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शरद ऋतु के आने की खबर दे रहे हैं हरसिंगार के फूल

शरद आ गया है, पर इसके परिवेश का सौंदर्य दिल्ली में उतना नहीं दिखता, जितना छोटे शहरों में.

Updated On: Nov 17, 2018 09:21 AM IST

Hemant Sharma Hemant Sharma
वरिष्ठ पत्रकार

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शरद ऋतु के आने की खबर दे रहे हैं हरसिंगार के फूल

फूलने लगे हैं हरसिंगार. सुबह उसके झड़े फूल शरद ऋतु के आने की खबर दे रहे हैं. कहते हैं हरसिंगार बड़ा शर्मीला होता है. रात में चुपके से खिलता है, खिलते ही झरने लगता है. सड़क पर सुबह टहलने के मेरे आनंद को हरसिंगार के लाल डंठलवाले झड़े फूलों की चादर दुगना करती है. बसंत से जो रिश्ता बेला का है, हरसिंगार से वही रिश्ता शरद का है. शरद मानसून की उत्तरकथा है.

बारिश प्रकृति का स्नान पर्व है. प्रकृति और निखर जाती है. कुदरत के कैनवास पर नीला, साफ और ताजा आकाश. खिलती रात. शरद यानी हरसिंगार, कमल और कुमुदिनी के खिलने का मौसम. शरद यानी जागृति, वैभव, उल्लास और आनंद का मौसम. गंदलेपन से मुक्ति का प्रतीक. तुलसीदास भी शरद ऋतु पर मगन हैं ‘वरषा बिगत सरद रितु आई. लछिमन देखहु परम सुहाई.’

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हरसिंगार के शर्मीले फूल मुनादी करते हैं कि पितृपक्ष के बाद त्योहारों का सिलसिला शुरू हो जाएगा, क्योंकि शरद उत्सव प्रिय है. इस एक ऋतु में जितने उत्सव होते हैं, पूरे साल नहीं होते. उत्सव किसी समाज की जीवित परंपरा होते हैं. उत्सवों के जरिए हम अतीत से ताकत लेते हैं. जीवन में नए रस का संचार होता है. मुझे लगता है, शरद हमारी जिजीविषा, हमारे संघर्ष और हमारी सामूहिकता का प्रतीक है.

तुलसीदास द्वारा शुरू की गई रामलीलाएं हों या तिलक महाराज द्वारा स्थापित गणेश उत्सव या फिर दुर्गापूजा तीनों की सामूहिकता शरद की सामाजिक एकजुटता में दिखती है. ये सभी उत्सव सामूहिकता और नई फसल के उगने से कटने तक के त्योहार हैं. शरद पुराने को विसर्जित करने और नए को पूजने का उपक्रम है.

मौसम का राजा बसंत है, लेकिन लंबे जीवन की कामना करते हमारे पूर्वजों ने सौ बसंत नहीं, सौ शरद मांगे. पूरा वैदिक वाङ्मय सौ शरद की बात करता है. कहा है-जीवेत शरद शतम्. कर्म करते हुए सौ शरद जीवित रहें. जीवन में राग, रस-रंग का प्रतीक बसंत है. पर उसके संघर्ष का प्रतीक शरद ही है. पूरे साल में सिर्फ एक रोज ही शरद पूर्णिमा का चांद सोलह कलाओं का होता है.

प्रतीकात्मक तस्वीर

प्रतीकात्मक तस्वीर

कहते हैं, चंद्रमा से उस रोज अमृत बरसता है. इसलिए शरद अमरत्व का प्रतीक है. इसे कोजागरी पूर्णिमा भी कहते हैं. शरद पूर्णिमा से अपना तीन पीढ़ी का रिश्ता है. मेरे पिता और पुत्र दोनों का जन्मदिन इसी रोज है.

बसंत और शरद दोनों संधि ऋतुएं हैं. एक में सर्दियां आ रही होती हैं, दूसरे में जा रही होती हैं. इसलिए दोनों का चरित्र एक सा है. बसंत शिशिर की शर्वरी से मुक्ति का एहसास है, तो शरद वर्षा के गंदलेपन से मुक्ति का उल्लास. शरद में चौमासे की समाप्ति होती है. साधु-संत इन चौमासे में एक जगह चार महीने रुके रहते हैं. उनकी गतिविधियां ठहर जाती हैं. वे शरद में फिर सक्रिय हो जाती हैं.

बंगला की कृतिवास रामायण के मुताबिक राम ने शरद में ही शक्ति की आराधना की थी. शास्त्रीय संगीत में भी शरद को सबसे कोमल ऋतु मानते हैं. हमारे यहां हर ऋतु के अलग-अलग राग हैं. शरद में मालकोश गाते हैं. पांच सुरों में गाया जानेवाला यह राग शास्त्रीय संगीत में सबसे कोमल राग है. महाकवि निराला ने अपनी बेटी सरोज के कैशोर्य की तुलना मालकोश से की है. ‘कांपा कोमलता पर सस्वर, ज्यों मालकोश नववीणा पर.’

बसंत में बहार है, मस्ती है, रंगबाजी है, रंगरलियां हैं, उन्माद है. शरद में गांभीर्य है, गति है, गंदगी को धोने की ललक है. बसंत के मूल में वासना है. शरद के मूल में उपासना है. बसंत जुड़ता है रति से, काम से. शरद संबंधित है शक्ति से, राम से. बसंत में काम भस्म हुआ था, शरद में रावण. शरद में भगवान् कृष्ण ने वृंदावन में सोलह हजार गोपिकाओं के साथ महारास रचाया था.

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इस रास की खासियत थी कि हर गोपी को एहसास था कि कृष्ण उसके साथ नृत्य कर रहे हैं. इस रास में ग्वाल-बाल, देवी-देवता सब एक रस थे. प्रकृति, मनुष्य, जड़-चेतन सब एक प्राण थे. संस्कृत के कवि भी शरद से अभिभूत हैं. शायद इसलिए साहित्य में उन्होंने बसंत की उपेक्षा की है. उनकी अधिकांश कविता वर्षा और शरद पर केंद्रित हैं.

‘मृच्छकटिकम्’ से लेकर ‘ऋतुसंहार’ तक और ‘गीत-गोविंद’ से लेकर तुलसीदास तक शरद के लालित्य का वर्णन हर कहीं है. किसी समय शरद के अंत से वर्ष पूरा होता था. इसीलिए वर्ष को शरद से नापा जाता था. बाद में कृषिप्रधान देश में वर्षा से वर्ष शुरू होने लगा. विक्रम संवत् की शुरुआत कालांतर में चैत्र से हुई. ऋतुओं में शरद समाजवादी ऋतु है. न इसमें गरमी के ताप से बचने के लिए ए.सी. चाहिए, न ही ठंड से बचने के उपकरण. मानसूनी हवाएं जब लौटती हैं तो उत्तर-पश्चिम हिस्से के तापमान में तेजी से गिरावट आती है. मौसम सुहावना होता है. तुलसीदास लिखते हैं—शरद के सुहावने मौसम में राजा, तपस्वी, व्यापारी, भिखारी सब हर्षित होकर नगर में विचरते हैं.

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किसी एक ऋतु में सभी देवताओं के मगन होने की स्थिति कहीं और नहीं बनती. शरद की शुरुआत, सावन में शिव की आराधना, भादों में कृष्ण जन्म और गणपति उत्सव, फिर आश्विन में पितरों की याद. शक्ति पूजा के साथ राम की रावण पर विजय. एक साथ सारे देवताओं की सक्रियता और प्रसन्नता हमें शरद में ही दिखलाई पड़ती है.

शरद आ गया है, पर इसके परिवेश का सौंदर्य दिल्ली में उतना नहीं दिखता, जितना छोटे शहरों में. यहां न पपीहे की पीहू-पीहू सुनाई देती है, न मालती की चटकी कलियां दिखती हैं. न कमल खिलता है, न कुमुदनी दिखती है. कमलवाले जरूर सक्रिय दिखते हैं.

(हिंदी लेखक हेमंत शर्मा की नई किताब 'तमाशा मेरे आगे' से अंश)

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