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पुण्यतिथि विशेष: समाज सुधारक जो आधुनिक बांग्ला का पितामह भी था

पुण्यतिथि विशेष: ईश्वर चंद्र विद्यासागर बंगाली पुनर्जागरण के प्रणेताओं में से एक थे

Arun Tiwari Arun Tiwari Updated On: Jul 29, 2017 10:03 AM IST

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पुण्यतिथि विशेष: समाज सुधारक जो आधुनिक बांग्ला का पितामह भी था

भारतीय इतिहास में ईश्वर चंद्र विद्यासागर को शिक्षक, फिलॉसोफर और समाज सुधारक जैसे न जाने कितने रूपों में याद किया जाता है. लेकिन उनके जीवन के सबसे मजेदार किस्सों में से एक है एक अंग्रेज शिक्षक को शिष्टाचार सिखाने का वाकया.

ईश्वर चंद्र उस समय कलकत्ता के संस्कृत कॉलेज में पढ़ाते थे. उन्हें किसी काम से अंग्रेज शिक्षक से मिलने के लिए विल्सन कॉलेज जाना जाता था. जब वो वहां पहुंचे तो अंग्रेज शिक्षक अपने कमरे में मेज पर पैर रखकर बैठे हुए थे. ईश्वर चंद्र के लिए असहज स्थिति थी लेकिन उन्होंने बिना इसे मुद्दा बनाए अपनी बातचीत पूरी की और वापस चले आए. सौभाग्य से कुछ ही दिनों बाद उस अंग्रेज शिक्षक को ईश्वर चंद्र से मिलने के लिए संस्कृत कॉलेज आना था. इस बार बारी ईश्वर चंद्र की थी. वो अपने कमरे में मेज पर पैर रखकर बैठ गए. वो अंग्रेज शिक्षक गुस्से में तमतमाए वहां से वापस लौट गया.

उस अंग्रेज शिक्षक ने ईश्वर चंद्र की शिकायत कर दी. जब ईश्वर चंद्र से पूछा गया कि उन्होंने ऐसा क्यों किया तो उनके जवाब ने सबको लाजवाब कर दिया. उन्होंने कहा हम भारतीय लोग पश्चिमी शिष्टाचार की सीख आप अंग्रेजों से ही लेते हैं. जब मैं उन अंग्रेज शिक्षक के कमरे में गया तो वो मेज पर पैर रखकर बैठे थे तो मुझे लगा कि शायद आप लोगों का मिलने-जुलने का यही शिष्टाचार है. मैंने तो सिर्फ आपके व्यवहार को ही दोहराया है. मुझे लगा शायद ये आपको अच्छा लगेगा. ईश्वर चंद्र की बातें सुनकर वो अग्रेज शिक्षक शरमा गया.

ईश्वर चंद्र जैसा व्यक्ति ही गुलाम भारत में एक सम्मानित अंग्रेज को इस तरह का पाठ पढ़ा सकता था. ब्रिटिश काल के भारत में कम ऐसे वाकये हुए हैं जब कोई हिंदुस्तानी किसी अंग्रेज की बेइज्जती यूं आराम बचकर निकल गया हो. ये सिर्फ एक किस्सा है ईश्वर चंद्र के स्वाभिमान का. पश्चिम बंगाल में ईश्वर चंद्र से जुड़ी न जाने कितनी कहानियां लोगों के बीच सुनाई जाती हैं.

इसलिए उनके निधन पर रवींद्रनाथ टैगोर ने लिखा था, ‘किसी को आश्चर्य हो सकता है कि भगवान ने चार करोड़ बंगाली बनाने की प्रक्रिया में एक ही इंसान बनाया’. कवि रवींद्रनाथ की यह बात बंगाली लोगों पर एक तंज भी थी. यह तंज उस समय के बंगाली समाज की कुरीतियों को लेकर कर किया गया था.

