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दांडी मार्च: नमक के नाम पर क्यों गांधी ने अंग्रेजों को सबक सिखाया?

महात्मा गांधी का यह मार्च सत्य के लिए था. उनके इरादे साफ थे. 'अगर आप हमें मारेंगे तो हम पलटकर वार नहीं करेंगे. लेकिन हम आपके नियम-कानून भी नहीं मानेंगे

Pratima Sharma Pratima Sharma Updated On: Mar 12, 2018 03:03 PM IST

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दांडी मार्च: नमक के नाम पर क्यों गांधी ने अंग्रेजों को सबक सिखाया?

आज से ठीक 88 साल पहले 12 मार्च 1930 को देश में एक ऐसा बदलाव हुआ, जिसने भारतीयों की किस्मत बदल दी. यही वह दिन था जब, महात्मा गांधी अहमदाबाद के अपने साबरमती आश्रम से दांडी के लिए निकले थे.

पहले 10, फिर 200...300...400...2500 लोगों की भीड़ गांधी के पीछे-पीछे जुड़ती जा रही थी. 63 साल के गांधी का इरादा पक्का था. और उनके इरादे पर लोगों का भरोसा था. महात्मा गांधी ने नमक का कानून तोड़ने के लिए दांडी मार्च किया था. उनके पीछे सफेद धोती पहने लोगों का रेला इतना बड़ा था कि उस मार्च को 'सफेद नदी' कहा गया.

386 किलोमीटर के लंबे सफर के बाद 5 अप्रैल को गांधी जी अपने अनुयायियों के साथ दांडी पहुंचे. अरब सागर के तटीय इलाके पर बसा दांडी ऐतिहासिक पलों का गवाह बनने वाला था. दांडी पहुंचने के बाद पहली सुबह महात्मा गांधी ने सबसे पहले प्रार्थना की. फिर झुककर कीचड़ में सना नमक उठाया. देखने में यह छोटी घटना थी लेकिन इसका असर व्यापक रहा. ब्रिटिश सरकार के लिए यह बड़ा झटका था. दुनिया भर में गांधी के इस कोशिश की चर्चा हुई. कई अमेरिकी अखबारों ने भी इसे कवर किया.

ब्रिटिश शेर को नमक डालकर पकाते गांधी का कार्टून

ब्रिटिश शेर को नमक डालकर पकाते गांधी का कार्टून

गांधी के नमक आंदोलन की व्यापकता को देखकर अंग्रेजों ने समुद्र किनारे नमक को कीचड़ में फैला दिया. लेकिन गांधी तो गांधी थे. उन्होंने उसी कीचड़ सने नमक से अंग्रेजों को सबक सिखाया.

अमेरिकी पत्रकार वेब मिलर उस वक्त वहां मौजूद थे. उन्होंने बाद में लिखा है, 'अचानक. स्थानीय पुलिस लोगों पर डंडे बरसाने लगी. लोग गिरने लगें. लेकिन किसी ने भी पलटकर वार नहीं किया.' मिलर की इस रिपोर्ट के बाद इसकी चर्चा अमेरिकी संसद में भी हुई थी.

कानून तोड़ने के लिए नमक ही क्यों चुना गया?

ऐसा नहीं था कि 1930 में नमक ही सबसे बड़ी समस्या थी, जिसके लिए इतना बड़ा आंदोलन करना पड़ा. उस वक्त कई ऐसे टैक्स थे जो भारतीयों पर थोपे गए थे. मसलन लैंड रेवेन्यू. लेकिन महात्मा गांधी ने नमक को चुना क्योंकि उनका मानना था कि नमक पर हर भारतीय का हक है.

हर भारतीय काम करते हुए पसीना बहा रहा है और उसे ही नमक नहीं मिल पा रहा है. गांधी की नजर में यह अन्याय था. ब्रिटिश सरकार ने नमक पर भारी भरकम टैक्स लगाया था. नमक बनाने पर भी सरकार का एकाधिकार था. बिना टैक्स दिए किसी को भी नमक नहीं मिल सकता था. जबकि महात्मा गांधी का मानना था कि नमक प्राकृतिक चीज है. मुफ्त है. देश के लोग अपने पसीने में नमक बहा रहे हैं तो नमक पर उनका पहला अधिकार है.

महात्मा गांधी का यह मार्च सत्य के लिए था. उनके इरादे साफ थे. 'अगर आप हमें मारेंगे तो हम पलटकर वार नहीं करेंगे. लेकिन हम आपके नियम-कानून भी नहीं मानेंगे.'

दुनिया भर की सभ्यताओं की नींव है नमक

नमक न सिर्फ भारत के इतिहास के अहम है बल्कि इसका अपना इतिहास भी काफी दिलचस्प है. राजनीतिक और सैन्य के लिहाज से भी नमक की अहमियत है. 3000 BC (ईसा पूर्व) चीन में नमक की आपूर्ति का जिक्र मिलता है. एक चीनी दार्शनिक ने नमक को 'दुनिया की सबसे मीठी चीज बताई है.'

रोम में वहां के सैनिकों को 'स्पेशल सॉल्ट राशन' दिया जाता था, जिसे सैलारियम अर्जेंटम कहा जाता है. दिलचस्प है कि सैलारियम अर्जेंटम से ही सैलरी शब्द आया है. वेनिस और न्यूयॉर्क के विकास में उनके सॉल्ट ट्रेडिंग सेंटर होने का बड़ा हाथ हैं. इसी तरह दुनिया भर की सभ्यताएं रेगिस्तान जैसी ऐसी कई जगहों पर विकसित हुई हैं, जहां पानी की कमी है लेकिन नमक मिलता है.

एवॉल्यूशन से जुड़े विद्वान मानते हैं कि सभ्यता के विकास में पानी से ज्यादा नमक का हाथ है. इसीलिए सिंधुघाटी सभ्यता का लोथल, यूरोप का वेनिस, और दुनिया भर के तमाम ताकत के केंद्र समुद्र के किनारे मिलते हैं. दुनिया में पहली बार नमक की सप्लाई के लिए ही रोमन्स ने पक्की सड़क बनाई. इसी नमक से भारत के आजाद होने की राह बनी और 17 साल बाद भारत आजाद हुआ.

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