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पुण्यतिथि विशेषः अपने-अपने बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर

अपने जीवन में भले ही अंबेडकर कोई चुनाव नहीं जीत पाए लेकिन आज हर दल अंबेडकर के नाम पर वोटों की तोड़-जोड़ में लगा है

Piyush Raj Piyush Raj Updated On: Dec 06, 2017 08:11 AM IST

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पुण्यतिथि विशेषः अपने-अपने बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर

अपने विचारों से आधुनिक भारत को आज भी प्रभावित करने वालों में से जो चंद लोग शामिल हैं, उनमें बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर भी एक हैं. अपने जीवन में भले ही अंबेडकर कोई चुनाव नहीं जीत पाए लेकिन आज हर दल भीमराव अंबेडकर के नाम पर वोटों की तोड़-जोड़ में लगा है और उन्हें अपना आदर्श बताने की होड़ में लगा है.

वैसे यह अंबेडकर के विचारों की ताकत और उनके पक्ष में व्यापक जनसमर्थन ही मुख्य वजह है आज खुलेआम अंबेडकर का विरोध बहुत कम ही लोग करते हैं. जबकि अंबेडकर को जीवित रहते प्रायः हर राजनीतिक विचारधारा का विरोध झेलना पड़ा था. अंबेडकर ने भी अपने समय में शायद ही किसी दल को बख्शा हो. गांधी और कांग्रेस से अंबेडकर का विरोध जगजाहिर है. इस पर अब तक कई तरह के लेख प्रकाशित हो चुके हैं और शोध भी हो चुके हैं.

अंबेडकर ने जितना वैचारिक लेखन किया है. उसे एक लेख में समेट पाना मुश्किल ही नहीं लगभग नामुमकिन है. इस वजह से लेख में अंबेडकर की दबी-छिपी होने वाली कुछ चलताऊ आलोचनाओं का खुद अंबेडकर के लेखन से देने का प्रयास किया गया है. वैसे भी अंबेडकर के विचार अपने आप में ऐसी चलताऊ आलोचनाओं के जवाब के लिए काफी हैं.

क्या जाति आधारित आरक्षण से बढ़ी समाज में खाई?

अभी हाल में ही कुमार विश्वास का एक वीडियो वायरल हुआ, जिसके बारे में यह कहा रहा है कि विश्वास ने अंबेडकर भारत में जातियों के बीच बढ़ी खाई के लिए जिम्मेदार बताया है. बाद में कुमार विश्वास का एक और वीडियो आया जिसमें वे सफाई देते हुए यह कह रहे हैं कि वे बाबा साहब का बहुत सम्मान करते हैं और वे 90 के दशक में मंडल कमीशन के सिफारिशों के जरिए सरकारी नौकरियों में पिछड़े वर्गों को दिए गए आरक्षण के बारे में कह रहे. वे इस वीडियो में यह भी कहते हैं कि वीपी सिंह के इस फैसले की वजह से समाज में जातियों के बीच खाई बढ़ी.

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कुमार विश्वास ने भले ही सफाई में अंबेडकर की जगह वीपी सिंह का नाम ले लिया हो लेकिन भारतीय संविधान में सामाजिक और शैक्षिणक पिछड़ेपन के आधार पर आरक्षण की आधारशिला अंबेडकर ने ही रखी है. आज जिस भी वर्ग को आरक्षण मिल रहा है, उसके पीछे अंबेडकर की ही सोच काम कर रही है. यानी अगर इस तर्क को माने कि जाति आधारित आरक्षण व्यवस्था से समाज में भेद बढ़ता है तो इसके भेद के लिए अंबेडकर ही जिम्मेदार हुए. वैसे इस तरह के तर्क सिर्फ इस प्रश्न से ही धज्जियां उड़ जाती हैं, जब ऐसे लोगों से यह पूछा जाता है कि यह बता दें कि पहले जाति-व्यवस्था आई या जाति-आधारित आरक्षण की व्यवस्था. जिस दिन भारतीय समाज से जाति-व्यवस्था का खात्मा हो जाएगा उसी दिन जाति आधारित आरक्षण की भी जरूरत नहीं रह जाएगी.

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कैसे हो जाति व्यवस्था का उन्मूलन?

जाति को खत्म करने के लिए लोग तरह-तरह के उपाय अंबेडकर के समय भी सुझाते थे और आज भी. इसमें अंतरजातीय विवाह और अंतरजातीय भोज जैसे प्रयास काफी लोकप्रिय हैं. आज तो कई लोग यह दावा करते हैं कि वे जाति के आधार पर भेदभाव नहीं करते और ना ही जातिसूचक उपनाम लगाते हैं. ऐसे प्रयास और कार्य निःसंदेह सराहनीय हैं.

अंबेडकर भी अपने समय में ऐसे प्रयासों की तारीफ करते हैं लेकिन वे जातियों के उन्मूलन के लिए उसकी तह में जाकर इसका हल खोजने की कोशिश करते हैं. अंबेडकर ‘जाति-उन्मूलन’ किताब में लिखते हैं- ‘लोग अपना व्यवहार तब तक नहीं बदलेंगे जब तक शास्त्रों की शुचिता पर विश्वास करना नहीं छोड़ देते, जिस आधार पर उनके विश्वास की नींव रखी है. इसलिए सहज ही है कि सुधार के ऐसे प्रयास बेनतीजा ही रहेंगे. अंतरजातीय भोज और अंतरजातीय विवाह करवाना और उसके लिए आंदोलन करने के काम कृत्रिम साधनों द्वारा जबरिया किए गए काम हैं. हर पुरुष और को शास्त्रों की दासता से मुक्त बनाइए, शास्त्र आधारित घातक विचारों से उनके दिमाग को मुक्त करिए, तब वह पुरुष या स्त्री खुद ही बिना आपके निर्देशों के अंतरजातीय भोज या अंतरजातीय विवाह करेगा.’

अंबेडकर ने इसी वजह से मनु स्मृति का दहन किया था. इस वजह से कई लोग अंबेडकर की आलोचना भी करते हैं और हिंदू समाज की भावनाओं पर चोट भी मानते हैं. ऐसे लोग यह भी कहते हैं कि मनु स्मृति में सब कुछ बुरा नहीं है और इसमें कई अच्छी बातें भी हैं. ऐसे लोग यह कहते हुए भूल जाते हैं कि अंबेडकर ने मनु स्मृति को इसलिए जलाया था क्योंकि यह स्त्रियों और शूद्रों को कई अधिकारों से वंचित करता है और उन्हें दूसरे दर्जे का नागरिक समझता है. एक तरफ तो शूद्रों और स्त्रियों को हिंदू धर्म का अंग समझा जाता है और दूसरी तरफ मनु स्मृति जैसे स्मृतियों के सहारे उन्हें कई मूल अधिकारों से वंचित करने की वकालत की जाती है. यहां सवाल यह भी है कि क्या इस तरह की स्मृतियों से दलितों और स्त्रियों की भावनाएं आहत नहीं होती?

यहां यह बात भी नोट की जानी चाहिए कि मनु स्मृति हिंदुओं का कोई धार्मिक ग्रंथ भी नहीं है. सिर्फ वेदों, गीता, हरिवंश पुराण, बाल्मिकी रामायण और महाभारत को ही यह स्थान प्राप्त है. वैसे इन धर्म ग्रंथों में भी कई जगह जाति-प्रथा और वर्ण-व्यवस्था को लेकर पक्ष-विपक्ष में बातें लिखी गईं हैं.

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स्मृतियों की रचना सामाजिक विधान को खासकर जाति-व्यवस्था को पुष्ट करने के लिए हुई थी और अंबेडकर का विरोध इन विधानों से था. इसलिए अंबेडकर ने मनु स्मृति का दहन किया. जो लोग यह सोचते हैं कि अंबेडकर के जमाने की तरह जाति-भेद या छुआछुत नहीं होता, उन्हें जाति-उत्पीड़न की खबरों से पहले वैवाहिक विज्ञापनों पर भी एक नजर डाल लेनी चाहिए, जहां हर किसी को सजातीय वर या वधू चाहिए.

यह देखकर सहज ही यह लगता है कि अंबेडकर ने शुचिता आधारित मानसिकता बदलने की जो बात आजादी से पहले कही थी वो आज भी किसी लिहाज से कम प्रासंगिक नहीं है. किसी भी जाति में जन्म लेने मात्र से श्रेष्ठता या हीनता का बोध होना इसी शास्त्र आधारित मानसिकता से ही संचालित है, जिसे जितनी जल्दी हो बदल देने की जरूरत है.

