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पुण्यतिथि विशेष धीरूभाई: सपनों को पूरा करने का हुनर कोई इनसे सीखे

अपने कारोबारी हुनर और हिम्मत की बदौलत रिलायंस इंडस्ट्रीज शुरू करने वाले धीरूभाई अंबानी नए कारोबारियों के आदर्श हैं

Updated On: Jul 06, 2017 11:09 AM IST

Pratima Sharma Pratima Sharma
सीनियर न्यूज एडिटर, फ़र्स्टपोस्ट हिंदी

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पुण्यतिथि विशेष धीरूभाई: सपनों को पूरा करने का हुनर कोई इनसे सीखे

सपने सोते हुए नहीं बल्कि जागती आंखों से देखना चाहिए. ऐसे सपने ही पूरे होते हैं. यह कहना है देश के एक ऐसे बिजनेसमैन का जिसने अपने विजन और मेहनत के दम पर रिलायंस इंडस्ट्रीज की नींव डाली. धंधे को सूंघ लेने का हुनर धीरूभाई में बचपन से ही था.

धीरूभाई के विश्वास और लोगों को जोड़कर रखने की उनकी काबिलियत का पता तब चला जब उन्होंने जूनागढ़ के नवाब के आदेश का विरोध किया. जूनागढ़ के नवाब ने अपनी रियासत में रैलियों पर पाबंदी लगा दी थी. धीरूभाई ने न सिर्फ इस पाबंदी का विरोध किया बल्कि तिरंगा फहराकर देश की आजादी का जश्न भी मनाया. उस वक्त धीरूभाई ने अपना पहला भाषण दिया.

वह युवाओं के लिए हीरो बन चुके थे. युवाओं के लिए धीरूभाई किसी हीरो से कम नहीं थे. उनके भाषण से उत्साहित होकर युवाओं का झुंड पुलिस और दूसरे अधिकारियों का विरोध कर रहा था और आजादी के नारे लगा रहा था.

पढ़ाई से ज्यादा धंधे में चलता था दिमाग 

आजादी के बाद जूनागढ़ के नवाब भारत में शामिल नहीं होना चाहते थे. उस वक्त धीरूभाई ने प्रजा मंडल के विरोध प्रदर्शन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया. धीरूभाई ने जूनागढ़ को भारत में शामिल कराने की हर मुमकिन कोशिश की. आखिरकार जूनागढ़ के नवाब ने हार मानी और यह रियासत भारत का हिस्सा बना.

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16 साल के धीरूभाई को समाजवाद और राजनीति काफी आकर्षित करती थी. इनका जन्म 28 दिसंबर 1932 को हुआ था. जूनागढ़ के चोरवाड़ गांव में पैदा हुए धीरूभाई अंबानी के बारे में कोई नहीं जानता था कि वह देश की सबसे बड़ी कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज की नींव रखेंगे.

पिता गोवर्धनदास अंबानी की गिरती सेहत और कमजोर माली हालत के कारण धीरूभाई को बीच में ही अपनी पढ़ाई छोड़नी पड़ी. धीरूभाई अंबानी के चार भाई-बहन थे. स्कूल टीचर के बेटे होने के बावजूद धीरूभाई का दिमाग पढ़ाई में कम और धंधे में ज्यादा लगता था.

गांव में शुरुआती 5 साल की पढ़ाई पूरी करने के बाद आगे की पढ़ाई के लिए उन्हें जूनागढ़ भेज दिया गया. इसके बावजूद उनका मन पढ़ाई में नहीं लगा. बचपन से ही उनका दिमाग धंधे पर ज्यादा रहता था. किशोर उम्र में उन्होंने तेल बेचकर पकौड़े की एक दुकान जमाई. इस दुकान से होने वाली कमाई से धीरूभाई अपने घर खर्च में हाथ बंटाते थे.

