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साहिर होते तो आज फिर लिखते-सबको सन्मति दे भगवान

साहिर ने भले ही यह लाइन वर्षों पहले लिखी थी लेकिन आज के हिंदुस्तान में शायद सबसे ज्यादा जरूरत सन्मति की ही है

Shailesh Chaturvedi Shailesh Chaturvedi Updated On: Oct 25, 2017 10:24 AM IST

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साहिर होते तो आज फिर लिखते-सबको सन्मति दे भगवान

एक कहानी है. संगीतकार जयदेव, मशहूर फिल्मकार विजय आनंद और गीतकार साहिर लुधियानवी बैठे हुए थे. जयदेव ने पाकिस्तान के मशहूर शायर सैफुद्दीन सैफ का शेर पढ़ा – हमको तो गर्दिश-ए हालात पे रोना आया.. रोने वाले तुझे किस बात पे रोना आया...

शेर सुनाकर जयदेव ने साहिर से कहा कि शायर एक सवाल छोड़कर गया है, इसका जवाब आपको देना है. साहिर ने अगले ही मिनट जवाब दे दिया - कभी खुद पे कभी हालात पे रोना आया....बात निकली तो हर इक बात पे रोना आया...जयदेव बहुत खुश हुए. उन्होंने कहा कि मियां, ग़ज़ल पूरी करो. मैं इसकी धुन बनाऊंगा. विजय आनंद ने कहा कि ग़ज़ल मेरी हुई. मैं अपनी फिल्म में इसे इस्तेमाल करूंगा. उसी बैठक में ग़ज़ल पूरी हुई. विजय आनंद ने 1961 में फिल्म बनाई हम दोनों. इसमें देव आनंद थे. फिल्म में इस ग़ज़ल का इस्तेमाल हुआ.

इसी फिल्म में एक भजन है-अल्लाह तेरो नाम, ईश्वर तेरो नाम.. सबको सन्मति दे भगवान. साहिर आज होते, तो शायद यही पंक्तियां बुदबदा रहे होते. आज के हिंदुस्तान में शायद सबसे ज्यादा जरूरत सन्मति की ही है. वैसे ऐसा नहीं है कि इस हिंदुस्तान के बारे में साहिर ने तब नहीं सोच लिया था. ऐसा नहीं होता, तो 1958 में आई फिल्म फिर सुबह होगी का गीत साहिर ने न लिखा होता-आसमां पे है खुदा और जमीं पे हम. इस गाने का एक अंतरा है -

आजकल किसी को वो टोकता नहीं, चाहे कुछ भी कीजिए रोकता नहीं हो रही है लूटमार, फट रहे हैं बम...

ऊपर वाले से इस तरह का संवाद साहिर ही कर सकते थे. संवाद क्या, शिकायत कि अब ऊपर वाला किसी को नहीं टोकता. ध्यान दीजिए, फिल्म तब आई थी, जब दुनिया ऐसी नहीं थी. भारत की आजादी को एक दशक ही हुआ था. उम्मीदें थीं. लोग मानते थे कि नेहरू देश को बदल देंगे. तब उन्होंने संसार के उन हालात की कल्पना की, जो अब दिखता है.

वो साहिर ही थे, जिन्होंने देश के हालात पर उस वक्त ऐसे तल्ख सवाल उठाए थे कि सरकार तिलमिला उठी थी. आज सहिष्णु और असहिष्णु की बहस के बीच सोचिए कि कोई गाना इसलिए बैन कर दिया जाए, क्योंकि उसमें सवाल पूछा गया हो. साहिर ने ही तो पूछा था- जिन्हें नाज है, हिंद पर वो कहां हैं... इस सवाल ने प्यासा फिल्म का वो गाना बैन करवा दिया था. बताने की जरूरत नहीं कि उस वक्त नेहरू की सरकार थी और पचास का दशक था. वो दौर जिसे सबसे ज्यादा सहिष्णु माना जाता है.

ये सारे गीत उसने लिखे, जो खुद एक जमींदार परिवार में जन्मा. पंजाब मे जन्मे साहिर का नाम अब्दुल हई था. उनके जन्म के साथ ही मां ने पिता से अलग होने का फैसला किया था. गुरबत में दिन बीते. मुल्क आजाद हुआ, तो उन्होंने पाकिस्तान में रहने का फैसला किया. लेकिन फिर भारत आए. आने के बाद ऐसे गीत लिखे कि हिंदी फिल्मों की साहिर के बगैर कल्पना ही नहीं की जा सकती.

चाहे वो एसडी बर्मन के लिए चंद मिनटों में लिखा गया ठंडी हवाएं, लहरा के आएं हो या कोई भी गीत. साहिर की कलम में जादू था. उनके गीतों में यथार्थ था. वैसे ही, जैसे उन्होंने लिखा चलो इक बार फिर से  अजनबी बन जाएं हम दोनों. इस गाने में कुछ पंक्तियां हैं – वो  अफसाना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन, उसे एक खूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा. कहा जाता है कि कि ये पंक्तियां सुधा मल्होत्रा के साथ अधूरे प्यार के लिए इस्तेमाल की गई थीं. और ये भी कि तुम मुझे भूल भी जाओ तो ये हक है तुमको... मेरी बात और है, मैंने तो मुहब्बत की है...

यकीनन उन्हें अभी न जाओ छोड़कर जैसे गानों के लिए जाना जाता है. यकीनन उन्हें अमृता प्रीतम के रिश्तों के लिए जाना जाता है. यकीनन उन्हें कभी-कभी मेरे दिल में खयाल आता है के लिए जाना जाता है. उनकी पहचान हर फिक्र को धुएं में उड़ाता चला गया से भी है. लेकिन असली पहचान दरअसल, विद्रोही तेवर के लिए है. वो तेवर जो उनसे लिखवाते हैं –

इक शहंशाह ने दौलत का सहारा ले कर

हम ग़रीबों की मुहब्बत का उड़ाया है मज़ाक...

वही तेवर हैं, जो उनसे लिखवाते हैं –

किसको भेजे वो यहां हाथ थामने, इस तमाम भीड़ का हाल जानने

आदमी हैं बेशुमार, देवता हैं कम...

वही तेवर जो लिखवाते हैं –

जरा मुल्क के रहबरों को बुलाओ

ये कूचे ये गलियां ये मंजर दिखाओ

जिन्हें नाज है हिंद पर उनको लाओ

जिन्हें नाज है हिंद पर वो कहां हैं...

या फिर वही- ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है.

और आखिर में वही भजन कि सबको सन्मति दे भगवान.

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