिया था.'

Lal Krishna Advani

लेकिन, लालकृष्ण आडवाणी की अगुवाई वाले अयोध्या आंदोलन की वजह से सेना की गैरराजीनिक छवि को नुकसान पहुंचा. क्योंकि उस वक्त 80 पूर्व सैन्य अधिकारी बीजेपी में शामिल हो गए थे. अतुल भारद्वाज कहते हैं, 'हालांकि वो सभी रिटायर्ड अधिकारी थे. लेकिन ये सेना का पहला बड़ा राजनीतिकरण हुआ था.' भारद्वाज के मुताबिक भारतीय सेना के राजनीतिकरण का दूसरा बड़ा दौर नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद शुरू हुआ.

भारद्वाज कहते हैं, 'मोदी के सत्ता में आने के बाद से सेना में सियासी ध्रुवीकरण और तेज हो गया. सेना के मौजूदा अधिकारी आज फेसबुक और दूसरे सोशल मीडिया पर सियासी मसलों पर खुलकर अपनी राय रख रहे हैं. सेना का ये सियासीकरण और ध्रुवीकरण नया है और 2014 के बाद शुरू हुआ है.'

नाम न छापने की शर्त पर एक रिटायर्ड मेजर ने कहा, 'किसी भी जनरल को राजनीति में जाने की इजाजत नहीं होनी चाहिए. क्योंकि अगर वो ऐसा करता है तो उसके मातहत काम करने वाले, सैनिक और अधिकारी, जो अभी भी सेना में हैं, उन पर सियासी असर पड़ सकता है. इससे सैन्य अधिकारियों के बीच सियासी लकीर खिंच जाएगी. इससे सेना के पेशेवेर होने पर असर होगा.'

रिटायर्ड ब्रिगेडियर हेमंत महाजन पूर्वोत्तर, कारगिल और कई राज्यों में तैनात रहे हैं. उन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा के मसले पर कई किताबें भी लिखी हैं. ब्रिगेडियर महाजन कहते हैं, 'आज सेना और राजनेताओं के बीच कोई संपर्क नहीं है. सेना पर सियासत का इतना ही असर होता है कि सरकार, सेना को कितना बजट देती है.'

ब्रिगेडियर महाजन कहते हैं कि अगर टाटा, इन्फोसिस और दूसरी कंपनियां सैन्य प्रतिभा का इस्तेमाल कर सकती हैं, तो सरकार क्यों न करे. उनकी नजर में पूर्व सैनिक या पुलिसवाले में शामिल होकर उसका काम-काज सुधार सकते हैं.

आजादी के बाद सेना ब्रिटिश अधिकारियों के चंगुल से छूटी तो वो खुद का भारतीयकरण करना चाहती थी. जनता ने भी सेना से अपनापन कायम कर लिया. अतुल भारद्वाज कहते हैं कि 1962 की लड़ाई का भारतीय सेना पर गहरा असर हुआ था. भारद्वाज कहते हैं, 'हालांकि हम वो युद्ध हार गए थे, लेकिन इससे सेना के भारतीयकरण में मदद मिली. जब लता मंगेशकर ने ऐ मेरे वतन के लोगो, जरा आंख में भर लो पानी गीत गाया था, तो इस गीत में पूरे देश के जज्बात भरे थे. 1962 की जंग के चलते सेना का आम भारतीय से राब्ता हुआ.'

1962 के युद्ध का एक और असर भी हुआ था. ब्रिगेडियर हेमंत कहते हैं कि 1962 की जंग के बाद सेना में डिवीजनों की तादाद दोगुनी हो गई. देश के हर इलाके और तबके के लोग सेना में शामिल हुए, खास तौर से ग्रामीण इलाकों से सेना की भर्ती करने पर जोर दिया गया. दूर-दराज के इलाकों में सेना की भर्ती रैलियां आयोजित की गईं. जबकि पहले सेना की भर्तियां शहरों में ही हुआ करती थीं. हेमंत बताते हैं कि सेना के स्कूलों पर भी लोकतांत्रिक प्रक्रिया का असर हुआ. 1970-80 के दशक के आते-आते सेना ने सैनिकों की जरूरतों के हिसाब से ढेर सारे स्कूल-कॉलेज खोले. आज सेना के जवानों और अधिकारियों के बच्चे एक साथ स्कूलों में पढ़ते हैं. एक ही मेज पर बैठ कर खाना खाते हैं.

