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पुण्यतिथि विशेष: अगर पैसों की कमी नहीं होती तो कभी मुंबई नहीं आते उत्पल दत्त

वह मुंबई की ओर रुख कभी न करते यदि उन्हें कर्जे की समस्या न आई होती. 60 के अंतिम वर्षो में उत्पल मुम्बई की ओर बढ़े

Satya Vyas Updated On: Aug 19, 2017 11:40 AM IST

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पुण्यतिथि विशेष: अगर पैसों की कमी नहीं होती तो कभी मुंबई नहीं आते उत्पल दत्त

दक्षिणी कोलकाता के महानायक उत्तम कुमार स्टेशन से जब आप उषा फैन कंपनी की ओर चलते हैं तो टैक्सीवाला और कुछ बताए या ना बताए, मूर एवेन्यू की सड़क दिखते ही बताएगा- दादा! इसी सड़क पर 'उत्पल दा' का बाड़ी है. आप उसे उकसाना चाहते हैं तो बस कहिए कौन उत्पल दा? वह खिन्न हो जाएगा और आपकी अनभिज्ञता पर मुंह बनाते हुए कहेगा-

आपनी जानी ना! उत्पल दत्त.

उत्पल दत्त बंगाल की नाट्य संस्कृति के वट वृक्ष रहे हैं. उन्होंने नाट्य मंचन, जात्रा, सिनेमा, और नाट्य लेखन पर जितना काम मात्र 64 वर्ष की अल्पायु में कर दिया है वह अकल्पनीय है. उत्पल दत्त राजनीतिक रूप से जितने भी सक्रिय रहे हों, सच यही है कि उनका जन्म नाटकों के लिए ही हुआ था. उन्होंने आजादी के बाद नाटकों को जीवित रखने में अभूतपूर्व योगदान दिया. दत्त ने पहली बार पश्चिम बंगाल में शेक्सपियर के नाटकों में अभिनय किया. उन्होंने ओथेलो की अभूतपूर्व भूमिका निभाई जो आज भी नए कलाकारों के लिए मानक के तौर पर ली जाती है.

उत्पल दत्त ने लिटिल थियेटर मंच की स्थापना की, जिसने दमनकारी बलों के खिलाफ दमनकारी समूहों के संघर्ष का मंचन किया. उत्पल दत्त ने उपनिवेशवाद को बुरी तरह का शोषण माना और अपने थिएटर के माध्यम से उन्होंने बुर्जुआ और इतिहास के अन्य विकृत संस्करणों को चुनौती दी.

उन्होंने जात्रा को पुनर्जीवित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. उन्होंने बंगाल के गांवों में अपनी वामपंथी विचारधारा और विश्वास का विस्तार करने के लिए जात्रा का उपयोग एक प्रभावी अस्त्र ही भांति किया. हो ची मिन्ह, वियतनाम और अन्य वाम कहानियां जात्रा के माध्यम से घर घर पहुंचाईं.

उत्पल कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया के सक्रिय कार्यकर्ता भी थे. उन्होंने कम्युनिस्ट पार्टी की विचारधाराओं का प्रचार करने के लिए कई नुक्कड़ नाटकों को मंचन करना किया. वह उन्मुक्त रूप से नक्सलबाड़ी आंदोलन के समर्थक थे जिनके कारण उन्हें सरकार विरोधी हस्तक्षेपों में जेलबंद भी किया गया.

उत्पल बांग्ला फिल्मों के उत्कृष्ट अभिनेता तो थे ही और वह अपनी उन्ही सीमाओं में रहना भी चाहते थे. वह सत्यजीत रे, ऋत्विक घटक इत्यादि के साथ काम कर संतुष्ट थे. वह मुंबई की ओर रुख कभी न करते यदि उन्हें कर्जे की समस्या न आई होती. 60 के अंतिम वर्षो में उत्पल मुम्बई की ओर बढ़े. उनकी चपल आंखें, तेज संवाद शैली और भौहों की अभिव्यक्ति ने उन्हें पहले खाल चरित्र ही दिए. मगर धीरे-धीरे उत्पल दत्त ने चरित्र अभिनेताओं की भूमिकाएं भी निभाईं. 80 के दशक में तो गोलमाल, बात बन जाए, नरम-गरम, अंगूर, शौकीन, किसी से न कहना जैसी फिल्मों में उन्होंने चुटीले हास्य की नींव रखी.

भारत के कला और संस्कृति में उत्कृष्ट योगदान के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता, फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ कॉमेडियन पुरस्कार और संगीत नाटक अकादमी फेलोशिप के लिए राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार भी मिला.

उत्पल दत्त को फिल्मों से जानने वाले इस बात पर शायद ही विश्वास कर पाएं कि उत्पलदत्त अभिनय से नफरत किया करते थे. कहने का आशय यह होता था कि वह दरअसल कभी अभिनय कर ही नही रहे होते थे. वह उस चरित्र को जी रहे होते थे.

वह उन कलाकारों में से रहे जो जीवनपर्यन्त काम करते रहे. 64 साल की अवस्था में डायलिसिस कराकर अस्पताल से वह घर लौटे ही थे कि अचानक सीने में तेज दर्द उठा और उनकी आज ही के दिन दिनांक 19 अगस्त 1993 को उन्होंने यह दुनिया छोड़ दी और साथ ही छोड़ गए हास्य अभिनय की एक अलग विधा जो बाद के अभिनेताओं के लिए आदर्श बनी.

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