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एक था ‘गुल’...और एक से बढ़कर एक थीं उसकी फिल्में

‘मेरे पास मां है.......’ सदियां भी चाहें तो वो इस आवाज़ और उस चेहरे की अदाकारी को भुला न सकेंगीं

Kinshuk Praval Kinshuk Praval Updated On: Dec 04, 2017 10:13 PM IST

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एक था ‘गुल’...और एक से बढ़कर एक थीं उसकी फिल्में

फिल्म ‘आवारा’ के गीत ‘प्यार हुआ इकारार हुआ’ में बारिश के एक सीन में बरसाती पहने तीन बच्चे दिखाई देते हैं जिसमें एक शशि कपूर भी होते हैं. शशि का बाल रूप बड़े भाई राज कपूर ने अपनी फिल्म में उतारा. गीत की लाइनें थीं...'गीत हमारे प्यार की दोहराएंगी निशानियां.....हम न रहेंगे....तुम न रहोगे ...रह जाएंगी निशानियां...'. आज शशि के जाने के बाद कपूर खानदान की तिकड़ी राज, शम्मी और शशि की आखिरी निशानी भी हमेशा के लिये खो गई. शशि कपूर भी जिंदगी के नाट्य मंच को अलविदा कह गए. उनसे पहले शम्मी कपूर और राज कपूर भी बारी बारी बिछड़ चुके थे.

रीयल लाइफ में एक अल्हड़ और मस्तमौला अंदाज़ शशि कपूर की पहचान था तो पर्दे पर वो हर भूमिका के लिये तैयार होते थे. अपने दौर में चॉकलेटी रोमांटिक हीरो के तौर पर मशहूर शशि कपूर पर्दे पर अकेले या फिर ढेर सारे सितारों के साथ आने से गुरेज़ नहीं करते थे.

SHASHI KAPOOR DEATH (12)

शशि कपूर के डायलॉग बोलने का अंदाज़ सबसे अलग था. एक बेहतरीन आवाज़ के मालिक रहे शशि कपूर के डायलॉग पर्दे पर तालियां बटोरते थे तो लोगों के जेहन में गूंजते भी थे. पर्दे पर उनकी जोड़ी अगर चॉकलेटी हीरो के रूप में नंदा, आशा पारिख के साथ मशहूर थी तो छोटे भाई या फिर जिगरी दोस्त के रूप में अमिताभ बच्चन के साथ सुपरहिट रही. अमिताभ बच्चन के साथ उन्होंने 16 फिल्मों में काम किया जिनमें अधिकतर सुपरहिट रहीं. अमिताभ बच्चन के साथ शान, दीवार, सुहाग, रोटी कपड़ा और मकान, काला पत्थर, कभी-कभी, त्रिशूल, काला पत्थर, ईमान धरम,  दो और दो पांच, नमक हलाल और सिलसिला जैसी फिल्में लोग बार बार देखना नहीं भूलते.

शशि कपूर अगर हर तरह का रोल करते थे तो वो हर तरह की फिल्म बनाने का भी जुनून रखते थे. उन्होंने साल 1961 में फिल्म धर्मपुत्र से लीड रोल के जरिये डेब्यू किया तो शर्मीली, कन्यादान, आ गले लग जा जैसी रोमांटिक फिल्में की. 'जब जब फूल खिले है' के लिये उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय पुरस्कार तक मिला.

shashi kapoor

लेकिन पर्दे के इस अदाकार के भीतर कुछ अलग करने का जुनून उनकी बनाई फिल्मों में दिखाई देता था. उन्होंने जुनून, छत्तीस चौरंगी लेन, कलयुग, उत्सव, विजेता और अजूबा जैसी फिल्में बनाईं. शशि की फिल्में भले ही व्यवसायिक तौर पर बड़ी कमाई नहीं कर सकीं लेकिन उनकी फिल्मों में अभिनय और निर्देशन की गाढ़ी कमाई दिखाई देती थी.

उनका बचपन पृथ्वी थियेटर के आसपास गुज़रा तो उम्र के आखिरी पड़ाव में भी उनका मन थियेटर से दूर नहीं हो सका. सिनेमा की व्यस्त दिनचर्या के बावजूद उन्होंने पिता पृथ्वीराज कपूर के थियेटर को शिद्दत से संभाला और उसे नाट्य मंचन के जरिये जीवंत रखा. थियेटर से ही उन्हें जेनिफर के रूप में हमसफर मिली जिससे उन्हें प्रेम हुआ और फिर उन्होंने शादी की. शशि की ज़िंदगी में थियेटर की अहमियत कितनी थी वो इस बात से समझी जा सकती है कि वो फुर्सत के लम्हों में पृथ्वी थियेटर में अपने अतीत की यादों को ताज़ा किया करते थे.

SHASHI KAPOOR DEATH (10)

शशि के भीतर अभिनय के अलावा निर्माता-निर्देशक के जुनून को पढ़ पाना इतना आसान नहीं था. उस दौर में वो लीक से हटकर फिल्में बनाने का हौसला रखते थे. फिल्म कलियुग और जुनून के लिये उन्हें अवार्ड मिला तो फिल्म उत्सव को भी क्लासिक फिल्म माना गया. अभिनय और निर्देशन के सफर में सम्मानों के सिलसिले भी पड़ावों की तरह मिले. शशि कपूर को पद्मभूषण से नवाज़ा गया तो उन्हें लाइफ टाइम अचीवमेंट के लिये दादा साहब फाल्के पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया.

‘मेरे पास मां है.......’ सदियां भी चाहें तो वो इस आवाज़ और उस चेहरे की अदाकारी को भुला न सकेंगीं क्योंकि वो सिर्फ एक नाम शशि कपूर भर ही नहीं था बल्कि वो बॉलीवुड के एक युग का पुरज़ोर ऐलान भी था जिसमें जुनून भी था तो उत्सव भी और जो विजेता भी था तो शान भी.

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