इस चर्चा को नए नजरिये से समझने के लिए मैंने रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल विनायक पटनकर से बात की. जनरल पटनकर ने चार दशक तक सेना में तमाम पदों पर काम किया है. वो कई जंगों में भी शामिल रहे थे.

सेना पर लोकतंत्र के असर के बारे में जनरल पटनकर कहते हैं, 'अच्छी बात ये है कि आज लोकतंत्र की जड़ें काफी गहराई तक पहुंच गई हैं. आज की पीढ़ी आस-पास के माहौल से लोकतांत्रिक मूल्यों को ग्रहण कर रही है.'

जनरल पटनकर कहते हैं कि सेना की कई यूनिटों में अधिकारियों को सैनिकों के साथ ही बैरक में सोने को कहा जाता है. हालांकि खुद जनरल पटनकर को ये तजुर्बा नहीं हुआ. उन दिनों में तो अफसरों से केवल ये उम्मीद की जाती थी कि वो न केवल अपने सैनिकों के नाम जानें, बल्कि उनके सामाजिक-आर्थिक और पारिवारिक हालात से भी रूबरू हों. खास तौर से उनसे ये उम्मीद की जाती थी कि उन्हें पता हो कि किसी सैनिक को मां की बीमारी के इलाज या बहन की शादी के लिए पैसों की जरूरत तो नहीं.

जनरल पटनकर कहते हैं, 'आज के दौर में ये किसी की जिंदगी में दखलंदाजी माना जाएगा. लोकतंत्र के विस्तार के साथ आज दुनियाभर में व्यक्तिवाद की अहमियत बढ़ती जा रही है. आज जाति, कबीले और समुदाय गौण हो गए हैं. वैसे भारत के बारे में ऐसा पूरी तरह से नहीं कहा जा सकता. आज समाज और व्यक्ति के बीच संघर्ष बढ़ रहा है. 1970 के दशक तक लोकतांत्रिक राजनीति गांवों तक पहुंचने लगी थी. जातीय वोट बैंकों की अहमियत बढ़ गई थी.'

जनरल पटनकर कहते हैं कि पहले अधिकारी, सैनिकों की मदद करने के लिए सरकारी अधिकारियों को सिफारिशी खत लिखते थे. वो कभी खुद के लिए ऐसा नहीं करते थे. जनरल पटनकर कहते हैं, 'पहले सेना और सिविल अधिकारियों में एकदूसरे के प्रति सम्मान था. ये बहुत पवित्र रिश्ता होता था. आज किसी सैनिक को अपना काम कराने के लिए स्थानीय नेता की मदद की जरूरत होती है. लोकतंत्र के विस्तार के साथ सैनिकों के बीच जागरूकता भी बढ़ी है. वो खुद भी अपना काम सरकारी अधिकारियों से करा सकते हैं.'

जनरल पटनकर कहते हैं कि लोकतंत्र की वजह से आज सेना के अधिकारी और सैनिक भी करीब आए हैं. 'ब्रिटिश राज में अधिकारियों और सैनिकों के बीच बहुत गहरी और चौड़ी खाई थी. हवलदारों और अधिकारियों के बीच पुल का काम जेसीओ करते थे. आज जेसीओ की रैंक संवाद के लिए कम और तरक्की के लिहाज से ज्यादा अहम हो गई है.' साफ है कि लोकतंत्र की वजह से आज दुनिया भर में ऊंच-नीच के दर्जों के बीच की खाई पटी है. इसका असर भारतीय सेना पर भी देखा जा सकता है.

जनरल पटनकर कहते हैं, 'आज सेना के अधिकारी भारतीय समाज के निचले तबके से आते हैं. काबिलियत होने पर कोई भी अधिकारी बन सकता है. 1970 के दशक से इसमें तेजी आई है.' जनरल पटनकर के मुताबिक पहले सेना के अधिकारी समाज के ऊंचे तबके या पूर्व सैन्य परिवारों से आते थे. आज अधिकारियों और सैनिकों के बीच सामाजिक दर्जे की खाई भरी है. आज बैंको के सुरक्षा गार्डों और ऑटो ड्राइवरों के बच्चे अधिकारी बन रहे हैं. वो कहते हैं कि पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल दलबीर सिंह सुहाग के पिता सेना में जेसीओ रहे थे.

