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डॉक्टर नरेंद्र दाभोलकर: क्यों फंस जाते हैं लोग बाबाओं की अंधभक्ति में

लोगों के बाबाओं के पाखंड में फंसने के पीछे कई कारण है

FP Staff Updated On: Sep 25, 2017 03:57 PM IST

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डॉक्टर नरेंद्र दाभोलकर: क्यों फंस जाते हैं लोग बाबाओं की अंधभक्ति में

डॉक्टर नरेंद्र दाभोलकर अंधविश्वास के खिलाफ लंबे समय से लिखते रहे. 2013 में उनकी गोली मारकर हत्या कर दी गई. राजकमल प्रकाशन ने उनकी मराठी किताब 'अंधविश्वास उन्मूलन' का हिंदी अनुवाद तीन खंडों में प्रकाशित किया है. हम उनकी अनुमति से इसके किताब के पहले भाग के अंश यहां प्रकाशित कर रहे हैं.

ढकोसले की तरफ भागनेवाले जनसमूह का मतलब एक अंधेरे भविष्य की गंभीर चिंता है. सामाजिक स्तरों पर नगर एवं देहातों में रहनेवाले अलग-अलग उम्र के स्त्री-पुरुष जब अपने-अपने स्तरों पर इस मानसिकता के प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष दावेदार बन जाते हैं, तब उसके पीछे कौन से प्रमुख कारण हैं, उन्हें समझना बहुत आवश्यक होता है. उन्हें इस प्रकार दर्ज किया जा सकता है :

व्याकुलता, अस्थिरता, अपराध की भावना

विगत डेढ़-दो दशकों से एक नई अर्थव्यवस्था पूरे विश्व में आकार ले रही है. उसका प्रमुख लक्षण आज की बेकारी है. आज का व्यक्ति इसीलिए निराश एवं घुटन की मानसिकता में जी रहा है. ऐसे लोगों का शोषण बहुत शीघ्र होता है. लेकिन जिम्मेदार शोषक सामने नहीं आते. ऐसे समय व्यक्ति किसी आधार की तलाश में रहता है. साक्षात् मिलनेवाले, बोलनेवाले बाबा का आधार उसके लिए महत्त्वपूर्ण बनता है. उसकी अद्भुत दैवी शक्ति से समस्या का समाधान मिलने की आशा होती है.

अंधी भाग-दौड़ वाली जिंदगी से निर्मित होनेवाली व्याकुलता, अस्थिरता उस बाबा के दैवी आश्रय की ओर आकर्षित हो जाती है. ख्यातलब्ध नायक एवं नायिकाओं की फिल्में धड़ाधड़ फ्लॉप हो जाती हैं. अव्वल स्थान के खिलाड़ी अपना फॉर्म गंवा बैठते हैं. किसी अज्ञात शक्ति के कारण यह संकट आते हैं, जिसका ज्ञान बाबा को होता है और वही अब इसे दूर भी करेंगे, ऐसा उनके भक्तों का विश्वास होता है. जब अनैतिक मार्ग से धन-दौलत, सुख-सुविधाएं प्राप्त की जाती हैं, तब मन अपराधी के रूप में संत्रस्त रहता है. बाबा के चरणों में लीन हो जाने से उनकी कृपा को प्राप्त कर अपराधी मन को कुछ मात्रा में शांति मिलती है.

कवि मंगेश पाडगावकर ने ऐसी मानसिकता का वर्णन बहुत कलात्मकता से किया है :

''लोग बने हैं कंकाल अंदर से खोखले

अदृश्य आतंक से घबराए निराधार

हर कोई चाहता है जबर्दस्त बुवा

जो निकालेगा मन की चिंता की जुएं

'जय साईं’ पुकारकर अधिकारी रिश्वत लेता

अभी तक फंसा नहीं, कृपा बाबा की

हम नहीं खोजेंगे, हम नहीं लड़ेंगे

हम नहीं दो हाथ करेंगे जिंदगी से

रीढ़ छीज चुकी पूरी तरह सरजोर, सभी लाचार

बुवा के नाम जप का उच्चार बनाता बेहोश हमें.’’

मन की व्याकुलता, अस्थिरता का सही उपाय अपने विचारों से ढूंढ़ लिया जा सकता है, लेकिन उसके विरुद्ध संघर्ष करने का मौका बुवा और बाबा देते ही नहीं हैं.

काल्पनिक खौफ

सामाजिक जीवन की रफ्तार जरूरत से अधिक तेज हो गई है. जीवन में भाग-दौड़ नहीं बल्कि जीवन ही भाग-दौड़ बन गया है. इसीलिए अचानक होनेवाली दुर्घटनाओं से दिल दहल जाता है. जैसे खचाखच भीड़वाली लोकल से पति रोज यात्रा करते हैं. उन्हें कुछ होगा तो नहीं? बेटी अजनबी शहर में अकेली रहती है, उसे कोई छेड़ेगा, सताएगा तो नहीं? आस-पास के घरों में रात में लूटमार होती है, आज रात मेरे घर का नंबर तो नहीं? बेटे के दोस्त शराबी हैं, कहीं बेटे को यह बुरी आदत न लगे, ऐसी अनेक चिंताओं की दीमक मनुष्य के मन को खोखला करती है.

ऐसे समय जब वह काल्पनिक खौफ प्रत्यक्ष दिखाई देता है तब उसका सामना किया जा सकता है, लेकिन ऐसा न होकर तब 'डरो मत, मैं तुम्हारे साथ हूं’ कहनेवाले बाबा का आधार ही मन को उस खौफ से दूर करता है.

अतृप्त वासनाओं की पूर्ति

आधुनिक संसार में भौतिक सुखों का उपभोग करने के स्रोत और संभावनाएं बढ़ गई हैं. नित नए आकर्षण लोगों को खींच रहे हैं. लेकिन प्रत्यक्ष उनकी प्राप्ति न के बराबर होती है. उसके लिए भ्रष्टाचार की नीति सभी को रास नहीं आती. ऐसे समय बाबा का सहारा लेकर 'अलीबाबा की गुफा खोलने की संभावना को व्यक्ति आजमाता है. यह उसकी लालसा होती है.

मानसिक बीमारियां

गंभीर मानसिक बीमारियों का प्रमाण भारत में 1 प्रतिशत है. हल्की मानसिक बीमारी का प्रमाण 7 से 10 प्रतिशत है. मन की बीमारी अभी भी लोगों को अटपटी लगती है. मन की बीमारी यानी पागलपन यही उनकी मान्यता है. हमारे समाज में पागलपन व्यक्तित्व पर लगा एक कलंक माना जाता है. मानसिक इलाज की व्यवस्था हमारे देश में अपर्याप्त है. जो है, वह बहुत महंगी है.

इन सारी पृष्ठभूमि पर मानसिक दृष्टि से हलकी अथवा गंभीर बीमारी से ग्रस्त होनेवाले लोगों को आध्यात्मिक बाबा-बुवा, गुरु, स्वामी अथवा 'बाहर की पीड़ा’ को उतारनेवाले मांत्रिक-भगत सहजता से उपलब्ध होते हैं. मरीजों की परंपरागत विचारधारा के अनुसार, उनकी बीमारी पर यही इलाज प्रभावी होते हैं, इसीलिए साधुत्व के ढोंग को और प्रेरणा मिलती है.

मनोकायिक बीमारियां

अधिकांश समय बीमारियां शारीरिक लक्षणों के द्वारा व्यक्त होती हैं, जैसे, जबान बंद होना, लकवा मारना, दृष्टिहीन हो जाना आदि. ये बीमारियां प्राथमिक स्तर पर मानसिक होती हैं, तत्पश्चात् वे शारीरिक लक्षणों के द्वारा प्रकट होती हैं. इसे मनोकायिक बीमारी कहते हैं. ऐसा रोगी मानसोपचार विशेषज्ञ के इलाज से ठीक होता है. जिस बाबा पर श्रद्धा है, उसकी बातों को मानकर ऐसा रोगी स्वस्थ हो जाता है. 'मन चंगा तो कठौती में गंगा’ उक्ति के अनुसार सभी शारीरिक बीमारियां भी धीरे-धीरे ठीक हो जाती हैं. मनोवैज्ञानिक कारणों से बाबा और भक्त मरीज दोनों अनजान होते हैं. इसलिए इन घटनाओं के लिए अनुकूल माहौल अपने आप तैयार हो जाता है.

शारीरिक स्वास्थ्य संबंधी सुविधाओं का अभाव एवं खर्चीला इलाज

अनेक कारणों से बीमार पड़नेवाले लोगों की इस देश में भारी संख्या है. इन बीमारियों के इलाज, सुविधाएं तथा उसके लिए आवश्यक खर्च बहुत से लोगों के लिए सामर्थ्य से बाहर होता है. विकल्प ढूंढ़नेवाले ऐसे लोगों को शरीर पर चादर डालकर, फर्श पर सिर रखकर हाथ से शल्यक्रिया करनेवाले बाबा अधिक भरोसेमंद लगते हैं.

निरर्थकता की भावना से पीड़ित महिलाएं

हमारे समाज में महिलाएं अनेक कारणों से निरर्थकता की भावना को लेकर जी रही हैं. उनके मन को शांति देनेवाली, मानसिक आधार देनेवाली कोई भी अधिकृत व्यवस्था समाज में नहीं है. परिवार से बेसहारा हुई स्त्री को समाज में संतुलित जीवन जीना एक चुनौती होती है. न ससुराल, न मायका—ऐसी स्थिति में वह बाबा, बुवा, स्वामी, गुरु के सत्संग, सहवास एवं सेवा का आधार लेती है, क्योंकि ऐसे गुरुगीरी समाजमान्य होते हैं, जहां पर सुरक्षित होने का एहसास होता है.

आत्मा, परमात्मा, ब्रह्म, परब्रह्म, मोक्ष, मुक्ति शब्दों का मायाजाल

भारत के अधिकतर हिंदूधर्मीय जनमानस पर उपर्युक्त शब्दों की मुहर लगी मिलती है. बचपन से ही उसने आत्मा-परमात्मा की (न समझनेवाली) चर्चा सुनी होती है. माया और ब्रह्म, परब्रह्म, आत्मा जैसे शब्द उसके दिमाग में बचपन से ही डाले जाते हैं. जीवन का लक्ष्य मोक्ष अर्थात् 'मुक्ति को प्राप्त करना है और उसके लिए संसार का भवसागर पार करना होगा’—ऐसे विचार उसके मन में घर कर लेते हैं. इनमें से किसी का भी अर्थ उसे पता नहीं होता. परंतु ये शब्द और उसके अर्थ बहुत महान, पवित्र, उदात्त हैं, ऐसे संस्कार उसके अबोध मन पर पड़ते हैं. बाबा-बुवा, गुरु, स्वामी—इन शब्दों का उपयोग अधिकारवाणी से करते हैं इसीलिए वे भी दिव्य, पवित्र और महान बन जाते हैं.

विश्व का नियंत्रण करनेवाली शक्ति और अवतारवाद

इस विश्व का नियंत्रण करनेवाली कोई अलौकिक एवं दैवी शक्ति है, ऐसा बहुसंख्य लोग मानते हैं. अवतारवाद की भावना हिंदू संस्कृति में परंपरा से है. इसीलिए बाबा साक्षात् ईश्वर का अवतार ही हैं. वे हमारे विघ्नहर्ता हैं, तकदीर के मालिक हैं, यह मानसिकता बाबा की शरण में उनको ले जाती है.

संभाव्य-असंभाव्यता का सिद्धांत

अपना भविष्य जानने के लिए लोग बाबा के पास जाते हैं. जीवन में अच्छे दिन आने के लिए बाबा अपनी दैवी शक्ति का उपयोग करें, ऐसी याचना करने के लिए ये लोग उनके पास जाते हैं. बाबा की महिमा का रसभरा वर्णन सुननेवालों को भी बाबा महान लगते हैं. प्रत्यक्ष प्रश्नों के अचूक उत्तर बाबा कैसे देते हैं? प्रश्न होते हैं- गर्भवती स्त्री को लड़का होगा या लड़की? चुनाव में दो उम्मीदवारों में से कौन जीतेगा? इनके उत्तर बहुविकल्पीय होते हैं. इसीलिए जो भी उत्तर बाबा देते हैं, उसके औसत नियमानुसार अचूक होने की 50 प्रतिशत संभावना होती है.

लड़का या लड़की में से कोई भी एक जन्म लेता ही है. (सोनोग्राफी की सुविधा के कारण अब बाबा इस प्रश्न से हाथ धो बैठे हैं) दो उम्मीदवारों में से एक की विजय निश्चय ही होती है. बाबा इतने तो बुद्धिमान होते ही हैं कि प्रत्येक संभाव्य अथवा असंभाव्यता के नियम के अनुसार उत्तरों का अनुमान कर लेते हैं. जिनके बारे में उत्तर सही नहीं होते, वे उसे अपने भाग्य का फेर समझते हैं. लोग मान लेते हैं कि नसीब में यही था.

सांस्कृतिक दृष्टि से व्यक्त होने की जरूरत

व्यक्ति सामाजिक होता है इसीलिए सांस्कृतिक दृष्टि से उसे समूह में व्यक्त होने की जरूरत होती है. गाँव में संयुक्त परिवार पद्धति होती है. वहाँ के मान-अपमानों को सिर पर उठाकर रहना पड़ता है. शहरों में फ्लैट संस्कृति में प्रत्येक व्यक्ति स्वयं तक सीमित हो गया है. पड़ोस में कौन रहता है, पता नहीं. एक-दूसरे के सुख-दुख में शामिल होने की जरूरत नहीं महसूस की जाती.

इसीलिए हम भी किसी समूह का हिस्सा हैं, यह भावना मनुष्य को सुरक्षा प्रदान करती है. बाबा-भगतों के भक्तगणों के समूह में यह भावनात्मक संतोष मिलता है. वहाँ पर सभी एक-दूसरे को बाबा के भक्तों के रूप में मिलते हैं. शहरी-गंवार, गरीब-अमीर, शिक्षित-अनपढ़, स्त्री-पुरुष-सभी एक मानसिक स्थिति में होते हैं.

अंधविश्वासी मन

समाज में यथार्थ घटित होता है और मनुष्य उस पर सोचनेवाला प्राणी समझा जाता है. अच्छा-बुरा, सच-झूठ को तय करने के लिए उसमें सजग दृष्टि होनी चाहिए. लेकिन समाज की मानसिकता इसके विरुद्ध नजर आती है. वह अंधविश्वासी होता जा रहा है. बाबा-भगत के प्रभाव में उसका मन इतना श्रद्धालु और अंधविश्वासी बन जाता है कि ऐसे ढकोसलों के पनपने के लिए वह उपजाऊ जमीन तैयार करता है.

सामाजिक प्रतिष्ठा का लाभ

गुरु का शिष्य बनने में-स्वामी और शिष्य के रूप में राजनीतिक हस्तियों का-दोनों का फायदा होता है. बाबा के पास बड़ा अनुयायी वर्ग होता है. गुरु से आदर और कृपा मिलना अनुयायी वर्ग में ऊंची प्रतिष्ठा का विषय होता है. दूसरी ओर शिष्य बाबा की तारीफों के पुल बांधते नहीं थकते. यह सब कथित सिद्ध साधकों की चतुराई होती है.

पैसा, सत्ता, जनसंचार माध्यम और गुंडों का आतंक

ढकोसले का धंधा अत्यधिक किफायती और बिना पूंजी लागत का होता है. किसी भी धंधे की सुरक्षा के लिए नैतिक-अनैतिक व्यवस्था होती है. वैसी ही गुरुगीरी के ढकोसले की सुरक्षा में वह सक्रिय रहती है. बाबा, भगत, गुरु कितनी भी उदात्तता की भाषा क्यों न बोलते हों लेकिन उनके विरुद्ध बोलना, छापना अर्थात् उनके नकाब को उतारने का प्रयत्न बिलकुल सहन नहीं किया जाता. बाबा के विरुद्ध लिखनेवाले, खबरों को छापनेवाले पत्रकार तथा अखबारों के सामने चीख-पुकार की जाती है. उन्हें धमकियां दी जाती हैं. उनके विरुद्ध मानहानि का दावा भी किया जाता है. उनके घरों पर धावा बोल दिया जाता है, उनसे मारपीट की जाती है.

