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दिल्ली पुलिस का वो DCP जिससे अदालत में जज भी पूछते थे- क्या तुमने सबकी हत्या का ठेका ले लिया है?

'वर्ष 1980 के आसपास मुझ पर सुंदर डाकू की हत्या समेत 3 अलग-अलग मामले लगे. इनमें से एक मामले में मुझे पूछताछ के लिए दिल्ली पुलिस मुख्यालय बुलाया गया और वहीं गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया'

Updated On: Jun 17, 2018 09:15 AM IST

Sanjeev Kumar Singh Chauhan Sanjeev Kumar Singh Chauhan

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पुलिस की नौकरी काजल की कोठरी सी मानी जाती है. नौकरी पर हर वक्त तलवार लटकी रहती है. न मालूम किस घड़ी कौन सा ‘गुडवर्क’, ‘बुरा’ बन जाए. जो अफसर पुलिसिया नौकरी के दौरान तमाम अपराधियों को हथकड़ियां पहनाता रहा हो, कब उसके हाथों में हथकड़ियां पड़ जाएं, खुद पुलिसवाला भी नहीं जानता.

इस हफ्ते के ‘संडे क्राइम स्पेशल’ में सन् 1970 के दशक के एक ऐसे ही दबंग और चर्चित पूर्व पुलिस अफसर (डिप्टी पुलिस कमिश्नर) की मुंह-जुबानी मैं आपको सुना और पढ़ा रहा हूं, तकरीबन 50 साल बाद.

सन् 1933 में पंजाब के लुधियाना का गांव दहरु

20 फरवरी, 1933 को पुलिस स्टेशन खन्ना अंतर्गत दहरु गांव में रहने वाले किसान दंपति राम रक्खा और पंजाब कौर के यहां एक बेटे का जन्म हुआ. नाम रखा गया सुखदेव सिंह. खुद ठेठ किसान होने के बाद भी राम रक्खा सिंह ने, इकलौती संतान सुखदेव सिंह की पढ़ाई-लिखाई में कोई कोर-कसर बाकी नहीं रखी. इसका परिणाम यह रहा कि वर्ष 1954 में ए.एस. कॉलेज खन्ना से सुखदेव सिंह ने ग्रेजुएशन कर लिया. यहां उल्लेखनीय है कि, इससे पहले ही पढ़ाई के दौरान वर्ष 1952-53 में सुखदेव सिंह की मां पंजाब कौर का साया बेटे के सिर से उठ चुका था. करीब 61 साल पहले वर्ष 1957 में दोस्तों के साथ सुखदेव सिंह दिल्ली-दर्शन को पहुंचे. तो फिर दिल्ली के ही होकर रह गए.

पिता को पुलिस से बेइंतहा नफरत थी मैं डीसीपी बना

रसूखदार किसान पिता राम रक्खा सिंह को पुलिस और उसकी नौकरी दोनों से बेइंतहा नफरत थी. वो पुलिस डिपार्टमेंट को झूठा, फरेबी, मक्कार और न जाने किन-किन नामों और तकिया कलामों से कोसते रहते थे. यह अलग बात है कि पिता, जिस पुलिस महकमे को भ्रष्ट और बदनाम समझते थे, कालांतर में उसी पुलिस में मैं दारोगा भर्ती हुआ. पुलिस की नौकरी में ही हत्या के 3-3 आरोप लगे. महीनों तिहाड़ जेल में कैद रहा. तमाम झंझावतों से जूझते हुए बाद में मैं दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल का पहला डीसीपी (उस जमाने में स्पेशल सेल एंटी टेररिस्ट स्क्वॉड के नाम से जानी जाती थी) बनकर रिटायर हो सका.’ सुखदेव सिंह करीब 60 साल पुरानी भूली-बिसरी अपनी ही यादों में ताक-झांक करते हुए यह बात बताते हैं.

मंत्री को नजरंदाज कर डीआईजी ने मुझे दारोगा बनाया

बकौल सुखदेव सिंह, ‘दिल्ली आने पर अखबार में पढ़ा कि, दिल्ली पुलिस में एएसआई (सहायक सब-इंस्पेक्टर) के 2 पद खाली हैं. लंबा-चौड़ा गठीला बदन था ही. ग्रेजुएट पास था. सो दिल्ली पुलिस में एएसआई के पद के लिए एप्लीकेशन दे दी. उन दिनों दिल्ली के डीआईजी थे सक्सेना साहब. उस जमाने में भारत के गृह मंत्री के आदेश पर, उनके विवेकानुसार ही दिल्ली पुलिस में एएसआई नियुक्त होते थे. इम्तिहान का कोई बड़ा तामझाम नहीं था. पहली ही पेशी में मेरी लंबाई-चौड़ाई गठीला बदन और ग्रेजुएशन तक की उच्च शिक्षा डीआईजी सक्सेना साहब के दिल-ओ-जेहन में ऐसी समाई कि, वो हर कीमत पर मुझे दिल्ली पुलिस में भर्ती करने की जिद पर अड़ गए. जबकि केंद्र सरकार का एक हाई-प्रोफाइल मंत्री किसी दूसरे आदमी को पहले दारोगा बनवाने पर तुला हुआ था. मेरा मेडिकल टेस्ट हुआ. मेडिकल में डॉक्टर ने मुझे एक ऐसी वजह से फेल कर दिया, जो बेईमानी सी लगती थी. मेरी मेडिकल रिपोर्ट जब डीआईजी सक्सेना के सामने गई, तो उन्होंने उस निगेटिव-मेडिकल रिपोर्ट को किनारे रखकर मुझे ही दारोगा भर्ती कर लिया.’

सुखदेव सिंह लगभग 40 साल पहले एसएचओ शाहदरा रहते हुए इंस्पेक्टर की वर्दी में

सुखदेव सिंह लगभग 40 साल पहले एसएचओ शाहदरा रहते हुए इंस्पेक्टर की वर्दी में

पड़ताल में पिता ने जब मुझे बेटा मानने से इनकार किया

‘पिता राम रक्खा सिंह गांव के संपन्न किसानों में शुमार थे. समाज में उनका अलग ही रुतबा था. पंचायती राज व्यवस्था में पिता राम रक्खा सिंह गांव के पहले सरपंच बने. दिल्ली पुलिस में मैं उन्हें बिना बताए भर्ती हो चुका था. ट्रेनिंग पर भेजे जाने से पहले मेरे वेरीफिकेशन के लिए पुलिस गांव में पहुंची. पिता को माजरा पता चला तो, उन्होंने पुलिसवाले से कह दिया कि, दहरु गांव में सुखदेव सिंह नाम का कोई लड़का नहीं रहता है. साथ ही यह भी कह दिया कि, मेरे बेटा तो है मगर उसका नाम सुखदेव सिंह नहीं है.

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चूंकि यह बात गांव के सरपंच ने कही थी. सो 'लकीर-के-फकीर' उस पुलिसवाले ने गांव में किसी और से मेरे बारे में क्रॉस-पूछताछ किए बिना ही पिता की बात पर विश्वास कर लिया. परिणाम उस कम-अक्ल पुलिसवाले के एक अदद बेजा कदम के चलते मेरी पुलिस वेरीफिकेशन रिपोर्ट 'निगेटिव' भेज दी गई. ऐसा करने/कराने के पीछे पिता की मंशा थी कि, मैं पुलिस में भर्ती न होने पाऊं. हुआ भी यही, वेरीफिकेशन रिपोर्ट निगेटिव आते ही मेरी पुलिस में भर्ती पर संकट आ गया. जब मुझे पता चला तो मैंने हाथ-पांव जोड़कर पिता को जैसे-तैसे समझा-बुझाकर मनाया.

तुगलक रोड थाने की पोस्टिंग में जिद्दी फौजी से सामना

वर्ष 1960 में फिल्लौर (लुधियाना) पुलिस ट्रेनिंग सेंटर से लौटा अंडर ट्रेनिंग मेरी पोस्टिंग हाई-प्रोफाईल नई दिल्ली जिले के एतिहासिक थाना तुगलक रोड में हुई. उस वक्त दिल्ली के आईजी (पुलिस महानिरीक्षक) मिस्टर मेहता थे. मेरी महीने की तनख्वाह थी 160 रुपए. बकौल दिल्ली पुलिस के रिटायर्ड डीसीपी सुखदेव सिंह, ‘एक दिन एक आला फौजी अफसर की तुलगक रोड थाने में खबर आई कि, उसके घर से पुरानी चादर चोरी हो गई है. यह वही फौजी अफसर था, जिसके ऊपर वर्ष 1962 में भारत-चीन की लड़ाई के दौरान तेजपुर बार्डर से मोर्चा छोड़ कर भाग आने का इल्जाम लगा था. मैं साइकिल से उसकी कोठी पर पहुंचा. वो अफसर बोला घर के सब नौकरों को पकड़ कर हवालात में डाल दो. तब तक पीटो जब तक वो फटी हुई पुरानी चादर वापस न कर दें. मौका पाकर जब उस फौजी अफसर की बीवी ने पूरा माजरा मुझे समझाया तो, मैं बेसाख्ता हंस पड़ा. वो बोली कि, फौजी बहुत जिद्दी है. चादर पुरानी और फटी हुई थी. इसलिए उसने पति को बिना बताए चादर चुपचाप कोठी के माली को दे दी. वो महिला बोली कि, अगर उसके फौजी अफसर पति को सच पता चल गया तो वो, घर में कोहराम मचा देगा. लिहाजा मैंने फौजी की आत्मसंतुष्टि के लिए माली और कोठी के बाकी सब नौकरों को तुगलक रोड थाने बुलाया और बाद में उन्हें छोड़ दिया. उधर खिसियाया अड़ियल फौजी अफसर थाना पुलिस को अंडर प्रेशर करने के लिए दिल्ली के पुलिस अधीक्षक को फोन पर फोन किए जा रहा था. मैंने जब एसपी गुलाटी साहब को सच बताया तो उनके पेट में भी हंसते-हंसते बल पड़ गए.’

Delhi Police-Sukhdev Singh

नौकरों द्वारा अखबार जलाने पर जब नेताजी बौखला गए

पुलिसिया नौकरी के अजीबो-गरीब सच्चे किस्से-कहानियां सुनाते हुए सुखदेव सिंह बताते हैं कि, ‘तुगलक रोड थाने की पोस्टिंग के दौरान ही एक बार एक नेता की कोठी में रहने वाले नौकरों ने पुराने अखबार (रद्दी) जलाकर जाड़े के दिनों में आग ताप ली. अखबार गायब होने की भनक लगते ही नेता जी ने पूरी दिल्ली पुलिस की नाक में दम कर दिया. बाद में समझा-बुझाकर नेता जी को मैंने ठंडा किया. एक बार एक आला फौजी अफसर के घर की रसोई से आधा किलो गुड़-चावल चोरी हो गए. वह गुड़-चावल की बरामदगी के लिए तुलगक रोड थाने पहुंच गया. थाने में उसने खूब हंगामा किया. यह अलग बात है कि गुड़-चावल कभी बरामद नहीं हो सके.’

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उस थाने में एसएचओ लगा जो जंगली पहाड़ी पर था

‘आज की दिल्ली पुलिस में एसएचओ की औकात और उसकी काबिलियत उसके 'थाने' से आंकी/लगाई जाती है. हमारे जमाने की दिल्ली पुलिस में काम और काबिलियत को अहमियत दी जाती थी. थाने का एसएचओ उसे ही लगाया जाता था, जो उसके लायक होता था. थाने का एसएचओ बनने के लिए उच्च शैक्षिक योग्यता, अनुभव और चरित्र ही 3 प्रमुख पैमाने थे. 1962 में एएसआई से मैं सब-इंस्पेक्टर बन गया. 8-10 साल बाद जब इंस्पेक्टर बना तो, दिल्ली के सुपरिंटेंडेंट थे मार्कण्डेय जी और डीआईजी आर.डी. सिंह. वर्ष 1970 में पुलिस की नौकरी में मुझे पहली बार जिस थाने का एसएचओ बनाया गया, वह थाना था लाजपत नगर. थाना बियाबान जंगल में ऊंची पहाड़ी पर मौजूद था. उस जमाने में पहाड़ी पर आबादी के नाम पर महज एक मकान बना हुआ था. उसी लाजपत नगर में, जिसमें आज इंसान को पांव रखने की भी जगह मयस्सर नहीं है. उस जमाने में मेरे पुलिस पेट्रोलिंग (गश्त) करने का स्टाइल पूरी दिल्ली में मशहूर था. थाने की पुलिस जीप मेरे पीछे चला करती थी. मैं थाना इलाके के जंगलात में 4-5 सिपाहियों के साथ हाथ में लाठी लेकर आगे-आगे पैदल चलकर गश्त करता था.’ दिल्ली पुलिस की नौकरी की यादों में खोए-खोए सब कुछ बिना सोचे-समझे कहते-सुनाते चले जाते हैं कल की दिल्ली पुलिस के चर्चित और दबंग आला अफसर सुखदेव सिंह.

दंगों में जब दिल्ली पुलिस गायब थी मैंने तब भी गश्त की

दिल्ली पुलिस की नौकरी में वर्ष 1970 दशक के पुराने दिनों को खंगालते हुए सुखदेव सिंह बताते हैं कि, ‘1973 में दिल्ली के कई इलाके में दंगे फैल गए. गुस्साई भीड़ ने रेल पटरियां उखाड़ दीं. बिजली खंबे तोड़ और जला दिए. दुकानों में आग लगा दी. ट्रेनों का दिल्ली में आना बंद कर दिया. खिसियाई भीड़ पुलिस को गलियों में दौड़ा-दौड़ा कर पीट रही थी. वजह थी शाहदरा पुलिस के कुछ जवानों द्वारा होमगार्ड के एक कमांडेंट की गोली मार कर हत्या कर देना. कमांडेंट पर आरोप था कि, उसके पास कुछ कुख्यात डाकुओं का लगातार आना-जाना रहता है. शाहदरा के हालात इतने ज्यादा खराब हो चुके थे कि, जान बचाने के लिए पुलिस सड़कों से गायब हो गई. उस वक्त दिल्ली के इंस्पेक्टर जनरल ऑफ पुलिस (आईजी) थे पी.आर. राजगोपाल. शाहदरा में फैले दंगे रोकने की उम्मीद से उच्चाधिकारियों ने मुझे शाहदरा का एसएचओ बना दिया.’

दिल्ली पुलिस का मुख्यालय

सुखदेव सिंह को दिल्ली पुलिस के मुख्यालय में ही गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया था

मुर्गों की वह लड़ाई जिसने इलाके में मेरी इज्जत बढ़वा दी

बकौल सुखदेव सिंह, ‘दंगाईयों ने शाहदरा इलाके में सड़कों-गलियों में पुलिस का निकलना दुश्वार कर दिया था. मैंने हालात भांपने के लिए स्कूटर पर सादा कपड़ों में ही निकलने का जोखिम लेने की सोची. एक दिन इलाके में मुर्गों की लड़ाई को लेकर दो पक्ष खून-खराबे पर उतर आए. झगड़े का मामला मेरे पास आया. मैंने दोनों पार्टियों को सजा देने के बजाए उन्हें समझा-बुझाकर छोड़ दिया. मेरा वो कदम 'रामबाण' साबित हुआ.’

