S M L

आयरिश क्रांति से प्रेरित था सूर्य सेन का चिटगांव विद्रोह

18 अप्रैल, 1930 की रात को अंग्रेज सेना और पुलिस के हथियार भंडार को लूटे जाने से शुरू हुए इस विद्रोह ने अगले 4 सालों तक अंग्रेजों की नींद उड़ाए रखी

Piyush Raj Piyush Raj Updated On: Jan 12, 2018 08:38 AM IST

0
आयरिश क्रांति से प्रेरित था सूर्य सेन का चिटगांव विद्रोह

1857 के पहले स्वाधीनता संग्राम के बाद ब्रिटिश राज को जिन सशस्त्र स्वतंत्रता आंदोलनों ने सबसे अधिक हिलाकर रख दिया, उनमें चिटगांव विद्रोह सबसे प्रमुख है. 18 अप्रैल, 1930 की रात को अंग्रेज सेना और पुलिस के हथियार भंडार को लूटे जाने से शुरू हुए इस विद्रोह ने अगले 4 सालों तक अंग्रेजों की नींद उड़ाए रखी.

इस सशस्त्र विद्रोह की योजना के पीछे सिर्फ 6 लोग थे और चिटगांव में हथियार भंडार लूटने के बाद इन 6 लोगों और इनसे जुड़े अन्य लोगों ने इसे अगले 4 सालों तक भूमिगत रूप से चलाया और जनता के बीच आजादी के संदेश को भी पहुंचाया. इस विद्रोह में सबसे मुख्य भूमिका क्रांतिकारी सूर्य सेन ने निभाई जिन्हें मास्टर दा के नाम से भी जाना जाता है.

सूर्य सेन उर्फ मास्टर दा का जन्म चिटगांव जिले के नोआपारा गांव में 22 मार्च, 1894 को हुआ था. सूर्य सेन दा बीए करने के दौरान ही उस कांग्रेस के नेतृत्व में चल रहे राष्ट्रीय आंदोलन के प्रभाव में आ गए थे. इसके साथ-साथ उनपर और उनके साथियों के ऊपर बंगाल में अनुशीलन समिति और युगांतर जैसे सशस्त्र राष्ट्रीय आंदोलन में विश्वास करने वाले संगठनों का भी प्रभाव था.

सशस्त्र क्रांति में भरोसा रखने वाला कांग्रेसी कार्यकर्ता

बीए करने के बाद सूर्य सेन दा ने अपने गांव के स्कूल में पढ़ाने लगे. यह काम वे रोजी-रोजी के लिए भी कर रहे थे और इस पेशे के जरिए वे छात्रों में देशभक्ति का भाव भी जगाते थे. सूर्य सेन दा को गांधी जी के अहिंसा के रास्ते में बहुत अधिक विश्वास नहीं था लेकिन उन्होंने जब देखा कि गांधीजी का देश की जनता पर बहुत अधिक प्रभाव पड़ रहा है तो वे कांग्रेस के लिए काम करने लगे. मास्टर दा ने बढ़-चढ़कर असहयोग आंदोलन में भाग लिया था. सशस्त्र क्रांति का रास्ता अख्तियार करने के बावजूद वे खादी के कपड़े पहनते थे. चिटगांव विद्रोह के 3 साल बाद 1933 में जब उन्हें पकड़ा गया तब उन्होंने अपना पेशा 'कांग्रेस कार्यकर्ता' लिखा था.

ये भी पढ़ें: पुण्यतिथि विशेष चे ग्वेरा: 'आजादी की लड़ाई लोगों की भूख से जन्‍म लेती है'

यह भी एक दिलचस्प तथ्य है कि सूर्य सेन और उनके साथी कांग्रेस का काम करते हुए सशस्त्र विद्रोह के लिए युवा लड़कों की भर्ती कर रहे थे. जिन लड़कों को ये लोग इस विद्रोह के लिए तैयार कर रहे थे, उनमें से कई लड़के भद्र परिवारों से आते थे. सूर्य सेन और उनके साथियों ने अपने विद्रोह की तैयारी के लिए बहुत ही गुपचुप रूप से तैयारी की थी. जबकि 24 घंटे ब्रिटिश सरकार के गुप्तचर उनपर नजर रखते थे फिर इन लोगों ने किसी को अपनी योजना की भनक तक नहीं लगने दी.

आयरलैंड के ईस्टर विद्रोह से मिली थी प्रेरणा

सूर्य सेन और उनके साथी आयरलैंड के छोटा डब्लिन विद्रोह से प्रभावित थे. अप्रैल 1916 में ईस्टर के दिन हुए इस विद्रोह का नेतृत्व सात लोगों ने किया था, जिनके नेतृत्व बहुत सी कम लोगों की सेना ने डब्लिन शहर के कई इमारतों पर कब्जा कर लिया था और उन्होंने आयरिश रिपब्लिक सरकार बनाई जो सिर्फ 7 दिनों तक चला और बाद में ब्रिटिश सरकार ने इस विद्रोह को कुचल दिया. पर इस विद्रोह ने आयरिश जनता पर बहुत ही गहरा प्रभाव पड़ा इसके बाद एक लंबा गुरिल्ला युद्ध आयरिश जनता और अंग्रेजी शासन के बीच हुआ, जिसके बाद अंततः इंग्लैंड को आयरलैंड को आजादी देनी पड़ी.