जनरल पटनकर कहते हैं, 'ये बहुत अच्छी बात है. सामंतवाद की बेड़ियां टूटी हैं. लोकतंत्र ने ब्रिटिश राज के दौर के सामंती माहौल को खत्म किया है.' जनरल पटनकर की बातों से लगता है कि लोकतंत्र का सेना पर व्यापक असर हुआ है. कुछ खास जातियों और समुदायों को ही सेना में भर्ती करने की सोच खत्म हुई  है. ऐसा लोकतंत्र की वजह से ही मुमकिन हुआ है. आज औरत हो या मर्द, सही काबिलियत के आधार पर कोई भी सेना में भर्ती हो सकता है.

पंजाब में पठानकोट के इंडियन एयर फोर्स बेस पर आतंकी हमले के बाद भारतीय सैनिकों का चाक-चौबंद (REUTERS)

तस्वीर: प्रतीकात्मक

भारतीय समाज में लोकतंत्र के गहरे तक पैठ करने की वजह से नारी सशक्तिकरण के मोर्चे पर एक बुनियादी किस्म का बदलाव आया है. आज 13 लाख से ज्यादा महिलाएं स्थानीय निकायों के लिए चुनी जाती हैं. तमाम संप्रदायों की लड़कियां आज स्कूलों में लड़कों से बेहतर प्रदर्शन कर रही हैं. आज हर क्षेत्र में महिलाएं बढ़-चढ़ कर हिस्सा ले रही हैं. सेना में भी महिलाओं की भर्ती बढ़ी है. जबकि पहले महिलाओं का रोल केवल पति और बच्चों की देखभाल का ही होता था. आज हम युवतियों को लाइबेरिया में संयुक्त राष्ट्र के मिशन के तहत ड्यूटी निभाते देखते हैं. आज इस बात पर बहस छिड़ी हुई है कि क्या युद्ध के मोर्चों पर भी महिलाओं को भेजा जाना चाहिए ?

ब्रिगेडियर हेमंत महाजन कहते हैं, 'सेना सोशल इंजीनियरिंग की जगह नहीं है. आज दुनिया में केवल दो देशों की सेनाओं, अमेरिका और इजराइल में ही महिलाओं को युद्ध के मोर्चे पर तैनात किया जाता है. लेकिन वहां पर भी महिला सैनिक युद्ध के मैदान में नहीं उतारी जातीं.' जनरल पटनकर का भी यही मानना है. वो कहते हैं, 'अगर कोई पुरुष सैनिक युद्ध बंदी बनाया जाता है तो उसे झेला जा सकता है. लेकिन अगर किसी महिला को युद्ध बंदी बना लिया जाए, तो हालात और भयंकर हो जाते हैं.'

हालांकि आज महिलाएं सेना की तमाम शाखाओं जैसे मेडिकल, इंजीनियर, सिग्नल और खुफिया विभागों में भर्ती हो रही हैं. जनरल पटनकर कहते हैं कि, 'पहले कोई पुरुष सैनिक, किसी महिला अधिकारी से आदेश लेने में हिचकिचाता था. लेकिन आज महिला अधिकारियों को भी पूरा सम्मान दिया जाता है. कई महिलाएं भी आज फाइटर पायलट बन गई हैं.'

सेना पर लोकतंत्र का असर आज उग्रवाद विरोधी अभियानों में भी दिख रहा है. जनरल पटनकर कहते हैं, '1950 के दशक में हमारी सेना को नगालैंड में उग्रवाद का सामना करना पड़ा. उन्हें हथियार उठाने वाले अपने ही नागरिकों का सामना करना पड़ा. वो लोग जो हमारे अपने थे. इस वजह से सेना ने उग्रवाद विरोधी अभियानों के लिए खुद का सिद्धांत तैयार किया. पहले सेनाओं को सिखाया जाता था कि पूरी ताकत से दुश्मन को कुचल दें. आज उग्रवाद से निपटने के लिए कम से कम ताकत का इस्तेमाल किया जाता है. हमारा उग्रवाद से निपटने का तरीका लोकतांत्रिक जागरूकता से प्रेरित है.' मैंने जनरल पटनकर से पूछा कि 2003 में उन्होंने एक इंटरव्यू दिया था जिसमें उन्होंने ये कहा था कि अगर ऑपरेशन के दौरान कुछ आतंकी भाग जाएं, वो ठीक है लेकिन दूसरे नागरिकों को नुकसान नहीं होना चाहिए. मैंने उनसे पूछा कि क्या वो अब भी अपनी इस बात पर कायम हैं. जनरल पटनकर ने हां में जवाब दिया.

