Co Sponsor
In association with
In association with
S M L

पुण्यतिथि विशेष किशोर कुमार: कोई होता जिसको हम अपना कह लेते यारों

जीनियस किशोर कुमार जीवन के अंतिम समय खुद को बंबई नगर में बेहद अकेला पाते थे

Shailesh Chaturvedi Shailesh Chaturvedi Updated On: Oct 13, 2017 02:18 PM IST

0
पुण्यतिथि विशेष किशोर कुमार: कोई होता जिसको हम अपना कह लेते यारों

वो खंडवा जाना चाहते थे. जिंदगी के आखिरी दिन अपने ‘घर’ में बिताना चाहते थे. उन्हें बंबई कभी अपने घर जैसा नहीं लगा. उन्हें सब कुछ छोड़ देना था. वो बहुत अकेला महसूस करते थे. उन्हें लगता था कि कोई उनका दोस्त नहीं है. वो गायक थे, वो एक्टर थे, वो गीतकार थे, वो संगीतकार थे, वो निर्माता थे, निर्देशक थे, स्क्रिप्टराइटर थे. एक शब्द में कहा जाए तो जीनियस थे. लेकिन उन्हें लोग दीवाना मानते थे, पागल मानते थे, अक्खड़ मानते थे. वो... यानी आभास कुमार गांगुली.

आभास कुमार गांगुली का बचपन में एक ही सपना था. वो अपने बड़े भाई से ज्यादा पैसे कमाना और केएल सहगल जैसा गाना चाहते थे. मध्य प्रदेश के खंडवा में चार अगस्त, 1929 को जन्मे आभास यानी किशोर कुमार. कैसे माना जा सकता है कि किशोर कुमार जैसा इंसान इस कदर अकेला हो सकता है.

एक समय ऐसा था, जब वो फिल्म के डायरेक्टर-प्रोड्यूसर से बचने की भरसक कोशिश करते थे. लेकिन जैसा कहा जाता है कि वो बंबई को छोड़ना भले ही चाहें, लेकिन मायानगरी उन्हें कतई छोड़ना नहीं चाहती थी. छोड़ा भी नहीं.

किशोर के पिता कुंजलाल गांगुली वकील और मां गौरी देवी धनाढ्य परिवार से ताल्लुक रखती थीं. किशोर चार भाइयों में सबसे छोटे थे. सबसे बड़े अशोक, उसके बाद सती देवी और फिर अनूप.

किशोर अभी बच्चे ही थे, जब अशोक कुमार बड़े फिल्म अभिनेता बन गए थे. अनूप को भी शौक था. भाइयों के साथ किशोर को भी फिल्म और संगीत का शौक हो गया. केएल सहगल के फैन थे. उन्हीं की तरह गाने की कोशिश करते थे और पढ़ाई जारी थी. इंदौर के क्रिश्चियन कॉलेज से वो ग्रेजुएट हुए. अभी वो किशोर कुमार नहीं बने थे. आभास ही थे. वो बंबई आ गए. बॉम्बे टॉकीज के लिए कोरस गाना शुरू किया. उन्होंने नाम भी बदल लिया. यहां अशोक कुमार काम करते थे. 1948 में फिल्म आई जिद्दी. इसके लिए खेमचंद प्रकाश के संगीत निर्देशन में किशोर कुमार ने अपना पहला गाना गाया – मरने की दुआएं क्यों मांगूं.

किशोर कुमार को फिल्में मिलने लगीं. सिर्फ गायक के तौर पर ही नहीं, अभिनेता के तौर पर भी. फिल्म नौकरी में एक गाना था छोटा सा घर होगा. संगीतकार सलिल चौधरी इसे हेमंत कुमार से गवाना चाहते थे. लेकिन किशोर ने जिद की कि एक बार वो उन्हें सुन लें. गाना उन्हें मिल गया.

इसी तरह फिल्म हाफ टिकट में एक गाना था – आके सीधी लगी दिल पे जैसे कटरिया... इसमें सलिल चौधरी ही संगीतकार थे. वो चाहते थे कि किशोर और लता मंगेशकर गाना गाएं. लता शहर में नहीं थीं. सलिल चौधरी को किसी भी हालत मे गाना रिकॉर्ड करना था. किशोर कुमार ने समस्या हल कर दी. उन्होंने पुरुष और महिला दोनों आवाज में गाना गा दिया.

इस बीच किशोर को एसडी बर्मन मिल गए थे. 1950 की बात है. बर्मन दा अशोक कुमार के घर गए थे. वहां उन्होंने किशोर को केएल सहगल की नकल करते सुना. उन्होंने किशोर को अपनी स्टाइल में गाने को कहा. कहा जा सकता है कि किशोर की प्रतिभा को मांजने का काम उन्होंने किया.

1961 में किशोर कुमार ने फिल्म बनाई झुमरू. इसके निर्माता, निर्देशक, मुख्य अभिनेता वही थे. मैं हूं झुमरू  गाना लिखा और संगीतबद्ध किया था. इसी तरह दूर गगन की छांव में भी उन्होंने बनाई. स्क्रिप्ट भी उनकी थी, संगीत भी, एक्टिंग भी. इसके बाद भी उन्होंने फिल्में बनाईं, जैसे बढ़ती का नाम दाढ़ी, जिंदगी, दूर वादियों में कहीं. लेकिन फिल्में ज्यादा चलीं नहीं.

किशोर के अक्खड़पन ने उन्हें परेशानियों में भी डाला. इमरजेंसी के वक्त संजय गांधी चाहते थे कि किशोर कुमार कांग्रेस की रैली में गाएं. किशोर ने मना कर दिया. नतीजा ये हुआ कि सूचना एवं प्रसारण मंत्री विद्या चरण शुक्ल उन पर अनौपचारिक प्रतिबंध लगा दिया.