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ईश्वर चंद्र के बारे में मशहूर था कि वो समय के बड़े पाबंद थे. एक बार उन्हें लंदन में आयोजित एक सभा में भाषण देना था. जब वो सभागार के बाहर पहुंचे तो देखा काफी लोग बाहर खड़े हैं. उन्होंने किसी से पूछा कि ये लोग बाहर क्यों खड़े हैं तो जानकारी मिली कि सभागार के सफाई कर्मचारी नहीं पहुंचे हैं. उन्होंने बिना देर लगाए हाथ में झाड़ू उठाई और सफाई में लग गए. उन्हें देखकर वहां मौजूद लोग भी सफाई में लग गए. थोड़ी ही देर में पूरा हॉल साफ हो चुका था.

इसके बाद ईश्वर चंद्र ने वहां भाषण दिया. उन्होंने वहां मौजूद लोगों से कहा स्वावलंबी बनिए. हो सकता है कि इस सभागार के सफाई कर्मचारी किसी कारण न आ सके हों तो क्या ये कार्यक्रम नहीं होता? जो लोग इतना श्रम करके यहां पहुंचे हैं उनका समय व्यर्थ हो जाता? उनके भाषण पर लोगों ने जबरदस्त तालियां बजाईं. ये वो समय था जब भारत में ब्रिटिश हुकूमत थी और ईश्वर चंद्र ब्रिटिश लोगों को उनकी धरती पर जीवन के कायदे समझा रहे थे.

26 सितंबर 1820 को बंगाल के मेदिनीपुर जिले में एक ब्राह्मण परिवार में जन्मे ईश्वर चंद्र बंदोपाध्याय के पूरे जीवन में सिर्फ एक ही सामान्य बात थी कि वो बेहद साधारण परिवार में पैदा हुए थे. बाकी की पूरी कहानी असाधारण है. छुटपन से विलक्षण थे और लगभग सत्तर साल की उम्र में 1891 जब उनका देहांत हुआ तब तक अनगिनत ऐसे काम किए जो आधुनिक बंगाल की सफलता के नींव के पत्थर हैं.

संस्कृत कॉलेज कलकत्ता में बारह साल तक अध्ययन के बाद जब वो बाहर निकले तो ईश्वर चंद्र से विद्यासागर बन चुके थे. कॉलेज में उनकी दक्षता की वजह से यह उपनाम सौंपा गया था. उन्होंने कलकत्ता के संस्कृत कॉलेज में संस्कृत के प्रोफेसर के रूप में सेवा की. वह जब कॉलेज के प्रिंसिपल थे, तो कॉलेज सुधार का स्थान बन गया था. इतना ही नहीं, विद्यासागर एक महान लेखक भी थे और उनको आधुनिक बंगाली भाषा के पिता के रूप में जाना जाता है. उन्होंने बंगाली वर्णमाला में सुधार किए.

विधवा विवाह को लेकर उन्होंने ब्रिटिश सरकार पर एक्ट बनाने के लिए बेहद दबाव बनाया था. इसके लिए उन्होंने सरकार के पेटिशन दिया. उनके पेटिशन के साथ ही 22 और लोगों ने भी उनके पक्ष में पेटिशन दिया था. लेकिन वहां के रूढ़िवादी हिंदू समाज के लोगों ने हजारों लोगों का हस्ताक्षर करके सरकार को पेटिशन दी. सरकार मुश्किल में फंस गई. इतने विरोध ने बावजूद भी ईश्वर चंद्र सरकार ने 1857 में एक्ट बनवाने में कामयाब हो गए.

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एक्ट बनवाने में तो कामयाबी मिल गई लेकिन फिर उनके साथियों ने बाद में वो उत्साह नहीं दिखाया. इसी वजह से उनके मूवमेंट को सफलता नहीं मिल पाई. लेकिन अगर ये कहा जाए कि राजा राम मोहन राय बंगाली समाज में सुधार के ध्वज वाहक थे तो ईश्रर चंद्र सिर्फ उनसे उन्नीस ही बैठते होंगे. यानी फासला ज्यादा नहीं था. वो भी बंगाली पुनर्जागरण के प्रणेताओं में से एक थे.

अपने पूरे जीवन में कई संस्थान खोलने वाले ईश्वर चंद्र अनवरत प्रगतिशील समाज बनाने के लिए काम करते रहे. उन्हें मालूम था भारत गुलाम है और प्रतिगामी कदम उसकी दासता को और लंबे समय तक खींचेंगे.

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