प्रदूषण फैलाने का आरोप झेलने वाले स्टरलाइट जैसे उद्योग हों, या सेना के कैंट और हथियारों के डिपो, ये सब रिहाइशी बस्तियं से दूर बनाए जाते हैं. लेकिन, बढ़ती आबादी की वजह से, अक्सर लोग उनके इर्द-गिर्द बसने लगते हैं. मैं जिस वक्त सैन्य अधिकारियों से मिल रहा था, उस वक्त कैंट की सड़कों को आम जनता के लिए खोलने की बहस छिड़ी हुई थी. कई अधिकारियों ने मुझसे कहा कि ये सरकार की दखलंदाजी है. ये मसले इसलिए खड़े होते हैं क्योंकि नेता अक्सर वोटबैंक की खातिर सेना की भावनाओं की अनदेखी कर देते हैं.

जनरल पटनकर सवाल उठाते हैं, 'कैंट की सभी सड़कों को खोलने का क्या मतलब है? नेताओं को समझना चाहिए कि उनके सेना के मामलों में दखलंदाजी की एक सीमा है. उनकी दखलंदाजी की बड़ी वजह सेना को लेकर जानकारी की कमी है. कैंट इलाके कोई शहर नहीं हैं. हकीकत ये है कि कैंट के इर्द-गिर्द शहर बसे हैं.' जनरल पटनकर, सेना के मामलों में नेताओं की दखलंदाजी को अफसोसनाक बताते हैं. वो ये भी कहते हैं कि कई बार हथियारों के डिपो के आस-पास की सड़कों को लेकर भी विवाद हुए हैं. जनरल पटनकर कहते हैं कि सेना के ठिकानों के आस-पास आम लोगों की बस्तियां बस गई हैं. इस विवाद को सुलझाने का कोई रास्ता फिलहाल नहीं दिखता.

प्रतीकात्मक तस्वीर

प्रतीकात्मक तस्वीर

हालांकि पटनकर ये मानते हैं कि सेना में नेता दखलंदाजी करते हैं. लेकिन, वो इस बात से इनकार करते हैं कि सेना का राजनीतिकरण हुआ है. जब मैंने उनसे ये पूछा कि पूर्व सैन्य अधिकारियों को किसी पार्टी में शामिल होना चाहिए या नहीं, तो, उन्होंने कहा कि इस पर कुछ कहना जल्दबाजी होगी. जनरल पटनकर के मुताबिक, 'इससे सेना के प्रोफेशनलिज्म पर असर नहीं पड़ता. क्योंकि वो लोग सेना में तो आते नहीं. मौजूदा सैन्य अधिकारी पूर्व अधिकारियों से समर्थन तो मांग नहीं रहे. सेना उनके पास नहीं जाती. वो सेना के पास नहीं आते.' हालांकि जनरल पटनकर कहते हैं कि कुछ पूर्व सैन्य अधिकारियों ने केंद्रीय मंत्रियों और मुख्यमंत्री के तौर पर बहुत अच्छा काम किया है. उनका इशारा रिटायर्ड मेजर जनरल भुवन चंद्र खंडूरी की तरफ था. जनरल खंडूरी उत्तराखंड के सीएम रहे थे. वो केंद्रीय मंत्री भी रहे थे. जनरल पटनकर कहते हैं कि पूर्व सैन्य अधिकारियों का सेना में जाना सही है या गलत, लेकिन इससे सरकार को फायदा हो सकता है.

पटनकर बताते हैं कि एक बार अमेरिका जाने पर उन्होंने देखा कि अमेरिकी सीनेट के 100 में से 96 सदस्यों ने दूसरे विश्व युद्ध और वियतनाम युद्ध में हिस्सा लिया था. हालांकि वो ये कहते हैं कि इसका असर सेना पर पड़ता है. पटनकर कहते हैं, 'संसद और विधानसभा में ऐसे पूर्व सैन्य अधिकारियों के होने से प्रशासन को बेहतर ढंग से चलाने, फैसले लेने में सरकार को मदद मिल सकती है.' जनरल पटनकर इस बात पर चिंता जताते हैं कि सेना, नौसेना और वायुसेना के प्रमुख, कैबिनेट की सुरक्षा मामलों की समिति में नहीं हैं.

