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एल एन राव: सत्संग कथावाचक से दिल्ली के एनकाउंटर स्पेशलिस्ट बनने की कहानी

स्पेशल स्टाफ में रहते हुए दिल्ली पुलिस की किताबों में सिर्फ एल.एन राव के नाम ही 96 करोड़ की हेरोईन और 176 क्विंटल चरस पकड़ने का रिकॉर्ड दर्ज है

Updated On: Apr 08, 2018 03:08 PM IST

Sanjeev Kumar Singh Chauhan Sanjeev Kumar Singh Chauhan

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एल एन राव: सत्संग कथावाचक से दिल्ली के एनकाउंटर स्पेशलिस्ट बनने की कहानी

आग और पानी अपना रास्ता खुद बनाते हैं. इनके बीच में आने वाली बाधाएं इन्हीं में समाहित होकर खुद-ब-खुद नेस्तनाबूद हो जाती हैं. इन्हीं अल्फाजों की बुनियाद पर जिंदगी बसर करने वाले थे हरियाणा के ठेठ गरीब और अनपढ़ किसान श्रीराम स्वरुप (अब स्वर्गवासी) और उनकी पत्नी नारायणी देवी. जिन्होंने ईमानदारी और हाड़तोड़ मेहनत की आग में पकी उम्मीदों की ईंटों पर एक मजबूत ‘मकान’ खड़ा करने का सपना देखा था. जानते हैं दिन भर चिलचिलाती धूप में खेतों में मशक्कत करने वाले इस किसान के उस बेजोड़ मकान के सपने की ज़मीन (आधार) क्या थी? मुंह चिढ़ाती गरीबी में भी पांच में से किसी एक बेटे को बड़े पुलिस अफसर की वर्दी में देखना.

इस एक अदद ख्वाब को हकीकत में बदलने की जिद में, श्रीराम स्वरुप को एक रुपए महीना के सूद (ब्याज) पर गांव के प्रधान/जमींदारों से हर महीने सौ रुपया कर्ज लेना पड़ा. तब एक बेटा दिल्ली पुलिस में डिप्टी पुलिस कमिश्नर (डीसीपी) बना. इस अविश्वसनीय कहानी का हीरो थे, दिल्ली पुलिस में डीसीपी रह चुके एल.एन. राव यानि लक्ष्मी नारायण राव. वही एल.एन.राव जो बचपन में गांव की चौपालों पर ‘सतसंग’ किया करते थे. वक्त और माता-पिता की उम्मीदों की एक करवट ने कल के उसी सतसंगी और जुझारु बालक लक्ष्मी को बाद में दिल्ली पुलिस में डिप्टी पुलिस कमिश्नर (अब रिटायर्ड) और देश का मशहूर ‘एनकाउंटर-स्पेशलिस्ट’ एल.एन. राव बना दिया.

मई 1954 में हरियाणा का ताजपुर गांव

श्रीराम स्वरुप पत्नी नारायणी देवी और इकलौते पुत्र रघुबीर सिंह के साथ महेंद्रगढ़ जिले के ताजपुर गांव में रहते थे. दिन भर खेतीबाड़ी में हाड़तोड़ मशक्कत करके जैसे-तैसे दो वक्त की रोटी का जुगाड़ होकर जिंदगी घिसट रही थी. ठेठ किसान पति-पत्नी का शिक्षा से दूर-दूर तक रिश्ता नहीं था. 3 अप्रैल, 1954 को दूसरी संतान के रुप में नारायणी देवी ने लड़के को जन्म दिया. उसी दिन से गरीब किसान श्रीराम स्वरुप को चिंताओं ने और भी घेर लिया. दो वक्त की रोटी के लिए पहले ही लाले पड़े थे. चिंता थी कि, अब इस लड़के (दूसरी संतान एलएन राव) को जिंदा रखने के लिए भला दूध-पानी-अन्न का इंतजाम कैसे करेंगे?

एल एन राव के पिता

एल एन राव के पिता

पहले से ही परेशानियों से जूझ रहे श्रीराम स्वरुप की चिंता, मगर तब धीरे-धीरे दूर होने लगी, जब दूसरी संतान के जन्म के बाद खेत में पैदावार में थोड़ी-बहुत बढ़ोत्तरी होती दिखाई दी. घर में आई बरकत की खुशी में गरीब किसान दंपत्ति ने बेटे (दूसरी संतान) का नाम लक्ष्मी नारायण रख दिया. कालांतर में इस गरीब किसान परिवार में तीन और पुत्रों क्रमश: देशराज, यादराम और खुशीराम का जन्म हुआ.

बकौल लक्ष्मी नारायण, - ‘बड़े भाई और मुझे प्रारंभिक शिक्षा के लिए मां-बाप ने गांव ताजपुर के ही प्राथमिक विद्यालय में दाखिल करा दिया. कक्षा 1 से पांचवीं तक दोनो भाई वहीं पढ़े.’ हर पिता को बच्चों को बड़े क्लास में बढ़ने (प्रमोट) की खुशी होती है. हम दोनो भाई जब गांव के प्राइमरी स्कूल से निकलकर बड़े स्कूल में जाने के लायक होने लगे, तो मां-बाप परेशान रहने लगे. बेटे बड़े क्लास बड़े स्कूल में जा रहे हैं, इस खुशी पर मां-बाप की गरीबी भारी पड़ रही थी. उन्हें चिंता थी बड़े स्कूल में आगे की पढ़ाई पैसे के अभाव में कैसे करा पाएंगे? बकौल लक्ष्मी नारायण, जैसे-तैसे सन् 1970 में ताजपुर गांव से दो किलोमीटर दूर स्थित अटेली मंडी कस्बे में चल रहे गवर्मेंट हाईस्कूल में कक्षा 10 में एडमीशन ले लिया.

जब सतसंगी बनकर भजन-कीर्तन करने लगे

घोर गरीबी में माता-पिता दो-जून की रोटी का जुगाड़ करेंगे या हम सब भाईयों को पढ़ाएंगे? हमेशा यह सवाल दिमाग पर सवारी करता रहता था. बेबाकी से बताते हैं एल.एन. राव. उनके मुताबिक, इसका तोड़ मैंने निकाल लिया. स्कूल से आते ही गांवों की चौपालों पर चला जाता. वहां गांव के नौजवानों और बड़े-बूढ़ों की महफिल जमाकर उन सबको भगवद्गगीता, वेद-पुराणों का सतसंगी ज्ञान गा-बजाकर देने लगा. इसके पीछे मंशा थी कि, अगर पढ़ाई बीच में छूट गयी, तो कम से कम गांव-गांव जाकर गा-बजाकर सतसंग करके ही जिंदगी बसर करने का कुछ जुगाड़ तो हो जाएगा.

जब पिता ने खुली आंखों से सपने देखना शुरु किया

इसके बाद सन् 1974 में नारनौल गवर्मेंट कॉलेज से भूगोल में बीए ऑनर्स कर लिया. परेशानियां तो बिकट थीं, लेकिन हम भाईयों ने कभी भी उनको रास्ते का रोड़ा नहीं बनने दिया. इसका सबूत हाईस्कूल, इंटर और फिर ग्रेजुएशन में लगातार मेरी ‘फर्स्ट-डिवीजन’ आना था. पिताजी ने देखा कि, दोनो बेटे (बड़े भाई रघुबीर सिंह और मैं) पढ़ने में गांव के बाकी युवकों से अच्छे हैं. इसी के बाद उम्मीदों की सीढ़ी पर बैठकर गरीब और पूर्णत: निरक्षर माता-पिता ने खुली आंखों से सपने देखना शुरु कर दिया. यह अलग बात है कि, इन सपनों को साकार करने की जिद ने किसान पिता को कर्ज के दलदल में धकेल दिया.

