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नटवर लाल: इसके जैसा ना कोई था, ना होगा!

अमीरों को लूटकर गरीबों के साथ मिल बांटकर खाने का दावा करने वाला नटवर लाल हर बार पुलिस की गिरफ्त से निकल भागा

Surendra Kishore Surendra Kishore Updated On: Nov 13, 2017 09:34 AM IST

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नटवर लाल: इसके जैसा ना कोई था, ना होगा!

आज के ‘नटवर लालों’ से चाहे जो भी समानता हो, पर आज का कोई ‘नटवर लाल’ 84 साल की उम्र में हथियारबंद संतरियों को धोखा देकर फरार तो नहीं हो सकता! इस मामले में मिथिलेश कुमार श्रीवास्तव उर्फ नटवर लाल को ‘न भूतो न भविष्यति’ ही माना जा सकता है.

25 जून 1996 की बात है. दिल्ली रेलवे स्टेशन पर नटवर लाल कानपुर जाने वाली ट्रेन का इंतजार कर रहा था. डॉक्टरी जांच के लिए उसे कानपुर जेल से दिल्ली लाया गया था. उसके साथ दो संतरी और एक फोर्थ ग्रेड का कर्मचारी था. लाचार नटवर लाल को बेंच पर लिटाकर वह कर्मचारी व्हील चेयर लौटाने चला गया. एक संतरी टिकट का प्रबंध करने गया. बचे संतरी को नटवरलाल ने चाय के लिए भेज दिया.

ऐसी चतुराई नहीं देखी

पर जब वह चाय लेकर लौटा तो उसके पैरों तले जमीन खिसक गई. नटवर लाल फरार हो चुका था. वह पहले भी कई बार फरार हो चुका था. लेकिन इसके बाद वह कभी पुलिस के हाथ नहीं आया. जब नटवर लाल के एक करीबी रिश्तेदार के घर श्राद्ध हुआ तो मान लिया गया कि मिथिलेश श्रीवास्तव अब दुनिया में नहीं हैं.

एक बार नटवर लाल ने कहा था कि जीरादेई ने दो राष्ट्रीय पुरुषों को जन्म दिया. एक डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद और दूसरा मुझे. वे राष्ट्रपति बने और मैं चतुर कलाकार! पर लोग मेरी कलाकारी को ठगी का नाम देते हैं.

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जीरादेई बिहार के अविभाजित सारण जिले में है. अब वह सिवान जिले में है. हालांकि यह संयोग ही है कि उसी जीरादेई विधानसभा क्षेत्र से आरजेडी नेता और चर्चित शहाबुद्दीन पहली बार विधायक बने थे.अब वे तिहाड़ जेल में हैं.

नहीं रोक सकीं जेल की दीवारें

‘दुनिया का कोई जेल गब्बर सिंह को ज्यादा दिनों तक बंद नहीं रख सकता.’

शोले में गब्बर सिंह ने तो यह डायलाॅग बाद में बोला. लेकिन नटवर लाल तो उससे पहले यह कहा करता था कि कोई भी जेल मुझे एक साल से ज्यादा समय तक नहीं रख सकता. वह आठ या नौ बार फरार हो चुका था.

पहली बार 1957 में वह लखनऊ जेल से और दूसरी बार 1963 में आंध्र प्रदेश के जेल से फरार हुआ था. अपने पूरे ‘नटवरी जीवन’ में उसने करीब 400 लोगों को ठगा था. उसने लगभग 3 करोड़ रुपए की ठगी की. विभिन्न राज्यों की अदालतों ने उसे कुल मिलाकर करीब 150 साल की सजा दी थी.

वह कहा करता था कि मैंने कभी गरीबों और मध्यम वर्ग के लोगों को नहीं ठगा. बड़े लोगों को ठगा और गरीबों के साथ मिल बांटकर खाया. उसने दो तीन लोगों से अधिक कभी अपने गिरोह में शामिल नहीं किया.

