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बुक रिव्यू: देश की जमीनी हकीकत समझने में मददगार है ज्यां द्रेज की ये किताब

भारत के शिक्षा, स्वास्थ्य, इन क्षेत्रों में दलितों की स्थिति, रोजगार, मनरेगा, भोजन के अधिकार, आदिवासी, नक्सलवादी, इन सभी क्षेत्रों में महिलाओं की स्थिति की बहुत ही गहराई से पड़ताल करती है

Updated On: Apr 08, 2018 10:17 AM IST

Anand Dutta
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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बुक रिव्यू: देश की जमीनी हकीकत समझने में मददगार है ज्यां द्रेज की ये किताब

भारतीय नीतियों का सामाजिक पक्ष

संपादक- ज्यां द्रेज,

सह संपादक- कमल नयन चौबे

कुल 496 पेज की यह किताब. भारत के शिक्षा, स्वास्थ्य, इन क्षेत्रों में दलितों की स्थिति, रोजगार, मनरेगा, भोजन के अधिकार, आदिवासी, नक्सलवादी, इन सभी क्षेत्रों में महिलाओं की स्थिति की बहुत ही गहराई से पड़ताल करती है. ये दीगर है कि यह किताब प्रसिद्ध मैग्जीन इकोनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली (EPW) में छपे पिछले कुछ सालों के लेखों का संग्रह है. इसमें रामचंद्र गुहा, ज्यां द्रेज, सुधा नारायणन, रितिका खेड़ा, गीता सेन, मिहिर शाह जैसों का शोधपरक और जमीन पर जाकर किए गए अध्ययनों को एक जगह रखा गया है.

इस किताब को पढ़ना आखिर क्यों जरूरी है?

अगर भारत के विकास या उसके रफ्तार की बात करें तो हमेशा से सबसे अधिक परेशानी या धीमी गति से बढ़ रहे सेक्टरों में शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और समाज में महिलाओं, दलितों और आदिवासियों की स्थिति के मामले में रही है. बहुत ही करीने से राजस्थान, बिहार, बंगाल, झारखंड, ओडिशा, यूपी में जाकर इसकी जमीनी पड़ताल की गई है. अगर नीति निर्माता, पत्रकार, या फिर देश को समझने की चाह रखनेवाले छात्र-आम जन ऊपरोक्त सभी मुद्दों को गहराई तक जाकर समझना चाहते हैं तो यह किताब घर बैठे बेहतर समझ विकसित कर सकती है.

दूसरी बात- अक्सर मेन स्ट्रीम मीडिया साल में एकाध बार या राजनीतिक रूप से प्रभाव न छोड़नेवाले वक्त को छोड़ दें तो इन मुद्दों की पड़ताल उसके एजेंडे में नहीं. लेकिन सवाल उठता है कि जब देश की रीढ इन्हीं मुद्दों की बेहतरी में छिपी है, तो फिर पड़ताल क्यों नहीं, इसकी रपट क्यों नहीं? सरकार में बैठे नीति निर्माताओं को भी समय निकालकर एक बार इस किताब का अध्ययन जरूर कर लेना चाहिए.

संपादक ज्यां द्रेज बताते हैं कि शोधार्थी, पत्रकार कड़ी मेहनत कर इम मामलों की पड़ताल करते हैं. इसकी खूबियों-खामियों को उजागर करते हैं, लेकिन स्थिति बदलने की रफ्तार बहुत ही धीमी है. क्योंकि नीति निर्माताओं तक ये बात पहुंचती नहीं शायद. अगर पहुंचती है तो वह बात करना जरूरी नहीं समझते.

तीसरी वजह, यह किताब वंचितों, गरीबों, जरूरतमंदों की आवाज है. गौर करने लायक बात ये है कि सामाजिक पेंशन के मुद्दे पर चार लेखिकाओं (श्रयान भट्टाचार्य, मारिया मिनी जोस, सौम्या कपूर मेहता, रिंकू मुरगई) मिलकर काम करती हैं. एक साथ देशभर की विधवाओं, वृद्धों की जरूरत और उसकी हकीकत को समझा रही होती हैं. जातिगत भेदभाव और खाद्य सुरक्षा कार्यक्रम रिपोर्ट को पढ़ेंगो तो आपको लगेगा कि प्रिया प्रकाश के मटकों से ज्यादा इन मुद्दों की समझ का होना कितना जरूरी है.

जब किताब के आखिरी में पहुंचते हैं तो आपको रामचंद्र गुहा का लेख मिलता है- आदिवासी, नक्सलवादी और भारतीय लोकतंत्र. भारत सरकार जिसे देश की आंतरिक सुरक्षा का सबसे बड़ा खतरा मान रही है, उसके बारे में बेहतर समझ बनेगी. मेट्रोपोलिटन सिटी का विकास किस आदिवासी के फूस वाले घरों को रौंद कर किया जा रहा है, इसका साफ चित्र देखने को मिल सकता है.

क्या कमी रह गई है किताब में

एक किताब सभी की आकांक्षाओं और जिस विषय पर लिखी गई है, उससे संबंधित सभी मुद्दों को एक साथ नहीं छू सकती. लेकिन जिन मुद्दों की पड़ताल की गई है, उसमें नॉर्थ-ईस्ट के राज्यों को लगभग छोड़ ही दिया गया है. जबकि शिक्षा, स्वास्थ्य, पेंशन, मनरेगा, रोजगार की जो स्थिति उत्तर भारत में दिखाई देती है, इससे बेहतर या बदतर नॉर्थ ईस्ट के राज्यों की स्थिति नहीं है. त्रिपुरा में जहां शिक्षा की स्थिति ठीक है तो बेरोजगारी की खराब. असम, मेघालय, नागालैंड में क्या हाल है, उनकी पड़ताल क्या, किताब के तमाम लेखकों ने इसे जरूरी नहीं समझा.

किताब का मूल्य- इसकी कीमत 895 रुपए है. क्या आप सोच सकते हैं कि सामान्य छात्र भी इसे खरीदने की हिम्मत कर पाएगा. यानी जिनके मुद्दों को यह किताब खंगालती है, उन तक या उनके आसपास के लोगों तक इस किताब की पहुंच हो ही नहीं सकती. ऐसे में किताब की उपयोगिता पर बड़ा सवाल तो खड़ा होता ही है.

जिस तरह इकोनॉमिकल एंड पॉलिटिकल वीकली पत्रिका की पहुंच कुछ खास पढ़े लिखे लोगों तक ही है, ऐसे में यह किताब भी कुछ पढ़े लिखे लोग, यूनिवर्सिटी, लाइब्रेरी और शोधार्थी तक ही दिख रही है. (पेपरबैक संस्करण इस कमी को दूर कर सकता है) इसके साथ ही कई बार किताब में छपे मुद्दों से संबंधित आंकड़ें और ग्राफिक्स अरुचिकर लगते हैं. (हालांकि इसके बिना वास्तविक स्थिति को दिखाना मुश्किल होता).

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