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शकील बदायूंनी: जिनके गीतों के बगैर अधूरी हैं रूमानी फिल्‍मों की कहानियां

हिंदी फिल्‍मों में रूमानियत के रंग भरने वाले इस शायर ने 20 अप्रैल 1970 को मुंबई में आखिरी सांस ली

Updated On: Apr 20, 2018 08:25 AM IST

FP Staff

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शकील बदायूंनी: जिनके गीतों के बगैर अधूरी हैं रूमानी फिल्‍मों की कहानियां

आसान अल्‍फाज के जरिए सीधे दिल में उतरने वाले मशहूर शायर और गीतकार शकील बदायूंनी के बगैर रूमानी फिल्‍मों की कहानियां अधूरी हैं. मगर, मकबूल शायर होने के बावजूद उन्‍हें वह जगह नहीं मिली जिसके वह हकदार थे.

‘मुगल-ए-आजम’ और ‘मदर इंडिया’ जैसी कालजयी फिल्‍मों और ‘मेरे महबूब’, ‘गंगा-जमुना’ और ‘घराना’ जैसी अपने दौर की सुपरहिट फिल्‍मों को अपने नग्‍मों से सजाने वाले शकील में उर्दू अदब की खिदमत करने का बेहतरीन जज्‍बा था.

शायर मुनव्‍वर राणा ने शकील के बारे में अपने खयालात का इजहार करते हुए कहा कि शकील बदायूंनी फिल्‍म जगत के ऐसे शायर थे, जिनके बगैर रूमानी फिल्‍मों की कहानियां अधूरी रहती थीं. उनकी शायरी में सबसे बड़ी खासियत यह थी कि उसमें इंसान की वह जिंदगी पूरे तौर पर मौजूद होती थी, जो ख्‍वाबों में दिखती है.

क्लासिकल शायर

उन्‍होंने कहा कि शकील क्‍लासिकल शायर थे. उनकी शायरी में उर्दू जबान का पूरा लुत्‍फ और मामलाबंदी मौजूद रहती थी. सबसे बड़ी बात यह है कि उनके मिसरे अवाम तक आसानी से पहुंच जाते थे. वह ऐसा जमाना था जब अरबी और फारसी के हवाले करके उर्दू को इतना मुश्किल कर दिया गया था कि वह आम लोगों तक नहीं पहुंच पाती थी, जबकि शायरी की आम तारीफ यही है कि हम कहें और आपके दिल तक पहुंच जाए.

राना ने कहा कि यह विडंबना रही कि शायरों को भी अलग-अलग दर्जों में बांट दिया गया. फिल्‍मी गीत लिखने वाले कमजोर शायर माने जाते थे और जो कव्‍वाली लिखते हैं, वे शायर ही नहीं माने जाते. शकील भी कुछ हद तक इसके शिकार हुए. वह फिल्‍मी शायर के बजाए फिल्‍मी गीतकार कहलाते थे.

उन्‍होंने कहा कि शकील अपने जमाने के मकबूल शायर और गीतकार जरूर थे, लेकिन आज उनके नाम से कोई तामीरी काम नजर नहीं आता. यह हैरतअंगेज बात है कि उनकी जयंती और पुण्‍यतिथि पर उन्‍हें याद करने के लिये बिरले ही कोई कार्यक्रम आयोजित होता है. यह अफसोसनाक पहलू है कि अपने अहद के मकबूलतरीन शायर शकील के बारे हमारी नई पीढ़ी की जानकारी बेहद कम है.

अवाम से ताल्लुक रखने वाला शायर

मशहूर शायर ग़ज़नफ़र अली ने शकील की खुसूसियात पर रोशनी डालते हुए कहा कि हमारी फिल्‍में किसी शायर के लिए अवाम में बने रहने का अहम जरिया हैं, लिहाजा एक शायर और गीतकार के रूप में शकील का अवाम से ज्‍यादा ताल्‍लुक था. शकील ने फिल्‍मों में जो गाने लिखे उनमें उर्दू अदब से कोई समझौता नहीं किया. इसीलिए उनके गाने अवाम और समाज दोनों में मकबूल हुए.

sahir shakeel

साहिर लुधियानवी और शकील बदायूंनी

उन्‍होंने कहा कि शकील का अपना एक नजरिया था, साहिर और शकील दोनों लगभग समकालीन थे. दोनों का ताल्‍लुक फिल्‍मों से रहा. साहिर ने अपने शेर में कहा कि 'एक शहंशाह ने दौलत का सहारा लेकर हम गरीबों की मुहब्‍बत का उड़ाया है मज़ाक.' वहीं, शकील ने कहा कि 'एक शहंशाह ने बनवाके हसीं ताजमहल सारी दुनिया को मुहब्‍बत की निशानी दी है.' इससे जाहिर होता है कि शकील का नुक्‍ता–ए-नजर कहीं ज्‍यादा व्‍यापक है.

यह भी पढ़ें: ताजमहल को लेकर क्यों टकरा गई थीं शकील और साहिर की कलम

अली ने कहा कि उर्दू जबान को जिन शायरों ने फिल्‍मों, गजलों और अशआर के हवाले से फरोग दिया. उनमें शकील का कारनामा बहुत अहम है. शकील के नग्‍मों की वजह से उर्दू जबान की मकबूलियत बढ़ी. जो लोग उर्दू को गैर मुल्‍की जबान समझते हैं, वो भी शकील बदायूंनी की नज्‍मों, गजलों को पसंद करते हैं, जिससे उर्दू अवाम में मकबूल हुई. मगर अफसोस कि शकील को वह मकाम नहीं मिला जिसके वह हकदार थे. अगर उन पर संजीदगी से काम किया जाए तो एक शायर के रूप में उनकी शख्सियत की और परतें भी खुल सकती हैं.

इस तरह शुरू हुआ शायरी का सफर

उत्‍तर प्रदेश के बदायूं जिले में तीन अगस्‍त 1916 को जन्‍मे शकील बदायूंनी को बचपन से ही शायरी का शौक था. वर्ष 1936 में अलीगढ़ मुस्लिम विश्‍वविद्यालय में दाखिला लेने के बाद उन्‍होंने मुशायरों में हिस्‍सा लेना शुरू किया. स्‍नातक की डिग्री हासिल करने के बाद वह सरकारी नौकरी में आए लेकिन दिल से वह शायर ही रहे.

शकील 1944 में मुंबई चले गए और उन्‍होंने संगीतकार नौशाद की सोहबत में अनेक मशहूर फिल्‍मों के गीत रचे. इनमें ‘मुगल-ए-आजम’ और ‘मदर इंडिया’, ‘बैजू बावरा’, ‘चौदहवीं का चांद’, ‘साहब, बीवी और गुलाम’, ‘शबाब’, ‘मेरे महबूब’, ‘गंगा-जमुना’, ‘दीदार’ और ‘घराना’ जैसी मकबूल फिल्‍में शामिल हैं. उन्‍हें ‘घराना’ फिल्‍म के गीतों के लिए वर्ष 1961 में ‘फिल्‍म फेयर’ अवार्ड से नवाजा गया था.

हिंदी फिल्‍मों में रूमानियत के रंग भरने वाले इस शायर ने 20 अप्रैल 1970 को मुंबई में आखिरी सांस ली.

(पीटीआई भाषा के लिए मुहम्‍मद मजहर सलीम की रिपोर्ट)

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