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प्रिवी पर्स की समाप्ति के बाद भी लोकतंत्र में पैदा हो गए नए रंग-ढंग के ‘राजा-महाराजा’

राजा-महाराजाओं ने भी प्रिवी पर्स छीने जाने से सरकार को रोकने के लिए बहुत हाथ-पांव मारे. कानूनी लड़ाई चली

Updated On: Aug 13, 2018 08:04 AM IST

Surendra Kishore Surendra Kishore
वरिष्ठ पत्रकार

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प्रिवी पर्स की समाप्ति के बाद भी लोकतंत्र में पैदा हो गए नए रंग-ढंग के ‘राजा-महाराजा’

आज लोकतंत्र के रथ पर सवार नए ढंग के ‘राजा-महाराजाओं’ की अरबों की घोषित-अघोषित संपत्ति का पता चल रहा है. अनेक लोगों के दिलो -दिमाग में यह सवाल उठ रहा है कि ये नए राजा लोग मध्य युग के उन असली राजा-महाराजाओं से कितना अलग हैं जिनके प्रिवी पर्स और विशेष सुविधाओं को इंदिरा सरकार ने समाप्त कर दिया था. इन विशेषाधिकारों को समाप्त करते समय केंद्र सरकार ने कहा था कि यह समतामूलक समाज बनाने और गरीबी हटाओ की दिशा में मजबूत कदम है. प्रिवी पर्स जब छीने गए तो उस समय उन्हें कितने पैसे मिल रहे थे? 1950 में शाही थैली की कुल सालाना राशि 5 करोड़ 80 लाख रुपए थी. आज के लोकतंत्र के ‘राजाओं’ की जायज-नाजायज आय कितनी है?

उन राजा-महाराजाओं ने भी प्रिवी पर्स छीने जाने से सरकार को रोकने के लिए बहुत हाथ-पांव मारे. कानूनी लड़ाई चली. आज के कुछ ‘राजा’ लोग भी अपनी अपार संपत्ति बचाने के लिए देश की विभिन्न अदालतों में बहुत हाथ-पांव मार रहे हैं. यानी इतिहास ने अपना एक चक्र पूरा कर लिया है.

आगे- आगे देखिए होता है क्या?

आज की पृष्ठभूमि में प्रिवी पर्स समाप्ति की 1970 वाली कहानी को याद कर लेना दिलचस्प होगा. वह ‘गरीबी हटाओ’ के नारे का दौर था. प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को लगा कि निजी बैंकों के राष्ट्रीयकरण और पूर्व राजाओं-महाराजाओं को सरकार की ओर से मिल रही शाही थैली को बंद कर देने से उनकी छवि गरीबों में बेहतर होगी. ऐसा कुछ समय के लिए हुआ भी. उन्होंने 1969-70 में ये दोनों काम कर दिए थे.

नतीजतन 1971 के लोकसभा के मध्यावधि चुनाव में इंदिरा गांधी के दल को बहुमत मिल गया. उससे पहले कांग्रेस के 1969 में हुए बंटवारे के कारण इंदिरा गांधी के दल को लोक सभा में बहुमत नहीं रह गया था.वह इस बीच कम्युनिस्टों की मदद से सरकार चला रही थीं.

तब प्रिवी पर्स हटाने को लेकर देश के अधिकतर लोगों का समर्थन इंदिरा सरकार को मिला हुआ था. वह राजतंत्र और सामंतवाद का अवशेष जो था. पर उसकी जगह इस देश में आर्थिक गैर बराबरी दूर करनी थी और समतामूलक समाज बनाना था. पर, सवाल है कि आज इस देश में क्या हो रहा है? नए ढंग के राजाओं की संख्या आज 1947 से कम है?

सरदार बल्लभ भाई पटेल ने 12 अक्टूबर, 1949 को संविधान सभा में कहा था कि हमने प्रिवी पर्स और कुछ विशेषाधिकार देने की योजना को इसलिए स्वीकार कर लिया क्योंकि हमारे पास कोई चारा नहीं था. वास्तव में स्थिति विघटन की अपार संभावनाओं से भरी हुई थी. कुछ राजा खुद को स्वतंत्र घोषित करने के अपने तकनीकी अधिकार का प्रयोग करना चाहते थे और कुछ पड़ोसी डोमिनियन में मिलना चाहते थे.

राजाओं ने अपने शासन अधिकारों को हस्तांतरित कर और अपनी रियासतों का एकीकरण कर अपना उत्तरदायित्व निभा दिया है. इन समझौते के अंतर्गत हमारे उत्तरदायित्व का मुख्य भाग यह है कि हम अपने द्वारा गारंटी की गई शाही थैली के वायदे को पूर्णतः कार्यान्वित किए जाने की सुनिश्चित व्यवस्था करें. यदि हम इसमें असफल होते हैं तो यह हमारा विश्वास भंग होगा.

सरदार पटेल ने यह भी कहा कि यह गारंटियां, जिन्हें कांग्रेस ने भी स्वीकार किया है, ऐतिहासिक समझौतों के अंग हैं, जो भारत के भौगोलिक, राजनीतिक और आर्थिक एकीकरण के महान आदर्श को, जो शताब्दियों से एक सुदूरवर्ती स्वप्न रहा है, और जो भारत की स्वाधीनता के आगमन के बाद भी उतना ही दूर और दुष्प्राय लगता था, उपलब्धि को अपने भीतर संजोए हुए है.’

बाद में यानी 1970 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की पहल पर शाही थैली की समाप्ति का विधेयक जब लोकसभा में पारित हो गया तो स्वतंत्र पार्टी के नेता और पूर्व गवर्नर जनरल राजा गोपालाचारी ने कहा कि संसद अपने उन वायदों से मुकर गई है जो राजाओं के संबध में किए गए थे.

Indira Gandhi

इंदिरा गांधी

यह अच्छा नहीं है. सर्वोच्च न्यायालय से न्याय मांगने की सुविधा से राजाओं को वंचित करना एक प्रकार की जालसाजी है. शाही थैली के रूप में मैसूर के राजा को 26 लाख रुपए वार्षिक धनराशि मिलती थी जो देश के राजाओं में सर्वाधिक राशि थी.

1970 में बिहार के सभी विधायकों के आवास में भी फोन की सुविधा नहीं दी गई थी

हैदराबाद के निजाम को 20 लाख रुपए और त्रावणकोर राजा को 18 लाख और पटियाला नरेश को 17 लाख रुपए मिलते थे. जयपुर, ग्वालियर, जोधपुर और उदयपुर को 10-10 लाख रुपए सालाना प्रिवी पर्स की राशि मिलती थी. देश में 83 ऐसे राजा थे जिन्हें 25 हजार रुपए या उससे भी कम राशि मिलती थी. न्यूनतम राशि 192 रुपए सौराष्ट्र के कटौदिया के राजा को मिलती थी.

सन् 1950 में शाही थैली की कुल राशि 5 करोड़ 80 लाख रुपए थी. समय के साथ यह राशि घटती जा रही थी. अधिकतर राजाओं ने प्रिवी पर्स की समाप्ति का विरोध किया था. बड़ौदा के पूर्व राजा फतेह सिंह गायकवाड़ के संयोजकत्व में राजाओं का संगठन बना. पर कश्मीर के पूर्व युवराज कर्ण सिंह ने स्वेच्छा से प्रिवी पर्स व विशेषाधिकार को त्यागने की घोषणा कर दी. उन्होंने कहा था कि पूर्व राजाओं को बदलते हुए समय की नब्ज पहचाननी चाहिए और उसी के अनुरूप काम करना चाहिए.

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शाही थैली की समाप्ति का सबसे अधिक प्रतिकूल असर गुजरात के पूर्व राजाओं पर पड़ा. गुजरात में 83 शासकों को शाही थैली मिल रही थी. उन्हें कुल 81 लाख रुपए सालाना से हाथ धोना पड़ा. मध्य प्रदेश में 59 पूर्व शासक शाही थैली पा रहे थे. भोपाल के राज महल में 30 फोन कनेक्शन थे. उस राज भवन में 3 हजार कर्मचारी थे. राजमहल की रसोई में भी फोन था. तब फोन की सुविधा बहुत कम ही लोगों को उपलब्ध थी. तब यानी 1970 में बिहार के सभी विधायकों के आवास में भी फोन की सुविधा नहीं दी गई थी.

प्रिवी पर्स समाप्त करने का फैसला संकेतात्मक अधिक था जो नए युग के उदय का संकेत था. पर, 1991 के बाद की नई आर्थिक नीति और आज के बेशुमार सरकारी भ्रष्टाचार ने उस सपने को ध्वस्त कर दिया जो प्रिवी पर्स की समाप्ति के बाद इस देश की गरीब जनता को दिखाया गया था.

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