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द्रौपदी पार्ट 2: द्रौपदी के अपमान का बदला लेने के लिए नहीं हुआ था महाभारत

महाभारत में द्रौपदी के साथ जितना अन्याय होता दिखता है, उतना अन्याय इस महाकथा में किसी अन्य स्त्री के साथ नहीं हुआ

Updated On: Dec 29, 2018 10:07 AM IST

Hemant Sharma Hemant Sharma
वरिष्ठ पत्रकार

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द्रौपदी पार्ट 2: द्रौपदी के अपमान का बदला लेने के लिए नहीं हुआ था महाभारत

महाभारत में द्रौपदी के साथ जितना अन्याय होता दिखता है, उतना अन्याय इस महाकथा में किसी अन्य स्त्री के साथ नहीं हुआ. द्रौपदी ने स्वयंवर में केवल अर्जुन को वर चुना था. लेकिन उसे पांचों पांडवों को अपना पति स्वीकार करना पड़ा. महाभारत काल में बहुपति विवाह का प्रचलन नहीं था. यह उससे पहले की अवस्था थी. फिर भी महाभारतकार ने कुंती के बहाने द्रौपदी का विवाह पांचों भाइयों से करा दिया. न कराते तो द्रौपदी को लेकर महाभारत से पहले घर में महाभारत हो जाती, इसलिए युधिष्ठिर ने कहा, कल्याणकारी द्रौपदी हम सब लोगों की पत्नी होगी. स्वयंवर अर्जुन ने जीता था, लेकिन बड़े भाई युधिष्ठिर और भीम के रहते उसका विवाह कैसे होता? यह पाप होता.

वेद और ब्राह्मण ग्रंथों में इसका प्रमाण मिलता है. बड़े भाई की पत्नी पर छोटे भाई का अधिकार तो था, पर इसका उलटा नहीं हो सकता था. इसलिए कुंती के मन में भी था कि वह सबकी होकर रहे और द्रौपदी पांचों की पत्नी हो गई. यदि वह एक की होकर रहती तो इससे कलह तो होता ही, पांडवों की एकता भी टूटती.

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कुंती के इस फैसले से द्रौपदी इनकार नहीं कर सकी. न चाहते हुए इसे मंजूर किया. वह जानती थी कि पांच पतियों की अकेली पत्नी होकर वह उपहास का पात्र बनेगी. फिर भी उसने मुखर होकर इसका विरोध नहीं किया. ऐसा विरोध जैसा उसने जुए में खुद के हारे जाने पर किया था. शायद पृथ्वी पर धर्म की स्थापना के लिए यह आवश्यक था. जैसा कि युधिष्ठिर ने तर्क दिया था, जटिला ने तो धर्म की रक्षा के लिए सात पति वरण किए थे.

दूसरे महाकाव्य रामायण में राम-रावण युद्ध भी धर्म की स्थापना के लिए लड़ा गया था. रामायण की नायिका सीता भी सुंदर थी. उसके भी तीन देवर थे, लेकिन दशरथ पुत्रों में एका रखने के लिए सीता से चारों भाइयों का विवाह रचने का आग्रह क्यों नहीं किया गया? इतिहास ने सीता को सती कहा. लेकिन द्रौपदी ने फिर भी बिना तर्क-वितर्क किए पांचों पांडवों का वरण किया. इसका क्या कारण हो सकता है? क्या वह खुद पांचों पांडवों के प्रेम में थी? द्रौपदी जैसे जटिल चरित्र के लिए एक पति काफी नहीं था.

कीचक वध प्रसंग में यह बात साफ भी हो जाती है. बहरहाल, महाभारत इस सवाल पर मौन है. लेकिन पांच पतियों की पत्नी के नाते भी द्रौपदी का आचरण आदर्श और अनुकरणीय माना गया तथा महाभारतकार ने उसके इस पत्नी रूप को देवी गरिमा दी.

महाभारत में कृष्ण और अर्जुन ( तस्वीर: विकीपीडिया )

महाभारत में कृष्ण और अर्जुन ( तस्वीर: विकीपीडिया )

महाभारतकार ने द्रौपदी को प्रखर नारीवादी रूप में महिमामंडित किया है. उसके तर्क अकाट्य हैं. द्रौपदी दांव पर लगा दी गई. पांडव उसे जुए में हार गए. वह कौरवों की संपत्ति हो गई. द्रौपदी ने युधिष्ठिर के धर्म को चुनौती दी. द्रौपदी कहना चाहती थी कि जो खुद को हार चुका हो, वह किसी का स्वामी कैसे हो सकता है? फिर वह अकेले युधिष्ठिर की पत्नी नहीं थी. वह पांचों पांडवों की पत्नी थी. तो अकेले युधिष्ठिर उसे दांव पर कैसे लगा सकते हैं? द्रौपदी धर्म पर भी बहस करती है. दुर्योधन का तर्क था-हमने तुम्हें धर्म के अनुसार प्राप्त किया है, अब तुम हमारी संपत्ति हो. तुम कौरवों की सेवा करो.

दुःशासन द्रौपदी के बाल खींचता हुआ घसीटकर उसे सभा में लाया. उसने कहा, द्रौपदी तुम एकवस्त्रा हो या नंगी क्यों न हो, हमने तुझे जुए में जीता है! अब तू हमारी दासी है. सभा में द्रौपदी ने खुद को बिलकुल अकेला महसूस किया. पर उसने हिम्मत नहीं हारी. वह दुःशासन से कहती है, देखती हूं, कोई भी मनुष्य तेरे इस कुकर्म की निंदा क्यों नहीं कर रहा?

द्रौपदी की इस ललकार के बावजूद विकर्ण के अलावा कोई उसके पक्ष में खड़ा नहीं होता. हां, पूरी सभा दुर्योधन और दुःशासन को धिक्कारती जरूर है. यहीं द्रौपदी जीत जाती है. अंत में शर्मिंदा होकर भीम को भी कहना पड़ता है, जुआरियों के घर प्रायः कुलटा स्त्रियां रहती हैं, लेकिन वे भी उन्हें दांव पर नहीं लगाते. उन कुलटाओं के प्रति भी उनके मन में दया रहती है. जब हस्तिनापुर के तमाम बुजुर्ग और वरिष्ठ दरबारी इस अन्याय के सामने तमाशबीन थे, उसके पति और श्वसुर चुपचाप बैठे थे और कोई प्रतिकार करने की स्थिति में नहीं था, तो भी द्रौपदी ने भरी सभा में अधर्म के खिलाफ आवाज उठाई.

चीरहरण से वह एक दैवी चमत्कार के चलते बची. माधव ने उसके वस्त्र को अनंत आकार देकर दुःशासन के पसीने छुड़वा दिए.

मित्रो! यह गलत है कि द्रौपदी के अपमान का बदला लेने के लिए महाभारत का युद्ध हुआ था. पांडव सिर्फ राज्य चाहते थे, द्रौपदी के अपमान का बदला नहीं, न ही धर्म की स्थापना. वह आधा राजपाट लेने पर भी राजी थे. अगर आप महाभारत में युधिष्ठिर का भाषण पढ़ें तो उसका सारा निचोड़ किसी भी तरह से युद्ध को टालने और अपना हिस्सा प्राप्त करने का है. भीम भी कहते हैं कि उनसे कहो कि हिस्सा दें, सर्वनाश न करें. तब द्रौपदी को कहना पड़ा-कृष्ण, जिसने मेरे बाल खींचे, जिनके पापी हाथ मेरे बालों को लगे, उनके प्रति दया मत करना. कुंती ने भी ऐसा संदेश युधिष्ठिर को कहलवाया था. जैसे कोई भीख मांग रहा हो-आधा न भी मिले तो पांडव पांच गांव से भी संतुष्ट हो जाते. यह बात अलग है कि कौरवों ने उन्हें वह भी देने से मना कर दिया.

लेकिन द्रौपदी को राजपाट नहीं चाहिए था. उसका मानना था कि सच्चा धर्म नारी का सम्मान करने में है. उसे अपमानित करनेवाला दंड का भागीदार है. उसने युधिष्ठिर को कीचक वध के लिए प्रेरित किया. पर युधिष्ठिर का कहना था, अभी इसका वक्त नहीं आया है. द्रौपदी के लिए यह अपमानजनक था. वह कीचक वध के लिए भीम के पास जाती है.

वह जानती है कि भीम को आसानी से भड़काया जा सकता है. भीम मल्लयुद्ध में कीचक की हत्या करते हैं. द्रौपदी उसके मृत शरीर को देखकर प्रसन्न होती है. पर द्रौपदी इससे भी संतुष्ट नहीं. वह चाहती है, लोग उसकी शक्ति को पहचानें, क्योंकि वह साधारण दासी नहीं है. वह कीचक के रक्षकों से कहती है, अंदर जाकर देखो, पराई स्त्री के प्रति बुरी नजर रखनेवाले कीचक का मेरे गंधर्व पतियों ने क्या हाल किया है. अपने पतियों को लेकर द्रौपदी के मन में एक अहंकार दिखता है.

