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क्लाइमेट चेंज के लिए कार्बन डाइऑक्साइड से ज्यादा खतरनाक है मीथेन

हमेशा से कार्बन डाइऑक्साइड को क्लाइमेट चेंज का महत्वपूर्ण कारक या कहें मुख्य खलनायक कहा जाता है लेकिन उससे कहीं ज्यादा घातक मीथेन गैस की चर्चा बहुत कम होती है

Updated On: Mar 01, 2018 10:00 AM IST

Maneka Gandhi Maneka Gandhi

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क्लाइमेट चेंज के लिए कार्बन डाइऑक्साइड से ज्यादा खतरनाक है मीथेन

हमेशा से कार्बन डाइऑक्साइड को क्लाइमेट चेंज का महत्वपूर्ण कारक या कहें मुख्य खलनायक कहा जाता है लेकिन उससे कहीं ज्यादा घातक मीथेन गैस की चर्चा बहुत कम होती है. संयुक्त राष्ट्र के क्लाइमेट चेंज के इंटरगवर्नमेंटल पैनल के अनुमान के मुताबिक ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में लगभग 16 फीसदी हिस्सा केवल मीथेन का होता है. हालांकि उत्सर्जित गैसों में कम हिस्सा होने बावजूद मीथेन क्लाइमेट चेंज के लिए बहुत खतरनाक होता है.

मीथेन एक सुपर इंसुलेटिंग गैस है जो की धरती को कार्बन डाइऑक्साइड की अपेक्षा अधिक गर्म करता है. ये सूर्य की रेडियोएक्टिव ताकतों को कार्बन डाइ ऑक्साइड के मुकाबले बहुत शक्तिशाली तरीके से खींच कर वायुमंडल  को गर्म करता है. वैज्ञानिकों ने हिसाब लगाया है कि इसकी ग्लोबल वार्मिंग क्षमता कार्बन डाइ ऑक्साइड से 28 गुनी ज्यादा है.

कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन 2013 से अब तक नहीं बढ़ा है इसके बावजूद 2017 में तापमान में 1 प्रतिशत की बढ़ोतरी रिकॉर्ड की गई है. इसके पीछे कारण है मीथेन के उत्सर्जन में जबरदस्त उछाल. वायुमंडल में मीथेन की सघनता प्रति वर्ष 0.5 पीपीबी (पार्ट प्रति बिलियन ) की दर से बढ़ रही है. 2007 से मीथेन उत्सर्जन तेजी से बढ़ना शुरू हुआ और हाल के दिनों में तो ये प्रतिवर्ष 9.9 पीपीबी से बढ़ कर 12.5 पीपीबी तक पहुंच गई है.

प्रतीकात्मक तस्वीर

प्रतीकात्मक तस्वीर

मीथेन का उत्पादन फैक्टरियों या कारों से नहीं होता है. ये उत्पन्न होता है मांस खाने वालों से. मांस और दूध देने वाले जानवर इसके मुख्य उत्पादक होते है. चिकन, गाय, बकरियां, भेड़, सूअर जैसे पौधे और पत्तियां खाने वाले जानवर गैस और डकार के रूप में मीथेन गैस उत्सर्जित करते हैं. जर्नल ऑफ एनिमल साइंस के मुताबिक गायें प्रतिदिन 250 से 500 लीटर मीथेन गैस वायुमंडल में उत्सर्जित करती हैं, जो बहुत ज्यादा है.

प्रतिवर्ष इंसानों द्वारा मारे जाने वाले जानवरों की संख्या में लगातार इजाफा होता जा रहा है. 2017 में 70 बिलियन जानवरों को खाने के लिए मार डाला गया. मीट और दूध के लिए बड़ी संख्या में पशुओं को पाला पोसा जा रहा है जिससे मीथेन गैस का उत्पादन लगातार बढ़ रहा है. हाल के दिनों में लगाए गए एक अनुमान के मुताबिक केवल पशुधन उद्योग से एक वर्ष में इतना मीथेन का उत्पादन होता है जो 2.2 बिलियन टन कार्बन डाइ ऑक्साइड के बराबर है. भारत,चीन और ब्राज़ील तीनों देश मीट और डेरी के सबसे बड़े उत्पादक है. ब्राज़ील और भारत तो पूरे विश्व के तीन सबसे बड़े बीफ उत्पादक देशों में शामिल हैं. भारत तो पूरे विश्व में दूध का सबसे उत्पादक भी है. भारत में इतना दूध का उत्पादन होता है जितना पूरे यूरोपियन यूनियन के देशों को मिलाकर भी नहीं होता. हम तीनों देश वायुमंडल में उत्सर्जित किये जाने वाले कुल मीथेन का 70 फीसदी उत्पादन करते हैं. ( कोयला और चावल मीथेन उत्पादन करनेवाले अन्य कारक हैं और भारत और चीन दोनों इसके उत्पादन में अग्रणी हैं ). हम जानते हैं कि जानवरों की बढ़ती संख्या हमारी धरती को नुकसान पहुंचा रही है. आप यहां मीट खाइए और उधर सुनामी फिलीपीन्स को तबाह करे. आप यहां मीट खाइए और चक्रवात श्रीलंका या तमिलनाडु में कहर बरपाए. इनमें आपसी संबंध तो ढूंढना ही पड़ेगा. लेकिन मैं एक बार फिर से इस लेख के मुख्य बिंदु पर वापस आती हूं. जानवरों की बढ़ती संख्या मीथेन उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार है ही उसके साथ साथ एक और वजह है मीथेन उत्पादन की और वो है जानवरों का एंटीबायोटिक्स निकालना.

अधिकतर मीट या दूध उत्पादन करने वाले जानवरों को बड़े-बड़े फैक्ट्री फार्म्स में बड़ा किया जाता है. आप उसे डेरी या पशुफार्म कहते हैं लेकिन ये कैदखाने से कम नहीं है जहां जानवरों को बंदी बना कर रखा जाता है. यहां जानवरों को क्षमता से अधिक रखा जाता है उन्हें घटिया खाना दिया जाता है और यहां तक कि उनके साथ हिंसक व्यवहार भी किया जाता है.

नतीजा ये होता है कि इनमें से अधिकतर चिकन से लेकर पशु तक बीमार रहते हैं. पशुधन उद्योग हर साल बढ़ रहा है और उसी तरह से उससे ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाने के लिए अत्याधुनिक तकनीक का सहारा लिया जा रहा है. पशुओं को लगातार एंटीबायोटिक्स दिया जाना अब सामान्य बात हो गई है, खास करके टेट्रासाइक्लिन जो उन्हें जल्दी बड़ा होने और अधिक वजन पाने में सहायता प्रदान करती है और साथ ही उनके रख रखाव के दौरान हुई बीमारियों की गंभीरता को कम करती है. विश्व का 80 प्रतिशत एंटीबायोटिक्स पशुधनों को खिलाया जाता है.

इससे कई समस्याएं खड़ी हो रही हैं. इसके लगातार इस्तेमाल से जानवरों में एंटीबायोटिक्स प्रतिरोधक उत्पन्न हो रहा है और उन जानवरों का मीट और डेरी उत्पाद खाने से मनुष्यों में भी ऐसा ही हो रहा है. लेकिन मेरा इस आर्टिकल को लिखने का मकसद दूसरा है. मेरी चर्चा में एंटीबायोटिक्स का उल्लेख इसलिए है क्योंकि इसके इस्तेमाल से पशुओं में मीथेन उत्सर्जन बढ़ता जा रहा है.    कोलोराडो विश्वविद्यालय में एक रिसर्च में पता चला है जानवरों को एंटीबायोटिक्स ट्रीटमेंट दिए जाने के बाद उनमें मीथेन उत्सर्जन की क्षमता दोगुनी बढ़ गई है. जैसे मान लीजिए की एक गाय का मीथेन उत्सर्जन 500 लीटर है तो उसको एंटीबायोटिक्स खिलाने के बाद उसका मीथेन उत्सर्जन बढ़ कर 1000 लीटर प्रति दिन हो जाएगा. रिसर्च में पता चला कि टेट्रासाइक्लिन एंटीबायोटिक के प्रयोग से गाय के पेट में प्राकृतिक बैक्टीरिया न केवल कम हो गया बल्कि उसने मीथेन उत्पादन करने वाले मेथानोजनिक जीवाणु बनाना शुरू कर दिया.

टेट्रासाइक्लिन के ट्रीटमेंट वाले गायों और साधारण गायों के गोबर में अलग अलग परिणाम देखने को मिले, एंटीबायोटिक्स खाने वाले गायों के गोबर में एंटीबायोटिक्स नहीं खाए हुए गायों की तुलना में 50-80 प्रतिशत तक ज्यादा मीथेन पाया गया. एंटीबायोटिक्स का सेवन किए गायों के डकार और गोबर दोनों में मीथेन की मात्रा ज्यादा पाई गई.

एक तरफ तो हम मीथेन के उत्पादन को कम करने के लिए नवीन ऊर्जा के स्रोतों को बढ़ावा दे रहे हैं, ऊर्जा क्षमता को बढ़ावा देने वाले उपकरणों को प्रोत्साहित कर रहे हैं, नेचुरल गैस लीक को रोकने और कोयले पर की निर्भरता को कम करने में जुटे हैं. वहीं दूसरी तरफ हम पशुओं को लगातार भारी मात्रा में एंटीबायोटिक्स खिला कर उनकी मीथेन उत्सर्जन क्षमता को बढ़ावा दे रहे हैं. पूरे विश्व में1.4 बिलियन गायों को केवल मनुष्यों के खाने के लिए पाला जा रहा है. कृषि के लिए जानवरों जिनकी संख्या 10 बिलियन से ज्यादा है वो ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में अब 20 फीसदी का योगदान करते हैं.

न्यूजीलैंड में करोड़ों डॉलर केवल इस शोध पर खर्च किए जा रहे हैं कि किस तरह से एक वैक्सीन से पशुओं में डकार आना कम किया जा सके. जर्मनी के वैज्ञानिक अनुवांशिक रूप से संशोधित एक ऐसी गाय का प्रजनन कर रहे हैं जो कि कम मीथेन उत्सर्जित करे. इन सबसे आसान है कि क्यों नहीं हम पशुओं को अच्छे से रखे उन्हें ठीक से खाना दें जिससे कि उन्हें एंटीबायोटिक्स देने की नौबत ही नहीं आए. इस उपाय से मीथेन उत्सर्जन में सीधे 50 फीसदी तक कटौती हो जाएगी.

समस्या ये है कि आज मीट और डेरी उद्योग वाले व्यवसायी केवल अपना मुनाफा बढ़ाना चाहते हैं. ये जानवरों के अच्छे रख रखाव पर खर्च कम और घटिया एंटीबायोटिक्स पर ज्यादा खर्च करना चाहते हैं जिससे उन्हें मारने से पहले ज्यादा कमाने के लिए जिंदा रखा जाये. ये लोग उन गायों में पैसा लगाने में ज्यादा भरोसा रखते है जो अनुवांशिक रूप से संशोधित होते हैं और बड़े और मोटे ताजे होते हैं.

प्रतीकात्मक तस्वीर

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2006 के संयुक्त राष्ट्र के एक रिपोर्ट में इशारा किया गया है कि कार और ट्रक के संयुक्त उत्पादन से उतना ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन नहीं होगा जितना पशुओं के पालने पर होगा.

समस्या की जड़ ये है कि हमने लगभग एक शताब्दी से उद्योगपतियों को जानवरों के प्रति अति क्रूरता बरतने की छूट दे रखी है जाहिर है अगर आप कर्म में विश्वास रखते हैं तो ये समस्या एक दिन आपको भी प्रभावित करना शुरू कर देगी.

जानवरों के पालन पोषण में एंटीबायोटिक्स के इस्तेमाल पर रोक मीथेन के उत्पादन में कमी लाएगा. लेकिन ये तभी संभव है जब पशुओं को अच्छे से रखा जाएगा, उन्हें अच्छा खाना दिया जाएगा, उन्हें स्वस्थ्य रखा जाएगा और खुले में विचरण करने दिया जाएगा. सबसे अच्छा तरीका है मीथेन कम करने का है कि मीट खाना बंद कर दिया जाए ऐसे में अगर मांग में कमी आएगी तो आपूर्ति में भी कमी आएगी.

वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड के मुकाबले मीथेन कम देर तक ठहरता है ऐसे में अगर हम इसका उत्सर्जन बंद कर दें तो ये 4-9 सालों में हमारे वायुमंडल से गायब हो जाएगा और ग्लोबल वार्मिंग रुक जाएगी. लेकिन ये सब निर्भर करता है कि आप खाते क्या हैं और अपने जीवन की कितनी चिंता करते हैं.

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