जाति आधारित समाज से नहीं बनेगा मजबूत  राष्ट्र

आजकल तरह-तरह के राष्ट्रवाद का जोर चल रहा है. अंबेडकर का साफ-साफ मानना था कि बिना जाति-व्यवस्था का खात्मा किए भारत को एक राष्ट्र बनाना असंभव है. 25 नवंबर को संविधान सभा में दिए गए अपने भाषण में अंबेडकर कहते हैं- ‘मेरी राय यह है कि यह मानते हुए कि हम एक राष्ट्र हैं, हम एक भरम पाल रहे हैं. हजारों जातियों में बंटे लोग एक राष्ट्र कैसे हो सकते हैं?..... जातियां राष्ट्र-विरोधी हैं. प्रथमतया इसलिए कि वे सामाजिक जीवन में अलगाव पैदा करती हैं. वे इसलिए भी राष्ट्र-विरोधी हैं , क्योंकि वे एक जाति से दूसरी जाति में ईर्ष्या और विद्वेष पैदा करती हैं. पर अगर हमें असल में एक राष्ट्र बनना है तो इन सारी मुश्किलों से पार पाना होगा.’

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क्या अंग्रेजों से समर्थक थे अंबेडकर?

अंबेडकर पर एक और आरोप लगता है कि वे अंग्रेजों के समर्थक थे और कभी भी स्वाधीनता आंदोलन में उन्होंने भाग नहीं लिया. यह सही है कि उन्होंने आजादी के आंदोलन में शिरकत नहीं की. लेकिन इसकी वजह यह थी कि कांग्रेस उस वक्त स्वतंत्र भारत में दलितों की स्थिति पर अपना रुख साफ नहीं कर रही थी. अंबेडकर के लिए दलितों की आजादी पहली प्राथमिकता थी.

साथ ही जो लोग अंबेडकर को अंग्रेजों का समर्थक समझने की भूल करते हैं, उन्हें 1930 के गोलमेज सम्मेलन में बोले गए अंबेडकर के इन वाक्यों का हमेशा ख्याल रखना चाहिए. इस सम्मेलन में अंबेडकर ने भारत के स्वराज की मांग करते हुए कहा था- ‘हमें ऐसी सरकार चाहिए जिसमें सत्ता पक्ष देश के सर्वाधिक हित में अपनी निष्ठा रखेगा. हमें ऐसी सरकार चाहिए जिसमें सत्ता पक्ष यह समझता हो कि कब आज्ञाकारिता समाप्त हो जाएगी और कब प्रतिरोध शुरू हो जाएगा और तब तक वह जीवन की सामाजिक और आर्थिक कानूनों में ऐसे संशोधन करने से कभी नहीं डरेगा जो न्याय और औचित्य की दृष्टि से तुरंत किए जाने जरूरी होंगे. यह भूमिका ब्रिटिश सरकार कभी नहीं निभा पाएगी. यह कार्य वही सरकार कर सकती है जो जनता की हो, जो जनता के लिए हो और जनता के द्वारा चुनी गई हो. ’

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संविधान सभा में भी अपने भाषण में अंबेडकर ने कहा था- ‘क्या भारतवासी अपने देश को अपने धर्ममत से ऊपर रखेंगे या धर्म मत को देश से ऊपर रखेंगे? मैं नहीं जानता. मगर यह तय है कि अगर दल धर्ममत को देश के ऊपर रखते हैं तब हमारी आजादी दुबारा जोखिम में डाल दी जाएगी और संभवतः हमेशा के लिए खो दी जाएगी. इस संभाव्य घटना के खिलाफ हम सभी को दृढ़प्रतिज्ञ होकर दृढ़ता से आजादी की रक्षा करनी चाहिए. हमें अपने खून की की अंतिम बूंद तक अपनी आजादी की रक्षा के लिए दृढ़ प्रतिज्ञ होना चाहिए.’

अगर हमें सचमुच का एक समतामूलक राष्ट्र बनना है तो अंबेडकर की यह पंक्ति हमेशा याद रखनी चाहिए- ‘शिक्षित बनो, आंदोलन करो, संगठित हो.’ और ‘आपको अपनी दासता से खुद मुक्त होना होगा, दासता से मुक्ति के लिए ईश्वर या महामानव पर मत निर्भर रहिए.’

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