मिथिलेश कुमार श्रीवास्तव उर्फ नटवर लाल को पुलिस ने कई बार गिरफ्तार किया लेकिन वो हर बार बच निकला. आखिर बार जब वह पुलिस के चंगुल से भागा था तब वह 84 साल का था. उसके बाद कभी वो पुलिस के हत्थे नहीं चढ़ा फोटो quora

मिथिलेश कुमार श्रीवास्तव उर्फ नटवर लाल को पुलिस ने कई बार गिरफ्तार किया लेकिन वो हर बार बच निकला. आखिर बार जब वह पुलिस के चंगुल से भागा था तब वह 84 साल का था. उसके बाद कभी वो पुलिस के हत्थे नहीं चढ़ा (फोटो- quora)

एक बार वह नई दिल्ली के एक ज्वैलर्स के यहां गया. वहां खुद को नारायण दत्त तिवारी का निजी सहायक बताया. उसने दुकानदार का विश्वास जीत लिया और एक लाख 60 हजार रुपए के जेवर लेकर फरार हो गया.

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रेलवे में राजस्व कलक्टर रघुनाथ प्रसाद श्रीवास्तव का बेटा नटवर लाल पढ़ा लिखा था. अंग्रेजी बोलता था और किसी के हस्ताक्षर की हूबहू नकल कर लेता था. पचास-साठ के दशकों में बिहार के गांवों में यह चर्चा थी कि नटवर लाल ने केंद्र सरकार से कह रखा है कि यदि वह अनुमति दे तो वह भारत सरकार का सारा कर्ज भुगतान करवा देगा.

उसे लगता था कि वह किसी भी कर्जदार देश के संबंधित अधिकारी के हस्ताक्षर की नकल करके यह काम कर सकता है. वह फर्जी बिल्टी रसीदों के जरिए रेलवे से माल छुड़वाकर बेचता था.

कहां से शुरू हुआ ठगी का कारोबार?

चूंकि उसके पिता रेलव में थे, इसलिए वह इस तरह के काम का जानकार हो गया था. उसने ठगी की शुरुआत वाराणसी से की थी. सबसे पहले वह एक सेठ के बच्चों को ट्यूशन पढ़ाता था. चर्चा है कि नटवर लाल ने अपनी बीमार बेटी के इलाज के लिए सेठ जी से एडवांस मांगा. नहीं मिला. बेटी मर गई. उसके बाद ही उसने अमीरों को लूटने का मन बना लिया.

1980 की बात है. लखनऊ की एक अदालत ने उसे पांच साल की सजा दी थी. सजा सुनाने के बाद जज साहब ने नटवर लाल से पूछा कि तुम यह सब कैसे करते हो? नटवर ने कहा, ‘आप हुजूर, एक रुपए का नोट अपनी जेब से निकाल कर देंगे?’

जज साहब ने नोट उसकी तरफ बढ़ा दिया. नटवर ने उस नोट को अपनी जेब में रखा और मुस्कराते हुए कहा कि ‘ठीक इसी तरह!’ जज साहब देखते रह गए और नटवर सिपाहियों के साथ कोर्ट रूम से बाहर निकल गया.

कुछ ऐसा था नटवर लाल

नटवर लाल के बारे में एक दिलचस्प किस्सा है. उन दिनों भी वह जेल में था. उसकी पत्नी उसे अक्सर पत्र लिखती थी. चिट्ठियों में कोई न कोई शिकायत रहती थी. पत्र सेंसर होकर नटवर लाल को मिलता था. एक दिन जेलर ने पूछा कि तुम जवाब क्यों नहीं देते? अपनी पत्नी को नटवर ने जवाब में लिखा कि तुम परेशान मत हो. खेत के बीच में जहां मेड़ बनी है, मैंने वहां कुछ सोना गाड़ रखा है. एक हाथ मिट्ठी खोदने पर तुम्हें एक पोटली मिलेगी. सारा सोना मत बेचना. जेल से छूटते ही मैं तुमसे मिलूंगा.

उधर खेत में सोना गड़े होने की खबर सुनकर पुलिस का एक दस्ता उसके गांव रवाना हो गया. जेल पुलिस ने चिट्ठी नहीं भेजी. पुलिस ने खुद जाकर सोने की तलाश में सारी जमीन की जुतवाई-खुदाई करवा दी. न कुछ मिलना था और न मिला. कुछ महीने बाद नटवर की पत्नी जेल में मिलने आई और उसने जेलर को यह कहते हुए धन्यवाद दिया कि मेरे खेत काफी दिनों से खाली पड़े थे, कोई जोतने वाला नहीं था. आपकी मेहरबानी से इस बार अच्छी फसल हुई है.

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