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जानिए कौन मारता है फांसी-घर के गार्ड को जोर से थप्पड़

फांसी की सजा सुनने में जितनी डरावनी है उससे कहीं ज्यादा अजीब इससे जुड़े नियम हैं

Updated On: Jan 21, 2018 03:58 PM IST

Sanjeev Kumar Singh Chauhan Sanjeev Kumar Singh Chauhan

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जानिए कौन मारता है फांसी-घर के गार्ड को जोर से थप्पड़
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'फांसी'...या फिर 'फांसी-घर'...! जेहन में यह शब्द आते ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं. फांसी का जिक्र आते ही सामने मौत दिखाई देने लगती है. क्या आपने सोचा है कि कैसा होता है फांसी-घर? कैसे लगाई जाती है फांसी? कैसा होता है जल्लाद? क्या कुछ मनोदशा होती होगी फांसी से पहले की तैयारियां करते वक्त उस टीम में शामिल लोगों की? फांसी लगने वाले के जेहन में मची उथल-पुथल का क्या आलम होता होगा?

सेंट्रल जेल में ही बनते हैं फांसी-घर?

भारत की तकरीबन हर सेंट्रल जेल (केंद्रीय कारागार) में फांसी-घर का निर्माण कराया जाता है. सेंट्रल जेल में ही इसलिए, क्योंकि जिला जेलों की तुलना में सेंट्रल-जेल के सुरक्षा इंतजाम कहीं ज्यादा मजबूत होते हैं. भारत की कुछ जेलों में अभी फांसी-घर इस्तेमाल में लाए जाने की स्थिति में हैं. येरवदा जेल (महाराष्ट्र), दिल्ली स्थित तिहाड़ जेल, मेरठ सेंट्रज जेल और कोलकता सेंट्रल जेल में अभी फांसी दी जा सकती है.

तिहाड़ का फांसी-घर सबसे ज्यादा सुरक्षित

tihar jail

दिल्ली स्थित तिहाड़ सेंट्रल जेल में फांसी-घर की सुरक्षा और रख-रखाव देश की बाकी जेलों से कहीं ज्यादा बेहतर है. इसकी दो वजह हैं. देश की अगर किसी भी जेल में कैदी को फांसी देने में कभी कोई समस्या खड़ी होती है. या फिर सरकार को लगता है कि, फलां कैदी को फलां जेल में फांसी पर टांगे जाने से शांति व्यवस्था पर विपरीत प्रभाव पड़ सकता है, तो उसे शिफ्ट करके तिहाड़ के फांसी-घर में लाकर तय समय पर फांसी पर लटकाया जा सकता है. क्योंकि एशिया की सर्वाधिक सुरक्षित जेल तिहाड़ ही मानी जाती रही है.

कुंआ, जिसमें लटकती है लाश

फांसी-घर किसी भी सेंट्रल जेल के अंदर एक अलग कोने में ही बनाया जाता है. ताकि वो रोजमर्रा की जिंदगी में आम कैदियों की नजर में न आए. फांसी घर की जानकारी इस हद तलक गुप्त रखी जाती है कि, तमाम कैदी अपनी सजा काटकर जेल से बाहर चले जाते हैं, मगर उन्हें इसका भान तक नहीं हो पाता है कि, वे फांसी-घर के बराबर वाली कोठरी में ही कैद रह आए हैं. जेल की ऊंची चार-दिवारी के बराबर ही उसके भीतर मौजदू दूसरी चार-दीवारी में फांसी-घर स्थित होता है.

फांसी घर में एक सीमेंटेड कुंआ होता है. कुएं में उतरने के लिए तीन से चार सीढ़ियां होती हैं. गोलाई में बने कुएं के अंदर ब-मुश्किल एक से डेढ़ मीटर ही जगह होती है. कुएं के अंदर 2-3 आदमी ही एक साथ खड़े हो सकते हैं. कुएं के ऊपर गोलाकार रुप में काठ (लकड़ी) का तख्ता ढका होता है. तख्ता बीच से दो हिस्सों में दिखाई देता है. लेकिन तख्ते को इस तरीके से डिजाइन किया जाता है कि, वो देखने में गोलाकार लगता है. फांसी देते वक्त जब जल्लाद 'लीवर' खींचता है तो, वही गोलाकार तख्ता कुएं के नीचे की तरफ दो हिस्सों में जाकर खुल जाता है. और कुछ सेकेंड पहले तक तख्ते के ऊपर मौजूद इंसान (आरोपी जिसे फांसी लगाई गयी होती है) तख्ते के दोनो फट्टों के बीच कुएं में रस्सी के सहारे झूल जाता है.

