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सिर्फ आदिवासियों के नहीं बल्कि सभी भारतीयों के नायक हैं बिरसा मुंडा

बिरसा को यह मालूम था कि अंधविश्वासों से घिरे आदिवासियों की मुक्ति आसान नहीं है, इसलिए उन्होंने खुद को भगवान घोषित कर धार्मिक उपदेश के बहाने आदिवासियों में राजनीतिक चेतना का प्रसार किया

Piyush Raj Piyush Raj Updated On: Jun 09, 2018 09:19 AM IST

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सिर्फ आदिवासियों के नहीं बल्कि सभी भारतीयों के नायक हैं बिरसा मुंडा

बिरसा मुंडा, यह नाम सुनते ही अक्सर हमारे दिमाग में एक ‘आदिवासी नायक’ का चित्र उभरता है, जिसने आदिवासियों के अधिकारों की लड़ाई लड़ी. आज भी आदिवासियों को जो संविधान द्वारा अधिकार मिले हुए हैं, उसमें बिरसा मुंडा और उनके सहयोगियों के संघर्ष की एक खास भूमिका है. बिरसा मुंडा को सिर्फ एक आदिवासी नायक या किसी एक खास समुदाय के नायक के रूप में देखना सही ऐतिहासिक दृष्टिकोण नहीं है. बिरसा मुंडा सिर्फ 25 साल जिए लेकिन इतनी कम उम्र में ही उन्होंने औपनिवेशिक ब्रिटिश शासन की बुनियाद हिला दी.

बिरसा मुंडा के बाद पैदा हुए भगत सिंह को हम इस बात के लिए याद करते हैं कि उनके लिए आजादी सिर्फ गोरे अंग्रेजों से मुक्ति ही नहीं थी बल्कि भूरे अंग्रेजों यानी शोषक भारतीयों से भी मुक्ति का पर्याय थी. जिस प्रकार भगत सिंह अंग्रेजों के साथ-साथ जमींदारों-सेठ-साहूकारों से मुक्ति और किसान-मजदूरों के राज के हिमायती थे, उसी प्रकार बिरसा भी मेहनतकश आदिवासियों का अपना राज चाहते थे. आजादी के आंदोलन के दौरान भगत सिंह जो बात कह रहे थे, बिरसा मुंडा उसे काफी पहले कह चुके थे. भले ही दोनों के कहने के अंदाज में अंतर हो पर लक्ष्य एक ही था.

एक जमीनी विचारक और क्रांतिकारी योद्धा

बिरसा मुंडा न सिर्फ आदिवासियों के बल्कि इस देश की जनता के नायक हैं. बिरसा मुंडा बिल्कुल मौलिक ढंग से सोचने वाले जमीनी क्रांतिकारी थे. बिरसा के समय ईसाई धर्म का आदिवासी समाज पर प्रभाव बढ़ रहा था. शुरू में बिरसा ने खुद भी ईसाई धर्म को अपनाया था लेकिन जल्द ही वो सरदार आंदोलन के चलते ईसाईयत के प्रभाव से मुक्त हो गए.

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बिरसा ने आदिवासियों को किसी भी तरह के बाहरी धर्म की जगह आदिवासियों को अपने पारंपरिक देवी-देवताओं की पूजा करने को कहा. आदिवासियों के लिए प्रकृति सबसे महत्वपूर्ण होती है क्योंकि वो इसी से अपना जीवनयापन करते हैं. इस वजह से आदिवासी प्रकृति-पूजक होते हैं. जब अंग्रेजों का शासन आया तो उन्होंने आदिवासी इलाकों की प्राकृतिक संपदा को लूटना शुरू किया. इसी बीच आदिवासियों के बीच ईसाई धर्म का भी प्रचार हो रहा था. अंग्रेज भी इसी धर्म को मानने वाले थे. दूसरी तरफ अंग्रेजों के साथ-साथ जो बाहरी लोग (जमींदार-सेठ-साहूकार) जिसे स्थानीय भाषा में दिकू कहा जाता है, उनका धर्म भी आदिवासियों से अलग था.

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धार्मिक आंदोलन के रूप में राजनीतिक आंदोलन

बिरसा भले ही पहले ईसाईयत और बाद में हिंदू धर्म के प्रभाव में आए लेकिन अंत में उन्होंने आदिवासियों के आदि धर्म को बढ़ावा दिया. आदिवासियों के प्रकृति प्रेम को राजनीतिक चेतना में बदलने का इससे बेहतर तरीका नहीं हो सकता था. बिरसा को यह मालूम था कि अंधविश्वासों से घिरे आदिवासियों की मुक्ति आसान नहीं है, इसलिए उन्होंने खुद को भगवान घोषित कर धार्मिक उपदेश के बहाने आदिवासियों में राजनीतिक चेतना का प्रसार किया. न सिर्फ मुंडा जनजाति के लोग बल्कि अन्य जनजाति के लोगों ने भी उन्हें ‘धरती आबा’ यानी धरती का पिता मानकर उनके उपदेशों पर अमल करना शुरू कर दिया.

बिरसा ने पुराने अंधविश्वासों का खंडन किया. लोगों को हिंसा और मादक पदार्थों से दूर रहने की सलाह दी. उनकी बातों का प्रभाव यह पड़ा कि ईसाई धर्म स्वीकार करने वालों की संख्या तेजी से घटने लगी और जो मुंडा और अन्य आदिवासी ईसाई बन गये थे, वे फिर से अपने पुराने धर्म में लौटने लगे.

'उलगुलान' का असर है सीएनपीटी एक्ट

1 अक्टूबर 1894 को सभी मुंडाओं को एकत्र कर इन्होंने अंग्रेजों से लगान माफी के लिए आंदोलन शुरू किया. 1895 में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और हजारीबाग केंद्रीय कारागार में दो साल तक जेल में रहे. लेकिन इस दौरान भी बिरसा के अनुयायियों ने उनके आंदोलन को जीवित रखा. जेल से छूटने के बाद बिरसा ने अंग्रेजों और जमींदारों के खिलाफ अपने आंदोलन को तेज कर दिया.

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1897 से 1900 के बीच मुंडाओं और अंग्रेज सिपाहियों के बीच युद्ध होते रहे और बिरसा और उसके चाहने वाले लोगों ने अंग्रेजों की नाक में दम कर रखा था. अगस्त 1897 में बिरसा और उसके चार सौ सिपाहियों ने तीर कमानों से लैस होकर खूंटी थाने पर धावा बोला.1898 में तांगा नदी के किनारे मुंडाओं की भिड़ंत अंग्रेज सेनाओं से हुई जिसमें पहले तो अंग्रेजी सेना हार गई लेकिन बाद में इसके बदले उस इलाके के बहुत से आदिवासी नेताओं की गिरफ्तारियां हुईं.

बिरसा ने साफ-साफ अंग्रेजों से कहा कि छोटानागपुर पर आदिवासियों का हक है. बिरसा ने नारा दिया कि ‘महारानी राज तुंदु जाना ओरो अबुआ राज एते जाना’ अर्थात ‘(ब्रिटिश) महारानी का राज खत्म हो और हमारा राज स्थापित हो.’ इस हक की लड़ाई के लिए अंत में 24 दिसंबर 1899 को बिरसा के अनुयायियों ने अंग्रेजों के खिलाफ निर्णायक युद्ध छेड़ दिया. 5 जनवरी 1900 तक पूरे छोटानागपुर में विद्रोह की चिंगारियां फैल गई. ब्रिटिश फौज ने आंदोलन का दमन शुरू कर दिया.

9 जनवरी 1900 के ऐतिहासिक दिन डोमबाड़ी पहा‍ड़ी पर अंग्रेजों से लड़ते हुए सैकड़ों मुंडाओं ने शहादत दी. बिरसा मुंडा काफी समय तक तो अंग्रेजों की पकड़ में नहीं आए थे, लेकिन एक स्थानीय गद्दार की वजह से 3 मार्च 1900 को गिरफ्तार हो गए. 9 जून 1900 को रांची जेल में बिरसा मुंडा का निधन हो गया. इसे बिरसा शहादत दिवस भी कहते हैं. अंग्रेजों के खिलाफ बिरसा का संघर्ष 6 वर्षों से अधिक चला. भले बिरसा का निधन हो गया था लेकिन बिरसा के ‘उलगुलान’ से ब्रिटिश सरकार इतनी डर गई थी कि उसने मजबूर होकर आदिवासियों के हक की रक्षा करने वाला छोटानागपुर टेनेंसी एक्ट पारित किया.

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