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पुण्यतिथि विशेष: ऐसा धर्मवीर जो 'गुनाहों का देवता' भी था

कोई विचारधारा धर्मवीर भारती को बांध नहीं सकती थी, वो स्वतंत्र चिंतन के सबसे मुखर साहित्यकारों में से एक थे

Updated On: Sep 04, 2017 12:47 PM IST

Arun Tiwari Arun Tiwari
सीनियर वेब प्रॉड्यूसर, फ़र्स्टपोस्ट हिंदी

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पुण्यतिथि विशेष: ऐसा धर्मवीर जो 'गुनाहों का देवता' भी था

‘दो महायुद्धों के बाद विनाश की इतनी बड़ी तांडवलीला. कोई तो जीवन दर्शन ऐसा मिले जिस पर विश्वास हो सके कि कोई तो भविष्य होगा. एक तरफ हिगेल, दूसरी तरफ नीत्शे, तीसरी तरफ मार्क्स. लेकिन समानता ये कि मनुष्य जो भी बनेगा वो भविष्य में ही बनेगा. मैं तो इस शताब्दी के उत्तरार्द्ध का एक सामान्य मनुष्य हूं. क्या मैं सिर्फ घास-फूस हूं जो झोंक दिया जाएगा भविष्य की भट्ठी में. कोई पार्टी, कोई आइडियोलॉजी कोई सिद्धांत उस पीड़ा में सहारा नहीं देता जो आप अकेले अपनी अंतरात्मा में भोग रहे होते हैं.’

हिंदी के प्रख्यात साहित्यकार धर्मवीर भारती 20 सालों के अंतर पर हुए दो विश्वयुद्धों के बारे में जब लिखते हैं, तो निराशा का ऐसा घनघोर अंधेरा दिखाई देता है जिसे दुनिया का शायद कोई भी सकारात्मक विचार न मिटा पाए. विश्वयुद्ध की विनाशलीला से उपजे बेहद नैराश्य वाले हालातों पर ऐसा लगता है, जैसे धर्मवीर भारती की नैतिकता क्रंदन कर रही हो. लेकिन जैसे ही आप 'अंधा युग' में लिखी उनकी लाइनों को पढ़ेंगे तो कह उठेंगे, ओह ! ये कैसा सृजनकर्ता है जो अपने ही लिखे विचार को बेहद क्रूरता के साथ मिटा भी सकता है?

'पता नहीं प्रभु है या नहीं, पर जब कोई भी मनुष्य अनाशक्त होकर चुनौती देता है इतिहास को, उस दिन नक्षत्रों की दशा बदल जाती है, नियति नहीं है पूर्वनिर्धारित, उसको हर क्षण मानव बनाता है, मिटाता है.'

अब यहां धर्मवीर भारती बिल्कुल ऊर्जावान और बेहद सकारात्मकता से भरे हुए उल्लासित दिखते हैं. जैसे लगता है जो लेखक अभी तक अपने भविष्य को कोस रहा था वही भविष्य की रपटीली सड़कों को बदलने चल पड़ा है.

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सूरज का सातवां घोड़ा फिल्म के निर्देशक श्याम बेनेगल ने एक बार धर्मवीर भारती के बारे में कहा भी था कि वो ऐसे लेखक हैं जो हमेशा दोराहे पर खड़े दिखाई देते थे. वो अपनी बात को पुख्ता करने के लिए फिल्म के नायक मानिक मुल्ला का जिक्र करते हुए बताते हैं कि हर अलग कहानी में वह जिंदगी के अलग पड़ाव पर है और अलग मुश्किलों से जूझ रहा है.

शायद खुद के लिखे पर भी अंतर्द्वंद से जूझने ने ही धर्मवीर भारती को धर्मवीर भारती बनाया था.

25 दिसबंर 1926 इलाहाबाद के अतरसुइया मोहल्ले में चिरंजी लाल वर्मा और चंदा देवी के घर जन्में धर्मवीर के पिता की मौत तब ही हो गई थी जब वो महज 13 साल के थे.

इलाहाबाद विश्वविद्यादल से बीए कर रहे धर्मवीर साहित्य की दुनिया में रच-बस रहे थे. इस दुनिया में उनके सबसे प्रिय साथी थे शरतचंद्र, चार्ल्स डिकेंस, पीबी शेली, जॉन कीट्स, विलियम वर्ड्सवर्थ एमिली डिकिंसन. वो विक्टर ह्यूगो के हंचबैक ऑफ नॉट्रे-डेम, लियो टॉल्सटॉय के वार एंड पीस, फ्योदोर डोस्टॉयवस्की के उपन्यासों में खुद के भीतर कहीं बेहद गहरे बैठे साहित्यकार को तलाश रहे थे.

धर्मवीर भारती के लेखन के दीवानों को ये जानकर हैरानी होगी कि वो नेवी का कैडेट बनना चाहते थे. इस तमन्ना के पीछे भी समंदर की लहरों से जीवन-दर्शन तलाश निकालने का ध्येय रहा होगा. शायद!

बहरहाल वो कैडेट तो न बन सके, हां साहित्य की दुनिया उन्हें तेजी से अपनाने को तैयार बैठी थी. साप्ताहिक अभ्युदय में उप संपादक पद पर काम किया. बीए फाइनल में हिंदी में सबसे ज्यादा अंक आने पर चिंता मणि घोष पुरस्कार मिला. वजीफे के रूप में आगे की फीस आधी हो गई. मुर्दों का गांव और पृथ्वी और स्वर्ग कहानी संग्रह से प्रकाशन के मिले पैसों से एमए में एडमिशन लिया. इसके बाद साहित्य की दुनिया में पैर थोड़े और मजबूती से जमने लगे. उत्साही कवियों और युवाओं का एक ग्रुप बना ‘परिमल’.

हिंदी के प्रख्यात समालोचक नामवर सिंह का मानना है कि परिमल का गठन प्रगतिशील लेखक संघ के विरोध में हुआ था. और धर्मवीर भारती इस ग्रुप के अगुआ थे. हालांकि धर्मवीर न किसी विचार में आप्त होने वाले लेखक थे और न ही किसी विचारधारा को सिरे से नकारने के पैरोकार. इसी वजह से इलाहाबाद विश्वविद्यालय में मिली प्रोफेसरी की नौकरी को ठोकर मारी और निकल पड़े मुंबई धर्मयुग को हिंदी साहित्य की किवदंति बनाने के लिए.

कहा जाता है अपने कई इलाहाबादी साहित्यकारों की इच्छा के विरुद्ध धर्मवीर भारती मुंबई गए थे. लेकिन स्वभाव से आदि विद्रोही भारती ने धर्मयुग मैगजीन को कीर्तिमान की तरह स्थापित किया. उनकी साहित्यिक कृतियों से इतर अगला मील का पत्थर साबित हुई उनकी वार रिपोर्टिंग.

वो हिंदी के पहले साहित्यकार थे जिन्होंने 1971 भारत-पाकिस्तान युद्ध में रिपोर्टिंग की. वो उस समय बांग्लादेश जाकर रिपोर्टिंग करने वाले पहले हिंदी के पत्रकार भी थे. इसने उन्हें पत्रकारिता के उस अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खड़ा कर दिया जिसमें उन पत्रकारों का नाम शामिल किया जाता है जिन्होंने विदेशी धरती पर सत्ता परिवर्तन और त्रासदियों को खुद देखा और महसूस किया.

हालांकि इन सबके बीच उनके बारे में ये भी कहा गया कि वो धर्मयुग को स्थापित करने में उन्होंने अजीब से नियम बना डाले. इनमें मैगजीन के लिए आने वाली हर कहानी के साथ लेखक के सेल्फ डिक्लेरेशन जैसी चीजें शामिल थीं. लेकिन अगर साहित्यिक नैतिकता की दृष्टि से देखा जाए तो क्या धर्मवीर भारती का ये कदम अनुचित था? शायद नहीं. क्योंकि उनके इन्हीं सब तरीकों की वजह धर्मयुग को आज भी याद किया जाता है.

साथ ही यह भी कहा जाता है कि धर्मवीर भारती से उस समय मिलना भी आसान नहीं था. उनसे मिलने आने वाले के नाम की पहले पर्ची अंदर जाती थी उसके बाद वो जिससे मिलने की इच्छा जताते थे वो ही उनसे मिल पाता था.

इस पर्ची से जुड़ा भी एक बड़ा मजेदार किस्सा साहित्यिक जगत में सुनाया जाता है. कहा जाता है कि पेंटर मकबूल फिदा हुसैन जब धर्मवीर भारती से मिलने जाया करते थे वो पर्ची पर घोड़े का स्केच बनाकर भेजते थे. ये उनका सिग्नेचर स्टाइल था.

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हालांकि इन सबके बीच रचनाकर्म से दूर रहने का अफसोस खुद धर्मवीर भारती ने अपने मित्र को लिखे एक खत में भी किया था. किसी भी नए लेखक या रचनाकार के लिए प्रेरणा वाली बात हो सकती है कि एक से बढ़कर एक रचनाओं का लेखक अपने लेखकीय कर्म को पूरा नहीं मानता था. दरअसल ये उसी दोराहे पर खड़े लेखक की पीड़ा थी जिसका जिक्र श्याम बेनेगल ने किया था.

4 सितंबर 1997 को इस दुनिया में आखिरी बार सांसे लेने वाले धर्मवीर भारती ने उन्हें हमेशा याद किए जाने के लिए सर्वश्रेष्ठ किताबों का जखीरा छोड़ा है. जिससे लोग ये जान सकें कि वो जो धर्मवीर था वो किसी धर्म को आखिरी रास्ता मानने के लिए जिंदगी भर तैयार न हुआ. वो हर धर्म (विचार) से जूझा और धर्मवीर हुआ.

किताबें:  अंधा युग, गुनाहों का देवता, सूरज का सातवां घोड़ा, ग्यारह सपनों का देश, प्रारंभ व समापन, अनकही, नदी प्यासी थी, नील झील, मानव मूल्य और साहित्य, ठण्डा लोहा.

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