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जब कई साल तक मैने थाने के दरवाजे बंद नहीं होने दिए

‘अब तक मैं इलाके की जनता की नजरों में सबसे सुलझा हुआ और दयालु पुलिस अफसर के रूप में खुद को स्थापित कर चुका था. पब्लिक के जेहन में पुलिस की सकारात्मक तस्वीर उतारने के लिए मैंने शाहदरा थाने के दरवाजे कई साल तक (वर्ष 1975 तक जब मैं वहां एसएचओ रहा) लगातार खोले रखे. मैंने एसएचओ के कमरे पर लगे परदे उतरवा दिए. दरवाजे हमेशा के लिए पब्लिक के वास्ते खुलवा दिए. पब्लिक को पुलिस से जो उम्मीद कभी हो ही नहीं सकती, वो सब मैंने उसे हासिल करवा दी. बस फिर क्या था, पब्लिक खुद ही थाने में आकर मुझसे कहने लगी कि आप कर्फ्यू खतम कर के इलाके में पुलिस गश्त शुरू करवाओ.’ बीते कल के दबंग आला पुलिस अफसर सुखदेव सिंह बेबाकी से पुलिस की नौकरी की ऊंच-नीच बयान करते हैं.

43 साल पहले मुझे बबाल-ए-जान बन गया डाकू सुंदर

वर्ष 1975 में सुखदेव सिंह प्रमोट होकर सहायक पुलिस आयुक्त (एसीपी) बन गए. मगर प्रमोशन के साथ ही मुसीबतों ने उन्हें घेरना शुरू कर दिया. बतौर एसीपी पहली पोस्टिंग मिली गांधी नगर सब-डिवीजन. जिसके तहत गांधी नगर, फर्श बाजार और कृष्णा नगर थाने आते थे. एसीपी का चार्ज लेने के चंद दिन बाद ही फर्श बाजार थाना क्षेत्र में उस जमाने के सबसे खूंखार सुंदर डाकू (सुंदर सिंह) ने दिन-दहाड़े एक लड़के को गोलियों से भून डाला. गांधी नगर थाना क्षेत्र में सुंदर डाकू ने दूध की एक डेयरी के मालिक के घर डाका डाल दिया. सुंदर डाकू गैंग ने बरामदे में लेटे बुजुर्ग की उसी वारदात के दौरान गोली मारकर हत्या कर दी. एक दिन पता चला कि सुंदर डाकू गैंग ने फरीदाबाद इलाके में आगरा कैनाल (नहर) के पास वन विभाग के एक युवा रेंजर की गोली मार कर हत्या कर दी है. उन दिनों दिल्ली पुलिस के महानिरीक्षक राजस्थान कॉडर के आईपीएस अधिकारी भवानीमल थे. उन्हीं दिनों सुंदर को राजस्थान पुलिस ने पकड़ लिया. बकौल सुखदेव सिंह, ‘दिल्ली पुलिस सुंदर सिंह डाकू को ट्रांजिट रिमांड पर ले आई. उसकी निशानदेही पर तुगलकाबाद इलाके से जब माल बरामद कर पुलिस पार्टी लौट रही थी, तो पुलिस के कब्जे से सुंदर डाकू भागकर यमुना में कूद गया, और पानी में डूबने से उसकी मौत हो गई.’

सुखदेव सिंह को 3 मामलों में दोषी ठहराकर तिहाड़ जेल में बंद कर दिया गया

सुखदेव सिंह को हत्या के 3 मामलों में आरोपी बताकर दिल्ली के तिहाड़ जेल में बंद कर दिया गया

डाकू भगाने के आरोप में मुझे तिहाड़ जेल में डाल दिया

‘महकमे ने सुंदर डाकू को हिरासत से भगाने का ठीकरा मेरे सिर फोड़ दिया. मुझे गिरफ्तार कर के तिहाड़ जेल में डाल दिया गया. इसके बाद भी मैं बाइज्जत अदालत से बरी हो गया. मुझ पर हत्या के एक, दो नहीं वरन् (बल्कि) पूरे 3 मामले चले. मैं सभी में बरी हुआ.’ सुखदेव सिंह दिल्ली पुलिस की नौकरी के बुरे दिनों की सच्ची कहानियां सुनाते हैं.