उनके मुताबिक अगर सेना प्रमुखों को सीसीएस में जगह मिलेगी तो ये पूरी तरह से लोकतांत्रिक होगी. अगर प्रधानमंत्री को समाज के हर तबके की सलाह चाहिए, तो उन्हें सेना की तरफ से भी सलाह मिलनी चाहिए. वो मानते हैं कि सेनाओं के प्रमुखों को तो सीसीएस में होना ही चाहिए. जनरल पटनकर 2008 के मुंबई हमले की मिसाल देते हुए कहते हैं कि तब सरकार ने सेना को फायर ब्रिगेड की तरह से इस्तेमाल किया. अगर सुरक्षा की कैबिनेट कमेटी में सैन्य अधिकारी होते, तो ऐसा नहीं होता.

सैन्य अधिकारियों से मेरी बातचीत में एक और मुद्दा बार-बार उठा. वो था मीडिया का नुकसान पहुंचाने वाला रोल और फेसबुक, ट्विटर जैसे सोशल मीडिया में सैन्य अधिकारियों की बार-बार की बयानबाजी और अतिसक्रियता. जनरल पटनकर इस बदलाव में उम्मीद देखते हैं. वो कहते हैं, 'इस देश में सब को बोलने की आजादी है, तो ऐसी चीजें होंगी. इसका सेना पर असर नहीं पड़ता. जब तक कोई शख्स वर्दी में है, तब तक राजनीति का असर सेना पर नहीं पड़ेगा.'

नाम न बताने की शर्त पर एक और रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल, जो 1971 की लड़ाई में ढाका पहुंचने वाले पहले अधिकारी थे, ने कहा कि लोकतंत्र और गणराज्य में फर्क है. लोकतंत्र का मतलब शोरगुल है. जबकि गणराज्य का मतलब गुफ्तगू है. ये रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल कहते हैं, 'लोकतंत्र के साथ हम एक गणराज्य भी हैं. किसी भी गणराज्य को संस्थाएं चलाती हैं. सोशल मीडिया पर लोकतंत्र के नाम पर मचने वाले शोर को संस्थाओं को बदनाम करने की इजाजत नहीं दी जा सकती.'

1971_Instrument_of_Surrender

वो कहते हैं कि 1971 में लोकतंत्र की सैन्य शासन पर जीत हुई थी. क्योंकि पाकिस्तान के शासकों ने चुनाव के नतीजों को नकार दिया था, जिससे ये युद्ध हुआ. उनकी नजर में 1971 की लड़ाई और उसके बाद सेना का जो बर्ताव रहा, उसका असर पूरे दक्षिण एशिया पर पड़ा. बांग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका और पाकिस्तान की सेनाओं को लोकतांत्रिक मूल्यों का सम्मान करना पड़ा.

हालांकि भारतीय सेना राजनीति के असर से दूर है. लेकिन पूर्व नौसैनिक अधिकारी अतुल भारद्वाज ने जो सवाल उठाए हैं, वो भी वाजिब हैं. सेना की गैरराजनीतिक छवि को धक्का लगा है. वहीं ब्रिगेडियर हेमंत महाजन और लेफ्टिनेंट जनरल विनायक पटनकर की बातें भी सही हैं. क्योंकि ये सारी परिचर्चा लोकतांत्रिक माहौल की वजह से हो रही है.

मैं अपने पाठकों से ये कहते हुए विदा लूंगा कि लोकतंत्र का सबसे ज्यादा फायदा सेना के कुत्तों और घोड़ों को हुआ है. पहले इन जानवरों को काम का न रह जाने पर मार दिया जाता था. लेकिन अधिकारों खास तौर से जानवरों के अधिकारों के प्रति बढ़ती जागरूकता की वजह से आज सेना के लिए बेकार हुए जानवरों की नीलामी की जाती है, ताकि लोग उन्हें गोद ले सकें.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो
Jab We Sat: ग्राउंड '0' से Rahul Kanwar की रिपोर्ट

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi