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पुण्यतिथि विशेष मार्टिन लूथर किंग: जिसके सपने के चलते ओबामा राष्ट्रपति बने

‘ईश्वर की अलग-अलग धारणाओं’ पर पीएचडी करने वाले मार्टिन लूथर किंग को अमेरिका का गांधी कहा जाता है

FP Staff Updated On: Apr 04, 2018 08:37 AM IST

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पुण्यतिथि विशेष मार्टिन लूथर किंग: जिसके सपने के चलते ओबामा राष्ट्रपति बने

अमेरिकी इतिहास को दो हिस्सों में बांट सकते हैं. एक मार्टिन लूथर किंग के पहले दूसरा उनके बाद. मार्टिन लूथर किंग अमेरिकी सिविल राइट्स मूवमेंट के नायक हैं. 15 जनवरी, 1929 को पैदा हुए किंग ने 1964 में सबसे कम उम्र में शांति का नोबेल पुरस्कार जीता. उनके नस्लभेद विरोधी आंदोलन ने लोगों को इतने खफा किया था कि अप्रैल 1968 में गोली मारकर किंग की हत्या कर दी गई.

‘ईश्वर की अलग-अलग धारणाओं’ पर पीएचडी करने वाले किंग को अमेरिका का गांधी कहा जाता है. किंग ने अहिंसा से देश में बराबरी लाने की बात कही. 1961 में किंग को 45 साल की जेल हुई. मगर अशांति के डर से उन्हें 3 दिन बाद छोड़ दिया गया. किंग ने 'बियॉन्ड वियतनाम' नाम से भाषण दिया. उनके 1963 में 'आई हैव अ ड्रीम' नाम के भाषण को दुनिया में अभी भी बार-बार पढ़ा और याद किया जाता है. हम आपको इस ऐतिहासिक भाषण के कुछ हिस्से पढ़वाते हैं.

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हम तब तक संतुष्ट नहीं होंगे जब तक एक नीग्रो, पुलिस की बयान न की जा सकने वाली दहशत और बर्बरता का शिकार होता रहेगा. हम तब तक संतुष्ट नहीं होंगे, जब तक किसी सफर की थकान से चूर होने के बावजूद हम हाइवे और शहरों के होटलों से लौटाए जाते रहेंगे.

हम तब तक संतुष्ट नहीं होंगे, जब तक, एक नीग्रो एक छोटी सी बस्ती की सड़ांध से निकल कर एक अच्छे माहौल में नहीं चला जाता. हम तब तक संतुष्ट नहीं होंगे, जब तक 'केवल गोरों के लिए' के बोर्ड लगाकर हमारे बच्चों को नीचा दिखाना, उनकी गरिमा को ठेस पहुंचाना चलता रहेगा.

हम तब तक संतुष्ट नहीं होंगे, जब तक मिसीसिपी में रहने वाला नीग्रो वोट नहीं डाल सकता और जब तक न्यूयॉर्क में रहने वाले नीग्रो को लगता रहेगा कि उसके पास कोई विकल्प ही नहीं जिसके लिए वो वोट करे. नहीं, नहीं, हम संतुष्ट नहीं हैं और हम तब तक संतुष्ट नहीं होंगे जब तक न्याय पानी की तरह और सच्चाई एक तेज नदी की तरह बहने नहीं लगते.

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मेरे दोस्तों, आज और कल की तमाम मुश्किलों के बाद भी मेरे पास एक सपना है. ये अमेरिका के सपने की जड़ों में गहरे तक जमा हुआ सपना है. मेरा सपना है कि देश खड़ा होगा और अपनी नस्ल के सच्चे अर्थों को जिएगा. हम सच में ऐसे रहेंगे कि सारे इंसान एक हैं. मेरा सपना है कि पुराने गुलामों के लड़के और उनके मालिकों की संताने जॉर्जिया की किसी पहाड़ी पर भाईचारे की मेज पर साथ बैठेंगे. मेरा सपना है कि मेरे चार छोटे बच्चे उनके रंग और नाक-नक्श से नहीं बल्कि उनके कैरेक्टर से पहचाने जाएंगे. मेरे पास एक सपना है.

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आज मेरा एक सपना है!

मेरा सपना है कि एक दिन हर एक घाटी भर जाएगी, हर एक पहाड़ छोटा हो जाएगा और ऊबड़-खाबड़ बीहड़ सपाट हो जाएंगे. तब ईश्वर की महिमा प्रकट होगी और सभी इंसान उसे एक साथ देखेंगे. यही हमारी उम्मीद है. इसी विश्वास के साथ मैं दक्षिण वापस जाऊंगा. इसी विश्वास से कि हम निराशा के पर्वत को तराशकर आशा का पत्थर निकाल पाएंगे. इसी विश्वास से कि हम झगड़े के शोर को भाईचारे के संगीत में बदल पाएंगे. इसी विश्वास से कि हम एक साथ काम कर पाएंगे, पूजा कर पाएंगे, संघर्ष कर पाएंगे, साथ जेल जा पाएंगे, स्वतंत्रता के लिए साथ-साथ खड़े हो पाएंगे, ये जानते हुए कि हम एक दिन आज़ाद हो जाएंगे.

29 मार्च, 1968, किंग बेहतर इलाज की मांग कर रहे लोगों से मिलने टेनेसी गए. 3 अप्रैल को वहां उन्होंने भाषण दिया. 4 अप्रैल की सुबह किंग ‘लॉरैन मोटल’ के कमरा नंबर 306 की बालकनी के बाहर खड़े थे. और एक गोली ने किंग को खामोश कर दिया. मगर किंग की मौत ने सिविल राइट्स मूवमेंट को नई ऊंचाई दी. 39 साल की उम्र में किंग ने दुनिया को जितना कुछ दिया विरले ही दे पाए हैं. जब उनका पोस्टमार्टम हुआ तो डॉक्टरों ने कहा कि उनके दिल की हालत तनाव के कारण 60 साल के आदमी जैसी हो चुकी थी.

(यह लेख इसी वर्ष पूर्व में प्रकाशित हो चुका है. हम इसे दोबारा से प्रकाशित कर रहे हैं)

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