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बॉम्बे बार: 'बीमार मानसिकता वाले मर्दों के अस्पताल की भटकती रूहें'

बार बालाओं की जिंदगी में उससे कहीं ज्यादा परतें हैं जितनी फिल्मों में दिखती हैं

Arun Tiwari Arun Tiwari Updated On: Mar 10, 2018 03:37 PM IST

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बॉम्बे बार: 'बीमार मानसिकता वाले मर्दों के अस्पताल की भटकती रूहें'

अमिताभ बच्चन जैसा दिखने वाला वह युवक मोटरसाइकिल से रेशमा के घर के चक्कर लगाया करता था. नाम बताया था सागर खान. रेशमा ने शायद उसके व्यक्तित्व में अपनी जिंदगी का महानायक देख लिया और उसकी मुहब्बत में गिरफ़्तार हो गई. मिलने जुलने और इजहार-ओ-इकरार के साथ यह खबर जब रेशमा के घर तक पहुंची तो कोहराम मच गया. लेकिन रेशमा घर से मार खाकर भी जब उससे छुपकर मिलती और वह रेशमा का हाथ पकड़ता तो उसे लगता कि 'खुदा ने सहारा दे दिया हो'.

...और एक दिन रेशमा अपने सपनों के इस 'अमिताभ बच्चन' के साथ भाग गई. मुंबई पहुंचकर निकाह पढ़वाया गया. लेकिन सागर शादी की रात और भलामानुस बन गया, यह कहकर कि 'चंद दिनों में घर लौटेंगे, अम्मी अब्बू की रजामंदी से निकाह करेंगे और फिर सुहागरात मनाएंगे.' रेशमा की नींद उस दिन खुली जब सागर खान ने 'नथ उतराई' के बदले उसे 40 हजार में बेच दिया.

तब रेशमा को पता चला कि वह जो उसका अमिताभ बच्चन यानी सागर खान था, वह दरअसल अनवर है, जिसने प्रेम की हथकड़ी पहनाकर उसे मुंबई पहुंचाया और वेश्यावृत्ति की नारकीय अंधेरी कोठरी में कैद कर दिया.

रेशमा अपने जिस्म को साफ कर लेती, लेकिन रूह पर मैल की परत उतनी ही घनी होती जाती. एक आशिक रेशमा को बेच गया तो कुछ दिन की गलाजत के बाद दूसरे ने उसे वेश्यावृत्ति से निकाल कर एक चमकदार बंगले में कैद कर गया. कैद करने वाले की दुर्घटनावश हुई मौत ने रेशमा को आजाद किया तो वह डांसबार पहुंच गई. डांस बार ने उसकी खाली जिंदगी में इतना किया कि तिजोरी भर दी. पैसों से मालामाल रेशमा कानपुर आई तो परिवार उजड़ चुका था. उसकी 'मुहब्बत' का सदमा वालिदैन को निगल गया और भाई-बहन शहर छोड़ छूमंतर हो गए. भरी तिजोरी वाली रेशमा की खाली रूह वापस मुंबई लौट गई.

बकौल रेशमा, 'तब से तीन रूहें भटक रही हैं; दो अम्मी अब्बू की और एक जिंदा लाश के रूप में रेशमा की.'

मुंबई की चमकदार दुनिया की तंग अंधेरी गलियों में ऐसी तमाम रेशम रूहें भटक रही हैं. कोई लाकर बेच दी गईं, कोई रोजगार के लिए आई थी, जो बार डांसर बनकर रह गई. कोई अभिनय करने आई थी और जिंदगी के स्टेज पर उलझकर रह गई. कोई डांसर बनने आई थी और अपराध जगत के मायाजाल ने उन्हें धंधे पर बैठने को मजबूर कर दिया.

जिस्मानी नुमाइश की इस चमकदार दुनिया में रंगीले नोटों के ढेर हैं. वह ढेर दरअसल ऐसे दलदल हैं कि जिसने पांव रखा, वह धंसता गया. किसी का घुटना भर फंसा तो कोई गर्दन तक पैंसों के दलदल में डूबता गया. किसी को दंगों से उजड़े परिवार की बेबसी वहां तक खींच कर ले गई तो किसी को पैसा कमाकर मां बाप और परिवार का सहारा बनने मजबूरी. नेताओं, क्रिकेटरों और सटोरियों जैसे रसूखदार लोगों के साथ मिलकर करोड़ों का वारा-न्यारा करने वाली तरन्नुम जैसी बार बालाएं रहीं, तो झुग्गी में जीवन निर्वाह करने वाली सना खान भी. कोई रेशमा अपने बार बार बेचे और खरीदे जाने से लाश में बदल गई है तो कोई सना खान अपनी मर्जी से अपने किन्नर जीवन में नाच और मान सम्मान पाकर खुश है जिसपर कभी किसी ने जिस्मफरोशी का दबाव नहीं डाला.

विवेक अग्रवाल की किताब 'बॉम्बे बार' बार बालाओं की कहानियों के स्टीरियो टाइप से आगे की कहानी कहती है

विवेक अग्रवाल की किताब 'बॉम्बे बार' बार बालाओं की कहानियों के स्टीरियो टाइप से आगे की बात कहती है

ऐसी ही कुछ बारबालाओं की कहानियों को तफ्सील से पत्रकार विवेक अग्रवाल ने अपनी किताब 'बॉम्बे बार: चिटके तो फटके' में संकलित की हैं. राधाकृष्ण प्रकाशन से छपी इस किताब में शामिल यह सभी कहानियां विवेक अग्रवाल के पत्रकार की खोज हैं जिसपर उन्होंने काफी रिसर्च किया और आंखों से देखा है. झकझोरने वाली यह बार कथाएं उस अनभिज्ञ और अनजानी दुनिया की परतें खोलती हैं जिससे आम जनमानस सर्वथा दूर है और कभी कभार कुछ रिपोर्ट या फिल्म के जरिये आधी अधूरी जानकारी जुटाता है.

जिस्म की नुमाइश पर नोट बरसाने वाली इस दुनिया में भटकती हर आत्मा की अंतिम परिणति यही है कि रुपये बटोरते हुए जिंदगी का सहारा खोजने का सिलसिला जवानी की ढलान पर रुकता है जहां जिंदगी यह सबक देती है कि 'अगर गुनाहों की मुआफी होती तो सारी मस्जिदें वीरान हो जातीं'.

यह तिजारत की दुनिया भले ही सैकड़ों युवतियों को एक सामान्य जिंदगी से महरूम कर दे, उनका ताउम्र के लिए सौदा कर दे, लेकिन बार बार चोट खाई हुई ऐसी रूहें भी जिंदा हैं जो दूसरे को जख्म देने से बचती हैं. रेशमा ढल चुकी उम्र में अब नयी लड़कियों को डांस बार में काम दिलाती हैं लेकिन किसी को जबरन या धोखा लेकर लाने की हामी नहीं हैं. रिंकी पिंकी जैसी बहनें हैं जो धंधे पर बैठने से इनकार करती हैं और अधूरी लड़ाई लड़ते हुए गिरोहबाजों से शिकस्त खाकर अपने गांव लौट जाती हैं. दूसरी तरफ, शर्वरी सोनावणे जैसी डांसर हैं जो लड़कियों को विदेशों में बेचने के गिरोह के खिलाफ मोर्चा भी खोल देती हैं.

विवेक अग्रवाल की 143 पेज की यह किताब उस मुबंई की अंधेरी दुनिया की तरफ ऐसा झरोखा खोलती है जहां से आप यह देख सकते हैं कि चमक दमक से घिरी हुई जिंदगियां घुप्प अंधेरे में कैसे अपने टूटे हुए ख्वाबों की किरचें समेटते हुए, कितनी सांसत में सांस लेती हैं.

जिंदगी का ऐसा कठिन संघर्ष बयान करने वाली और किताबों की जरूरत है, जैसी विवेक अग्रवाल ने लिखी है. किताब के लिंक के लिए यहां क्लिक करें.

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