S M L

पुण्यतिथि विशेष: बचपन की धन्नो के विश्वविख्यात सितारा देवी बनने की दास्तान

सितारा देवी ने जब नृत्य की दुनिया में कदम रखा था तो समाज ने उनके परिवार का बहिष्कार कर दिया था

Shivendra Kumar Singh Shivendra Kumar Singh Updated On: Nov 25, 2017 10:16 AM IST

0
पुण्यतिथि विशेष: बचपन की धन्नो के विश्वविख्यात सितारा देवी बनने की दास्तान

बनारस कलाकारों की नगरी है. विद्वानों की नगरी है. इसी काशी नगरी में साल 1920 के आस-पास की बात है. संस्कृत और संगीत के विद्वान पंडित सुखदेव प्रसाद के यहां तीसरी संतान के जन्म का वक्त था. घर में दो बेटियां पहले से थीं. एक बेटी का नाम उन्होंने बड़े प्यार से रखा था अलखनंदा और दूसरी का तारा. तीसरी संतान के पैदा होने से पहले पंडित सुखदेव प्रसाद ने 6 राग और 36 रागनियों का एक पंचाग तैयार किया.

पंडित सुखदेव प्रसाद को जितना उत्साह अपनी तीसरी संतान को लेकर था उतना ही उत्साह इस बात को लेकर था कि उसका जन्म उनके बनाए पंचाग के अनुसार हो. फिर दीपावली से ठीक दो दिन पहले पंडित सुखदेव प्रसाद के यहां तीसरी बेटी का जन्म हुआ. जन्म धनतेरस के दिन हुआ था इसलिए नाम रख दिया गया- धन्नो. दो बड़ी बहनों के बीच पलने वाली धन्नो जन्म के साथ ही सभी की दुलारी हो गईं. पिता संगीत के विद्वान थे इसलिए घर में संगीत और नृत्य की आवाज, उसकी झंकार धन्नो के कानों में लगातार पड़ रही थी. उसी झंकार के साथ धन्नो ना सिर्फ बड़ी हो रही थी बल्कि उन्हें आत्मसात भी करती जा रही थी.

8 साल में की कोरियोग्राफी

इसके बाद ये वाकया तब का है जब धन्नो करीब 8 साल की थी. धन्नो के स्कूल में ‘सावित्री सत्यवान’ नाम से एक नृत्य नाटिका होने वाली थी. बचपन की सुनी सुनाई और देखी बातों का असर हुआ. उस 8 बरस की बच्ची ने अपनी टीचर से कहा कि वो इस नृत्य नाटिका की नृत्य संरचना तैयार करना चाहती है. ‘कोरियोग्राफी’ शब्द की परिभाषा शायद ही तब तक प्रचलित हुई हो. जाहिर है धन्नो का लोगों ने मजाक उड़ाया, कहा कि ये मुंह और मसूर की दाल. ये अलग बात है कि अपनी सोच, अपनी रचनात्मकता और साथ ही साथ भरपूर आत्मविश्वास के दम पर धन्नो ने अपनी टीचर से इस नृत्य नाटिका को तैयार करने के लिए हामी भरवा ली.

नृत्य नाटिका तय मौके पर हुई, अगले दिन जब अखबार में उस नृत्य नाटिका के बारे में खबर छपी, साथ ही ये जानकारी भी आई कि इस नृत्य नाटिका को धन्नो ने तैयार किया था तो घरवाले चौंक गए. ये चौंकना इसलिए था क्योंकि घर पर किसी को पता तक नहीं था कि धन्नो किसी तरह की नृत्य संरचना तैयार कर रही है.

Sitara Devi-567

यूं बनी धन्नो सितारा 

अब इस खूबसूरत कहानी को और आगे बढ़ाए उससे पहले बता देते हैं कि आखिर ये धन्नो है कौन? ये धन्नो हैं भारतीय नृत्य परंपरा की सबसे विश्वविख्यात कलाकारों में से एक सितारा देवी. ये बताना भी जरूरी है कि धन्नो कैसे सितारा देवी बनीं.

दरअसल जैसे ही बचपन की धन्नो की इस प्रतिभा के बारे में पिता पंडित सुखदेव प्रसाद को पता चला उन्होंने पहला काम किया बेटी की विधिवत कथक की शिक्षा. साथ साथ उसे उन कार्यक्रमों में ले जाना जहां बड़े कलाकारों को देखने और उनसे मिलने का मौका मिले.

ये भी पढ़ें: रफी की गायकी, नौशाद का संगीत और दिलीप कुमार का अभिनय... एक बेहतरीन गाने की अनसुनी 

इसी दौरान वो घटना हुई जिसने धन्नो को सितारा बना दिया. धन्नो एक बार अपने परिवार के साथ एक कार्यक्रम में गई थी. जिस कार्यक्रम में वो गई थीं, वहां भी दो लड़कियां थीं. एक का नाम था तारा, दूसरी का सितारा. धन्नो को बहनों के ये नाम बहुत अच्छे लगे. वहां से घर लौटने के बाद उन्होंने पिता सुखदेव प्रसाद से जिद की कि उनका नाम भी बदलकर सितारा रखा जाए. सुखदेव प्रसाद ने ना-नुकुर की लेकिन बेटी की जिद के आगे कुछ बोल नहीं पाए. उन्हें क्या पता था कि आने वाले समय में ये नाम वाकई एक सितारे की तरह चमकेगा.

sitara devi

यह भी पढ़ें: किस महान कलाकार के नहीं पहुंचने पर सिर्फ 22 साल की गिरिजा देवी ने संभाला था मंच

सितारा देवी के जीवन में दो घटनाएं और खास रहीं. एक तो उनका लखनऊ घराने के बड़े कलाकार अच्छन महाराज, शंभू महाराज और लच्छू महाराज से विधिवत कथक सीखना और दूसरा जब वो 12 साल की थीं तब फिल्म जगत की जानी मानी हस्ती निरंजन शर्मा से हुई उनकी मुलाकात. इन दोनों घटनाओं का थोड़ा विस्तार जानना जरूरी है. सितारा देवी जब करीब 12 साल की थीं, तब ही उन्हें निरंजन शर्मा ने अपनी फिल्म ‘उषा हरण’ के लिए साइन किया था.