फांसी घर ला देता है जेल अफसरों को पसीना

दरअसल फांसी-घर एक तो पहले से ही जेल के उस कोने में बनाया जाता है, जो बिलकुल सूनसान होता है. यही कारण है कि, जिसके चलते कभी भी किसी फांसी-घर पर कोई जेल कर्मी 'निगरानी या पहरा' ड्यूटी लेने/करने को राजी नहीं होता है. जेल की नौकरी में फांसी घर की पहरा-ड्यूटी सबसे खौफनाक मानी जाती है. इसीलिए अमूमन किसी भी फांसी घर की रखवाली/पहरेदारी में एक समय में कम से कम दो कर्मचारियों की ड्यूटी लगाई जाती है.

फांसी-तख्ते की सुरक्षा में कोताही यानि नौकरी पर खतरा

कहते हैं कि फांसी घर की रखवाली में यूं तो कुछ खास नहीं होता है. फांसी-घर के अंदर न गोला-बारुद-असलाह रखा होता है. न कोई कैदी. जिसकी सुरक्षा चाक-चौबंद करनी हो. फिर भी 24 घंटे हर फांसी-घर की सुरक्षा में कर्मचारियों की तैनाती अनिवार्य है. फांसी घर के पुराने तख्तों पर कोई आंच आई तो समझो फांसी घर की सुरक्षा में तैनात कर्मचारी-अधिकारी की नौकरी तक जाने का खतरा पैदा हो जाता है.

बड़े काम का है फांसी तख्ते की लकड़ी का टुकड़ा भी

तिहाड़ जेल के पूर्व कानूनी सलाहकार (रिटार्यड) सुनील गुप्ता के मुताबिक, फांसी के तख्ते की लकड़ी हमेशा आम-जन की डिमांड में रहती है. माना जाता है कि, फांसी-तख्ते की छोटी से छोटी लकड़ी (किर्च) भी लोग पाना चाहते हैं. उनके मुताबिक अमूमन लोग फांसी तख्ते का इस्तेमाल जादू-टोना-टोटका में करते हैं. पढ़ाई में कमजोर बच्चों की किताबों में फांसी घर की लकड़ी का टुकड़ा रखने से उनकी याददाश्त तेज हो जाती है. लोगो का ऐसा मानना है. कुछ लोगों के अनुसार, कोई नवजात शिशु अगर सोते-सोते चौंक जाता हो, तो उसके सिराहने फांसी-तख्ते की लकड़ी रखने से उसका चौंकना बंद हो जाता है.

किसी इंसान के अगर जेल जाने का योग उसकी जन्म-कुंडली में लिखा हो तो, उसकी बाजू (हाथ) में फांसी के तख्ते की लकड़ी बांधने से उसके जेल जाने की उम्मीद लगभग खतम सी हो जाती है. किसी इंसान पर अक्सर अकाल मौत का साया अगर आ-जा रहा हो. या फिर आए-दिन सड़क पर या कहीं भी उसे एक्सीडेंट का भय सता रहा हो, ऐसे इंसान के बदन से अगर फांसी-तख्ते की लकड़ी लगी रहे तो एक्सीडेंट में अकाल मौत का भय खतम हो जाता है.

कुछ लोगों का मानना है कि, अगर किसी गर्भवती महिला को गर्भावस्था के दौरान डरावने सपने आ रहे हों. उसे अपने आस-पास कोई साया सा नजर आ रहा हो. ऐसी महिलाओं के पास फांसी-तख्ते की लकड़ी रखने से उसकी इन तमाम समस्याओं का समाधान हो सकता है.

बकौल सुनील गुप्ता. मैं इन तमाम बातों को आज के सभ्य समाज में रहते हुए कदापि मानने को तैयार नहीं हूं. हां तिहाड़ जेल की लंबी नौकरी के अनुभव में मैने यह सब देखा-सुना जरुर है. उनके मुताबिक यही वजह है कि, हमें (जेल प्रशासन को) फांसी-घर में फांसी-कुएं पर मौजूद लकड़ी के सड़े-गले तख्तों की हिफाजत भी कैदियों की मानिंद ही चाक-चौबंद तौर-तरीकों से करनी पड़ती है. उनके मुताबिक यही कारण है कि, समाज में टोना-टोटका करने कराने वालों की डिमांड में फांसी तख्ते की लकड़ी हमेशा रहती है. इस तख्ते की जरा सी छोटी से छोटी लड़की के टुकड़े की एवज में वे लोग मोटी रकम देने में भी संकोच नहीं करते हैं. इसीलिए फांसी घर में मौजूद सड़े-गले तख्तों की हिफाजत में भी जेल प्रशासन को अक्सर मशक्कत करते ही रहनी पड़ती है.

रात में कौन फांसी घर के पहरेदारों को मारता है थप्पड़!

फांसी घर जैसे वीरान-डरावने स्थान की पहरेदारी करना आसान नहीं है. कहा जाता है कि कई साल पहले तिहाड़ जेल के एक संतरी (पहरेदार) की रात के वक्त फांसी घर की रखवाली की ड्यूटी लगी थी. ड्यूटी भी अकेले ही कर रहा था. किसी वक्त उसे नींद की झपकी आ गयी. तभी उसे अहसास हुआ कि उसके किसी ने थप्पड़ मारा है. इस अहसास ने उसे पसीने से तर-ब-तर कर दिया. ऐसा वाकया और भी कई बार हुआ. ड्यूटी स्टाफ ने बाकी स्टाफ को बताया, तो उन्होंने इसे ड्यूटी न करे का बहाना बताकर हंसी में टाल दिया. हालांकि इन बातों पर जेल अधिकारी विश्वास करने को राजी नहीं होते.

फांसी घर की ड्यूटी के नाम से कांपती है रुह

फांसी capital punishment

जब से रात के वक्त संतरी ड्यूटी के सिपाही को साये द्वारा थप्पड़ मारने की चर्चा ने तिहाड़ में जोर पकड़ा, पूरे जेल प्रशासन को ही फांसी घर के नाम से भय लगने लगा है. इस घटना के बाद से फांसी घर की संतरी ड्यूटी करने से अब बहादुर से बहादुर जेल कर्मी भी कन्नी काटता है. सूत्रों की माने तो आलम यह है कि अगर कोई जेलकर्मी ड्यूटी में ज्यादा लापरवाही बरतता पाया जाता है तो, उसे फांसी घर की संतरी ड्यूटी में भेजे जाने की नसीहत देकर पटरी पर लाए जाने की कोशिशें तक की जाती हैं.

फांसी तख्ते की लकड़ी की मिलती है मुंह-मांगी कीमत

फांसी तख्ते की लकड़ी की कीमत जेल के बाहर मुंह-मांगी मिलती है. यह बात धीरे-धीरे जब तिहाड़ के आला अफसरों के कानों तक पहुंची तो उन्हें काठ मार गया. उनके जेहन में शंका उत्पन्न हुई कि, कहीं चंद रुपयों के लालच में जेल कर्मी फांसी तख्ते की लकड़ी की खरीद-फरोख्त में न पड़ जायें. इससे बदनामी होगी सो अलग. जेल और फांसी-घर के सुरक्षा इंतजामों पर ही सवालिया निशान लग जायेगा. लिहाजा इस समस्या से निपटने का बेजोड़ और स्थायी समाधान खोज लिया गया. जेल प्रशासन ने रातों-रात लकड़ी के तख्तों को हटाकर लोहे के भारी-भरकम फट्टे (तख्ते) लगवा दिए. यह काम लोक निर्माण विभाग ने इसलिए किया क्योंकि, फांसीघर के रख-रखाव (मेंटिनेंस) की जिम्मेदारी दिल्ली सरकार की है.

अफजल गुरु को लोहे के फांसी तख्तों पर ही लटकाया

तिहाड़ जेल सूत्रों के मुताबिक 43 साल के आतंकवादी मोहम्मद अफजल गुरु को 9 फरवरी 2013 को तिहाड़ जेल के ही इन नये फांसी तख्तों (लोहे के) पर ही खड़ा करके फांसी दी गयी. लोहे के इन नये तख्तों पर खड़े होकर फांसी लगने वाला मोहम्मद अफजल गुरु पहला कैदी साबित हुआ. लकड़ी तख्त पर अंतिम फांसी इंदिरा गांधी के हत्यारों को दी गई थी. संसद पर हमले का आरोपी अफजल गुरु अगर लोहे के तख्तों पर फांसी लटकाए जाने वाला आरोपी साबित हुआ.

अफवाह है तड़के चार बजे फांसी पर टांगने की बात

अब तक यही समझा जाता रहा है कि, फांसी पर सजा पाये इंसान को तड़के 4 बजे फांसी के फंदे पर लटकाया जाता है. यह बात सरासर गलत है. इसके कई पुख्ता उदाहरण मौजूद हैं. इसकी पुष्टि होती है श्रीमति इंदिरा गांधी के हत्यारे सतवंत सिंह और केहर सिंह की फांसी. दोनो को सुबह करीब सात बजे फंदे पर लटकाया गया था. इसी तरह 1993 मुंबई बम धमाकों के आरोपी याकूब अब्दुल रज्जाक मेमन को 30 जुलाई 2015 को नागपुर सेंट्रल जेल में सुबह करीब साढ़े छह बजे फांसी पर लटकाया गया. इस उन अफवाहों पर भी विराम लगता है कि. फांसी भोर में (तड़के) चार बजे ही दी जाती है.

रंग-बिल्ला या मकबूल बट, सबकी किस्मत एक

देश में यूं तो तमाम सेंट्रल जेलों में फांसी घर मौजूद हैं. तिहाड़ जेल के फांसी घर की पहचान मगर अलग ही रही है. इसकी वजह है तिहाड़ के फांसी घर में सबसे ज्यादा कैदियों की सजा-ए-मौत को अमल में लाया जाना. 1982 में गीता-संजय चोपड़ा के हत्यारे कुलजीत सिंह (रंगा खुश) और जसबीर सिंह (बिल्ला) को तिहाड़ के फांसी घर में ही लटकाया गया था. इसके करीब दो ढाई साल बाद 11 फरवरी 1984 को 29 साल के कश्मीरी आतंकवादी मकबूल बट को भी तिहाड़ जेल में ही फांसी दी गयी. देश को हिला देने वाले विद्या जैन हत्याकांड का आरोपी जुगाड़ सिंह (जुगार) भी तिहाड़ के ही फांसी घर में टांगकर मारा गया था.

फांसी की सजा सुनाने वाला पहला जज जिसकी हत्या हुई

जस्टिस नीलकंठ गंजू

जस्टिस नीलकंठ गंजू

जब बात फांसी, फांसी घर की हो तो जज नीलकंठ गंजू का जिक्र जरुर आता है. नीलकंठ गंजू देश के ऐसे पहले और इकलौते जज माने जाते रहे हैं, जिन्होंने कश्मीरी आतंकवादी मकबूल बट को दोषी करार दिया था. बाद में मकबूल को मौत की सजा सुनाई. मकबूल बट को 1984 में तिहाड़ जेल में फांसी पर लटकाया गया. इससे खफा जेकेएलएफ (जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट) के आतंकवादियों ने करीब छह साल बाद सन् 1990 में जज नीलकंठ गंजू की गोली मारकर हत्या कर दी थी.

फांसी-घर का सन्नाटा और अजब-गजब रिवाज

फांसी के वक्त फांसी घर की चार दीवारी के भीतर मजिस्ट्रेट, जेल सुपरिंटेंडेंट, असिस्टेंट सुपरिंटेंडेंट-जेलर, मेडिकल आफिसर (डाक्टर), एक या दो जल्लाद, फांसी की सजा पाया आरोपी, जेल के कानून अफसर सहित कुल जमा 5 से 8 लोग मौजूद होते हैं. इनमें से किसी को किसी से बोलने की इजाजत नहीं होती. सब मुंह और हाथ के इशारों से या फिर कलम-कागज की मदद से लिखकर ही बात करते हैं. फांसी देने के तय समय से 18 से 24 घंटे पहले आरोपी बताया जाता है. जेल सुपरिंटेंडेंट काल कोठरी के बाहर खड़ा रहकर आरोपी को ‘डेथ-वारंट’ पढ़कर सुनाता है.

मौत की सजा पाया शख्स नहीं देख पाता जल्लाद को

जल्लाद के बारे में जो भी धारणाएं हों, मगर वो हमारी-आपकी तरह आम-इंसान है. न वो भीमकाय है न काला-भुजंग या फिर शक्ल से डरावना. देश में कुछ जल्लाद (लक्ष्मन, कल्लू, पवन आदि) तो ऐसे हैं, जिन्हें आमने-सामने देखकर कोई अंदाजा ही नहीं लगा सकता है कि, ये लोग जीते-जागते इंसान को फांसी पर लटकाने जैसा दुस्साहसिक काम करते होंगे.

फांसी का सामान

खटका, रुमाल, रस्सी, सफेद घेरा और रेत बोरी  का फांसी के वक्त सबसे अमह रोल होता है. जल्लाद अपनी भाषा में ‘लीवर’ को खटका कहता है. जल्लाद के लीवर खींचते ही सजा-ए-मौत पाए इंसान के पांवों के नीचे मौजूद तख्ता दो हिस्सों में खुलकर कुंए के अंदर जाकर खुल जाता है. और इसी के साथ एक मामूली सी चीख या आवाज के साथ इंसान का शरीर कुंए के अंदर गर्दन में मौजूद फांसी-फंदे के सहारे झूलने लगता है. फांसी के वक्त दो रुमाल इस्तेमाल होते हैं. इनका रंग काला, लाल या फिर सफेद हो सकता है. एक रुमाल फांसी सजा पाये इंसान के चेहरे को ढंकने में इस्तेमाल होता है. दूसरा रुमाल जेलर, जल्लाद को ‘लीवर’ खींचने के लिए इशारे के रुप में करता है. फांसी घर में रस्सियों की संख्या भी तीन होती है. दो रस्सियों से एक ही तख्ते पर दो अलग अलग फांसी के फंदे बनाये जाते हैं. ताकि एक रस्से के काम न करने पर दूसरा रस्सा इस्तेमाल हो सके.

जल्लाद बांधता आरोपी के पांव

फांसी से पहले तीसरी रस्सी से आरोपी के हाथ पीछे की करके उसी समय बांध दिए जाते हैं. जब उसे काल-कोठरी से निकालकर फांसी घर की ओर लेकर चला जाता है. फांसी की सजा पाये इंसान के पैरों के नीचे सफेद घेरा खींचा जाता है. काल कोठरी से लाकर इंसान को उसी सफेद घेरे के अंदर दोनो पांव रखवाकर खड़ा किया जा सके. इस निशान के ऊपर ही वो रस्सी का फंदा रखा होता है जिसे, इंसान के खड़े होते ही बिना समय गंवाए एकदम कस दिया जाता है. यह काम जल्लाद करता है. पांव बांधते समय जल्लाद इस बात का बहुत ख्याल रखता (सतर्कता) है कि आरोपी कहीं पांवों से जल्लाद के ऊपर ही हमला न कर दे.

इसलिए ढंकते हैं दोषी का मुंह

आरोपी (मौत की सजा पाने वाला), जल्लाद या किसी और को या फिर फांसी के फंदे को अपनी आंखों से देखकर गुस्से में विरोध पर न उतर आए, इसलिए उसका मुंह रुमाल से काल-कोठरी के भीतर ही ढंक दिया जाता है. ताकि उसे अपने आस-पास लोगों के होने का अहसास तो हो सके, लेकिन वो किसी से नजर न मिला सके. फांसी से ठीक पहले अगर मरने वाला अपनी कोई वसीयत लिखाने की इच्छा जाहिर करे, तो वसीयत लिखने की जिम्मेदारी/ प्रक्रिया फांसी घर में मौजूद मजिस्ट्रेट पूरी करता है. फांसी पर लटकाए जाने वाले इंसान के पांव में उसी के वजन की रेते की बोरियां बांधी जाती है, ताकि फंदे पर कुएं में झूलते समय उसके प्राण हर हाल में निकल जायें. साथ ही रेत की बोरियों के वजन से फांसी के समय इंसान का शरीर तड़पता हुआ फांसी-कुएं की दीवारों से न टकराए.

(लेखक अपराध मामलों से जुड़े स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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