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एक खिड़की जो आपको रूमानियत की दुनिया में ले जाती है

दिव्या के इस संग्रह की कहानियों को भुलाना किसी के लिए भी आसान नहीं हो सकता.

Updated On: Jul 27, 2018 07:24 AM IST

Gopal Shukla

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एक खिड़की जो आपको रूमानियत की दुनिया में ले जाती है

हिन्दी आलोचकों और वरिष्ठ साहित्यकारों की अक्सर ये शिकायत रहती है कि युवा कथाकारों के पास न अच्छी भाषा है और न ही शिल्प. और विचार तो उनके पास हैं ही नहीं. वो केवल अपने या उधार के अनुभवों को नैरेटिव्स में लिखने को ही लेखन मान लेते हैं. वो अनुभवों को जस का तस लिखना ही बहुत बड़ी काबिलियत मान लेते हैं. उनके लिए यही पूंजी है. उनकी दुनिया बाहरी दुनिया ही है.

वे कभी अंतर्मन की सैर करना और कराना नहीं चाहते. लेकिन युवा कहानीकार दिव्या विजय इस भीड़ से अलग खड़ी कहानीकार हैं. वे कहानी की नई खिड़कियां खोलती हैं. एक खिड़की आपको रूमानियत की दुनिया में ले जाती है (प्रेम पथ ऐसो कठिन, मन के भीतर एक समुद्र रहता है, फिसलते फ़ासलों की रेत घड़ी) तो दूसरी खिड़की आपको फैन्टेसी यानी बनफ़्शई ख्वाबों की दुनिया में ले जाती है. एक तीसरी खिड़की (प्यार का कीमिया) भी है, जो प्रेम के दैहिक और आध्यात्मिक रूप से आपको मिलवाती है.

बिट्टो कहानी मासूमियत की दुनिया आपके सामने खोलती है, दिव्या की हर कहानी में एक अलग रोमांचकारी दुनिया है. 'अलग़ोज़े की धुन पर' उनका पहला कहानी संग्रह राजपाल एंड सन्स ने प्रकाशित किया है. संग्रह में केवल दस कहानियां ही हैं लेकिन आश्चर्यजनक रुप से ये सभी कहानियां उस दुनिया की कहानियां हैं जो हमारे भीतर बसती हैं. जिसमें कल्पनालोक की रूमानियत है तो यथार्थ भी अपने ठोस स्वरूप में मौजूद है. दिव्या उंगली पकड़कर आपको अपनी कहानियों की दुनिया में ले जाती हैं, एकदम सहज भाव से.

पहली ही कहानी 'अलग़ोज़े की धुन पर' में एक पत्नी अपने पति की पूर्व प्रेमिका से मिलती है. पत्नी दरअसल प्रेमिका से वो सब ले लेना चाहती है या सीख लेना चाहती है जिसकी वजह से उसका पति उससे प्यार करता था. ये पत्नी के जरिए पति के अकेलेपन और पहली प्रेमिका को न भूल पाने की कहानी है. कहानी के अंत में पत्नी कहती है, तुम्हारा स्वाद अब मुझमें घुल गया है, तुम्हें अपने अंदर समेटे ले जा रही हूं. कबीर के मन में एकांत अब शायद उतना अकेला न रहे। ये कहानी स्त्रीमन की कई परतें खोलती है...बेहद नफीस और मासूम सी लेकिन बड़ी कहानी.

एक अन्य कहानी नज़राना-ए-शिकस्त में एक स्त्री की लाश की शिनाख्त करने उसका पति शवगृह पहुंचता है. मर गई स्त्री अपनी कहानी कहती है. कैसे उनका विवाह हुआ, कैसे उसका पति उसे उतनी ही आज़ादी देता जिससे उसका पौरुष संतुष्ट होता रहे. पति की मर्जी से ही उसे कपड़े पहनने पड़ते और प्यार करना पड़ता. पति को पता चलता है कि जब एक्सीडेंट हुआ तो उसकी पत्नी के साथ एक पुरुष भी था. वो सकते में आ जाता है. उसे लगता है कि उसकी पत्नी चरित्रहीन भी थी.

दूसरे पुरुषों के साथ गुलछर्रे उड़ाया करती थी. मृत औरत बताती है कि वो पहली बार रेल देखने गई थी. वहां बेहोश हो गई और एक व्यक्ति उसे अस्पताल पहुंचाने के लिए उसे अपनी गाड़ी में लेकर अस्पताल जा रहा था कि तभी रास्ते में हादसा हो गया और दोनों मर गए, लेकिन मृत औरत ये बात अपने पति को नहीं बताती. पति को शिकस्त खाए इंसान के रूप में देखकर उसके चेहरे पर एक मुस्कान आ जाती है और स्थिर हो जाती है. स्त्री विमर्श उनकी कहानियों में सहज रूप से आ जाता है. वो इसे निकालकर अलग नहीं करतीं.

'प्यार की कीमिया' में एलफ्रेड और क्लारा के माध्यम से दिव्या प्रेम को नई ऊचाइंयों पर ले जाती हैं, तो प्रेम पथ ऐसो कठिन में नायिका चार पुरुषों से प्रेम करती है. ये कहानी बोल्ड होते हुए भी परंपरागत लगती है. लेकिन खूबसूरत कहानी है. दिव्या की कहानी पढ़कर लगता है कि पता नहीं लेखिका के मन में कितनी खूबसूरत दुनिया बसती है और पाठक इस दुनिया में भ्रमण करने के लोभ से खुद को नहीं बचा पाता. बेशक उनकी कहानियों में सामाजिक और राजनैतिक टिप्पणियां नहीं हैं लेकिन वो इंसानी रिश्तों की कहानियां हैं. वो प्रेम की कहानियां हैं.

लेकिन कहीं कहीं दिव्या की कहानियों में नाटकीयता भी मौजूद है. एक जादूगर का पतन कहानी काफी हद तक फिल्मी हो जाती है लेकिन वो कहानी को वहीं पहुंचाती हैं, जहां कहानी पहुंच सकती है. नए मिजाज की कहानियां लिखने वाली दिव्या कई कहानियों में परंपरागत नजर आती हैं. तो प्रेम पथ ऐसो कठिन में चार पुरुषों से प्रेम करने वाली एक ऐसी लड़की की कहानी भी लिखती हैं जिसमें जब फैसले की घड़ी आती है तो नायिका को द्रौपदी नजर आती है.

यही बात कहानी को थोड़ा कमजोर कर देती है. लेकिन दिव्या अभी युवा हैं और कहानियों की दुनिया में उन्हें अभी लम्बा सफर तय करना है और अच्छी बात है कि परंपरागत होते हुए भी उनकी भाषा और शिल्प अपना रास्ता खुद तय कर लेते हैं. ऐसे प्रयोग और लीक से हटकर सोचने की उनकी कोशिश आने वाले दिनों में उन्हें कहानीकारों की जमात में एक अलग मुकाम दिला सकती है. दिव्या के इस संग्रह की कहानियों को भुलाना किसी के लिए भी आसान नहीं हो सकता.

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