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याज्ञसेनी, पांचाली, कृष्णा, पृषती...कितने नाम और कितने रूप वाली द्रौपदी

कौरवों के दर्प को कुचलने का प्रण लेती द्रौपदी. युद्ध के लिए पांडवों के पौरुष को ललकारती द्रौपदी. नारी मुक्ति आंदोलन की नींव बनती द्रौपदी. पांच पतियों से असफल प्रेम करती द्रौपदी. महाभारत के विस्तृत कैनवास पर यह द्रौपदी के विभिन्न रूप हैं

Updated On: Dec 22, 2018 09:31 AM IST

Hemant Sharma Hemant Sharma
वरिष्ठ पत्रकार

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याज्ञसेनी, पांचाली, कृष्णा, पृषती...कितने नाम और कितने रूप वाली द्रौपदी

उस दिन बनारस में उस बड़े और पुराने अस्पताल के आई.सी.यू. में भर्ती पिताजी ने मेरी हथेलियों को छूकर मेरी आंखों में झांकते हुए कहा था-मैं चाहता हूं, इस किताब की भूमिका तुम लिखो. मैं आज तक समझ नहीं पाया यह उनका आग्रह था या आदेश. मैंने उनसे पूछा भी नहीं. जब वे स्वस्थ होकर घर लौटे तो फिर कहा, तुम लिखो. मेरे सामने यक्षप्रश्न-पिता की किताब की भूमिका बेटा लिखे? वह भी ऐसी किताब की भूमिका, जिसका चरित्र द्रौपदी जैसा जटिल हो.

पत्रकारीय जीवन में अब तक न जाने कितने ऐसे जटिल किरदारों से पाला पड़ चुका है, पर यह तो द्रौपदी है. द्रौपदी पर पिताजी की लिखी छोटी सी किताब खत्म करने के बाद मैं विचलित था. द्रौपदी की पीड़ा, उसका संताप, उसके भीतर जमा क्रोध, घृणा, अपमान और तिरस्कार की भावना मुझे कहीं अंदर तक आंदोलित करने लगी. सोचता रहा, पिताश्री ने तो महाभारत के करीब-करीब सभी पात्रों पर जाने कितना लिखा.

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उनकी हर किताब का पहला पाठक और प्रूफरीडर मैं ही होता हूं. कृष्ण की तो पूरे तीन हजार पन्नों की आत्मकथा लिखी, पर उनकी इस सृजनात्मक प्रकिया में मैं कहीं नहीं था. सिवाय पहले पाठक की भूमिका में मैं कहीं दूर खड़ा रहता था. लेकिन उस दिन द्रौपदी की भूमिका लिखने के लिए उन्होंने मुझे क्यों चुना? अब जब मैं इस पुस्तक की भूमिका लिखने बैठा हूं तो समझ सकता हूं कि पिता ने यह जिम्मेदारी मुझे क्यों सौंपी होगी?

द्रौपदी! याज्ञसेनी! पांचाली! कृष्णा और पृषती!

द्रौपदी के स्वयंवर के समय की तस्वीर ( विकीपीडिया से साभार )

द्रौपदी के स्वयंवर के समय की तस्वीर ( विकीपीडिया से साभार )

इसका दूसरा नाम है बदला, प्रतिशोध और प्रतिहिंसा. अपने अपमान की आग में तपती द्रौपदी. कौरवों के दर्प को कुचलने का प्रण लेती द्रौपदी. युद्ध के लिए पांडवों के पौरुष को ललकारती द्रौपदी. नारी मुक्ति आंदोलन की नींव बनती द्रौपदी. पांच पतियों से असफल प्रेम करती द्रौपदी. महाभारत के विस्तृत कैनवास पर यह द्रौपदी के विभिन्न रूप हैं, जिसमें से हर रूप उपन्यास का विषय हो सकता है. लेकिन इस उपन्यास में ऐसी विराट और जटिल द्रौपदी को एक सूत्र में पिरोया गया है.

दरअसल, यज्ञकुंड की आग से जन्मी द्रौपदी आजीवन उस आग से मुक्त नहीं हो पाई. वह हमेशा इसी प्रतिशोध की आग में जलती रही. उसी आग में दूसरों को जलाती रही. द्रौपदी महाभारत की धुरी है, पूरा महाभारत उसके इर्द-गिर्द घटित हुआ. विडंबना यह है कि वह अपनों से भी लड़ी और दूसरों से भी, पर नितांत अकेले, महाराज द्रुपद की बेटी, प्रतापी पांडवों की पत्नी, धृष्टद्युम्न जैसे वीर की बहन और कृष्ण की सखी होने के बावजूद वह अपने संघर्ष में नितांत अकेली थी. जीवन की रणभूमि में अकेली खड़ी द्रौपदी ने अपने पतियों को हमेशा अधर्म के खिलाफ युद्ध के लिए प्रेरित किया.

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अपने केश खुले छोड़कर अगर वह अपनी ओर से एकतरफा युद्ध का ऐलान न करती तो शायद पांडव महाभारत की चुनौती को कभी स्वीकार न करते और इतिहास उनके भगोड़े चरित्र को ही जानता. पर यह रहस्य कृष्ण जानते थे. इसलिए युद्धभूमि में अर्जुन को गीता का ज्ञान देकर उन्होंने अपनी सखी कृष्णा की मदद की. कृष्ण ने अपनी जंघा पर ताल ठोककर भीम को भी उसकी प्रतिज्ञा याद दिलाई. तब दुर्योधन मारा गया.

द्रौपदी का चरित्र अनोखा है. पूरी दुनिया के इतिहास में उस जैसी दूसरी कोई स्त्री नहीं हुई. लेकिन इतिहास ने उसके साथ न्याय नहीं किया. दरअसल, भारत की पुरुषप्रधान सामाजिक व्यवस्था उसके साथ तालमेल नहीं बिठा सकी. द्रौपदी को महाभारत के लिए जिम्मेदार माना गया. हालांकि इसके लिए वह अकेली जिम्मेदार नहीं थी. मेरा मानना है कि द्रौपदी न भी रहती तो भी महाभारत का युद्ध होता, क्योंकि यह विवाद संपत्ति के बंटवारे का था. द्रौपदी केवल कारण बनी.

पांच पतियों के कारण भारतीय परंपरा में द्रौपदी को आदर्श नारी का दर्जा कभी नहीं मिल सका. द्रौपदी का नाम उपहास से जुड़ गया. महाकाव्य युग के बाद लोगों ने अपनी बेटियों का नाम द्रौपदी रखना छोड़ दिया. समाजवादी चिंतक डॉ. राममनोहर लोहिया के अलावा किसी ने द्रौपदी को उसका सम्मान नहीं दिया. पांच हजार साल के इतिहास में डॉ. लोहिया ही एक ऐसे आदमी हैं, जो द्रौपदी को सीता से ऊपर रखने को तैयार हैं.

द्रौपदी का अनंत संताप उसकी ताकत था. संघर्षों में वह हमेशा अकेली रही. पांच पतियों की पत्नी होकर भी अकेली. अनाथ जैसी. कुशल रणनीतिकार कृष्ण की सखी, पर अनाथवत. उसकी दैन्यता और असहायता का असली जख्म यही है. गौरतलब है कि द्रौपदी को दुख देनेवाले और कष्ट पहुंचाने वाले लोग उसके अपने ही थे. महाभारत के कई प्रसंग ऐसे हैं, जब दोनों तरफ से उसे दुख और अपमान की यातना मिलती है.

दुःशासन का भरी सभा में उसके बाल पकड़कर घसीटना. उसे निर्वस्त्र करने की कोशिश करना. जयद्रथ और कीचक द्वारा उसका अपहरण करना. उसके जीवन के ये सारे ऐसे त्रासद प्रसंग हैं, जो उसे अनाथवत बनाते हैं. शायद इसीलिए धृष्टद्युम्न और कृष्ण जब वनवास में द्रौपदी से मिलने गए तो वह गुस्से से फट पड़ी. कहा, मेरा कोई नहीं है. मेरा न कोई पुत्र है, न पति, न भाई है और न बाप. मधुसूदन आप भी नहीं. यदि होते तो हमारा यह अपमान कभी न होता. द्रौपदी की यही अनाथवतता उसके बगावती चरित्र के मूल में थी.

द्रौपदी के तर्क, बुद्धिमत्ता, ज्ञान और पांडित्य के आगे सब लाचार नजर आते हैं. जब भी वह सवाल करती है, पूरी सभा निरुत्तर होती है. चाहे खुद को जुए में हारने का सवाल हो या फिर नारी के अपमान पर द्रौपदी के तीखे सवाल हों या शांतिपर्व में पितामह की नीति पर दी जानेवाली सीख पर द्रौपदी का भाषण हो. हर बार भीष्म को शर्म से गड़ना पड़ा. युधिष्ठिर को नजरें झुकानी पड़ीं.

हस्तिनापुर की राजसभा के चापलूस दरबारियों को द्रौपदी हतप्रभ करती है. वह भीष्म, द्रोण, कृपा और कर्ण सरीखों की बोलती बंद करती है. सत्ता के शीर्ष पर हो रहे बेईमान फैसलों पर द्रौपदी जब उंगली उठाती है तो धर्मराज लाचार नजर आते हैं.

( विकीपीडिया से साभार )

( विकीपीडिया से साभार )

कमजोर और अबला स्त्री के प्रति होते अन्याय पर तमाशबीन रहनेवाले नीति निर्माताओं का यह तटस्थ और नपुंसक रवैया केवल आज के सत्तातंत्र के सामने नहीं है. पांच हजार साल पहले भी राजसभाएं ऐसे ही चलती थीं. तब भी दुर्योधन से मिलनेवाली वेतन की पट्टी से भीष्म, कर्ण, द्रोण, कृपाचार्य जैसे लोगों का मुंह बंधा रहता था. बेशक महाभारतकार और इतिहास ने धर्मराज का खिताब युधिष्ठिर को दिया हो, लेकिन कमजोर, निकम्मे, लाचार और यथास्थितिवादी युधिष्ठिर के आगे धर्म का जितना सटीक आचरण द्रौपदी ने किया, उसकी मिसाल पूरे महाभारत में नहीं मिलती.

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जिस युधिष्ठिर को धर्मराज कहा गया, उसने कई बार झूठ का सहारा लिया. चाहे वह धोखे से द्रोण का वध हो या फिर द्रौपदी का निर्वस्त्र किया जाना हो, अश्वत्थामा को माफी देने का सवाल हो या पांडवों की अंतिम यात्रा में द्रौपदी पर युधिष्ठिर की घृणास्पद टिप्पणी. हर कहीं द्रौपदी धर्मराज से कहीं ज्यादा मर्यादा में दिखती है.

युधिष्ठिर के जीवन की एक घटना ने तो उन्हें झूठा और षड्यंत्रकारी करार दिया. जब उन्होंने यह जानते हुए कि द्रोणपुत्र अश्वत्थामा जीवित है और अश्वत्थामा नामक हाथी ही मरा है, फिर भी झूठ बोला कि पता नहीं हाथी मरा है या मनुष्य, पर अश्वत्थामा मारा गया. इस एक सूचना पर द्रोण ने हथियार फेंक दिए और वे धृष्टद्युम्न के हाथों मारे गए. यह था धर्मराज का झूठ, धोखा और षड्यंत्र. द्रौपदी पर आप किसी छोटे से अधर्माचरण का भी आरोप नहीं लगा सकते.

हां, यह सवाल जरूर उठता है कि अपने स्वयंवर में कर्ण को मछली की आंख पर निशाना लगाने से रोककर द्रौपदी ने ठीक किया या गलत? कर्ण को स्वयंवर में मौका न देकर उसके साथ अन्याय हुआ, ऐसा कुछ विश्लेषकों का मानना है. पर स्वयंवर तो द्रौपदी रचा रही थी. विवाह द्रौपदी का होना था, वर उसे चुनना था. तो वह अपनी शर्त पूरी करने का मौका किसे दे या किसे न दे, यह उसका अधिकार था, जिसका इस्तेमाल द्रौपदी ने किया.

एक और प्रसंग-चीरहरण के दौरान द्रोणाचार्य चुप थे. जिन सात महारथियों ने निहत्थे अभिमन्यु को घेरकर मारा था, द्रोणाचार्य उसमें भी शामिल थे. बावजूद इसके ब्राह्मण और गुरु होने के नाते द्रौपदी ने द्रोणाचार्य का हमेशा सम्मान किया. उन्हें उचित आदर दिया. गुरुपुत्र होने के कारण ही अश्वत्थामा का वध नहीं होने दिया. जिस अश्वत्थामा ने द्रौपदी के पांच पुत्रों की सोते वक्त धोखे से हत्या कर दी थी, उस अश्वत्थामा को भी द्रौपदी ने क्षमादान दिया. यह था द्रौपदी का नैतिक शिखर. यह थी उसके चरित्र की विलक्षणता.

( विकीपीडिया से साभार )

( विकीपीडिया से साभार )

जब पांचों पति द्रौपदी को जुए में हार गए तो तिलमिलाई द्रौपदी ने भरी सभा में धर्मराज से सवाल पुछवाया-जाकर पूछो उस जुआरी महाराज से कि पहले मुझे हारे थे या खुद को. अगर वे पहले खुद को दांव पर लगाकर दास बन चुके हैं तो उन्हें मुझे हारने का हक नहीं, क्योंकि दास के पास फिर ऐसी कोई वस्तु नहीं रह जाती, जिस पर वह अपना स्वामित्व चलाए.

इसके बाद भी द्रौपदी का व्यवहार युक्तिसंगत है. जब धर्मराज ने सबकुछ जुए में गंवा दिया, कौरवों की सभा में द्रौपदी का चीरहरण हो गया, तो फिर किसी संभावित अनिष्ट को टालने के लिए धृतराष्ट्र ने द्रौपदी से तीन वर मांगने को कहा. यहां भी द्रौपदी ने विवेक का इस्तेमाल किया.

पहले वर में धर्मराज को दासता से मुक्त कराया. दूसरे वर में बाकी चार भाइयों को शस्त्रों के साथ छुड़ाया. तीसरे वर में वह कुछ भी मांग सकती थी, पर नहीं मांगा. किसी और वस्तु का लोभ न कर उसने खुद को ही नहीं, बल्कि पांडवों को भी अपमान से बचाया. उसकी इस विवेकशीलता की तारीफ खुद कर्ण ने की.

...(जारी, लेख का अगला भाग अगले सप्ताह)

(यह लेख हेमंत शर्मा की पुस्तक 'तमाशा मेरे आगे' से लिया गया है. द्रौपदी पर यह लेख हम दो भागों में लेंगे. अगला भाग, अगले शनिवार को. पुस्तक प्रभात प्रकाशन द्वारा प्रकाशित की गई है. इस लेख में हेमंत जी ने अपने पिता का जिक्र किया है. हेमंत शर्मा मशहूर लेखक मनु शर्मा के पुत्र हैं)

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