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जब मोरारजी देसाई की जान बचाने के लिए वायुसेना के 5 अफसरों ने दी थी कुर्बानी

4 नवंबर, 1977 को असम के जोरहाट के पास टी.यू-124 पुष्पक विमान को पायलट ने यदि नाक के बल नहीं गिरा दिया होता तो शायद प्रधानमंत्री की जान नहीं बच पाती

Surendra Kishore Surendra Kishore Updated On: Nov 20, 2017 08:48 AM IST

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जब मोरारजी देसाई की जान बचाने के लिए वायुसेना के 5 अफसरों ने दी थी कुर्बानी

प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई की जान बचाने के लिए वायुसेना के 5 अफसरों ने अपनी जान दे दी थी. 4 नवंबर, 1977 को असम के जोरहाट के पास टी.यू-124 पुष्पक विमान को पायलट ने यदि नाक के बल नहीं गिरा दिया होता तो शायद प्रधानमंत्री की जान नहीं बच पाती. इस तरह चालक दल ने वायुसेना के शौर्य और बलिदान की परंपरा की रक्षा की.

उस दुर्घटना में मोरारजी देसाई के होंठ पर हल्की चोट आई थी. उनके साथ उस विमान में प्रधानमंत्री के बेटे कांति देसाई, सर्वोदय नेता नारायण देसाई, सीबीआई प्रमुख जाॅन लोबो और अरूणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पी के थुंगन चल रहे थे. इस दुर्घटना में कांति देसाई, नारायण देसाई और पी के थुंगन के पैरों की हड्डियां टूट गई थीं.

कांति देसाई बेल्ट नहीं बांध सके थे. खुद मोरारजी देसाई विमान के मलबे से उठकर टहलते हुए वहां से सुरक्षित स्थान पर पहुंच गए थे. दुर्घटना के बाद प्रधानमंत्री ने कहा कि ‘विपत्ति के समय भी परमात्मा ने मुझे अविचलित रखा. इस जीवनदान का एक ही अर्थ है कि मैं उसकी सृष्टि की सेवा के लिए पुनः खुद को समर्पित कर दूं.’

विमान चालक दल के आत्मबलिदान पर प्रधानमंत्री ने कहा, ‘मुझे खेद है कि कर्मचारी वर्ग के 5 सदस्यों की, जिनकी गणना सर्वोत्तम हवाबाजों में की जाती थी, जान चली गई. संभवतः हमारी जिंदगी बचाने की खातिर. उनके प्रति अनुग्रह व्यक्त करने के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं.’

Morarji Desai

अफसरों के अंतिम संस्कार में शामिल नहीं हुए वीआईपी

प्रधानमंत्री की जान बचाने के लिए जिन 5 अफसरों को अपनी जान देनी पड़ी थी, उनमें कप्तान सी जे डिलीमा, विंग कमांडर जोगेंद्र सिंह, स्क्वाड्रन लीडर वी एस शंकर, स्क्वाड्रन लीडर एम सिरियाक और फ्लाइट लेफ्टिनेंट ओ पी अरोड़ा शामिल थे. यह सभी लोग काॅकपीट में थे. इन्हें बाद में पुरस्कार देने की बात चली तो उसमें अड़ंगा लग गया. एक जांच रिपोर्ट के अनुसार विमान दुर्घटना मानवीय कारणों से हुई थी.

इन अफसरों के अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिए जब एक केंद्रीय राज्य मंत्री प्रो. शेर सिंह को छोड़कर कोई वीवीआईपी उपस्थित नहीं हुआ तो यह बात अनेक लोगों को बुरी लगी.

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घटनाक्रम कुछ इस प्रकार था. 4 नवंबर की शाम का समय था. सवा 5 बजे विमान दिल्ली से उड़ा. उसे पौने 8 बजे जोरहाट पहुंचना था. साढ़े 7 बजे विमान की यात्री टोली को सुरक्षा पेटियां कसने की हिदायत दे दी गई थी. कुछ ही मिनटों में विमान जोरहाट हवाई अड्डे पर उतरने जा रहा था. लेकिन वहां उतर नहीं पाया. मौसम के कारण उसमें दिक्कत आई. ईंधन भी सीमित मात्रा में ही था.  उतरते हुए विमान ने फिर उड़ान भरी. अंततः वह हवाई अड्डे से 5 किलोमीटर दूर धान के खेत में नाक के बल नोड डाइव पर गिरा. खेत में पानी भरा था.

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मोरारजी देसाई ने अपनी प्रधानमंत्री की कुर्सी बचाने के लिए अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया (फोटो : पीटीआई से साभार)

जब राष्ट्रपति ने लगाया पीएम को गले

अगले दिन जब प्रधानमंत्री वायुसेना के विमान राजहंस से दिल्ली लौटे तो हवाई अड्डे पर उनकी अगवानी के लिए राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, गृह मंत्री, रक्षा मंत्री और अनेक गणमान्य लोग उपस्थित थे. भावुक माहौल था.

राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी ने मोरारजी देसाई को गले लगा लिया. उससे पहले राष्ट्रपति ने प्रधानमंत्री के नाम यह संदेश भेजा था कि ‘कल की विमान दुर्घटना में आपका सुरक्षित रहना दैवी विधान ही था. आप सुरक्षित हैं, यह जान कर देश को बड़ी राहत मिली है. हम हृदय से कामना करते हैं कि वर्षों तक आप देश का नेतृत्व करें.’

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जोरहाट जाने के लिए किस विमान का इस्तेमाल हो, यात्रा शुरू करने से पहले इसकी चर्चा हुई थी. कुछ लोगों ने राय दी थी कि पुष्पक विमान की तेल रखने की क्षमता कम है. यानी जोरहाट तक के लिए ही तेल स्टाॅक किया जा सकता है. किसी विपरीत परिस्थिति में मुश्किल आ सकती है इसलिए प्रधानमंत्री के लिए बड़े विमान का इस्तेमाल किया जाना चाहिए. पर उसमें तेल का खर्च अधिक होता. प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई इस बात के विरोधी थे कि किसी चीज पर सरकार का अनावश्यक खर्च हो.

यहां तक कि मोरारजी देसाई कभी विशेष विमान से विदेश दौरे पर नहीं गए. वो सेवा विमान से जाते थे. कई पत्रकार इस कारण भी मोरारजी से नाराज रहा करते थे. वो अपने साथ पत्रकारों को नहीं ले जाते थे. पूर्व के प्रधानमंत्रियों के साथ विशेष विमान में पत्रकारों को जगह मिल जाया करती थी. यदि यह कहा जाए कि ईंधन के पैसे बचाने के लिए प्रधानमंत्री ने अपनी और वायुसेना के आला दर्जे के अफसरों की जान खतरे में डाल दी तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी. पर, मोरारजी तो कहा करते थे कि ईश्वर की इच्छा के बिना पत्ता भी नहीं हिलता.

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