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अकबर के पास 20,000 कबूतर थे, इस शौक को वो इश्कबाजी कहते थे

उस परिंदे की काली पूंछ ऐसी लगती मानो कबूतर के आशिकों के जलते दिलों से उठने वाली आग.

FP Staff Updated On: Oct 15, 2017 12:34 PM IST

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अकबर के पास 20,000 कबूतर थे, इस शौक को वो इश्कबाजी कहते थे

 

लेखक-पत्रकार शाज़ी जमां ने बादशाह अकबर पर 'अकबर' शीर्षक से उपन्यास लिखा है. हम इसके प्रकाशक राजकमल प्रकाशन की इजाजत के साथ आप को इसका एक हिस्सा पढ़वा रहे हैं.

बादशाह सलामत (अकबर) को बाहर से कबूतरों के फड़फड़ाने की आवाज आई. उनके पास बीस हजार कबूतर थे. उन्होंने कबूतरबाजी को इश्कबाजी का नाम दिया था. बादशाह सलामत मानते थे कि कबूतरों के करतब और उनकी उड़ान दरवेशों की याद दिलाते हैं. कमउम्री में बादशाह सलामत ने बहुत कबूतरबाजी की लेकिन थोड़ा बड़े हुए तो इसे छोड़ दिया. उसके बाद गौर किया और फिर से कबूतरबाजी शुरू की.

बादशाह सलामत को मोहना नाम का कबूतर बहुत पसंद था. वो नीले रंग का सीखा-सिखाया कबूतर उन्हें मिजार अजीज कोका ने दिया था. उन्होंने मोहना को शाही कबूतरों का मुखिया बनाया. मोहना से अश्की, परीजाद, अलमास और शाह ऊदी जैसे कई उम्दा कबूतर पैदा हुए.

जब बादशाह सलामत कबूतरों का मुआयना करते तो सबसे पहले मोहना के खानदान को देखते, उसके बाद बाकी कबूतरों को. बादशाह सलामत अपने कबूतरों के करतब का लुत्फ उठाते.

उन्हें चर्ख करतब पसंद था जिसे सीख कर कबूतर हवा में एक पूरा गोल चक्कर लगा लेते और बाजी का करतब भी जिसमें कबूतर पांव ऊपर की तरफ करके तेजी से उलट जाते.

अब्दुर्रहीम खानेखानां को भेजे खत में बादशाह सलामत ने अब्दुल्ला खान उजबक से कबूतर मिलने पर खुशी का इजहार किया था.

'दुनिया के किसी कबूतरखाने में किसी भी नस्ल के कबूतरों की उड़ान की ऊंचाई और करतब कभी भी इन नायाब कबूतरों जैसी नहीं है. खानेखानां जैसा करीबी शाही महफिलों से दूर हो सकता है लेकिन ऐसे खुशी के मौकों पर हमेशा याद रखा जाएगा.

'खानेखानां की कमी को महसूस किया गया जब कबूतर पेश हुए. ये महसूस हुआ कि इस मौके पर उन से बात नहीं हो सकती. कबूतरों की कई टोलियों ने खामोशी से उन्हें पैगाम भेजा.

कुछ नई उम्र के करतब दिखाने वाले बुजुर्ग कबूतर थे जैसे पुरनिगार जिसमें बहुत खूबियां थीं, जिसने ना सिर्फ कबूतरखाने को दिल से खुश किया बल्कि उनको भी जिनके दिल मुतमईन थे.

इन कबूतरों का मानना है कि उनकी ईमानदार इबादत की वजह से खुदाई ताकत उन्हें खुदा से डरने वाले हजरत बादशाह की सरपरस्ती में ले आई है, जो कि खूबियों की कद्र करते हैं, और उनके दिमाग में जवानी का जज्बा आ गया है और उन्हें नई जिंदगी और कामयाबी मिली है.

इन नई उम्र के कबूतरों ने खैरख्वाह दरबारियों से, ख़ासतौर पर खानेखानां से— जो कि बादशाह के वफादार और दीनदार चेले हैं—दरख्वास्त की है कि वो ढके-छुपे तरीके से यह कबूतर ना मांगे, ताकि कहीं उनकी टोली ना टूट जाए क्योंकि कबूतरों की दिली ख्वाहिश है कि वो शहंशाह की खिदमत में रहें और गुजरे वक्त की भरपाई के लिए अपनी खूबी और कलाबाजी दिखाएं.

1960 में आई दिलीप कुमार की फिल्म 'मुग़ल-ए-आजम' को डायरेक्टर फिरोज अब्बास खान ने एक म्यूजिकल थिएटर शो में तब्दील कर प्रस्तुत किया है. शो से ये रही लाइव तसवीरें. ये है राजा अकबर का दरबार

दुख और परेशानी दूर करने वाले ऊंची नस्ल के एक और कबूतर, जो देखने में बुजुर्ग लेकिन काम में जवान, नामी सरसब्ज की बेटी सब्जगाही, ने भी अपना सलाम भेजा है कि लंबे वक्त बाद मुराद पूरी हुई और दरबार आने का मौका मिला.

इस कबूतर की ख्वाहिश है कि उसे अपने बेटों और रिश्तेदारों के साथ यहां रहने दिया जाए ताकि सही और पुरलुत्फ तरीके से बादशाह सलामत की खिदमत हो सके. हालांकि उनकी पूरी जिंदगी ही माशूकों की तरह औरों को अपनी तरफ खींचने में गुजरी है लेकिन कबूतर आखिर अपने प्यारे बादशाह की तरफ खिंचे चले आए हैं.

सभी वफादार दरबारी, खासतौर पर खानेखानां, को चाहिए कि वो अपनी ख्वाहिशात के लिए बादशाह के लुत्फ में खलल ना डालें और इन कबूतरों को मांगने से खुद को रोकें. मिलन से बेहतर जुदाई है.

'कुत्तपर नाम का कबूतर खुरासान की नस्ल का है. हालांकि नाम तूरान का है. ये कम परों वाले भरोसेमंद कबूतरों का अगुवा है और आसमान में ऊंचा उड़ता है.

'जो हलके वजन का है वो आसानी से उड़ेगा, हलका परिंदा जल्द उड़ता है और ऊंचा उड़ता है.’

'एक और है मशाले कलां जो आसमान में आग की लपक की तरह उठता है और दरबार पहुंचने को उतावला है. उसकी काली पूंछ ऐसी लगती है मानो कबूतर के आशिकों के जलते दिलों से उठने वाली आग.

पुरनिगार नाम का कबूतर लैला की याद दिलाता है जो अपने पांव की हरकत से लोगों को मोह लेती थी. सभी कबूतर ऊंची और अच्छी नस्ल के हैं और खुशनुमा हैं. कुछ पुरनिगार जैसे, ज्यादातर सब्जगाही जैसे. आज़ाद कबूतर का हर पर शहंशाह का इंसाफ चाहता है.

Marriage_of_Adham_Khan,_son_of_Mahan_Anga,_Akbarnama

चूंकि दरबार में सभी कबूतर उन्हें और दूसरे लोगों को अपने नायाब कमाल से खुश करने के लिए जमा हुए हैं इसलिए सभी कबूतरों की तरफ से शहंशाह की इल्तिजा है कि उनकी टोली ना बिखरे. इस ख्वाहिश को पूरा करने के लिए कबूतरों का शहंशाह के इंसाफ में पूरा यकीन है.

उन सब की ख्वाहिश है कि मुकद्दस काबा के चारों तरफ उड़ने वाले कबूतरों को हज पर जाने वाले किसी शख्स के जरिए पैगाम भेजें कि उनकी ख्वाहिश पूरी करने की दुआ करें.’

कबूतर भेजने वाला ये हुक्मरान वही था जिसकी ताकत ने एक जमाने में बादशाह सलामत को बेचैन कर दिया था. छरहरे बदन के अब्दुल्ला खान उजबक का सिलसिला शैबानी खान के जरिए चंगेज खान के बड़े बेटे जोची से जुड़ता था.

जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर के दादा फिरदौस मकानी बाबर बादशाह को इसी उजबक ताकत ने समरकंद से बेदखल किया और उन्हें काबुल आना पड़ा, और फिर हिंदुस्तान.

फारस के शाह तहमास्प के गुजर जाने के बाद अब्दुल्ला खान उजबक ने खुरासान पर हमला कर दिया था और तुर्की के उस्मानी बादशाह ने उत्तरी ईरान पर. बादशाह सलामत ने फारस के खिलाफ मुहिम में शामिल होने से साफ इन्कार कर दिया था.

वो ना तो उस्मानी तुर्कों को मजबूत करना चाहते थे, ना ही उजबक ताकत को. जब अब्दुल्ला खान उजबक ने बल्ख और बदख्शां पर क़ब्जा कर लिया और मिज़ार हकीम के गुजर जाने के बाद बादशाह सलामत ने काबुल पर तो दोनों की सरहदें मिल गईं. अब बादशाह सलामत लाहौर आ गए ताकि हालात पर नजर रखें.

इकत्तीसवें इलाही सन् बमुताबिक़ 1586 ईसवी की 3 सितंबर को बादशाह सलामत ने अब्दुल्ला ख़ान उज़बक को एक फ़रमान लिखा, जिसका एक मसौदा हकीम अबुल फ़तह ने तैयार किया और दूसरा शेख़ अबुल फ़ज़ल ने.

अक्सर बादशाह सलामत एक फरमान को दो लोगों से लिखवाते थे. एक बार सरहिंद के पास अपने लश्कर में उन्होंने शेख अबुल फ़ज़ल और हकीम अबुल फ़तह को एक फरमान का मसौदा तैयार करने को कहा. अगले

रोज़ जब हकीम अबुलफ़तह पहुंचे तो बादशाह सलामत ने कहा, रात कितनी ज्यादा बारिश हुई. बरसात के मौसम से भी ज्यादा. तुमने फ़रमान लिखा या सोते रहे?’’

जब हकीम अबुल फ़तह ने जेब से फरमान निकाल कर पढ़ा तो बादशाह सलामत ने शुरू से आखिर तक बहुत ध्यान से सुना और फिर कहा, बहुत अच्छा लिखा है.’’

जब शेख़ अबुल फ़ज़ल ने अपना मसौदा पेश किया तो बादशाह सलामत ने कहा, हकीम अबुल फ़तह ने अच्छा मसौदा बनाया है. अगर कुछ छूट गया है तो बता दो ताकि वो शामिल किया जा सके.’’

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