सूर्य सेन और उनके साथी भी कुछ ऐसा ही करना चाहते थे. जिस दिन चिटगांव में शस्त्रागार लूटा गया, उस दिन गुड फ्राइडे था जो ईस्टर से दो दिन पहले होता है. इस विद्रोह में कई लोग शामिल हुए पर डब्लिन विद्रोह की तरह पूरी योजना की जानकारी सिर्फ चुनिंदा 6 लोगों को थी. चिटगांव विद्रोह में शामिल कई लोगों को तो सिर्फ कुछ घंटे पहले यह बताया गया था कि उन्हें क्या करना है. सूर्य सेन की सबसे प्रय किताब आयरिश क्रांतिकारी डन ब्रीन की आत्मकथा 'माई फाइट फॉर आयरिश फ्रीडम' थी और ब्रीन उनके आदर्श थे.

यह भी पढ़ें: रामधारी सिंह दिनकर: ‘जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध’

चिटगांव में 18 अप्रैल, 1930 को हुए हमले के बाद अंग्रेज बौखला गए, सूर्य सेन और उनके साथियों को 20-21 अप्रैल की रात को जलालाबाद में हुई लड़ाई में हार का सांना करना पड़ा लेकिन सूर्य सेन और उनके साथियों ने हार नहीं मानी.  इन लोगों ने गुरिल्ला तरीके से लड़ाई को जारी रखने के लिए गांवों में आधार बनाने की कोशिश की और अगले 4 सालों तक अंग्रेजों की नींद हराम करते रहे.

महिला क्रांतिकारियों ने भी दी शहादत

इस आंदोलन की सबसे बड़ी खासियत यह थी अंग्रेज इस विद्रोह को सांप्रदायिक रंग देकर दबा नहीं पाए. सूर्य सेन को जितना हिंदुओं का साथ मिला उतना ही मुसलमानों का. कई बार मुसलमानों ने सूर्य सेन और उनके साथियों की छिपने और बचने में मदद की. इस विद्रोह की दूसरी खासियत यह थी कि इसमें महिला क्रांतिकारियों ने भी भागीदारी की. प्रीतिलता वाडेकर और कल्पना दत्त ने इस विद्रोह को संचालित करने में और इसका प्रचार-प्रसार करने में अहम भूमिका निभाई. प्रीतिलता वाडेकर 1857 के सशस्त्र विद्रोह के बाद स्वतंत्रता के लिए हुए किसी सशस्त्र विद्रोह में शहीद होने वाली पहली महिला थीं.

चिटगांव विद्रोह की शुरुआत के लगभग 3 साल बाद 16-17 फरवरी, 1933 की रात मास्टर सूर्य सेन दा को अंग्रेजी फौज देवारा पकड़ लिया गया,. सूर्य सेन दा तब तक इतने महत्वपूर्ण क्रांतिकारी हो गए थे कि उनको पकड़ने का श्रेय लेने में अंग्रेज पुलिस और सेना में होड़ लग गई थी. सूर्य सेन दा अधिक दिन तक जिंदा रहना अंग्रेजों को अपने शासन के लिए खतरा लग रहा था. कोलकाता की ब्रिटिश कोर्ट ने फांसी की सजा सुनाई और भगत सिंह की ही तरह 12 जनवरी की रात को बगैर उनके परिवार को बताए सूर्य सेन और उनके साथी तारकेश्वर दस्तीकर को फांसी दे दी गई. अंग्रेजों के मन में सूर्य सेन दा का इतना खौफ था कि उनका शव भी उनके घरवालों को नहीं दिया गया और न ही उनका अंतिम संस्कार किया गया. सूर्य सेन और उनके साथी की लाश को सैकड़ों मील दूर ले जाकर बंगाल की खाड़ी में फेंक दिया गया. सूर्य सेन की फांसी की खबर भी घरवालों को काफी बाद में दी गई.

सूर्य सेन दा यह जानते थे कि शायद बाद में उनके कदम को लोग असफल हो जाने के बाद गलत कहेंगे लेकिन वे आयरिश क्रांतिकारी जेम्स फिंटन लेलर की इस बात में ज्यादा भरोसा करते थे कि किसी न किसी को तो प्रतिरोध की शुरूआत करनी ही पड़ेगी और प्रतिरोध का हर पहला कदम, हमेशा समय से पहले, बेवकूफी भरा और खतरनाक तो होगा ही.

सूर्य सेन भले ही आजाद भारत नहीं देख सके लेकिन  उनका सपना जरूर पूरा हुआ और आजादी के आंदोलन में कूदने वाले कई नौजवानों के प्रेरणास्रोत भी बने.

(इस लेख के लिए तथ्य मानिनी चटर्जी द्वारा चिटगांव विद्रोह पर लिखी गई पुस्तक 'करो और मरो' से लिए गए हैं)

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो
'हमारे देश की सबसे खूबसूरत चीज 'सेक्युलरिज़म' है लेकिन कुछ तो अजीब हो रहा है'- Taapsee Pannu

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi