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कागोडू किसान सत्याग्रह : आजाद भारत में लोहिया का पहला गांधीवादी आंदोलन

समाजवादी चिंतक डॉ.राममनोहर लोहिया की आज 51 वीं पुण्यतिथि है. 12 अक्टूबर 1967 में सत्तावन वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया.

Updated On: Oct 12, 2018 08:46 AM IST

Abhishek Ranjan Singh

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कागोडू किसान सत्याग्रह : आजाद भारत में लोहिया का पहला गांधीवादी आंदोलन

समाजवादी चिंतक डॉ.राममनोहर लोहिया की आज 51 वीं पुण्यतिथि है. 12 अक्टूबर 1967 में सत्तावन वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया. उन्हें हमारे बीच से गए पांच दशक हो गए. लेकिन भारतीय राजनीति में उनकी मजबूत शिनाख्त दर्ज है. जिसकी मिसालें आज भी दी जाती हैं. वैसे तो स्वतंत्रता संग्राम के समय डॉ.लोहिया की जेल यात्राओं की फेहरिस्त लंबी है. लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि स्वतंत्रता पश्चात भी उनका रिश्ता जेल से कायम रहा.

आम लोगों से जुड़े मुद्दों को लेकर वह हमेशा संघर्षरत रहे. स्वाधीन भारत की नई सरकार में उनके समकालीन राजनेता सत्ता में जहां अपनी मजबूत दावेदारी सुनिश्चित करने में जुटे थे. वहीं डॉ.लोहिया गरीब-गुरबों की समस्याओं को लेकर सत्याग्रह की जमीन तैयार कर रहे थे. उनके संदर्भ में देश की आजादी से पूर्व 1946 की दो घटनाओं का जिक्र करना जरूरी है. पहला गोवा मुक्ति संग्राम और दूसरा पूर्वी बंगाल के अशांत नोआखाली में उनकी ऐतिहासिक भूमिका. उनके बगैर इतिहास में दर्ज इन प्रमुख घटनाओं का कोई महत्व नहीं रह जाता. गोवा में आजादी की अलख जगाने के बाद महात्मा गांधी के आदेश पर डॉ.लोहिया करीब सवा महीने तक पूर्वी बंगाल के हिंसा प्रभावित नोआखाली, कोमिल्ला, चटगांव और कुष्टिया जिलों में रहे.

मुहम्मद अली जिन्ना के ‘डायरेक्ट एक्शन’ की घोषणा ने हिंदुओं और मुसलमानों को दुश्मन बना दिया. कभी जंग-ए-आजादी में शामिल दोनों कौम खून की प्यासे हो गईं. बंगाल, बिहार और पंजाब में चारों तरफ नृशंसता के उत्सव मनाए जा रहे थे. सांप्रदायिक हिंसा की आग में जल रहे नोआखाली में शांति-सद्भाव स्थापित करने में महात्मा गांधी के अवदानों को भुलाया नहीं जा सकता. हिंसा प्रभावित नोआखाली और लक्ष्मीपुर जिले के गावों में तीन महीनों तक गांधी जी ने पदयात्राएं की. उनके इस शांति अभियान में डॉ. राममनोहर लोहिया आखिर तक शामिल रहे.

डॉ.लोहिया की नजरों में सत्ता का हस्तांतरण आजादी के अधूरे मायने थे. उनके मुताबिक बगैर किसानों की खुशहाली और उन्नति के भारत की आजादी बेमानी है. काश्तकारों के प्रति उनके मन में अगाध श्रद्धा थी. इसकी भी एक वजह है जिसका जिक्र उन्होंने अपने लेख और भाषणों में भी किया है. वर्ष 1943 में पूर्वी-पश्चिमी बंगाल में भीषण अकाल पड़ा. जिसमें तीस लाख लोगों की मौत भूख से हुई.

बंगलौर रेलवे स्टेशन-डॉ.लोहिया के साथ जे.एच पटेल,गोपाल गौड़ा,के.लिंगप्पा और कादरी सामन्ना.

बंगलौर रेलवे स्टेशन-डॉ.लोहिया के साथ जे.एच पटेल,गोपाल गौड़ा,के.लिंगप्पा और कादरी सामन्ना.

