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सामाजिक-आर्थिक समानता की लड़ाई की योद्धा थीं लक्ष्मी सहगल

पुण्यतिथि विशेष: लक्ष्मी सहगल सामाजिक और आर्थिक समानता की लड़ाई लड़ती रहीं

Arun Tiwari Arun Tiwari Updated On: Jul 23, 2017 02:20 PM IST

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सामाजिक-आर्थिक समानता की लड़ाई की योद्धा थीं लक्ष्मी सहगल

‘स्वतंत्रता तीन तरह की होती है. पहली राजनीतिक स्वतंत्रता होती है जो किसी देश को औपनिवेशिक ताकतों से मिलती है. दूसरी, आर्थिक होती है और तीसरी, सामाजिक. भारत को अभी तक सिर्फ पहली हासिल हुई है.’

ये बातें लक्ष्मी सहगल ने 2006 में उन पर बन रही एक डॉक्यूमेंट्री के दौरान कही थी. भारत को आजादी कैसे मिली और कितनी मेहनत से मिली ये उन्होंने किसी से सुनकर नहीं जाना था क्योंकि वो खुद आजाद हिंद फौज का हिस्सा थीं. वो जानती थीं कि अंग्रेजों से आजादी मिल जाने के बाद बहुत सी और बाधाएं थीं जिन्हें पार करना था लेकिन दुखद रूप से ऐसा नहीं हो पाया.

आर्थिक और सामाजिक आजादी की समझ उन्हें कहां से आई होगी ये बात उन्हीं के द्वारा बताए गए एक और किस्से समझा जा सकता है. एक इंटरव्यू के दौरान उन्होंने बताया था कि उनके पिता एस.स्वामीनाथन के पास पढ़ाई के लिए पैसे नहीं थे. उन्होंने बेहद मेहनत की और पढ़ाई पूरी करने के लिए गिलक्रिस्ट स्कॉलरशिप के तहत पहले स्कॉटलैंड और फिर बाद में दुनिया की सबसे ख्यातिनाम युनिवर्सिटी में शुमार हावर्ड भी गए.

लेकिन इन सारी बातों के बीच उनके आस-पास के ब्राह्मण ने नाराजगी जाहिर की और कहा कि उन्हें प्रायश्चित के लिए हवन कराना होगा. इसके जवाब में उन्होंने कहा कि मैं प्रायश्चित एक ही शर्त पर करूंगा जब हवन के चारों तरफ घूमते हुए उनके एक हाथ में रम होगी और दूसरे हाथ में बीफ होगा. निश्चित रूप से ये बात उनके पिता ने किसी को दुखी करने के लिए नहीं बल्कि समाज की उन रूढ़ियों को तोड़ने के लिए की होगी जो किसी की पढ़ाई-लिखाई से ज्यादा धार्मिक नियमों को बचाने की कोशिश करती हैं.

लक्ष्मी ने एक साक्षात्कार के बाद ये भी बताया था कि उन्होंने इस बात की ताकीद की थी कि मेरी बेटियां कभी किसी पर डिपेंडेंट नहीं रहेंगी. वो आर्थिक रूप से सक्षम बनेंगी.

लक्ष्मी का जन्म 24 अक्टूबर 1914 को मद्रास (अब तमिलनाडु) के मालाबार में मशहूर वकील एस. स्वामीनाथन और सामाजिक कार्यकर्ता ए.वी अम्मू कुट्टी के घर हुआ था. तमाम जिंदगी डॉक्टर के तौर पर लोगों का इलाज सामाजिक सरोकार के तौर पर करती रहने वाली लक्ष्मी सहगल को सामाजिक और आर्थिक आजादी पिता से विरासत में मिली थी. शायद इसी वजह से वो इनकी वकालत भी करती थीं.

सामाजिक जिम्मेदारी का हिस्सा ही उनका पढ़ाई के लिए लंदन न जाने का भी रहा था. पिता की मौत के बाद उन्होंने डॉक्टरी की पढ़ाई करने के लिए लंदन जाने से इंकार कर दिया और 1932 में मद्रास मेडिकल कॉलेज में दाखिला लिया. 1938 में उन्होंने मद्रास मेडिकल कालेज से एमबीबीएस किया.

कुछ दिन भारत में काम करने के बाद परिस्थितियां कुछ ऐसी बनीं कि वे 1940 में वे सिंगापुर चली गईं. लक्ष्मी का देशप्रेम वहां भी बना रहा. उन्होंने न केवल भारत से आए आप्रवासी मज़दूरों के लिये निशुल्क चिकित्सालय खोला बल्कि भारत स्वतंत्रता संघ की सक्रिय सदस्य भी बनीं.

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यहीं पर 1943 में उनकी मुलाकात नेता जी सुभाष चंद्र बोस से हुई. लक्ष्मी आजाद हिंद फौज का हिस्सा बनकर देश के लिए कुछ करना चाहती थीं. शुरुआत में नेता जी को उन पर पूरा भरोसा न हुआ लेकिन बाद में वो मान गए. इसके बाद बनी आजाद हिंद फौज की ऐतिहासिक पहली महिला रेजीमेंट जिसका नाम झांसी बाई के नाम रखा गया.

लक्ष्मी ने आजाद हिंद फौज में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. सेकंड वर्ल्ड वार के बाद जब ब्रिटिश सेनाओं ने जापानी सैनिकों को पकड़ने के ऑपरेशन शुरू किए तो लक्ष्मी सहगल भी गिरफ्तार की गई थीं. बाद में उन्हें छोड़ दिया गया. 1947 में उन्होंने आजाद हिंद फौज में कर्नल रहे प्रेम कुमार सहगल से विवाह कर लिया. इन्हीं प्रेम कुमार सहगल पर डायरेक्टर तिग्मांशु धूलिया की फिल्म रागदेश आधारित है.

इसके बाद लक्ष्मी सहगल कानपुर शिफ्ट हो गईं और उसके बाद एक डॉक्टर के तौर पर लोगों की सेवा में लगी रहीं. सत्तर के दशक में उन्होंने कम्यूनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) ज्वाइन कर ली. पार्टी से उनके जुड़ाव सामाजिक और आर्थिक आजादी से जोड़ कर देखा जा सकता है.

साल 2002 के राष्ट्रपति चुनाव में एनडीए के कैंडिडेट अब्दुल कलाम के समक्ष फॉरवर्ड फ्रंट ने उन्हें अपना उम्मीदवार बनाया था. वो चुनाव लक्ष्मी सहगल हार गई थीं.

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उस समय शायद आखिरी बार वो नेशनल मीडिया में सुर्खियां बनी थीं लेकिन उसके बाद लक्ष्मी सहगल कानपुर में लोगों की सेवा में लगी रहीं. सामाजिक और आर्थिक आजादी में उनके भरोसे को इस बात से समझा जा सकता है कि जिस वामपंथी पार्टी ने सुभाष चंद्र बोस की आलोचना की थी उसी पार्टी को बाद में लक्ष्मी ने ज्वाइन किया. सीपीआईएम ज्वाइन करने के पीछे भी उनके उद्देश्य साफ थे कि ये पार्टी आर्थिक और सामाजिक समानता की बात करती है.

कैप्टन लक्ष्मी सहगल ने 23 जुलाई 2012 को इस दुनिया को अलविदा कह दिया था. उनका जीवन इस बात की मिसाल है जो वो सोचती थीं पूरे जीवन उसी के लिए लड़ती रहीं. एक बार उन्होंने कहा भी था- फाइट विल गो ऑन.

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