बाबा ऐसा आतंक फैलानेवाली फौज पहले से ही तैयार रखते हैं. पैसों का बीज बोकर सद्भावना को खरीदा जाता है. विरोधियों का मुंह बंद रखने के लिए अर्थनीति अपनाई जाती है. खेद इस बात का है कि जनसंचार माध्यम भी ऐसी अर्थनीति के गुलाम बनते जा रहे हैं. बाबा की महिमा के वर्णन पूरे पन्नों में 'अर्थपूर्ण’ शीर्षकों के साथ छपवाए जाते हैं. अपने क्षेत्र की राजनीतिक अथवा पूंजीवादी सत्ता अपने समर्थन में ही रहे, इस बात का पूरा ध्यान रखा जाता है. इस प्रकार अध्यात्म का दावा करनेवाले लोग वास्तव में नगद नारायण का व्यवहार करते हैं.

दैवी आतंक

कोई दुष्ट शक्ति षड्यंत्र रचाकर सतानेवाली होती है, ऐसी गलत भावना लोगों को आतंकित करती रहती है. मांत्रिक-तांत्रिकों के संदर्भ में भी ऐसा ही आतंक लोगों में होता है. ऐसे व्यक्ति की दुश्मनी मोल लेने का साहस लोगों में नहीं होता. कभी-कभी बाबा और समय आने पर उनके चेले भी धमकियां देने से पीछे नहीं हटते. दैवी आतंक से सामान्य लोग घबराते हैं. उन्हें कितने भी कटु अनुभव क्यों न हो, लेकिन वे उसके विरुद्ध बातें जाहिर करना ठीक नहीं समझते.

धंधे का रैकेट

बाबा का बहुत बोलबाला रहता है. मांत्रिकों के दैवी इलाज के लिए लोगों की लंबी कतारें लगती हैं. इन सबसे धंधे की एक शृंखला तैयार होती है. भक्त और जरूरतमंदों को लाने-छोड़नेवाले वाहनों का धंधा जोरों पर रहता है. भीड़-भाड़ वाले इलाकों में छोटी-मोटी जरूरतों को पूरा करनेवाले उद्योग चलने लगते हैं. चायपान, भोजन, निवास, फोटो, नारियल, फूलों की मालाएं आदि चीजों को बेचनेवाले दुकानदार फायदे में रहते हैं. बाबा का धंधा उनके धंधों को हमेशा चालू रखता है.

राज्यमान्यता-लोकमान्यता

बुवा-बाबा को जो धन मिलता है, वह उसकी मुफ्त की कमाई होती है. भौतिक सुखों की रेलपेल उनके पास हमेशा रहती है. लेकिन कमाई का कुछ हिस्सा वे सामाजिक कार्यों में खर्च करते हैं. इससे उन्हें अपने आप लोकमान्यता मिल जाती है. इधर राज्यसंस्थाओं का भी सहयोग मिलता है. इसीलिए उनकी ओर से भी राज्यमान्यता मिलती है. 'तू चुप, मैं भी चुप’ समझौते पर सब कुछ बिना रोक-टोक के शुरू रहता है.

अफवाहों का मानसशास्त्र

जो बाबा-भगत अपनी दैवी शक्ति के लिए चर्चित रहते हैं, उनके कर्तृत्व से होनेवाले चमत्कारों की कथाएँ निरंतर फैलाई जाती हैं. बाबा की शक्ति से लाभान्वित हुए मरीज, दिवालिया निकले रईस अपनी प्रतीति के अनुभव बढ़ा-चढ़ाकर बयान करते हैं. लेकिन जाँच-पड़ताल के बाद केवल अफवाहें ही सामने आती है.

साहसी वृत्ति का अभाव एवं उदासी वृत्ति

भारतीय जनमानस लड़ाकू वृत्ति का नहीं है. उसमें जुझारू बनने की इच्छा नहीं दिखाई देती. नया कुछ ढूँढ़ने, उत्साह, प्रसन्नता से रसिक जीवन जीने, नए क्षितिजों में उड़ान भरने जैसी मानसिकता बहुत कम लोगों में होती है. 'भगवान ने जैसा रखा है, वैसे ही रहो’ जैसी यथास्थितिवादी मानसिकता का प्रभाव लोगों पर अधिक है. इसे सींचनेवाले साधुओं के क्या कहने!

स्त्रियों का असंतुष्ट काम-जीवन

बाबा बनने पर स्त्रियों से सहवास की अनुकूलता सहज ही प्राप्त होती है. लेकिन जिस मात्रा में महिलाएं बाबा की अनुयायी बन जाती हैं, उसे देखकर हैरानी होती है. महिलाएँ ऐसा क्यों करती हैं? उत्तर के रूप में यह बात सामने आती है कि बाबा के दैवी प्रभाव की ओर वह आकर्षित होती है. अपने आप वहां की वासना का वह शिकार बनती है. फिर बदनामी के डर से चुप रहती है. दूसरी संभावना यह बताई जाती है कि स्त्री के अंतर्मन की अतृप्त कामवासना इसका एक कारण हो सकती है. स्त्री अपनी कामवासना को दबाती है. अनेक कारणों से वह बता नहीं सकती. इस संदर्भ में उसका अज्ञान भी होता है. लेकिन इस संदर्भ में बोलना वह अनैतिक समझती है.

स्त्री-पुरुष के संबंधों में पुरुष की कामतृप्ति शीघ्र होती है और पूर्ति का एहसास भी उसे होता है. वह इस क्रीड़ा से जल्दी दूर हो जाता है. बेशक स्त्री न बोलती हो लेकिन उसके विरुद्ध बोलना, छापना अर्थात् उसके नकाबों को उतारने का प्रयास बिलकुल सहन नहीं करती. वह आंतरिक स्तर पर व्याकुल होती है, दुखी होती है. वह सामाजिक बंधनों के बोझ तले दबी होती है. पुरुष अपनी इच्छापूर्ति अनेक मार्गों से करता है, लेकिन स्त्री के पास ऐसा विकल्प नहीं होता.

अपने बच्चे की परवरिश करना, नामजप, भगवान की पूजा, कथित अध्यात्म जैसे विकल्पों से स्त्री अपने आप पर नियंत्रण रखती है. विवाहेतर संबंधों का विकल्प उसके लिए बहुत भारी होता है. भारतीय सामाजिक जीवन में वह बहिष्कृत बन जाती है. उसे व्यभिचारी कहा जाता है. लेकिन बाबा, बुवा के इर्द-गिर्द कथित धार्मिक-नैतिक शक्ति होती है. लोकप्रियता होती है. इसीलिए उनके सहवास के बारे में लोगों में चर्चा की गुंजाइश नहीं होती. यह परिणाम परंपरागत जनमानस में जड़ें जमाई हुई श्रद्धा के रसायन का है. इसीलिए बाबा से सहज ही शारीरिक संबंध स्थापित होते हैं. जिस बाबा के केवल दर्शन के लिए लोग घंटों तरसते हैं, अधिकार से मिला उसका सहवास भी एक कारण हो सकता है.

वाघमारे बाबा जैसे सामान्य रूप के बाबा की ओर महिलाएं भारी संख्या में जाती थीं. एक ही परिवार की सास-बहू, बेटी और मां के साथ उसके संबंध गवाहसहित प्रस्तुत किए गए थे. इसका मामला अभी चल रहा है. लेकिन ऐसा भयावह यथार्थ इस क्षेत्र में पाया गया है. स्त्री शरीर-संबंधों की अपेक्षा अपनापन और प्यार के संबंधों से अधिक जुड़ी होती है.

अपवाद के रूप में ही कुछ स्त्रियां शारीरिक संतोष के लिए बाबा की ओर आकर्षित होती हैं. अधिकांश स्त्रियों का उद्देश्य होता है कि बाबा की कृपादृष्टि और हस्तस्पर्श से उनकी पारिवारिक व्यथा-वेदनाओं का शमन हो. आज के भारतीय समाज की अधिकांश महिलाएं आध्यात्मिक उद्देश्य से बाबा के पास जाती हैं. उन्हें पूरी तरह से वासनापूर्ति से जोड़ना महिलाओं पर अन्याय ही होगा, इस बात पर भी गौर करना चाहिए.

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