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चंपारण: जिस आदमी ने गांधी की जान बचाई, देश और सिस्टम उसे भूल गया

चंपारण के नामपर गांधी को सब याद करते हैं मगर उनका साथ देने वाले लोग गुमनाम रह जाते हैं

Updated On: Apr 10, 2018 02:31 PM IST

Chandan Srivastawa Chandan Srivastawa
लेखक सामाजिक-सांस्कृतिक विषयों के शोधकर्ता और इन्क्लूसिव मीडिया फॉर चेंज के संस्थापक सदस्य हैं

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चंपारण: जिस आदमी ने गांधी की जान बचाई, देश और सिस्टम उसे भूल गया

‘हजार बार जमाना इधर से गुजरा है- नई नई सी है कुछ तेरी रहगुजर फिर भी-’ इतिहास का मामला कुछ ऐसा ही है- बहुत पुराना लेकिन एकदम नया! इतिहास की शाहराह से चाहे जितनी बार गुजरो, यादों की किसी ना किसी गली से गुजरना बाकी ही रह जाता है!

मिसाल के लिए ‘चंपारण-सत्याग्रह’ को ही याद करें. यह देश की आजादी की ‘संघर्ष-यात्रा’(राष्ट्रवादी इतिहास) में मील के एक पत्थर की तरह आता है. ‘मैं आया, मैंने देखा और मैंने जीत लिया’ कि तर्ज पर चंपारण में चले संघर्ष को एक अकेले गांधी की विजय-यात्रा के निर्णायक पड़ाव की तरह देखा जाता है. मान लिया जाता है कि चंपारण सत्याग्रह से इस देश की आजादी के लड़ाई ने जन-आंदोलन की शक्ल अख्तियार की और गांधी को आगे के लिए ‘सत्याग्रह’ (राजनीतिक मुक्ति के लिए सत्य और अहिंसा के प्रयोग) का कारगर हथियार मिला.

और ऐसा मानते हैं तो इसमें कोई बुराई भी नहीं. चंपारण-सत्याग्रह(1917) से पहले गांधी भारत वाले ‘महात्मा गांधी’ कम और दक्षिण अफ्रीका की रंगभेदी सरकार से पूरे बीस साल तक हिन्दुस्तानियों के हक के लिए जूझने वाले ‘बैरिस्टर गांधी’ ज्यादा थे. हिन्दुस्तान में चंपारण उनके सत्याग्रह की पहली जमीन बना. इसके बाद तो जैसे एक सिलसिला-सा बन गया.

याद कीजिए अहमदाबाद में मिल मालिकों के खिलाफ मजदूरों का संघर्ष या फिर खेडा के किसानों का सत्याग्रह. ये दोनों वाकये 1918 में पेश आए. फिर आया 1919 के अप्रैल का महीना- रॉलेट एक्ट के खिलाफ देशव्यापी आंदोलन चला. और फिर इसके बाद 1920-22 का असहयोग आंदोलन और खिलाफत-आंदोलन दौर. तो एक सिलसिला बनता है, चंपारण के सत्याग्रह के बाद जैसे इस देश की जमीन और जनता दोनों जाग गये थे.

नील की खेती से जुड़ी महिलाओं को संबोधित करते गांधी. फोटो सोर्स- द बेटर इंडिया

नील की खेती से जुड़ी महिलाओं को संबोधित करते गांधी. फोटो सोर्स- द बेटर इंडिया

लेकिन क्या चंपारण वाले सत्याग्रही गांधी को सिर्फ अकेले याद किया जा सकता है ? जो गांधी को याद करें तो बतक मियां को कैसे भुल जायें ? बतक मियां ना होते तो फिर चंपारण-सत्याग्रह वाले गांधी भी नहीं होते और जो चंपारण-सत्याग्रह वाले गांधी ना होते तो...?

हां, जिस अनहोनी को सोचकर आपका कलेजा कांप सकता है, उस अनहोनी से तब इस देश को बतक मियां ने बचाया था. बहुतों को शायद आश्चर्य होगा लेकिन गांधी को मारने की एक कोशिश बिहार में हुई थी, तब एक अंग्रेज ने मारना चाहा था उन्हें.

गांधी को मारने की साजिश

बात 1950 के दशक की है. तब डा. राजेन्द्र प्रसाद मोतिहारी(अविभाजित चंपारण का मुख्यालय) आए थे. मोतिहारी रेलवे स्टेशन पर देश के प्रथम राष्ट्रपति को देखने-सुनने के लिए हजारों की भीड़ जमा थी. ट्रेन से उतरते ही भीड़ के एक कोने से बहुत शोर-गुल उठा. राजेन्द्र प्रसाद की नजर भीड़ के उस कोने पर गई. देखा, एक बुजुर्ग आदमी उनकी तरफ आगे बढ़ने के लिए लोगों से गुत्मगुत्था हो रहा है. राजेन्द्र प्रसाद की आंखों ने पहचान लिया- ये बुजुर्ग कोई और नहीं बतक मियां ही थे.

अफ्रीका में गांधी की सफलता पर एक कार्टून साभार- गांधी दर्शन

अफ्रीका में गांधी की सफलता पर एक कार्टून साभार- गांधी दर्शन

उन्होंने बतक मियां को गले लगाया, हाथ पकड़कर मंच की तरफ ले गये और अपनी बगल की कुर्सी पर बैठाया. इसके बाद उन्होंने वहां जमा भीड़ को एक किस्सा सुनाया, वो किस्सा जिसके गवाह कभी वे खुद बने थे. राजेन्द्र प्रसाद ने लोगों को बताया कि बतक मियां चंपारण-सत्याग्रह के दिनों में एक अंग्रेज नीलहे की कोठी पर रसोईया थे और उस नीलहे अंग्रेज ने बतक मियां से कहा था कि गांधी को जहर देकर मार देना है. लेकिन बतक मियां ईमान के पक्के थे, अपना सबकुछ लुटाकर लेकिन गांधी की जान बचा ली थी.

इस किस्से की तफ्सील कुछ कुछ यों है कि अप्रैल की एक गर्म दुपहरिया में गांधी मुजफ्फरपुर से आने वाली ट्रेन से मोतिहारी रेलवे स्टेशन पहुंचे थे और पहुंचने के चंद दिनों के बाद एक नीलहे अंग्रेज इर्विन ने उन्हें अपनी कोठी पर दावत के लिए बुलाया. इर्विन ने अपने रसोईये बतक मियां को आदेश दिया कि गांधी को दूध के गिलास में जहर मिलाकर देना है. उसने बतक मियां को इस काम के लिए धमकी दी थी और लालच भी. बतक मियां ने गांधी को जहर मिले दूध का ग्लास दिया जरुर लेकिन इर्विन की जहर बुझी साजिश की सच्चाई भी गांधी और उनके साथ वहां मौजूद लोगों को सुना दी. अपनी साजिश के नाकाम होने से बौखलाये इर्विन ने बतक मियां को नौकरी से निकाल दिया. वे जेल भेज दिए गए. परिवार पर जुल्म हुआ, घर गिरा दिया गया. कहते हैं, दुर्दशा में जी रहे बतक मियां और उनके परिवार को उबारने के लिए राजेन्द्र प्रसाद ने जिले के कलेक्टर को आदेश दिया कि इन्हें 24 एकड़ जमीन दी जाय. और, आजाद भारत की एक सच्चाई यह भी है कि साल 2010 बतक मियां के परिवार जन को यह जमीन नहीं मिल पायी थी.

जब गांधी एक पत्रकार के घर गये

चंपारण-सत्याग्रह की राष्ट्रवादी कहानी से जैसे बतक मियां को भुलाया गया वैसे ही पीर मोहम्मद मूनिस को भी. सब जानते हैं, गांधी को चंपारण जाने के लिए राजी करने वाले राजकुमार शुक्ल थे. गांधी तो उस वक्त तक चंपारण का नाम तक ना जानते थे. राजकुमार शुक्ल ने मनाया था गांधी को नील की खेती करने वाले किसानों की विपदा सुनने के लिए चंपारण आने को. लेकिन कितनों को याद आता है कि चंपारण आने के लिए राजकुमार शुक्ल ने गांधी को जो चिट्ठियां लिखीं— वो सबकी सब पीर मोहम्मद मूनिस की लिखी थीं और चंपारण-सत्याग्रह के मशहूर होने से पहले नीलहे अंग्रेजी की ज्यादती के किस्से मंजर-ए-आम पर लाने का काम पीर मोहम्मद ‘मूनिस’ की कलम कर रही थी?

पीर मोहम्मद बेतिया राज इंग्लिश हाई स्कूल में शिक्षक थे. साथ में पत्रकारिता भी करते थे. अमर शहीद गणेश शंकर विद्यार्थी के साप्ताहिक अखबार ‘प्रताप’ से उसकी स्थापना(1913) के समय से जुड़ गये थे पीर मोहम्मद. इस अखबार के मार्फत अपने इलाके के किसानों की मुश्किल और उन पर हो रहे अत्याचार की कहानियां सुनाया करते थे. चंपारण-सत्याग्रह के दिनों में भी उन्हीं की कलम से इस इलाके की कहानियां ‘प्रताप’ में छपीं. इस एक्टिविस्ट पत्रकार को अंग्रेजी राज में खतरनाक माना गया. उन्हें नौकरी से निकाला गया. झूठे मुकदमे में फंसाया गया, दस महीने की जेल भी हुई. 1916 में लखनऊ में होने वाले कांग्रेस के वार्षिक सत्र में राजकुमार शुक्ल के साथ पीर मोहम्मद भी गए थे. दोनों ने इसी अधिवेशन में गांधी से भेंट की थी. चंपारण सत्याग्रह के दौरान गांधी पीर मोहम्मद मूनिस की मां से मिलने उनके घर पहुंचे थे. माना जाता है, किसी पत्रकार के घर गांधी की यह एकलौती यात्रा थी.