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नास्तिक को मुसीबतों ने जब मंदिर की ओर मोड़ दिया

बकौल सुखदेव सिंह, ‘अब तक मैं कभी मंदिर, मस्जिद, गिरजाघर, गुरुद्वारे नहीं गया था. अगर यह कहूं पूरी तरह नास्तिक था तो गलत नहीं. मुसीबतों के दिनों में एक बार अपने स्कूटर पर बैठाकर इंस्पेक्टर आर.पी. गौतम मुझे जबरदस्ती मरघट वाले हनुमान मंदिर (निगम बोध घाट के सामने) ले गए. मैंने ईमानदारी से सिर झुकाकर वहां अपनी गलतियों की माफी मांगी. जब मैं आंखे बंद कर के गलतियों का प्रायश्चित कर रहा था, तभी एक माला न मालूम कहां से मेरे गले और हाथों में आकर फंस गई. वो माला मैंने लाकर घर में मौजूद कोर्ट-कचहरी की फाइलों में लाकर रख दी. यह वर्ष 1980 के आस-पास की बात है.

सीबीआई ने हत्या का पहला केस मेरे खिलाफ दर्ज किया

1977 में देश में जनता पार्टी सरकार आई. मोरार जी देसाई प्रधानमंत्री और चौधरी चरण सिंह केंद्रीय गृह मंत्री बने. सरकार बनते ही सीबीआई ने सबसे पहला सुंदर डाकू की मौत के मामले में हत्या का जो केस दर्ज किया, वो मेरे खिलाफ था. मैं गिरफ्तार हुआ और जेल में डाल दिया गया. उसके बाद दिल्ली के तत्कालीन आला अफसर जिनमें आईपीएस प्रीतम सिंह भिंडर (पीएस भिंडर दिल्ली के पूर्व पुलिस कमिश्नर, केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल के पूर्व महानिदेशक, इंटेलीजेंस ब्यूरो के पूर्व सहायक निदेशक) भी थे, के साथ कुल 13 लोगों को सुंदर डाकू हत्याकांड में सीबीआई ने जेल में ठूंस दिया. बाद में सब बाइज्जत बरी हुए.

जज भी पूछते थे, क्या सबकी हत्या का ठेका लिया है!

इसे इत्तेफाक कहूं या अपनी बदकिस्मती कि, वर्ष 1980 के आसपास ही मुझ पर सुंदर डाकू की हत्या के अलावा, थाना फर्श बाजार इलाके में हुई संतलाल और गांधी नगर थाना इलाके में हुई सुरजीत पाल की हत्या के भी दो और मामले लगे. इनमें से एक मामले में तो मुझे पूछताछ के लिए दिल्ली पुलिस मुख्यालय बुलाया गया. और वहीं गिरफ्तार कर के जेल भेज दिया गया. मेरी नर्क हुई पुलिसिया जिंदगी का आलम यह था कि, उस जमाने में अदालतों में बैठे जज भी मुझसे पूछते थे, ‘सुखदेव सिंह क्या सबकी हत्या का ठेका तुम्हीं ने ले लिया है! वर्ष 1989 में दिल्ली पुलिस ने जब एंटी टेररिस्ट स्क्वॉड (अब स्पेशल सेल) का गठन किया तो, उसका पहला डीसीपी मुझे ही बनाया गया. वर्ष 1991 में वहीं से मैं रिटायर हो गया. उस वक्त दिल्ली के पुलिस कमिश्नर राजा विजय करण थे.’

पत्नी उपदेश कौर से साथ सुखदेव सिंह

पत्नी उपदेश कौर से साथ सुखदेव सिंह

पत्नी और बेटियों के नसीब से आज जिंदा हूं

हत्या के 3-3 मामले सिर पर ढोकर जेलों की सलाखों के पीछे रहकर भी पुलिस की नौकरी में कभी आपका बाल-बांका नहीं हुआ? यह पूछने पर सुखदेव सिंह पत्नी उपदेश कौर, बेटी जौली सिंह और ज्योतिका सिंह की ओर देखने लगते हैं. बकौल सुखदेव सिंह, ‘इन तीनों की किस्मत भी मेरे साथ जुड़ी थी. सो कुछ नहीं बिगड़ा. जब पहली बार गिरफ्तार हुआ तो, बड़ी बेटी 3 साल की और छोटी बेटी 2 साल की थी. दोनो बेटियों के चेचक निकली हुई थी.’

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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