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पुलिस ने जंगल में जहां लाखों के इनामी 4 खाड़कू मारे, वहां फूल-माला कौन चढ़ा गया?

'पड़ताल' की इस कड़ी में हम आपको हू-ब-हू करीब 27 साल पुराने एक सच्चे और रूह कंपा देने वाले किस्से से रू-ब-रू कराने जा रहे हैं.

Sanjeev Kumar Singh Chauhan Sanjeev Kumar Singh Chauhan Updated On: May 26, 2018 09:26 PM IST

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पुलिस ने जंगल में जहां लाखों के इनामी 4 खाड़कू मारे, वहां फूल-माला कौन चढ़ा गया?

‘आमना-सामना होने पर अक्सर अपराधी-पुलिस के बीच सांप-नेवले की सी लड़ाई होती है. दोनों एक-दूसरे को घेरने के लिए दांव चलते हैं. कमजोर पड़कर या नासमझी में, दुश्मन के दांव में जो फंस गया वही समझो ढेर. 'पड़ताल' की इस कड़ी में हम आपको हू-ब-हू करीब 27 साल पुराने एक ऐसे ही सच्चे और रूह कंपा देने वाले किस्से से रू-ब-रू कराने जा रहे हैं.

उस जमाने के दो आला-पुलिस अफसरों (एक रिटायर्ड पुलिस महानिरीक्षक और दूसरे उप-महानिरीक्षक) की मुंहजुबानी, जिनमें से एक के नेतृत्व में इस सच्ची घटना को अंजाम दिया गया. वह घटना जिसमें खाड़कूओं द्वारा फैलाये गये जाल में पहले पुलिस की पड़ताली-टीम फंस गयी. परिणाम पुलिस और पीएसी के जवानों से भरा ट्रक आतंकवादियों ने बारूदी सुरंग से उड़ा दिया. 7-8 बहादुर जवान शहीद हो गये.

इस असफलता के करीब 7 महीने बाद पुलिस के बुने जाल में जब दुश्मन (खाड़कू-आतंकवादी) फंसे, तो बियाबान जंगल में कई घंटे चले दिल-दहला देने वाले 'एनकाउंटर' में लाखों रुपये के इनामी 4 खूंखार खाड़कू ढेर करके पुलिस ने पिछली हार का हिसाब बराबर कर लिया. जीत-हार और लुका-छिपी के इस खेल में हैरंतगेज बात जो सामने निकल कर आई, वह थी जंगल में जहां पुलिस ने चारों खाड़कू गोलियों से छलनी किये, 15 दिन बाद उसी जगह पर धूप-अगरबत्ती जलाकर कोई फूल-माला चढ़ा गया!' क्या था धूप-अगरबत्ती जलाकर फूल-माला चढ़ाने का रहस्य? बियाबान जंगल में यह सब करने वाले आखिर थे कौन? इन तमाम सवालों के बेबाक जवाब 'पड़ताल' के पाठकों को मिलेंगे इस पूरी कहानी को पढ़ने के दौरान.

1990 का तराई मतलब बेहाल पुलिस, पब्लिक, खाड़कू

उत्तर प्रदेश के बरेली, लखीमपुर खीरी (नेपाल बॉर्डर तक), शाहजहांपुर, पीलीभीत, उधम सिंह नगर, रुद्रपुर, राम नगर, हल्द्वानी, काठगोदाम, मझोला, न्यूरिया, पलिया, हजारा, सम्पूर्णा नगर, अमरिया, पूरनपुर और नैनीताल के कुछ हिस्सों में सिख आतंकवाद चरम पर था. खाड़कू (आतंकी) जिन झालों (फॉर्म हाउस) पर शरण लेते, उन्हीं को बर्बाद करने पर उतारू थे. झालों में रहने वाले सिख परिवार पुलिस और खाड़कू दोनों से परेशान थे.

खाड़कू, सरदारों के झालों पर जबरिया शरण लेते. झालों पर मौजूद मां-बहन-बेटियों पर गंदी नजर रखते. खाड़कुओं की तलाश में पुलिस पहुंचती तो, झालों के मालिकों से कड़ाई से पूछताछ करती. खाड़कू रुकते किसी झाले पर थे. कमजोर खुफिया-तंत्र के चलते पुलिस खाड़कुओं के बारे में ‘पड़ताल’ करने पहुंच किसी और झाले पर जाती.