इस दुष्काल को डॉ.लोहिया ने सदैव एक नरसंहार की संज्ञा दी. इसके लिए उन्होंने ब्रिटेन और चर्चिल की नीतियों को जिम्मेदार माना. बंगाल की त्रासदी का गहरा असर डॉ.लोहिया के मन-मस्तिष्क पर पड़ा. उनकी प्रबल इच्छा थी कि आजादी के बाद नई सरकार प्राथमिकता और प्रभावी तरीके से देश में भूमि सुधार किए जाएं. लेकिन इसे दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि किसानों की बेहतरी से जुड़े उनके सपने पूरे नहीं हो सके.

स्वाधीन भारत में सत्याग्रही लोहिया

दिल्ली से ढाई हजार किलोमीटर दूर मध्य कर्नाटक स्थित जिला शिमोगा. इस जिले की सियासी हैसियत बेशक बदल गई हो लेकिन पचास-साठ के दशक में यह क्षेत्र कभी समाजवादी आंदोलन का केंद्र हुआ करता था. शिमोगा से नब्बे किलोमीटर दूर एक गांव है कागोडू. मुमकिन है देश के बाकी हिस्सों में लोग इस गांव से अपरिचित हों लेकिन दक्षिण भारत में इस गांव की मिसालें दी जाती हैं. कभी-कभी कुछ ऐसी घटनाएं होती हैं जब किसी व्यक्ति व स्थल का जिक्र सदियों तक किया जाता है.

अप्रैल 1951 कागोडू गांव में स्थानीय जमींदार के खिलाफ भूमिहीन रैयतों ने एक अहिंसक आंदोलन को अंजाम दिया. तारीख में यह कागोडू किसान सत्याग्रह के नाम से दर्ज है. उन दिनों कर्नाटक मैसूर राज्य कहलाता था. शिमोगा और उसके आस-पास के जिलों में वाडियार वंश से जुड़े लोगों की जमींदारी थी.

वहां रैयतों पर जमींदारों के जुल्म की कहानी काफी पुरानी थी. आजादी के बाद अंग्रेज तो चले गए लेकिन शोषण व गैर-बराबरी पर आधारित जमींदारी प्रथा बरकरार थी. आजादी के चार साल बाद यानी 1951 में शिमोगा में जमींदारों के खिलाफ आंदोलन की सुगबुगाहट होने लगी. वैसे तो इसकी शुरूआत 4 जनवरी 1948 को गई थी जब ‘सागर रैयत संघ’ ने बेतहाशा लगान वृद्धि के खिलाफ आवाज उठाई. आंदोलन की यह चिंगारी उस वक्त भड़की जब 1951 में सागर तालुका से बीस किलोमीटर दूर कागोडू गांव में डॉ.लोहिया के विचारों से प्रभावित सोशलिस्ट पार्टी से जुड़े दो युवा नेता शांतावेरी गोपाल गौडा और एच.गणपतियप्पा ने वर्षों से गैर-बराबरी झेल रहे भूमिहीन रैयतों को एकजुट करना शुरू किया.

जमींदारी प्रथा खत्म कर अधिशेष भूमि गरीब-भूमिहीन किसानों में बांटी जाए? उनकी प्रमुख मांगें थीं. कागोडू किसान सत्याग्रह के शिल्पीकार शांतावेरी गोपाल गौड़ा का नारा था, 'भूमि पर पहला अधिकार उसका है जो स्वयं खेती करे.' जमींदार के.जी वाडियार की तरफ से किसानों के विरोध को दबाने की तमाम कोशिशें हुईं. सत्याग्रहियों पर पुलिसिया बर्बरता और काफी संख्या में किसानों की गिरफ्तारियां भी हुईं. इधर कागोडू किसान सत्याग्रह की खबरें देश भर के अखबारों में प्रमुखता से प्रकाशित होने लगे.

समाजवादी नेता डॉ.राममनोहर लोहिया के दिशा-निर्देश में किसानों का यह सत्याग्रह दिन-प्रतिदिन मजबूत होने लगा. जमींदारों के दमन के बावजूद कागोडू के किसानों ने अहिंसा का रास्ता नहीं छोड़ा. 21 मई 1951 में शांतावेरी गोपाल गौड़ा ने कागोडू में एक बड़ी सभा को संबोधित किया जिसमें करीब पचास हजार लोग शामिल हुए. इसमें जे.एच पटेल, एस.बंगरप्पा और के.लिंगप्पा जैसे समाजवादी नेता भी शामिल थे. कागोडू सत्याग्रहियों पर जुल्म बढ़ता देख डॉ.लोहिया दिल्ली से शिमोगा के लिए रवाना हो गए. उनके साथ पंडित रामनंदन मिश्र भी थे.

तीर्थहल्ली में कागोडू किसान सत्याग्रह के शिल्पीकार शांतावेरी गोपाल गौड़ा की प्रतिमा.

तीर्थहल्ली में कागोडू किसान सत्याग्रह के शिल्पीकार शांतावेरी गोपाल गौड़ा की प्रतिमा.

12 जून 1951 की सुबह उनकी गाड़ी सागर स्टेशन पर रुकी. वहां एन.के सीतारमैया अयंगर उनकी आगवानी में मौजूद थे. तांगे पर बैठते ही डॉ. लोहिया ने उनसे पूछा, सत्याग्रहियों ने अहिंसा का रास्ता तो नहीं छोड़ा? अयंगर ने जबाव दिया, वे मर जाएंगे लेकिन गांधी मार्ग नहीं छोड़ेंगे. कुछ घंटे बाद वह सागर जेल पहुंचे गिरफ्तार सत्याग्रहियों से मिलने. जेल में उनके अनुयायी शांतावेरी गोपाल गौड़ा और एस.बंगरप्पा समेत कई समाजवादी नेता बंद थे.

13 जून 1951 को सागर स्थित गांधी मैदान में डॉ.लोहिया ने किसानों की एक बड़ी रैली को संबोधित किया. गोवा मुक्ति संग्राम की मिसाल देते हुए उन्होंने भूमिहीन रैयतों से निर्णायक लड़ाई लड़ने का आह्वान किया. उनकी मौजूदगी का व्यापक असर कागोडू किसान सत्याग्रह में देखने को मिला.

डॉ.लोहिया का नारा था- वोट,फावड़ा और जेल का लोकतंत्र बनाए रखने में बड़ा योगदान है. 14 जून 1951 की सुबह कागोडू के दस हजार किसानों के साथ हल-बैल लेकर डॉ.लोहिया परती खेतों की जुताई करने लगे. जमींदार के अमलों ने शुरू में विरोध जताया लेकिन रैयतों की भीड़ देखकर वे वापस लौट गए. सत्याग्रह की रणनीति पर चर्चा के लिए उसी रात डॉ.लोहिया को शिमोगा जाना था. गाड़ी पकड़ने वह सागर रेलवे स्टेशन पहुंचे. लेकिन वहां पहले से मौजूद पुलिसकर्मियों ने डॉ.लोहिया और पंडित रामनंदन मिश्र को गिरफ्तार कर लिया. दो दिनों तक सागर जेल में रखने के बाद उन्हें बंगलौर सेंट्रल जेल भेज दिया गया. अपने नेता की गिरफ्तारी से सत्याग्रही निराश तो हुए लेकिन लंबे संघर्ष के लिए उनका धैर्य बरकरार था.

डॉ.लोहिया गिरफ्तारी की खबर देश भर में फैल गई. ऐसा होना लाजिमी था क्योंकि स्वतंत्र भारत में यह उनकी दूसरी गिरफ्तारी थी. 1949 में उनकी पहली गिरफ्तारी दिल्ली के मंडी हाउस स्थित नेपाल राजदूतावास के सामने हुई. जब नेपाल में राणाशाही के खिलाफ वह प्रदर्शन कर रहे थे. डॉ.लोहिया की गिरफ्तारी से विचलित जयप्रकाश नारायण कागोडू पहुंचे. उनके आगमन से निराश किसानों में एक नया जोश पैदा हो गया. इधर सत्याग्रह को लेकर मैसूर सरकार पर राजनीतिक दबाव भी बढ़ने लगा था. लिहाजा 21 जून 1951 को राज्य सरकार ने जेल में बंद डॉ.लोहिया और शांतावेरी गोपाल गौड़ा समेत करीब 2000 किसानों पर दर्ज मुकदमे वापस लेने की घोषणा की.

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22 जून 1951 को डॉ.लोहिया और उनके साथी रिहा हुए. 24 जून 1951 को रांची में सोशलिस्ट पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक प्रस्तावित थी. रांची जाने के लिए वह बंगलौर स्टेशन पहुंचे. हजारों लोगों की भीड़ नम आंखों से अपने नेता को विदा करने आई थी. सोशलिस्ट पार्टी की बैठक में डॉ.लोहिया ने कागोडू किसान सत्याग्रह की तर्ज पर देश भर में सत्याग्रह शुरू करने की घोषणा की. डॉ.लोहिया के मार्गदर्शन में कागोडू किसान सत्याग्रह अंततः सफल हुआ.

चार महीनों से चल रहे किसान सत्याग्रह का समापन 27 अगस्त 1951 को हुआ. मैसूर सरकार के दबाव में जमींदार के.जी वाडियार को झुकना पड़ा और इस तरह भूमिहीन रैयतों के बीच उन्हें सात लाख एकड़ जमीन वितरित करनी पड़ी. सत्याग्रह की इस सफलता ने देश भर में डॉ.लोहिया को ख्याति दिलाई. मजदूर और किसानों की नजरों में उनकी छवि एक मसीहा में रूप में विकसित होने लगी. इसका प्रत्यक्ष लाभ सोशलिस्ट पार्टी को मिला नतीजतन मैसूर राज्य में पार्टी की जड़ें मजबूत होने लगीं.

दक्षिण के राजनारायण थे शांतावेरी गौपाल गौड़ा

उन दिनों समाजवादियों की आपसी बातचीत में राजनारायण को डॉ.लोहिया का हनुमान कहा जाता था. उनके शब्द राजनारायण के लिए किसी पत्थर की लकीर से कम नहीं थी. स्वतंत्रता पश्चात डॉ.लोहिया के नेतृत्व में हुए तमाम आंदोलनों में राजनारायण अग्रिम पंक्ति में नजर आते थे. बात चाहे अंग्रेजी हटाओ आंदोलन की हो या फिर दाम बांधो आंदोलन की. दक्षिणी राज्य मैसूर में राजनारायण के मानिंद एक शख्स थे शांतावेरी गोपाल गौड़ा.

कागोडू किसान सत्याग्रह के प्रमुख इस नेता का तेवर राजनारायण जैसा ही था. सोशलिस्ट पार्टी के नेता गोपाल गौड़ा शिमोगा जिले के सागर और तीर्थहल्ली विधानसभा क्षेत्र से तीन बार विधायक निर्वाचित हुए. आरगा उनका पैतृक गांव था, सम्मलित परिवार में ठीक-ठाक जमीनें भी थी. लेकिन कागोडू किसान सत्याग्रह के दौरान शांतावेरी गोपाल गौड़ा ने अपने हिस्से की तमाम जमीनें भूमिहीन रैयतों में बांट दी.

समाजवाद का मजबूत गढ़ था शिमोगा

पचास व साठ के दशक में शिमोगा समाजवादियों का गढ़ हुआ करता था. जिले की सागर, तीर्थहल्ली, सोरबा एवं शिकारीपुर विधानसभा क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व कभी शांतावेरी गोपाल गौड़ा, एस.बंगरप्पा और के. थिमप्पा जैसे लोहियावादियों ने किया. शांतावेरी गोपाल गौड़ा का जन्म 14 मार्च 1923 को तीर्थहल्ली में हुआ था. 49 साल की उम्र में उनका निधन 9 जून 1972 को हुआ.

वर्ष 1967 के चुनाव में संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी से करीब दो दर्जन सांसद देश भर में जीतकर सदन पहुंचे. उनमें एक नाम प्रमुख था जे.एच पटेल का, जो शिमोगा संसदीय क्षेत्र से जीते थे. लोकसभा में एक प्रखर वक्ता के रूप में शुमार वह पहले ऐसे सांसद थे जिन्होंने सदन में हिंदी और अंग्रेजी से इतर अपनी मातृभाषा कन्नड़ में भाषण दिया था.

आज लोकसभा में सांसद अपनी मातृभाषाओं में सवाल-जबाव करते हैं. लेकिन इसकी शुरूआत जे.एच पटेल ने की थी. डॉ.लोहिया का निधन ऐसे वक्त हुआ जब कर्नाटक समेत देश भर में संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी की लोकप्रियता अपने शिखर पर थी. उनकी असामयिक मृत्यु से समाजवादी आंदोलन को काफी झटका लगा. लोहियावादी नेताओं के आपसी मतभेद और अहंकार की वजह से संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी की अंदरूनी कलह सतह पर आने लगी.

नई बहू के हाथों में सत्याग्रही पताका

समाजवादी नेता एच.गणपतियप्पा की पत्नी मंजनअम्मा गणपति और पुत्र जी.वी रवि.

समाजवादी नेता एच.गणपतियप्पा की पत्नी मंजनअम्मा गणपति और पुत्र जी.वी रवि.

अस्सी की उम्र पार कर चुकीं मंजनअम्मा गणपति समाजवादी नेता एच.गणपतियप्पा की पत्नी हैं. वह बताती हैं कि कागोडू किसान सत्याग्रह के समय उनकी शादी हुई थी. उनका ससुराल सागर तालुका स्थित वडनाला गांव में था. डॉ.लोहिया से उनकी पहली भेंट वहीं हुई थी. उनके साथ शांतावेरी गोपाल गौडा और पंडित रामनंदन मिश्र भी आए थे. कागोडू किसान सत्याग्रह को लेकर सभी लोग आपस में बातचीत कर रहे थे. दोपहर का खाना सभी ने साथ मिलकर खाया. उसके बाद तीनों नेता सत्याग्रह स्थल जाने को तैयार हुए. डॉ.लोहिया ने मुझे भी साथ चलने को कहा. किसी नवविवाहिता के लिए गांवों में घूमना और अपरिचित लोगों से बात करना आसान नहीं था. मेरे पति एच.गणपतियप्पा के लिए डॉ. लोहिया के आदेश को टालना आसान नहीं था. लिहाजा मैं भी उन लोगों के साथ सत्याग्रह में शामिल हो गई. कागोडू किसान सत्याग्रह में महिलाओं की काफी संख्या थी. मैंने डॉ.लोहिया को कन्नड़ भाषा में भी थोड़ी-बहुत बातें करते देखा जो मेरे लिए किसी आश्चर्य से कम नहीं था. उन्होंने सत्याग्रह में शामिल महिलाओं के नेतृत्व की जिम्मेदारी हमारे ऊपर सौंपी.

कागोडू किसान सत्याग्रह के प्रत्यक्षदर्शी

बयासी साल के वीरप्पा नायक कागोडू किसान सत्याग्रह के चंद जीवित प्रत्यक्षदर्शियों में एक हैं. उस वक्त उनकी उम्र सोलह साल थी. वह बताते हैं कि डॉ. राममनोहर लोहिया सत्याग्रह और उसके बाद भी कागोडू आए थे. पहली बार जब वह गांव आए तो उन्हें देखने वालों की भीड़ उमड़ पड़ी थी. उनकी वाणी में गजब का आत्मविश्वास और आकर्षण था. सत्याग्रह को कुचलने के लिए पुलिस निहत्थे किसानों पर लाठियां बरसा रहे थे. लेकिन अपनी तरफ से उन्होंने एक कंकड़ तक नहीं फेंका.

जी.वी रवि कागोडू किसान सत्याग्रह के प्रमुख नेता एच.गणपतियप्पा के पुत्र हैं. वह बताते हैं कि हिरनेल्लूर गांव के लोगों ने चंदा जमा कर मंदिर में नई मूर्ति स्थापित करने का जिम्मा उनके पिता को सौंपा. ग्रामीणों का विश्वास था कि भगवान की मूर्ति स्थापित करने से जमींदार का जुल्म समाप्त हो जाएगा. पैसे लेकर एच.गणपतियप्पा मैसूर पहुंचे.

एक प्रिंटिंग प्रेस में उन्होंने कागोडू किसान सत्याग्रह के दस हजार पर्चे छपवा लिए. हिरनेल्लूर लौटने पर जब ग्रामीणों ने उनसे मूर्ति दिखाने को कहा तब उन्होंने बैलगाड़ी की तरफ इशारा किया. लोगों ने पोटली खोली और मूर्ति न देखकर एच.गणपतियप्पा पर भड़क उठे. लेकिन उन्होंने लोगों को समझाया किसानों के सत्याग्रह से बड़ी कोई तपस्या नहीं हो सकती. उन्होंने ग्रामीणों से कहा, जिस जमीन पर यह मंदिर है वह भूमि जमींदार की है. अगर भगवान की मूर्ति स्थापित करनी है तो उस दिन का इंतजार करो जब कागोडू के भूमिहीन रैयतों के पास अपनी जमीन होंगी. सागर विधानसभा से कई बार विधायक रहे के. थिमप्पा फिलहाल कांग्रेस में हैं. लेकिन राजनीति का ककहरा उन्होंने डॉ. लोहिया और शांतावेरी गोपाल गौड़ा जैसे समाजवादी नेताओं से सीखा. छियासी वर्षीय थिमप्पा के मुताबिक कागोडू किसान सत्याग्रह एक अनोखा आंदोलन था. जहां बगैर हिंसा के भूमिहीनों को उनका अधिकार मिला.

कर्नाटक में भूमि सुधार की प्रेरणा बना कागोडू सत्याग्रह

पचास के दशक में हुए कागोडू किसान सत्याग्रह की सफलता के बाद शिमोगा जिले के भूमिहीन रैयतों के बीच सात लाख एकड़ जमीन वितरित की गई. लेकिन इसे कागोडू सत्याग्रह का ही असर कहा जाएगा कि दो दशक बाद कर्नाटक के मुख्यमंत्री डी.देवराज अर्श ने 1972 में कर्नाटक भूमि सुधार अधिनियम पारित किया. इसके तहत राज्यभर में करीब अस्सी लाख एकड़ जमीन भूमिहीनों के बीच वितरित किया गया.

कर्नाटक में दो बार मुख्यमंत्री रहे डी.देवराज अर्श ने भूमि सुधार अधिनियम लागू करते समय कहा था, यह महान कार्य करने का सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ है. डॉ.राममनोहर लोहिया जैसे महान गांधीवादी समाजवादी नेता के प्रति मैं आभार प्रकट करता हूं कि उन्होंने कर्नाटक के शोषित किसानों के अधिकारों की लड़ाई लड़ी. मेरे द्वारा राज्य में भूमि सुधार का जो मसौदा पारित हुआ है वह कागोडू किसान सत्याग्रह का एक विस्तार है. इसकी मूल प्रेरणा मुझे इसी आंदोलन से प्राप्त हुआ.

डॉ.राममनोहर लोहिया के नाम पर रेलवे स्टेशन

सागर रेलवे स्टेशन- जून 1951 में डॉ.लोहिया को गिरफ्तार किया गया था

सागर रेलवे स्टेशन- जून 1951 में डॉ.लोहिया को गिरफ्तार किया गया था

कागोडू किसान सत्याग्रह की कहानी डॉ.राममनोहर लोहिया के बगैर अधूरी है. यह कहना है शांतावेरी गोपाल गौड़ा ट्रस्ट से जुड़े कल्लूर मेघराज का. ट्रस्ट पिछले कई वर्षों से सागर रेलवे स्टेशन को डॉ.राममनोहर लोहिया की स्मृति में रखने की मांग कर रही है. मेघराज के मुताबिक इस बाबत उन्होंने एक ज्ञापन राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और भारत सरकार को भेजा है. हमें उम्मीद है कि सरकार जल्द ही इस बारे में सकारात्मक पहल करेगी. कागोडू किसान सत्याग्रह में डॉ. लोहिया की भूमिका स्मरणीय है. इसलिए हम चाहते हैं कि सागर स्टेशन अब उनके नाम से जाना जाए. इससे कर्नाटक की नई पीढ़ी भी इस ऐतिहासिक घटनाक्रम से परिचित हो सकेगी.

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