Indian business leader Dhurubhai Ambani gestures is this file photo taken in Bombay April 8, 2002. Ambani, celebrated for creating shareholder wealth for millions, died late on Saturday at the age of 69, Reliance group said. Ambani had been in intensive care since being admitted to Bombay's Breach Candy hospital on June 24 after suffering a second stroke. Picture taken November 3, 2000. REUTERS/Roy Madhur

शुरुआती करियर

धीरूभाई अपने सपनों को हकीकत बनाने के लिए जब यमन के पोर्ट एडेन पहुंचे, तो वह दुनिया का सबसे बिजी एयरपोर्ट था. यहां उन्होंने क्लर्क के तौर पर अपनी नौकरी शुरू की. इलाके के सबसे बड़े ट्रेडिंग फर्म ए. बेसेस एंड कंपनी से जुड़ने के बाद धीरूभाई ने ट्रेडिंग, इंपोर्ट-एक्सपोर्ट, होलसेल बिजनेस, मार्केटिंग, सेल्स और डिस्ट्रीब्यूशन की हर बारीकियां सीखीं.

धीरूभाई ने यहां अलग-अलग देशों के लोगों से करेंसी ट्रेडिंग सीखी. अपने हुनर को निखारते निखारते उन्हें यह समझ आ गया था कि ट्रेडिंग में उनकी खास दिलचस्पी है. 1954 में कोकिला बेन से विवाह करने के बाद उनके जीवन में एक नया मोड़ आया.

उनकी कंपनी ने उन्हें एडेन में शुरू होने वाली शेल ऑयल रिफाइनरी कंपनी में काम करने के लिए एडेन भेजा. यहां से ही धीरूभाई ने अपनी रिफाइनरी कंपनी का सपना देखना शुरू कर दिया था. 50 के दशक के बाद वह एडेन से देश वापस लौट आए.

यूं पड़ी रिलायंस की नींव 

धीरूभाई कोई दुकान खोलकर नहीं बैठना चाहते थे. हमेशा से वह कुछ बड़ा करना चाहते थे. वह एक बड़े और कामयाब बिजनेसमैन बनना चाहते थे. इसी दौरान उन्होंने अरब के कुछ कारोबारियों से संपर्क किया. धीरूभाई ने उन्हें मसाले, चीनी और दूसरी चीजें निर्यात करना शुरू किया लेकिन उनका मार्जिन बेहद कम था. इसके बाद उन्होंने थोक कारोबार शुरू किया और रिलायंस कमर्शियल कॉरपोरेशन की नींव पड़ी. अपनी जबरदस्त सर्विस से धीरूभाई ने अपने कारोबार का सिक्का पूरी तरह जमा लिया.

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अब तक धीरूभाई ने अपने दिमाग का लोहा मनवा लिया था. कारोबार के दौरान उन्हें जब भी पैसों की जरूरत होती थी वह गुजरात के साहूकारों से उधार लेते थे. अपनी बात के पक्के धीरूभाई ने हमेशा कहे वक्त पर भी पैसा लौटाया.

ऐसे बने टेक्सटाइल किंग

धीरूभाई को जब यह अहसास हुआ कि सिर्फ मसालों के कारोबार से बात नहीं बनेगी तो उन्होंने धागों के कारोबार में उतरने का फैसला किया. टेक्सटाइल में कारोबार करना मुश्किल था क्योंकि उतार-चढ़ाव बहुत होता था. हालांकि उन्होंने इस कारोबार के गुर जल्द ही सीख लिया और यह समझ गए कि इस धंधे में काफी पैसा है.

अहमदाबाद के नरोदा में पहली टेक्सटाइल कंपनी शुरू करना उनके जीवन का सबसे मुश्किल काम था. धीरूभाई की टेक्सटाइल कंपनी का कपड़ा विमल ब्रांड से जाना जाता था. उन्हें दूसरे मिल मालिकों का विरोध झेलना पड़ा. इन मुश्किलों का धीरूभाई और उनकी टीम पर कोई असर नहीं पड़ा. उनकी टीम बिचौलियों को छोड़कर खुद रिटेलर्स को विमल के कपड़े बेचने लगी. इस बिजनेस की कामयाबी का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि कई रिटेलर्स ने सिर्फ विमल के कपड़े ही बेचना शुरू कर दिया.

इस कामयाबी का असर रिलायंस इंडस्ट्रीज पर साफ नजर आया. 1970 के दशक तक कंपनी का कुल टर्नओवर 70 करोड़ हो गया. 2002 तक कंपनी का टर्नओवर 75,000 करोड़ रुपए तक पहुंच गया. कंपनी के आगे बढ़ने का सिलसिला लगातार जारी है. अपने कारोबारी हुनर और हिम्मत की बदौलत रिलायंस इंडस्ट्रीज शुरू करने वाले धीरूभाई अंबानी नए कारोबारियों के आदर्श हैं.

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