शायद इसी अहंकार की पूर्ति के लिए उसने अपने लिए पांच पति वरण किए थे. पर यह बात दूसरी है कि इन पांच पांडवों में अकसर वृहन्नला और शिखंडी नजर आते रहे, यानी द्रौपदी महाभारत की एकमात्र वजह नहीं थी. जिस दिन बड़े बेटे के होते हुए अंधे धृतराष्ट्र को अलग रखकर पांडु को गद्दी दी गई, उसी रोज इस युद्ध के बीज बो दिए गए थे. तभी से धृतराष्ट्र और पांडु के बेटों में रार पनपी.

द्रौपदी संपूर्ण नारी थी. घर की चहारदीवारी में उसने घरेलू महिला की तरह नारी के आदर्श प्रस्तुत किए. वह कार्यकुशल थी और लोकव्यवहार के साथ घर-गृहस्थी में भी पारंगत. पांचों पति उसकी मुट्ठी में थे. अपने कार्य-व्यवहार के कारण वह पांचों पांडवों के लिए सम्मानित थी. वनपर्व में एक रोचक प्रसंग है.

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कृष्ण की पत्नी सत्यभामा द्रौपदी से पूछती है, ‘हे प्रियदर्शनी, क्या रहस्य है कि पांडव सदा तुम्हारे अधीन रहते हैं. तुम्हारे इशारों पर चलते हैं. मुझे भी कोई ऐसा व्रत, तप, स्नान, मंत्र, औषध आदि बताओ, जिससे मैं कृष्ण को सदैव अपने वश में रख सकूं.’ जवाब में द्रौपदी कहती है, ‘पति को वश में करने के ये उचित उपाय नहीं हैं’... ‘फिर क्या उपाय हैं?’ सत्यभामा ने पूछा.

द्रौपदी ने रहस्य खोला-‘मैं अहंकार और काम-क्रोध छोड़कर सदा सावधानी के साथ सब पांडवों और उनकी अन्यान्य स्त्रियों की भी सेवा करती हूं. अपनी इच्छाओं का दमन करके, अपने मन को अपने-आप में समेटकर केवल सेवा की इच्छा से अपने पतियों को मन में रखती हूं. कभी मेरे मन से कोई बुरी बात न निकल जाए, इसके प्रति सावधान रहती हूं.

असभ्य की तरह कहीं भी खड़ी नहीं हो जाती. निर्लज्ज की तरह कहीं भी दृष्टि नहीं डालती. बुरी जगह पर नहीं बैठती. देवता, मनुष्य, गंधर्व, युवक, बड़ी सज-धज वाला धनवान या परमसुंदर कैसा भी व्यक्ति क्यों न हो, मेरा मन पांडवों के सिवा कहीं नहीं जाता. पतियों व उनके सेवकों को भोजन कराए बिना मैं कभी भोजन नहीं करती, उनके नहाए बिना मैं नहाती नहीं. पतिदेव जब तक शयन न करें, मैं सोती नहीं. खेत से, वन से अथवा गांव से जब कभी मेरे पति घर पधारते हैं, मैं खड़ी होकर उनका अभिनंदन करती हूं तथा आसन और जल अर्पण करके उनके स्वागत-सत्कार में लग जाती हूं’ यह था द्रौपदी का साधक या सम्मोहक मंत्र.

द्रौपदी का अपने पतियों के प्रति समभाव था. वह पांचों से संतुष्ट थी. उसे विचलित नहीं किया जा सकता था. इसका संकेत आदिपर्व में कर्ण ने एक प्रसंग में किया है. दुर्योधन ने कई बार सोचा कि पांडवों में भेद पैदा किया जाए. दुर्योधन ने यह कोशिश भी की, ताकि किसी तरह द्रौपदी को फोड़ लिया जाए. लेकिन कर्ण ने कहा, ‘प्रायः स्त्रियों का यह अभीष्ट गुण है कि एक स्त्री अनेक पुरुषों से संबंध स्थापित करने में रुचि रखती है. पांडवों के साथ रहने में द्रौपदी को यह लाभ स्वतः प्राप्त है. इसलिए उसके मन में भेद नहीं किया जा सकता.’

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लेकिन द्रौपदी जैसी असाधारण नारी के बीच भी एक साधारण नारी छिपी थी, जिसमें प्रेम, ईर्ष्या, डाह जैसी समस्त नारी-सुलभ दुर्बलताएं मौजूद थीं. द्रौपदी के खुद पांच पति थे, लेकिन अर्जुन को लेकर उसके मन में अधिक प्रेम था. किंतु उनसे जुड़ी महिलाओं के लिए द्रौपदी के मन में सहज व स्वाभाविक ईर्ष्या भावना थी. अर्जुन ने कृष्ण के इशारे पर सुभद्रा का हरण किया.

अर्जुन ने सुभद्रा से विवाह किया. यह राजनीतिक विवाह नहीं था, एक तरह से प्रेम विवाह था. ऐसे में द्रौपदी को बुरा लगना स्वाभाविक था. विवाह के बाद अर्जुन द्रौपदी से मिलने आए तो द्रौपदी ने अर्जुन पर व्यंग्य-बाण छोड़े-हे कुंतीपुत्र, यहां क्यों आए हो. वहीं जाओ जहां वह सात्वत वंश की कन्या सुभद्रा है.

सच है, बोझ को कितना ही कसकर बांधा जाए, जब उसे दूसरी बार बांधते हैं तब पहला बंधन ढीला पड़ जाता है. पांच भाइयों में बंटी द्रौपदी ने उनकी पत्नियों के रहते हुए सबको संतुष्ट किया. यहां भी द्रौपदी बेजोड़ है.

पांच हजार साल पहले घटे महाभारत पर लिखना मुश्किल काम है. उस युग के तनाव को झेलना, उसके संत्रास का अनुभव करना, लेखक का उस युग में पहुंचना और उसके बाद अपने साथ पाठकों को पहुंचाना और भी दुरूह है. पर यह संभव इसलिए हो सका, क्योंकि महाभारत भले पांच हजार साल पहले हुआ हो, उसकी संरचना और संदर्भ भले ही बदल चुके हों, लेकिन महाभारत आज भी उतना ही प्रासंगिक और उपयोगी है जितना उस वक्त था.

वही समस्याएं और चुनौतियां हमारे सामने हैं. राजसत्ता के भीतर होनेवाला षड्यंत्र हो या राजसत्ता का बेकाबू मद या फिर बिक चुकी शिक्षा व्यवस्था हो या फिर छल-कपट से मारे जाते अभिमन्यु, सब आज मौजूद हैं. आज भी द्रौपदियों का अपमान हो रहा है. कर्ण नदी-नाले में रोज बह रहे हैं. इसलिए जब इस उपन्यास में लेखक पाठक को पांच हजार साल पहले पहुंचाता है तो पाठक को महाभारत अपने आस-पास की घटना लगती है. यही लेखक का सामर्थ्य है, जिसे उसने बखूबी निभाया है. लेखक ने महाभारत पर लिखी अपनी पूरी श्रंखला में पात्रों और घटनाओं की आज के संदर्भ में नई व्याख्या की है, जो आपके सामने है.

तस्वीर विकीपिडिया से साभार

तस्वीर विकीपिडिया से साभार

एक बात और. हमारी परंपरा में महाभारत घर में रखा नहीं जाता था. मेरी दादी इसके सख्त खिलाफ थीं. फिर भी मैंने अपने घर में महाभारत ही नहीं, उसके अन्य भाषाई संस्करण देखे. उसकी कमेंट्री और उस पर आधारित शोध ग्रंथों के साथ ही हमारा बचपन बीता. दादी का कहना था कि महाभारत घर में रहे तो महाभारत होता है. महाभारत तो नहीं हुआ, पर पिता ने इस श्रंखला में कोई बीस पुस्तकें लिख दीं.

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द्रौपदी पर पूरा ग्रंथ लिखा जा सकता है. जैसा मैंने शुरू में बताया कि पिताजी ने महाभारत के कर्ण, द्रोण और गांधारी जैसे चरित्रों पर विस्तार से लिखा है. कृष्ण पर तो उन्होंने आठ खंड लिख डाले. लेकिन द्रौपदी पर यह पुस्तक कुछ पन्नों में ही सिमट गई. क्यों? क्या लेखक द्रौपदी के चरित्र को साधारण आंकते है? नहीं! लेखक कृष्ण के बाद द्रौपदी को महाभारत का दूसरा सबसे महत्त्वपूर्ण चरित्र मानते हैं. यह महाभारत श्रंखला की यह पहली पुस्तक थी, इसलिए उसकी अपनी सीमाएं थीं. शायद इसलिए यह द्रौपदी के विराट् व्यक्तित्व के अनुरूप विस्तार न पा सकी. इसका रंज खुद लेखक को भी है. लेकिन द्रौपदी पर जितना भी लिखा जाए, कम है, क्योंकि द्रौपदी सदियों में कभी एक बार जन्म लेती है.

(यह लेख हेमंत शर्मा की पुस्तक 'तमाशा मेरे आगे' से लिया गया है. द्रौपदी पर यह लेख हम दो भागों में लेंगे. अगला भाग, अगले शनिवार को. पुस्तक प्रभात प्रकाशन द्वारा प्रकाशित की गई है. इस लेख में हेमंत जी ने अपने पिता का जिक्र किया है. हेमंत शर्मा मशहूर लेखक मनु शर्मा के पुत्र हैं)

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