ब्रिटिश शेर को नमक डालकर पकाते गांधी का कार्टून

ब्रिटिश शेर को नमक डालकर पकाते गांधी का कार्टून

पीर मोहम्मद का सार्वजनिक जीवन चमकदार है. वे बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष चुने गये थे और 1921 से बिहार की प्रदेश कांग्रेस इकाई जुड़े रहे. चंपारण में किसानों और गन्ना मिलों के बीच बिचौलियों को हटाने की मांग उठी तो उन्होंने गन्ना किसानों की हिमायत की. बेतिया नगरपालिका के सफ़ाई कर्मचारियों हड़ताल(1937) में भी योगदान रहा. लेकिन, गांधी के ‘चंपारण-सत्याग्रह’ के सांचे ढले इतिहास के भीतर पीर मोहम्मद ‘मूनिस’ का जिक्र नहीं आता. सोचिए क्यों?

चंपारण-सत्याग्रह के किस्से में किसी किसान का नाम क्यों नहीं?

सौ साल बाद राष्ट्र बीती जिंदगी के पन्ने पलटकर अपने जाग उठने के एक लम्हे के तौर पर चंपारण-सत्याग्रह को देख-परख रहा है तो पीर मूनिस या फिर बतक मियां का नाम तो भूले-भटके फिर भी कहीं ना कहीं दर्ज हो रहा है लेकिन क्या हमें नील की खेती करने को मजबूर किए गए उन किसानों में से किसी का नाम याद आता है जिनकी पीठ पर लगान वसूली के नाम पर जमींदार के कारिन्दे और अंग्रेजी सरकार के अमले लाठी-डंडे बरसाते थे ?

नील के कुल 70 कारखाने थे चंपारण में उस वक्त. तो एक तरह से पूरा इलाका ही नीलहे कोठियों के हुक्म के घेरे में था. नील की खेती अंग्रेजों के लिए फायदेमंद थी और उन्होंने जमींदारी व्यवस्था का सहारा लेकर किसानों को नील की खेती के लिए मजबूर किया. जहां वे जमींदारी (लगान वसूली का अधिकार) हासिल नहीं कर पाते थे वहां बतौर ठेकेदार पट्टे पर जमीन ले लेते थे. अंग्रेज ठेकेदार के रुप में बरताव किसी जमींदार ही की तरह करते थे. चंपारण में बेतिया राज से ठेके पर कई गांवों की जमीन पट्टे पर ली थीं अंग्रेजों ने. तीनकठिया प्रणाली के तहत किसानों को जमीन के सबसे उपजाऊ हिस्से में नील उगाने के लिए मजबूर किया जाता था.

कपड़ों की रंगाई के लिए मिलों में नील की मांग बढ़ती जा रही थी और बढ़ती हुई मांग के हिसाब से नील की खेती करने वाले किसानों पर अंग्रेजों के जुल्म भी बढ़ रहे थे. इस बीच जर्मनी में सिथंटिक नील बन गया. भारत से निर्यात किए जाने वाले नील की कीमत  1894-95 के बीच 4.75 करोड़ रुपये से घटकर 2.96 करोड़ रुपये पर आ गई. और, इसका भार एक बार फिर से चंपारण के किसानों पर लादा गया. लगान 50-60 फीसद बढ़ा दी गई- इसे शरहबेशी कहा गया.

नील के दाम गिर गये थे, किसान इसकी खेती नहीं करना चाहते थे. अंग्रेजों ने इसका भी तोड़ निकाला. कहा, नील की खेती छोड़कर दूसरी फसलों की खेती करना चाहते हो तो ‘तवाना’ देना होगा. ‘तवाना’ को तौर पर वसूली जाने वाली रकम इतनी ज्यादा थी कि किसानों को कर्ज लेना पड़ता था और कर्ज की मूल रकम चुकाने की बात तो छोड़ दें, 12 प्रतिशत की दर से लगने वाले सूद को चुकाने में ही उनकी गृहस्थी खत्म हो जाती थी.

किसानी की लूट का एक और तरीका था- ‘जिरात.’ इसके अंतर्गत किसानों को नील की फैक्ट्री की मिल्कियत वाली खेती की जमीन दी जाती थी और उसपर ऊंचे दर से लगान वसूली जाती थी. किसान ऐसी जमीन को लेने से इनकार नहीं कर सकता था, इनकार की सूरत में उसका किसानी का उसका हक छीन लिया जाता था.पहले विश्वयुद्ध की शुरुआत के बाद(1914) जर्मनी के सिंथेटिक नील की मांग कम पड़ने से भारत से होने वाले नील के उत्पादन ने फिर जोर पकड़ा. चंपारण के किसानों पर जुल्म और बढ़े. उनसे अब बेगारी भी करवायी जाने लगी.

gandhi in champaran

गांधी के चंपारण पहुंचने पर उनके साथी के रुप में जुल्म के मारे ऐसे कई किसानों का बयान खुद डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने कलमबंद किया था. ऐसे एक किसान-परिवार की विधवा(पति दुधई राय) मुसमात झुनिया(उम्र अस्सी वर्ष) का बयान इतिहासकार शाहिद अमीन ने इंडियन एक्सप्रेस में छपे एक लेख में दर्ज किया है. झुनिया के परिवार को पहले 16 रुपये का लगान देना पड़ता था जिसे बढ़ाकर(शरहबेशी) 26 रुपया कर दिया गया था.

झुनिया के बयान(भोजपुरी) का हिन्दी अनुवाद कुछ यों होगा : . “मैंने लगान की मूल रकम (16 रुपये) कोर्ट में जमा करवा दी थी. मेरा एक लड़का है जो कुछ कमअक्ल है. लेकिन कोठी ने मेरे ऊपर दावा ठोंक दिया. मामले पर अभी सुनवाई चलनी बाकी है लेकिन फैक्ट्री के कारिन्दे रामजी राय और कुछ और लोग मेरे घर आए और हमसे दही और घी देने को कहा. उनके साथ गारद(सिपाही) भी थे. उन लोगों ने मेरे बेटे को मारा और उसकी छाती पर हेंगा(खेती की जुताई में प्रयुक्त लकड़ी का एक पट्टा) रखकर दबाने लगे.

मैं उनके सामने रो पड़ी और उनके सामने 27 रुपये निकालकर रख दिए. मैंने अपनी जमीन मटुक सिंह को बेची जिसने वो रकम कोठी को दे दी. मैंने(जमीन) 49 रुपये में बेची थी. मेरे हिस्से में 27 रुपये आए, इसमें भी मुझे मिले 24 रुपये ही. बाकी के तीन रुपये सिपाही डकार गये. साधुशरण लाल(गांव का पटवारी) ने कोर्ट में जमा पैसों की रसीद मुझसे ले ली.”.( याद रहे, 26 रुपये की रकम तब बहुत बड़ी होती थी. इस तथ्य से हिसाब लगाइए कि गांधी को चंपारण आने का न्यौता देने वाले राजकुमार शुक्ल उन दिनों कर्ज के अपने धंधे से सालाना 1610 रुपये का ब्याज कमाते थे जो आज की तारीख में 4 लाख रुपये के बराबर है.)

दुधई राय की विधवा झुनिया की तरह चंपारण में नीलहों के अत्याचार के शिकार लाखों थे. कहर इन्हीं पर टूटती थी, आशियाना इन्हीं का उजड़ता था. चंपारण के सत्याग्रह में इन्हीं अनाम किसानों के बयान कलमबंद हुए और गांधी की आवाज पर ये ही किसान एकबारगी अपना भय छोड़कर ‘अंग्रेजी राज’ के खिलाफ खड़े हो गए. लेकिन इन किसानों की रामकहानी ना तो गांधी की आत्मकथा में आती है और ना ही राजेन्द्र प्रसाद के.

कोई बतक मियां की तरह होता है- वह अपना सबकुछ लुटाकर भी ईमान पर कायम रहता है. कोई पीर मोहम्मद मूनीस की तरह होता है, वह जनता पर ढाए जा रहे जुल्म से दुनिया को बेखौफ होकर आगाह करता है. कोई राजकुमार शुक्ल की तरह होता है- वह सोचता तो अपने हित की है लेकिन ये भी जानता है कि लोगों का हित साधे बगैर अपना हित नहीं सध सकता. इन सबके बीच होते हैं लाखों अनाम लोग जिनकी जुल्म की मार से उघड़ती जा रही चमड़ी से हमेशा एक ‘आह’ निकलती है—और जब ये सारी चीजें मिल जाती हैं तो ‘गांधी’ के आने से एक आंधी उठती है. फिर उस बवंडर में तख्त और ताज के सारी बनावटें बदल जाती हैं. चंपारण-सत्याग्रह इन सबकी कथा है- एक अकेले गांधी की कथा नहीं. भोजपुरी अंचल में यों ही नहीं कहा जाता आज भी कि- थोड़ कईलें गांधी जी- बहुत कईलें लोगवा.

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