दरअसल, निरंजन शर्मा बनारस की एक ऐसी लड़की की तलाश में आए थे, जो चंचल हो लेकिन एक भोलापन लिए हुए. साथ ही साथ उसे डांस की बारीकियां भी आती हों. उस दौर में डांस का काम ज्यादातर तवायफों तक ही सीमित था. निरंजन शर्मा को तवायफों की गली से ही पता चला कि उनकी तलाश सितारा देवी पूरी कर सकती हैं. ये जानकारी बिल्कुल सही थी, सितारा देवी से मिलने के बाद निरंजन शर्मा को लगा कि उनकी तलाश पूरी हुई. उन्होंने 1930 के दशक में सितारा देवी को पहली बार फिल्मों में आने के लिए पूरे परिवार के साथ बंबई (अब मुंबई) आने का न्यौता दिया.

टैगोर से मिली थी ‘नृत्य स्रामाज्ञी’ की उपाधि

दूसरी घटना को जानना इसलिए जरूरी है क्योंकि सितारा देवी ने अच्छन महाराज, शंभू महाराज और लच्छू महाराज से शिक्षा तो लखनऊ घराने की ली, लेकिन धीरे-धीरे अपनी एक अलग शैली विकसित की. अपनी इसी अलग शैली से उन्होंने बनारस घराने में कथक का विस्तार किया. जहां शुद्धता पर जमकर जोर दिया गया. उन्होंने तबला-पखावज के बोलों की बजाए नृत्य के शुद्ध बोलों का इस्तेमाल ज्यादा किया.

sitara_devi123

ये वो दौर था जब कथक के नाम पर लखनऊ, जयपुर और रायगढ़ जैसे घराने ज्यादा प्रचलित थे, लेकिन सितारा देवी ने बनारस घराने को एक खास पहचान दी. ये भी एक बड़ी वजह रही कि बड़े नामों से शिक्षा लेने के बाद भी सितारा देवी ने अपनी पहचान जल्द ही बना ली. सितारा देवी तब सिर्फ 16 बरस की थीं जब एक कार्यक्रम में पंडित रवींद्र नाथ टैगोर आए थे. सफेद दाढ़ी, एकदम दिव्य पुरुष की छवि वाले पंडित टैगोर ने सितारा देवी को उनके कार्यक्रम के बाद बुलाया और ईनाम दिया. सितारा देवी के पिता ने बेटी से कहा कि वो पंडित रवींद्र नाथ टैगोर से उनकी भाषा में कहें कि वो उन्हें कुछ लिखकर दें.

ये भी पढ़ें: भैरव से भैरवी तक के साथ दुनिया की सुर-यात्रा को तैयार हैं सुरों के दो साधक

कोलकाता में बचपन बीता था इसलिए सितारा देवी को भी थोड़ी बहुत बंगाली आती थी, उन्होंने अपनी ये इच्छा टैगोर जी को बताई. तब पंडित रवींद्र नाथ टैगोर ने सितारा देवी को ‘नृत्य स्रामाज्ञी’ की उपाधि से लिखकर नवाजा.

सितारा देवी के नृत्य की खासियत उनका भाव पक्ष था. आप उन्हें दुर्गा या काली परन करते देखिए तो ऐसा लगता था कि आप साक्षात मां दुर्गा या काली को देख रहे हों. सितारा देवी के जीवन का संघर्ष उनके इन भावों में दिखता था. संघर्ष अपनी पहचान बनाने का, संघर्ष समाज से लड़ने का. सितारा देवी ने जब नृत्य की दुनिया में कदम रखा था तो समाज ने उनके परिवार का बहिष्कार कर दिया था. वजह बड़ी साफ थी उस दौर में नृत्य करने वाली लड़कियों को इज्जत की निगाह से कम ही देखा जाता था. लेकिन पिता सुखदेव प्रसाद हमेशा अपनी बेटियों के साथ थे. उन्हें समाज से ज्यादा फिक्र अपनी बेटियों की थी. इसीलिए उन्होंने हमेशा सितारा देवी का साथ दिया.

ये भी पढ़ें: जन्मशती विशेष: क्लास खत्म होने के बाद भी पढ़ाते रहते थे मुक्तिबोध

अपने पिता का ये अंदाज बेटी को भी मिला. सितारा देवी भी बिंदास थीं. अपने नृत्य से लेकर निजी रिश्तों तक. दर्शकों ने उन्हें हमेशा सर माथे पर बिठाया. प्यार किया. इज्जत दी। सितारा देवी के लिए वही इज्जत काफी थी. उन्होंने इसके अलावा किसी और बात की परवाह नहीं की. यहां तक कि जब उन्हें पद्मभूषण देने की बात आई तो उन्होंने साफ मना कर दिया. उनकी लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 8 नवंबर को उनके जन्मदिन पर गूगल ने उनकी तस्वीर से डूडल बनाया.

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो
गोल्डन गर्ल मनिका बत्रा और उनके कोच संदीप से खास बातचीत

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi