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कबीरचौरा: जहां मार्क्स से चार सदी पहले कबीर ने आबोहवा में समाजवाद घोला था

कैसे छूटे कबीरचौरा? क्योंकि कबीरचौरा का छूटना गंगा-जमनी तहजीब का छूटना है. कबीरचौरा से हटना सांप्रदायिक सद्भाव के एक हजार साल पुराने इतिहास से कटना है.

Updated On: Nov 03, 2018 07:37 AM IST

Hemant Sharma Hemant Sharma
वरिष्ठ पत्रकार

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कबीरचौरा: जहां मार्क्स से चार सदी पहले कबीर ने आबोहवा में समाजवाद घोला था
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मेरे परम स्नेही चौबेजी बार-बार कहते हैं, कबीरचौरा आपसे छूट नहीं रहा है. आप भले दिल्ली में रहते हों, पर सोच के दायरे से कबीरचौरा नहीं निकल पा रहा है. वह बुरी लत सा आपके पीछे पड़ा है. मेरे लिए यह लाख टके का सवाल है. कैसे छूटे कबीरचौरा?  क्योंकि कबीरचौरा का छूटना गंगा-जमनी तहजीब का छूटना है. कबीरचौरा से हटना सांप्रदायिक सद्भाव के एक हजार साल पुराने इतिहास से कटना है. कबीरचौरा से पीछा छुड़ाना लुकाठी हाथ में लेकर सच कहने की ‘कबीरी परंपरा’ से मुंह मोड़ना है. कबीरचौरा को छोड़ना ठुमरी, दादरा, कथक और तबले की विरासत को छोड़ना है. साहित्य और संगीत की अनंत परंपरा को अंगूठा दिखाना है.

बनारस का कबीरचौरा महज एक मुहल्ला नहीं, समूची संस्कृति है. जिसकी न धर्म है और न जाति. यहां चार सौ साल पहले कबीर चादर बुनते-बुनते आधुनिक समाज का ताना-बाना रच गए थे. व्यवहार और विचार के सिद्धांत गढ़ गए थे. पौराणिक बनारस में नरहरिपुरा मुहल्ला हिरण्यकश्यप का विनाश करने वाले भगवान नृसिंह के नाम पर था. कबीर के दत्तक पिता नीरू यहीं रहते थे. सो यह स्थान कबीर की कर्मभूमि और साधना-स्थली बना. कबीर की आंखन देखी का चश्मदीद हुआ कबीरचौरा. मृत्यु के बाद यहीं उनकी समाधि बनी. कबीर मठ अस्तित्व में आया. कालांतर में यही नरहरिपुरा ‘कबीरचौरा’ के नाम से जाना जाने लगा. देश में ‘सेक्युलरिज्म’ का ‘न्यूक्लियस’ यानी नाभिक केंद्र बना.

मेरा बचपन इसी मुहल्ले मे बीता. घर से कोई दो सौ मीटर की दूरी पर थी औघड़नाथ की तकिया. अघोरी साधुओं की धूनी. आंखें लाल-लाल किए डरावने साधु. यहीं अनहद की बानी कबीर ने सुनी थी. कबीर हर रोज औघड़नाथ तकिया आते थे. अलग-अलग संतों के क्रियाकलाप उनकी उत्सुकता के केंद्र थे. इसी तकिया से ‘बुनकर कबीर’ की ‘संत’ कबीर बनने की प्रक्रिया शुरू हुई. यहीं उन्होंने हिंदू-मुसलमान के आडंबर को पहचाना और धर्म के पाखंड के खिलाफ शंखनाद किया. जीवन जगत को जाना. उन्हीं के शब्दों में ‘न कछु किया न करि सका, न करने जोग शरीर. जो कुछ किया सो हरि किया, भए कबीर-कबीर.’ तो मित्रों, यहीं कबीर हुए कबीर. कबीर यानी सबसे बड़ा. कबीर अवैध संतान थे. इसलिए समाज की सारी अवैधताओं पर उन्होंने इसी कबीरचौरा से चोट की.

संत कबीर

संत कबीर

कबीरचौरा भक्ति के साथ रस भी बरसाता है. पंडित कंठे महाराज से लेकर किशन महाराज और गोदई महाराज तक तबले की समृद्ध परंपरा. गिरिजा देवी की ठुमरी हो या सितारा देवी और गोपीकृष्ण के नृत्य की ताल. हनुमान प्रसाद मिश्र की सारंगी हो या फिर पंडित राम सहाय राजन-साजन मिश्र का गायन. सबकी जड़ें इसी कबीरचौरा में हैं. यह कबीरचौरा प्रसाद, प्रेमचंद और रामचंद्र शुक्ल का है. देवकीनंदन खत्री और ठाकुर प्रसाद सिंह का. हजारीप्रसाद द्विवेदी और मनु शर्मा का तो नामवर सिंह और शिवप्रसाद सिंह का भी. मंगला गौरी मंदिर में शहनाई बजाते बिस्मिल्लाह खां का भी. कीनाराम, लाहिड़ी महाशय और तैलंग स्वामी का भी. कबीर ने इस समाज को जाना था, तुलसी ने माना था. इसलिए कबीरचौरा दोनों का है.

यह इतिहास से बाहर भूगोल से परे है. परंपरा को जीता और आधुनिकता को ओढ़ता-बिछाता. यहां न कोई व्यस्त है, न ‘वर्कलोड’ से ग्रस्त. कुछ करने की वासना नहीं. होने का सौंदर्य है. मस्ती ऐसी कि गंगा नहाने और जूता सिलने में यहां के समाज में कोई फर्क नहीं है. दुनिया को ठेंगे पर रखना इसका स्वभाव है. फक्कड़पन विशिष्टता. लिंग पूजा सांस्कृतिक विरासत है. लुकाठी हाथ में लेकर अपना घर फूंकने की तत्परता इसकी प्रकृति है. रांड़, सांड़, सीढ़ी, संन्यासी प्रतीक हैं. इसी कबीरचौरा में कबीर ने सधुक्कड़ी भाषा गढ़ी, जिसे बाद में भारतेंदु हरिश्चंद्र ने हिंदी भाषा के संस्कार दिए और तुलसी ने देवभाषा के समानांतर लोकभाषा खड़ी की.

डॉ. लोहिया ने ‘सुधरो और टूटो’ का नारा बीसवीं शताब्दी में दिया था. कबीर अपने वक्त में ‘सुधरो या टूटो’ की मुनादी कर रहे थे. वे सुधार चाहते थे, भले व्यवस्था टूट जाए. तब कबीरचौरा ने मोटी-मोटी पोथियों के अस्तित्व को नकारा था. किताबी ज्ञान के बरक्स सिर्फ ‘ढाई आखर प्रेम’ का पढ़ने की जरूरत बताई थी. जब लोकतांत्रिक समाज बना भी नहीं था, तो इस मुहल्ले ने आलोचना को सर्वोपरि माना था. कबीरचौरा का ऐलान था, ‘निंदक नियरे राखिए, आंगन कुटी छवाय.’ भले इस विकसित लोकतंत्र में अब किसी को आलोचना बर्दाश्त नहीं. कबीरचौरा यानी कर्मकार, मेहनतकश लोगों का मुख्यालय. जिनका मानना है कि जो अपने भीतर है, उसे लोग व्यर्थ ही मंदिर, मस्जिद, काबा और कैलाश में ढूंढते हैं.

मार्क्स से चार शताब्दी पहले कबीरचौरा का साम्यवाद देखिए. ‘साईं इतना दीजिए, जामे कुटुम समाए. मैं भी भूखा न रहूं, साधु न भूखा जाए.’ मांग और आपूर्ति पर यह फतवा मार्क्स से चार सौ साल पहले कबीरचौरा का था. मांगने में भी साम्यवाद. अस्तेय और अपरिग्रह का समाज. तबसे कबीरचौरा को समझने की कोशिश जारी है. जिसकी जैसी समझ, उसका वैसा कबीरचौरा. समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता, समानता, सद्भाव के साथ ही पाखंड और आडंबर के खिलाफ बीच तत्व कबीरचौरा में मौजूद है. कुंठित होता समाज कबीरचौरा के यथार्थ को नहीं समझ सकता. इसलिए मैं बार-बार कबीरचौरा की ओर लौटता हूं. इसे भूलना मुश्किल है.

(यह लेख हेमंत शर्मा की पुस्तक 'तमाशा मेरे आगे' से लिया गया है. पुस्तक प्रभात प्रकाशन द्वारा प्रकाशित की गई है.)

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