आकाशवाणी और दूरदर्शन पर उनके गाने बजने बंद हो गए. 4 मई 1976 से इमरजेंसी खत्म होने तक प्रतिबंध जारी रहा. 80 के दशक में किशोर कुमार का अमिताभ बच्चन से विवाद हो गया. अमिताभ ने किशोर की फिल्म ममता की छांव में मेहमान कलाकार बनने से मना कर दिया था. उन्होंने कुछ समय मिथुन चक्रवर्ती के लिए भी गाने नहीं गाए. वजह यह थी कि मिथुन ने उनकी पूर्व पत्नी योगिता बाली से शादी की थी.

किशोर कुमार ने चार शादियां की. उनकी पहली पत्नी बांग्ला अभिनेत्री और गायिका रूमा गुहा ठाकुरता थीं. 1950 में की शादी 1958 तक चली. रूमा को वो बहुत प्रतिभाशाली मानते थे. उनका कहना था कि दोनों का जिंदगी को देखने का नजरिया अलग था, इसलिए शादी नहीं चली. किशोर चाहते थे कि वो घर संभालें. करियर से ज्यादा अहम घर है.

दूसरी शादी मधुबाला से थी. किशोर ने जब उन्हें प्रपोज किया, वो बहुत बीमार थीं. ट्रीटमेंट के लिए लंदन जाना चाहती थीं. उनके दिल में छेद था. रूमा से तलाक के बाद किशोर ने मधुबाला से शादी की. इसके लिए उन्होंने इस्लाम कुबूल किया. उनका नाम रखा गया करीम अब्दुल. किशोर कुमार के माता-पिता इस शादी में नहीं आए. किशोर ब्राह्मण परिवार से थे, जबकि मधुबाला मुस्लिम थीं.

Madhubala

हालांकि किशोर और मधुबाला ने हिंदू रीति-रिवाज से भी शादी की. लेकिन मधुबाला को घर में कभी अपनाया नहीं गया. घर में तनाव की वजह से शादी के एक महीना बाद ही मधुबाला बांद्रा के अपने बंगले में शिफ्ट हो गईं. वैवाहिक जीवन बड़े तनाव में बीता. किशोर के मुताबिक नौ साल उन्होंने मधुबाला की सेवा की. वो बेड से नहीं उठ सकती थीं. अपनी आंखों के सामने मरते देखा.

एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि किसी को सामने मरते देखना क्या होता है, इसे समझा नहीं जा सकता. 23 फरवरी 1969 को मधुबाला की मौत हो गई. वो बहुत दर्द में थीं. परेशान हो जाती थीं तो चीखती थीं कि मौत क्यों नहीं आती? किशोर ने बताया था – उस वक्त भी मुझे मजाक करना पड़ता था. डॉक्टर ने कहा था कि इन्हें खुश रखिए. मैंने मधुबाला की आखिरी सांस तक ये किया. खुशी में खुश हुआ. दुख में रोया.

किशोर की तीसरी शादी योगिता बाली के साथ 1976 में हुई. महज दो साल ये शादी चली. किशोर इस शादी को मजाक मानते थे. वो मानते थे कि योगिता बाली शादी को लेकर गंभीर नहीं थीं. वो अपनी मां के साथ रहना चाहती थीं, मेरे साथ नहीं. 1980 में उन्होंने एक और अभिनेत्री लीना चंदावरकर से शादी की. लीना को वो बहुत पसंद करते थे. उनके साथ खुश थे. किशोर के दो बेटे हैं. पत्नी रूमा से अमित कुमार और लीना से सुमित कुमार.

1986 में किशोर कुमार को दिल का दौरा पड़ा. इसके बाद उन्होंने गाना कम कर दिया. अब वो खंडवा लौट जाना चाहते थे. लेकिन नियति को ये मंजूर नहीं था. 13 अक्टूबर 1987 का दिन था. बड़े भाई अशोक कुमार का 76वां जन्मदिन. किशोर कुमार को दिल का दौरा पड़ा. उनकी मौत हो गई.

किशोर इससे पहले कई बार अपने परिवार और स्टाफ के सामने मरने की एक्टिंग कर चुके थे. वो कई बार अशोक कुमार और अनूप कुमार तक खुद के मरने की खबर भी पहुंचवा चुके थे. जब सब सन्न रह जाते, तो किशोर जोर-जोर से हंसने लगते. लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ. संगीत का जीनियस हमेशा के लिए चला गया था.

वो हमेशा खुद को किशोर कुमार खंडवावाला कहलाना पसंद करते थे. उनका अंतिम संस्कार खंडवा में ही हुआ. उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा था कि कौन मूर्खों के इस शहर (बंबई) में रहना चाहता है, जहां कोई दोस्त नहीं. हर कोई आपका इस्तेमाल करना चाहता है. क्या आप यहां किसी पर भरोसा कर सकते हैं? क्या कोई आपका दोस्त है? मैं इन सबसे दूर चला जाऊंगा. अपने खंडवा में. वो मेरे पुरखों का घर है. इस बदसूरत शहर में कौन रहना चाहता है. लेकिन वो ‘बदसूरत’ शहर को मौत से पहले छोड़ नहीं सके.

उनका आखिरी गाना बप्पी लाहिड़ी के लिए था. आशा भोंसले के साथ फिल्म वक्त की आवाज में – गुरु गुरु. गाना मिथुन चक्रवर्ती और श्रीदेवी पर फिल्माया गया था. गाना 12 अक्टूबर को रिकॉर्ड हुआ था. मौत से एक दिन पहले.

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो
AUTO EXPO 2018: MARUTI SUZUKI की नई SWIFT का इंतजार हुआ खत्म

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi