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मीर तक़ी मीर जिन्हें ग़ालिब भी उस्ताद माना करते थे

Updated On: Sep 21, 2018 08:41 AM IST

Annu Rizvi

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मीर तक़ी मीर जिन्हें ग़ालिब भी उस्ताद माना करते थे

उर्दू के मशहूर शायर मिर्ज़ा असदुल्ला खां ग़ालिब को कौन नहीं जानता. ग़ालिब बड़े शायर थे और ये बात वो जानते भी थे. अपने आगे ग़ालिब ने कभी किसी को शायर नहीं जाना. मशहूर मर्सियागो शायर मीर अनीस का ये मिसरा ग़ालिब के लिए तो नहीं था मगर उनपे बिलकुल सटीक बैठता है. ये आंख वो है जिसमे समाता नहीं कोई

हालांकि उनके दौर में कई बड़े शायर गुजरे. हकीम मोमिन खां मोमिन, मोहम्मद इब्राहीम खां ज़ौक़, और ख्वाजा हैदर अली आतिश. इनमें और भी कई नाम लिए जा सकते हैं. मगर ग़ालिब से लगभग 75 साल पहले एक शायर पैदा हुआ, नाम था मीर तक़ी मीर और ग़ालिब ने अपनी जिंदगी में अगर किसी की शायरी का लोहा माना, तो वो शायर है मीर ही हैं. इस बात को उन्होंने अपने शेरों में पिरोया भी है.

रेख़्ता के तुम्हीं उस्ताद नहीं हो ग़ालिब,

कहते हैं अगले ज़माने में कोई मीर भी था.

मीर तक़ी मीर की तारीफ सिर्फ ग़ालिब ने की हो ऐसा नहीं है ज़ौक़ ने भी मीर की तारीफ की मगर अपने साथी शायर ग़ालिब पर कटाक्ष के साथ.

ना हुआ पर ना हुआ मीर का अंदाज़ नसीब,

'ज़ौक़' यारों ने बहुत ज़ोर ग़ज़ल में मारा.

'हसरत' मोहानी ने भी उनकी शायरी की तारीफ कुछ यूं की है.

गुज़रे बहुत उस्ताद मगर रंग-ए-असर में,

बे मिस्ल है 'हसरत' सुखन-ए-मीर अभी तक.

मशहूर शायरा और स्क्रिप्ट राइटर ज़ेहरा निगाह साहिबा ने रेख़्ता के एक प्रोग्राम में बहुत दिलचस्प क़िस्सा मीर के बारे में बताया. बात काफी पुरानी है, शायद 1955 या 60 के आस-पास की. तब उनके एक दोस्त किसी काम से लखनऊ गए. खयाल आया कि मीर की कब्र पर चला जाए. वो उस छोटे से कब्रिस्तान में पहुंचे तो वहां कुछ नहीं था. उन्होंने वहां की देखभाल करने वाले से पूछा की भाई यहां मीर तक़ी मीर की कब्र हुआ करती थी, उस पर संगमरमर की तख्ती भी लगी थी, वो कब्र अब कहां है, दिख नहीं रही.

उस आदमी ने कहा की भइया मज़ार तो वो वाली है, मगर जो तख्ती थी अब उसपे मेरी बीवी रोटी बेलती है. उन्हें बड़ा ताज्जुब हुआ. उन्होंने उससे कहा कि क्या मैं उस तख्ती को देख सकता हूं. उसने कहा, हां आप देख सकते हैं, मगर आपको मेरे घर चलना पड़ेगा. वो उस आदमी के घर चले गए और उससे वो तख्ती खरीदने की जिद की. उस जमाने में 12 रुपए में उन्होंने वो तख्ती उस आदमी से खरीदी और वापस मीर की कब्र पर लगवा दी लेकिन सुना है कि अब तो तख्ती नहीं, पूरी की पूरी कब्र ही गायब है.

मीर तक़ी मीर, 20 सितंबर 1723 में अकबराबाद में पैदा हुए, जिसे आज हम आगरा के नाम से जानते हैं, और उनकी मौत की तारीख जो मिलती है वो है 21 सितंबर 1810. उनके पिता ने ताउम्र फकीराना जिंदगी गुजारी. जब मीर दस बरस के थे, तभी उनके पिता की मौत हो गई. बाप के मरने के बाद उन पर बहुत बुरा वक्त गुजरा. पिता के दोस्तों ने उनकी परवरिश की. जब मीर की उम्र कोई 13 या 14 साल रही होगी तो वो दिल्ली आकर अपने एक रिश्तेदार सिराज खान आरज़ू के घर रहने लगे. यहीं मीर को जिंदगी का पहला इश्क हुआ, मगर कामयाबी नहीं मिली. इश्क में चोट खाई तो दीवानगी ने दामन थाम लिया.

अगर ज़ेहरा निगाह की मानें तो वो मीर के बारे में कहती हैं कि मीर को बर्बाद करने में सबसे बड़ी गलती मीर के वालिद की थी, जो मरते वक्त एक 9 बरस के बच्चे के कान में ये फूंक गए कि जिंदगी का कोई भरोसा नहीं, जब-जब फुर्सत मिले इश्क किया करो. फिर मीर इसी, इश्क की जायदाद के वारिस हो गए. छोटी सी उम्र में बाप की ये बात दिल में ऐसे बैठी कि मरते दम तक न निकल सकी. मगर मीर को सिर्फ किसी लड़की से इश्क हो, ऐसा नहीं था. बल्कि उन्हें इंसानियत से प्यार था.

अब तक मीर शायरी करने लगे थे और थोड़ा बहुत नाम भी हो गया था. उस जमाने में दिल्ली के हालात ख़राब हो रहे थे. ऐसे में उनको लखनऊ से अवध के नवाब आसिफुद्दौला का बुलावा आया और उन्होंने 1782 में उनके दरबार में 1 रूपया रोज पर नौकरी कर ली. मगर दिल्ली की मोहब्बत को दिल से ना निकल सके.

क्या बूद ओ बाश पूछो हो पूरब के साकिनो

हम को ग़रीब जान के, हंस हंस पुकार के

दिल्ली जो एक शहर था आलम में इंतेखाब

रहते थे मुन्तख़ब ही जहां रोज़गार के

उसको फ़लक ने लूट के बर्बाद कर दिया

हम रहने वाले हैं उसी उजड़े दयार के

मीर शायर थे, सो जरा-जरा सी बात पे तुनक जाते थे. एक दिन वो नवाब को अपनी गजल सुना रहे थे, लेकिन वो किसी और तरफ देख रहे थे. मीर ने कहा, हुजूर शेर तवज्जो चाहता है. तब नवाब आसिफुद्दौला ने कहा, शेर तवज्जो के लायक होगा तो मिल जाएगी. बस ये बात दिल को लग गई और मीर वहां से चले आए. महीनों महल का रुख न किया. नवाब ने उनको ढूंढ के बुलवाया, आ गए और तबीयतन नेक थे, तो मान भी गए.

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एक इंटरव्यू में वैज्ञानिक और शायर जनाब गौहर रज़ा साहब ने मीर के बारे कहा कि उनकी शायरी में, बगोला, नातवां, गोर (कब्र) जैसे अल्फाज बार-बार आते हैं लेकिन मीर ने जिस दौर में जन्म लिया, उनकी शायरी उसी दौर का आईना है. दिल्ली लुट रही थी और इसका असर उनके अशआर में बार-बार दिखाई दिया लेकिन इसके अलावा भी मीर की शायरी में इश्क, विरोध, गुस्सा, उस वक्त के बिगड़ते हुए माहौल पर तंज, खूबसूरत जुबान और अपनी दिल्ली से मोहब्बत है.

देख तो दिल के जां से उठता है

ये धुआं सा कहां से उठता है

यूं उठे आह उस गली से हम

जैसे कोई जहां से उठता है

नाज़ुकी उसके लब की क्या कहिये

पंखुड़ी एक गुलाब की सी है

मीर की शायरी इश्क़ में डूबी हुई है. चंद शेर सुनिए.

हमारा खास मसलक इश्क़ जिसमें

पयम्बर दिल है,क़िब्ला दिल, खुदा दिल

मय में वो बात कहां जो तेरे दीदार में है

जो गिरा फिर कभी उसको न संभलते देखा

मीर वास्तव में सिर्फ शायर थे. जो अच्छा लगा वो लिख दिया. किसी की परवाह नहीं की. आप भी देखिए.

'मीर' के दीन-ओ-मज़हब को अब पूछते क्या हो उनने तो

क़श्क़ा खैंचा, दैर में बैठा, कब का तर्क इस्लाम किया

मीर ने आखरी सांस लखनऊ में ली और वहीं दफन हुए, मोहल्ला मशक गंज के पास. मगर मीर को मरने के बाद भी सुकून ना मिला. उनकी कब्र के ऊपर लखनऊ सिटी स्टेशन बना और उनकी क़ब्र का निशान भी मिट गया. आज ना जाने कितनी रेल गाड़ियां उन पर से गुजर जाती हैं. उनको शायद इस बात का अंदाजा था तभी उन्होंने ये शेर कहा.

मत तुर्बत ए मीर को मिटाओ

रहने दो गरीब का निशां तो

उनका एक शेर और पढ़िए.

बहुत शोर उसकी गली में है मीर

अब उठ जाएं यां से तो अच्छा करें

लेकिन खुदा-ए-सुखन 'मीर तक़ी मीर' अब कहीं ना जाएंगे, रहती दुनिया तक उन्हें इसी शोर में रहना होगा.

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