सूद की उधारी से मिली ‘जागीर’ दिखाने की तमन्ना

पत्नी के साथ एल एन राव

पत्नी के साथ एल एन राव

अतीत की किताब के पन्ने पलटते हुए लक्ष्मी नारायण राव बताते हैं कि,- ‘अर्थशास्त्र में एमए की पढ़ाई के लिए मैं मेरठ (यूपी) के देव नागरी (डीएन) कॉलेज जाने की तैयारी में था. आर्थिक तंगी के चलते पिता के सामने जाने की हिम्मत नहीं थी. अपनी जेब में दाम का कोई जुगाड़ नहीं था. अंतत: पिताजी ने ही एक रास्ता निकाला कि, वे मुझे मेरठ में रहने, खाने और पढ़ाई के लिए गांव के जमींदारों/प्रधान से एक रुपए सैकड़ा सूद (ब्याज) पर सौ रुपए हर महीना कर्ज लेकर भेज देंगे. उनकी शर्त और हसरत इतनी सी थी कि, पढ़-लिखकर मैं किसी तरह पुलिस का बड़ा अफसर बन जाऊं. ताकि पूरी जिंदगी खेतों में हाड़तोड़ मशक्कत करने और सूद/ब्याज पर पैसा (कर्जा) लेकर बच्चों को पढ़ाने-लिखाने से हासिल हुई बेशकीमती ‘जागीर’ (बड़े पद पर सरकारी नौकरी या फिर पुलिस अफसर की वर्दी में बेटे को) को वे लोग (मां-पिता) गांव वालों को सीना चौड़ा करके दिखा सकें.’

मुसीबतों और गरीबी ने मजबूत बनाया

सन् 1972 में स्नातक (बीए) करने के दौरान ही असिस्टेंट स्टेशन मास्टर की परीक्षा दी. उसी साल जिंदगी में पहली बार मुंबई देखी. अजमेर में हुए मेडिकल टेस्ट में फेल हो गए. इसी बीच 6 जून, 1973 को बहरोड के गांव गंडाला की रहने वाली शकुंतला देवी से विवाह हो गया. एक तो बेरोजगारी ऊपर से शादी. इसके बाद यूपीएससी द्वारा आयोजित इंडियन मिलेट्री अकादमी (आईएमए) में सेकेंड लेफ्टिनेंट के लिए दो बार ट्राई किया. किस्मत ने यहां भी साथ नहीं दिया. दोनो बार फेल हो गया. 1975 में एक्साइज एंड कस्टम इंस्पेक्टर की नौकरी मिली. पूरे देश में ट्रांसफर होता. सो वो नौकरी ज्वाइन नहीं की. अंतत: 21 अक्टूबर, 1976 को प्रोवेशनरी आफिसर के पद पर इंडियन बैंक में जीवन की पहली सरकारी नौकरी ज्वाइन कर ली. ब्रांच थी रोहतक (हरियाणा) और तनख्वाह 875 रुपए महीना.

पुलिस में सलेक्ट होते ही दारोगा परीक्षा रद्द हो गयी

यह बात है सन् 1976 की. दिल्ली के पुलिस उप-महानिरीक्षक (डीआईजी) थे आईजे वर्मा. बकौल एल.एन. राव, ‘ देश में इमरजेंसी (आपातकाल) लगी थी. दिल्ली पुलिस की डायरेक्टर 124  सब-इंस्पेक्टर के पदों की भर्ती में मैं भी शामिल हुआ. लिखित और फिजीकल परीक्षा पास कर ली. मेडिकल को गए तो पता लगा कि, धांधलियों की शिकायतों के चलते परीक्षा रद्द कर दी गयी. जांच सीबीआई के हवाले कर दी गयी. लिहाजा वर्दी पहनने की तमन्ना वहां भी धरी रह गयी. जनवरी 1977 में दुबारा एसएससी (सर्विस सलेक्शन कमीशन) ने परीक्षा कराई. मैं पास हो गया. सब-इंस्पेक्टरी में तनख्वाह थी 495 रुपए. जबकि बैंक में मिल रही थी उसकी डबल 875 रुपए. एक तरफ मां और गरीब किसान पिता के सपने, पिता द्वारा एक रुपया सैकड़ा सूद (ब्याज) पर कर्ज लेकर मुझे पढ़ाना और दूसरी तरफ बैंक की मोटी पगार छोड़कर आधी तनख्वाह पर वर्दी पहनकर थानेदारी करने जाना.

मां और गरीब पिता की उम्मीदें तो खाकी वर्दी में पल-पोसकर बड़ी हुईं थीं. पिता जिस ‘जागीर’ को गांव वालों को दिखाना चाहते थे, वो मुझे खाकी-वर्दी में से अक्सर झांकती दिखाई देती थीं. लिहाजा बैंक की मोटी पगार (तनख्वाह) छोड़कर मैंने 7 अप्रैल, 1977 को आधी तनख्वाह यानि 495 रुपए महीना पर दिल्ली पुलिस में सब-इंस्पेक्टरी ज्वाइन कर ली. पिता की आंखों में पल रहे सपनों को परवान चढ़ाकर, उनके अरमानों को खुला आसमान देने की उम्मीद में.

दिल्ली पुलिस में दारोगा से डीसीपी तक   

मां के साथ एल एन राव

मां के साथ एल एन राव

दिल्ली पुलिस में सब-इंस्पेक्टर बनते ही पहली पोस्टिंग पुलिस कंट्रोल रुम में मिली. 1980 तक वहां रहा. फरवरी 1981 से 1984 तक वसंत विहार थाने में और उसके बाद करीब 6 महीने बदरपुर थाने में तैनाती रही. जब सब-इंस्पेक्टरी में 1400 रुपए तनख्वाह मिलने लगी तो सन् 1984 के आसपास पत्नी शकुंतला देवी को गांव से लाकर दिल्ली में 250 रुपए के किराये के मकान में लाकर रख लिया.

दिल्ली पुलिस में ऐसे बढ़ी थी ‘डिमांड’

बात है सन् 1984 के नवंबर महीने की. दक्षिणी दिल्ली के जंगपुरा में एक लड़के की किडनैपिंग हो गयी. हाईप्रोफाइल मामला था, सो लाजपत नगर स्पेशल स्टाफ इंचार्ज इंस्पेक्टर रणधीर सिंह ने फौरी तौर पर वहां बुलवा लिया. फिर 1984 तक वहीं तैनात रहा.

इनाम-काम का रिकॉर्ड जो अब भी नहीं टूटा है

स्पेशल स्टाफ में रहते हुए 96 करोड़ की हेरोईन और 176 क्विंटल चरस पकड़ने का रिकॉर्ड आज भी दिल्ली पुलिस की किताबों में सिर्फ और सिर्फ एल.एन. राव के नाम दर्ज है. अंतरराष्ट्रीय ड्रग तस्कर अशोक सोलोमन की गिरफ्तारी से उसके पास से 433 किलो चरस जब्त करने का रिकार्ड राव के ही नाम बरकरार है. उस जमाने में सहायक पुलिस आयुक्त (एसीपी, अब केंद्रीय सुरक्षा बल में स्पेशल डायरेक्टर जनरल) लाजपतनगर आईपीएस दीपक मिश्रा, जिनके पास स्पेशल स्टाफ का भी चार्ज था, के नेतृत्व में कश्मीरी गैंग से 700 किलोग्राम गांजे की बरामदगी ने भी दिल्ली में तहलका मचा दिया था. अगर दिल्ली पुलिस में ‘रिवार्ड-मनी’ पाने वालों का रिकार्ड खंगाला जाए, तो वो भी सबसे ज्यादा एलएन राव के नाम ही कायम है. राव 1984 से 1988 के बीच ही 8-9 लाख की रिवार्ड-मनी (इनामी राशी) दिल्ली पुलिस से हासिल कर चुके थे. जबकि पूरी नौकरी के दौरान एक पुलिस कर्मी 10 लाख से ज्यादा इनामी राशि हासिल नहीं कर सकता है.

आईपीएस जिसने दारोगा को डीसीपी बना दिया

मन झकझोर देने वाले अतीत का जिक्र करते वक्त डीसीपी के पद से रिटायर हो चुके एलएन राव आज भी अगर किसी को नहीं भूलते हैं तो, वो हैं आईपीएस दीपक मिश्रा. दीपक मिश्रा ने ही एक दारोगा (राव) को डीसीपी बनने तक का रास्ता अपने हाथों से बनाकर दिया. वो चाहे पश्चिमी दिल्ली के पटेल नगर थाना इलाके में कलिंगा केबल के मालिक के बेटे के अपहरण का मामला हो. या फिर पश्चिमी दिल्ली के ही राजौरी गार्डन थाना इलाके में दिन-दहाड़े राजा गार्डन चौक पर हुई खूनी मुठभेड़. इसी मुठभेड़ में एलएन राव और इंस्पेक्टर राजेंद्र सिंह (अब एसीपी द्वारका) की टीमों ने पश्चिमी उत्तर-प्रदेश (मेरठ) के कुख्यात बदमाश बृज मोहन त्यागी और दिल्ली के बदमाश अनिल मल्होत्रा को गोलियों से भून डाला था. उस खूनी मुठभेड़ में एलएन राव ने बदन में तीन गोलियां खाकर खुद की ज़िंदगी जोखिम में डाल ली थी.

एक छोड़ चार-चार भाईयों ने पहनी खाकी वर्दी

L N RAO ENCOUNTER SPECIALIST DCP (4)

कालांतर में एलएन राव के बड़े भाई रघुबीर सिंह पोस्टमास्टर (नारनौल) से रिटायर हुए. एलएन राव से छोटे तीसरे नंबर के भाई देशराज दिल्ली पुलिस में इंस्पेक्टर हैं. देशराज दक्षिणी दिल्ली जिला पुलिस कंट्रोल रुम में तैनात हैं. चौथे भाई यादराम बहरोड राजस्थान में केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (सीआईएसएफ) में असिस्टेंट कमांडेंट हैं. जबकि सबसे छोटे भाई खुशी राम भी दिल्ली पुलिस में ही सहायक उप-निरीक्षक पद पर राष्ट्रपति भवन में तैनात थे. सन् 2015 में वसंत विहार (दिल्ली) इलाके में सड़क पार करते समय हादसे में उनकी मृत्यु हो गयी.

उनका कर्ज उतारने की कुव्वत नहीं

अब तक के जीवन में पहली बार अपनी दुश्वार जिंदगी (अतीत) को किसी पत्रकार के सामने बयान करने वाले पचास साल पहले के सतसंगी बालक लक्ष्मी को विपरीत हवा ने उड़ाने की कोशिश तो बहुत की. यह अलग बात है कि, उन्होंने हवा के रुख के विपरीत जाने के बजाए उसके साथ ही मुंह करके खड़े होकर तूफानों से ‘जीतने’ और ‘जीने’ का हुनर भी सीख लिया. बकौल पत्नी शकुन्तला देवी, हालातों ने हम लोगों को तोड़ने के जब-जब प्रयास किये, तो हम उनसे लड़ने के लिए खुद को और मजबूत करते गए. शकुंतला देवी के मुताबिक, - ‘शायद इसी का परिणाम रहा होगा कि, राव साहब दारोगा से देश के मशहूर ‘एनकाउंटर-स्पेशलिस्ट’ डीसीपी बनकर 30 अप्रैल, 2014 को दिल्ली पुलिस से रिटायर होकर परिवार के साथ रह रहे हैं.’

एलएन राव के मुताबिक, पिता स्वर्गीय राम स्वरुप का देहांत 5 मार्च, 2011 को 85 वर्ष की उम्र में हो गया. 87 साल की बुजुर्ग मां नारायणी देवी पुत्र लक्ष्मी नारायण राव और पुत्रवधू शकुंतला देवी के साथ ही रह रही हैं. राव के मुताबिक, पिता ने उन्हें पढ़ाने के लिए जिन जमींदारों से एक रुपए सैकड़ा महीना सूद/ब्याज पर जो कर्ज लिया था, वो तो निपट गया. मां के दूध का कर्ज उतारने की न तो कोई संतान सोचे. न ही कोई संतान मां के दूध का कर्ज अपनी जिंदगी में उतार सकती है.

(लेखक अपराध मामलों से जुड़े स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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