यूपी के लखीमपुर खीरी जिले का थाना सम्पूर्णा नगर, जहां उस रात मौत मंडराकर, हजारा थाना (पीलीभीत) में जाकर अड़ गयी. अविस्मरणीय बहादुरी की बेमिसाल इबारत लिखने वाले पूर्व आईपीएस राम कृष्ण चतुर्वेदी.

यूपी के लखीमपुर खीरी जिले का थाना सम्पूर्णा नगर, जहां उस रात मौत मंडराकर, हजारा थाना (पीलीभीत) में जाकर अड़ गयी. अविस्मरणीय बहादुरी की बेमिसाल इबारत लिखने वाले पूर्व आईपीएस राम कृष्ण चतुर्वेदी.

पुलिस और पब्लिक के बीच की इस गहरी खाई का नाजायज फायदा उठा रहे थे खूनी-खाड़कू. कुल जमा पब्लिक-पुलिस और खाड़कू थे और सब एक-दूसरे से दुखी. खाड़कू, यूपी पुलिस से परेशान थे. पुलिस, खाड़कूओं के खून-खराबे से बेहाल. झालों में रहने वाले सिख परिवार खाड़कू और पुलिस दोनों से जलील हो रहे थे.’ बेबाकी से बताते-सुनाते नहीं थकते हैं, उस जमाने में पलिया (जिला लखीमपुर खीरी) के क्षेत्राधिकारी (वर्तमान में उत्तर प्रदेश राज्य पुलिस भर्ती बोर्ड के सदस्य 1998 बैच यूपी काडर के पूर्व आईपीएस रिटायर्ड पुलिस महानिरीक्षक इंटेलिजेंस) आर.के. चतुर्वेदी (राम कृष्ण चतुर्वेदी) और अमरिया व पूरनपुर (दोनों जिला पीलीभीत के सब-डिवीजन) के पूर्व सर्किल-ऑफिसर (यूपी कॉडर 2002 बैच के पूर्व आईपीएस और अलीगढ़ रेंज के रिटायर्ड डीआईजी) आर.पी.एस. यादव (राजेंद्र प्रसाद सिंह यादव).

जब थानों में सूरज ढलने से पहले पड़ने लगे ताले

बकौल रिटायर्ड डीआईजी और पूर्व आईपीएस आरपीएस यादव, ‘अंधाधुंध कत्लेआम और लूट की वारदातों को अंजाम देकर पुलिस को खुली चुनौती दे रहे थे चिढ़े हुए खाड़कू. खूनी-दिमाग खाड़कुओं के निशाने पर पुलिस-पब्लिक दोनों थे.’ वहीं आर.के चतुर्वेदी के शब्दों में, ‘खालिस्तान लिबरेशन आर्मी, बब्बर खालसा, खालिस्तान कमांडो फोर्स के खाड़कुओं से भयभीत पुलिस ने वर्दी पर (कंधों) पीतल के बैज लगाने छोड़ दिये. उनकी जगह खाकी वर्दी पर धागे से बैज बनवाने शुरू कर दिये. खाड़कू-प्रभावित इलाकों में तैनात पुलिसकर्मियों ने खाकी-वर्दी छिपाने के लिए बदन पर कंबल-चादर ओढ़ना शुरू कर दिया. सूरज ढलने से पहले थाने, पुलिस-जंगल की चौकियों (फॉरेस्ट बैरियर), आला-पुलिस अफसरों के दफ्तरों में ताले जड़े जाने शुरू हो चुके थे.’

पुलिस कप्तान की सहमी बीवी जब छत पर जा चढ़ीं!

पूर्व आईपीएस (रिटायर्ड डीआईजी) राजेंद्र प्रसाद सिंह यादव के मुताबिक, ‘एक बार हमारे एसपी (पीलीभीत के पुलिस कप्तान) साहब के बंगले से चंद फर्लांग दूर मौजूद जंगलात की चेक-पोस्ट पर शाम ढले खाड़कुओं ने गोलियां बरसा दी थीं. गोलियों की तड़तड़ाहट कप्तान साहब के सरकारी आवास के अंदर मौजूद उनकी पत्नी ने सुनी तो उनकी घिघ्घी बंध गयी.

डर के मारे वे सरकारी आवास की छत पर जा पहुंचीं. घबराहट थोड़ी शांत होने के बाद जब नीचे पहुंचीं तो, कप्तान साहब से बोलीं कि, छोड़िये ऐसी पुलिस की नौकरी. जान है तो जहान है. चलिये यहां से (पीलीभीत की पोस्टिंग से) तुरंत कहीं और.’ करीब 27 साल पुराने उस वाकये को याद करके बेसाख्ता हंस पड़ते हैं यूपी पुलिस के रिटायर्ड डीआईजी आरपीएस यादव. बकौल आरपीएस यादव, जब उन्होंने पीलीभीत जिले में बहैसियत सर्किल ऑफिसर जॉइन किया, यह किस्सा उससे पहले का है. तब तक एसपी साहब का ट्रांसफर हो चुका था.

राजेंद्र प्रसाद सिंह यादव

पूर्व DIG राजेंद्र प्रसाद सिंह यादव: 1990 के दशक में जिन्हें देखकर खूंखार खाड़कू रास्ता बदल जाते थे

मजबूत ‘पड़ताल’ के चलते मौत रास्ता बदल गयी

‘जहां तक याद आ रहा है यह वाकया है 1991 के मध्य का. मैं उन दिनों लखीमपुर खीरी जिले के पलिया सब-डिवीजन का सर्किल ऑफिसर था. मेरे ही सब-डिवीजन के थाना सम्पूर्णा नगर में शाम ढले एक फोन आया. फोन करने वाले ने कहा कि वो मिलिट्री फॉर्म इलाके से बोल रहा है. उसके घर में दो खाड़कू मय हथियारों के घुस आये हैं. फोन करने वाले का कहना था कि उसने दोनों खाड़कूओं को नशीला पदार्थ खिलाकर मकान में बंद कर लिया है. तुरंत पुलिस भेजी जाये.’ बताते हैं पूर्व आईपीएस राम कृष्ण चतुर्वेदी.

‘चूंकि उन दिनों खाड़कू, पब्लिक से ज्यादा पुलिस का 'शिकार' करने को बेताब थे. लिहाजा मैंने उसी वक्त पलिया थाने के प्रभारी सब-इंस्पेक्टर मुकेश कुमार (अब रिटायर्ड इंस्पेक्टर) को टेलीफोन कॉल की पड़ताल करके सत्यता जांचने के लिए, पलिया टेलीफोन एक्सचेंज भेज दिया. पता चला कि मिलेट्री फॉर्म एरिया जिला पीलीभीत के थाना हजारा के इलाके में था. दूसरे मिलिट्री फॉर्म का टेलीफोन तकनीकी खराबी के कारण कई दिन से बंद पड़ा था.

मतलब साफ था कि आतंकवादी पुलिस को धोखे से बुलाकर 'ठिकाने' लगाने की प्लानिंग में थे. तब हमें लगा कि उस दिन फौरी मगर मजबूत ‘पड़ताल’ के चलते हमारी मौत अपना रास्ता बदल गयी थी.’ पुलिस नौकरी के दौरान उस नायाब ‘पड़ताल’ की सच्ची कहानी बयान करते हुए बताते हैं उत्तर प्रदेश पुलिस के रिटायर्ड इंस्पेक्टर जनरल ऑफ पुलिस (इंटेलीजेंस) आर. के. चतुर्वेदी.

हमसे दूर गयी ‘मौत’ जब हजारा थाने में मंडराने लगी

‘टेलीफोन कॉल चूंकि थाना हजारा (जिला पीलीभीत) के एरिये से संबंधित थी. सो हमने हजारा पुलिस को बता दिया. साथ ही उन सबको (हजारा पुलिस) सतर्कता बरतने की हिदायत भी दी. मुझे जिसकी आशंका थी दो घंटे बाद रात को वही हुआ. हमारे थाने में फोन आने के बाद हजारा थाने में अनजान टेलीफोन कॉल पहुंची. टेलीफोन करने वाले ने हजारा थाने में बताया कि इलाके में मजदूर नेता रामचंद्र की हत्या कर दी गयी है. लाश चौराहे पर पड़ी है. हजारा थाना पुलिस ने उस टेलीफोन कॉल को 'फर्जी' मानकर ध्यान नहीं दिया. उस काली भयावह रोंगटे खड़े कर देने वाली रात की सच्ची कहानी बेबाकी से सुनाते हैं आर.के. चुतुर्वेदी.

पड़ताल के छेदों में जब जिद्दी ‘मौत’छिपकर जा बैठी

बकौल राम कृष्ण चतुर्वेदी, ‘मन में रह-रह कर अजीब से विचार आ-जा रहे थे. नींद आंखों से कोसों दूर थी. ज्यों-ज्यों रात चढ़ रही थी, बदन थकान से बोझिल होता जा रहा था. तभी मुझे सूचना मिली कि हजारा थाने में कोई आदमी साइकिल से पहुंचा था जिसने चौराहे के बीचो-बीच लाश पड़ी होने की खबर दी. चूंकि कोई इंसान खुद साइकिल से चलकर थाने खबर करने आया था. अब भला सूचना गलत कैसे हो सकती है? सोचकर हजारा थाना इंचार्ज राजिंदर सिंह त्यागी ने मौके पर जाने का प्लान बना लिया.

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बस, हजारा थाना पुलिस की उस 'पड़ताल' में वहीं कुछ छेद खुले रह गये. उस रात पुलिस वालों के पीछे हाथ धोकर पड़ी 'मौत' उन्हीं छेदों में छिपकर जा बैठी. थाना हजारा पुलिस को सूचना देने आया शख्स साइकिल से ही वापस चला गया. थानाध्यक्ष हजारा आर.एस. त्यागी ने एहतियातन पुलिस जीप के बजाये, पीएसी के ट्रक में मय फोर्स घटनास्थल की ओर कूच करना ज्यादा बेहतर समझा. मुझे लगता है कि उस रात उसी वक्त मौत से जिंदगी की हार का सफर शुरू हो चुका था.’ बदन में कंपकंपी ला देने वाली उस 'पड़ताल' का सच बयान करते-करते आर.के. चतुर्वेदी की आंखें नम हो आती हैं.

जिंदगी को हरा कर मौत ने लील लिए 8 बेकसूर

जिंदगी-मौत के बीच चल रहे लुका-छिपी के खौफनाक खेल की उस स्याह रात का रूह कंपा देने वाले सच की कहानी आगे बढ़ाते हैं आर.के. चतुर्वेदी, ‘अभी कुछ ही रात गुजरी थी. नींद से बोझिल बदन में करंट सा दौड़ पड़ा. स्टाफ ने बताया कि, बब्बर खालसा के खाड़कूओं ने हजारा थाने की पुलिस और पीएसी के जवानों को ले जा रहे ट्रक को बारूदी सुंरग के विस्फोट से उड़ा दिया है.

विस्फोट में थानाध्यक्ष हजारा राजिंदर सिंह त्यागी और पीएसी के प्लाटून कमांडर सहित 7-8 पुलिस जवानों की ठौर मौत हो चुकी है. कुछ गंभीर रूप से घायल हैं. हादसा जहां हुआ, वहां सड़क पर आतंकवादियों ने कुत्ते की लाश डाल रखी थी. कुत्ते की उस लाश से बचाने के लिए चालक ने जैसे ही पीएसी ट्रक को कच्ची सड़क पर उतारा, पास छिपे खाड़कुओं ने बारुदी सुरंग में विस्फोट कर दिया.’

8 मौत का वजन लादे मेरे यहां कोई घूमे बर्दाश्त नहीं

‘सन् 1992 की बात है. दिन-रात भयानक बारिश हो रही थी. 6-7 जुलाई को मुखबिर ने सूचना दी कि धोखे से पीएसी ट्रक उड़ाकर पुलिस के 8 जवानों की मौत का जिम्मेदार, बब्बर खालसा का भारत का डिप्टी चीफ सुखविंदर सिंह उर्फ भोला उर्फ तोला पलिया इलाके में हथियारबंद 6-7 खाड़कूओं के साथ घूम रहा है. उन सबके पास एके-47, एके-56 राइफलें, हथगोले, साइनाइड कैप्सू और भारी मात्रा में कारतूसों का जखीरा है.

मुखबिर से हमें पता यह चल चुका था कि सुखविंदर सिंह उर्फ भोला भारतीय फौज का भगोड़ा है. वह बारूदी सुरंग बनाकर विस्फोट करने में माहिर है. भोला उस समय पंजाब पुलिस के 5 लाख जैसी भारी भरकम इनामी राशि का वजन भी अपने सिर पर ढो रहा था.’ बताते हैं उस एतिहासिक 'एनकाउंटर' से पहले की गयी 'पड़ताल' की कहानी आर. के. चतुर्वेदी.

सोच लिया था मरेंगे इज्जत से मारेंगे चुनौती देकर

उस पड़ताली और एनकाउंटर टीम के प्रमुख रहे पूर्व आईपीएस आर.के. चतुर्वेदी के शब्दों में, ‘मैंने तुरंत पलिया थानाध्यक्ष सब-इंस्पेक्टर मुकेश कुमार (अब रिटायर्ड इंस्पेक्टर यूपी पुलिस), थानाध्यक्ष भीरा पुरुषोत्तम शरण (रिटायर्ड डिप्टी एसपी) और सम्पूर्णा नगर थाने के प्रभारी डी.एन. मिश्रा (दयानाथ मिश्रा, सड़क हादसे में बाद में मौत हो गयी) की टीम बनाई. तीनों टीमों को समझाकर मैं उनके साथ निकल पड़ा.

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यह बात है दिन के तीन-चार बजे की. हमने खाड़कूओं को पहचान लिया. वे सब बस से नेपाल न जाकर, नेपाल बॉर्डर पर भारतीय सीमा में बसी आबादी की ओर चल दिये. जैसे ही वे लोग सूतिया नाले के पास (नेपाल सीमा पर) जंगल में पहुंचे हमने उन्हें रुकने के लिए आवाज दी. जवाब में उधर से उन्होंने नारेबाजी करके हम पर अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी.’

पहली बार देखे थे खाड़कू और साइनाइड कैप्सूल

‘रात भर दोनों ओर से हजारों गोलियां और हथगोले चले. तड़के करीब 5 बजे मौके पर 6 में से 4 खाड़कुओं की खून सनी और गोलियों से छलनी पड़ी लाशें देख लेने के बाद दिल को तसल्ली हुई. मन में आ रहा था कि चलो, धोखे से की गयी हजारा थाना इंचार्ज और पीएसी के जवानों की दिल दहला देने वाली मौत का बदला 7 महीने बाद ही सही, शान के साथ ले तो लिया.

sulkhan singh

यूपी के पूर्व डीजीपी सुलखान सिंह

खाड़कुओं के साथ हुई उस खूनी मुठभेड़ का लोहा, उस वक्त पीलीभीत के पुलिस अधीक्षक रहे पूर्व आईपीएस सुलखान सिंह (हाल ही में उत्तर प्रदेश पुलिस महानिदेशक पद से रिटायर हुए) आज तक मानते हैं. उस भोर में मैंने पहली बार जिंदगी में आतंकवादियों के गले में मौजूद साइनाइड कैप्सूल और खूनी खाड़कू देखे थे.’ बताते हैं पूर्व आईपीएस आर.के. चतुर्वेदी.

इसलिए वहां फूल-माला चढ़ी, अगरबत्ती जली मिली

‘उस मुठभेड़ के बाद पलिया सब-डिवीजन और लखीमपुर खीरी पुलिस की सूबे में तूती बोलने लगी थी. पब्लिक में इस उम्मीद का संचार होने लगा कि चलो थानों में सर-ए-शाम ताले जड़कर लाइटें बुझाकर और सड़कों पर कंबल ओढ़कर निकलने वाली पुलिस भी खूनी-खाड़कूओं को गोलियों से छलनी करने की कुव्वत रखती है. उस एतिहासिक एनकाउंटर से ठीक दो दिन पहले ही ओपी सिंह (उत्तर प्रदेश के मौजूदा पुलिस महानिदेशक और केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल के पूर्व निदेशक ओम प्रकाश सिंह) ने लखीमपुर खीरी के पुलिस अधीक्षक का कार्यभार ग्रहण किया था. उस एनकाउंटर के बाद मुझे (आरके चतुर्वेदी) सरकार ने 'वाई' कैटेगरी की सुरक्षा मुहैया कराई थी.’ बताते हैं पूर्व आईपीएस चतुर्वेदी.

उस एनकाउंटर के बाद हुई हैरतंगेज और दिलचस्प घटना का जिक्र करना नहीं भूलते हैं आर.के. चतुर्वेदी. बेबाकी से बताते हैं और खुलकर ठहाका मारकर हंसते हैं कि, ‘नेपाल बार्डर पर सूतिया नाले के करीब जंगल में जिस जगह हमने बब्बर खालसा के उन चारों खाड़कूओं को गोलियों से भून डाला था. उसी स्थान पर 10-15 दिन बाद कोई खाड़कू समर्थक सिरफिरा अगरबत्ती-धूपबत्ती जलाकर फूल-माला चढ़ा गया था. मैंने बाद में सुना था कि खाड़कूओं को मार डालने वाली पुलिस टीम और मुझको (आर.के. चतुर्वेदी को) 'ठिकाने' लगाने की कसम खाकर वो फूल-माला चढ़ाकर अगरबत्ती जलाई गयी थी. अभी तक तो मैं जिंदा हूं. पता नहीं मुझे ठिकाने लगाने की कसम खाने वाले कहां धक्के खा रहे हैं?’

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