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बर्थडे स्पेशल: जब अमरीश पुरी को मनाने स्पीलबर्ग भी उनकी हवेली पर आए थे

फिल्म इंडस्ट्री ने अमरीश पुरी को वो सम्मान कतई नहीं दिया जो उन्हें मिलना चाहिए था

Animesh Mukharjee Animesh Mukharjee Updated On: Jun 22, 2017 12:38 PM IST

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बर्थडे स्पेशल: जब अमरीश पुरी को मनाने स्पीलबर्ग भी उनकी हवेली पर आए थे

साल 1992-93 की बात है, इंजेक्शन लगाने वाले डॉक्टर को एक 4-5 साल के बच्चे ने गाली दी, अमरीश पुरी कहीं का. अगर 22 जून 1932 को पैदा हुए अमरीश इसको सुनते तो अपनी रौबदार आवाज में हंस पड़ते.

एक छोटे से बच्चे की स्वाभाविक प्रतिक्रिया उनके लिए किसी अवॉर्ड से कम नहीं थी. हालांकि, जिंदगी भर ऐसे तमाम पुरस्कारों से नवाजे गए अमरीश पुरी को फिल्म इंडस्ट्री न कभी बेस्ट ऐक्टर का पुरस्कार दे पाई, न उन्हें पद्मश्री जैसा कोई पुरस्कार कला क्षेत्र में योगदान के नाम पर मिला.

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वो आदमी जो औसत फिल्मों को कल्ट बना देता था

सनी देओल हिंदी सिनेमा के उन अभिनेताओं में हैं जो अपने अतिमानवीय हाव-भाव को विश्वस्नीय बना देते हैं. गदर में उनके हैंडपंप उखाड़ने वाले सीन को याद करिए. आपको लगता है कि ये आदमी ऐसा कर सकता है. मगर आपको ये भी लगता है कि इस आदमी के सामने खड़ा अशरफ अली इसे रोक भी सकता है.

शाहरुख खान की ‘दिल वाले दुल्हनिया ले जाएंगे’, सनी देओल की घातक, घायल, दामिनी. सलमान शाहरुख की ‘करण-अर्जुन’ इन सब से आप अमरीश पुरी को निकाल दीजिए. सिमरन के बाबूजी और काशी के बाप के बिना ये सारी फिल्में अपने दौर की बाकी फिल्मों जैसी ही लगेंगी. दरअसल अमरीश अपनी कद्दावर शख्सियत और दमदार ऐक्टिंग से एक ऐसा स्तर बना देते थे कि हीरो को उनके बराबर आने में एक अलग ही स्तर पर आना पड़ता था.

डीडीएलजे के नाम पर हमें दो ही डायलॉग सबसे पहले याद आते हैं. एक शाहरुख खान का कहा, ‘बड़े-बड़े शहरों में ऐसी छोटी-छोटी बातें होती रहती है सेनोरीटा’ और दूसरा कालजयी डायलॉग, ‘जा, सिमरन जा, जी ले अपनी जिंदगी’. ऐसे ही नहीं दुनिया के सबसे महान निर्देशकों में से एक स्टीवन स्पीलबर्ग ने उन्हें ‘सर्वश्रेष्ठ विलेन’ कहा था.

उनके लिए हॉलीवुड भी मुंबई आया

‘इंडियाना जोंस, टेंपल ऑफ डूम्स’ में उन्हें नरबलि देने वाले तांत्रिक मोलाराम के रोल में कास्ट करने के लिए स्पीलबर्ग को अच्छे खासे पापड़ बेलने पड़े थे. स्पीलबर्ग अमरीश को ऑडीशन देने अमेरिका बुलाना चाहते थे. अमरीश का कहना था कि जिसे ऑडिशन करना हो वो मुंबई आए. इसके बाद भी अमरीश सपीलबर्ग की फिल्म करने के इच्छुक नहीं थे. ‘गांधी’ फिल्म के डायरेक्टर रिचर्ड एडनबरो की सिफारिश पर पुरी साहब ने ये फिल्म की थी.

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दरअसल 39 साल की उम्र में ग्रेड ‘ए’ की सरकारी नौकरी छोड़कर फिल्मों में आए अमरीश अपने हुनर की कीमत जानते थे. फिल्म इंडस्ट्री ने उनको वो सम्मान कतई नहीं दिया जो उन्हें मिलना चाहिए था. मगर उनके जैसा दमदार विलेन भी मसाला फिल्मों की मूलभूत आवश्यकता बन गया था. उन्हें पता था कि उनकी आवाज और पत्थर जैसा चेहरा फिल्म इंडस्ट्री की जरूरत है. इसीलिए वो इंडस्ट्री के सबसे महंगे विलेन बन गए थे.

इसके साथ-साथ उनसे जुड़े दो नियम और थे. एक तो वो कभी इंटरव्यू के लिए अपनी आवाज रिकॉर्ड नहीं करने देते थे और दूसरा कवर स्टोरी से कम पर किसी मैग्जीन को इंटरव्यू नहीं देते थे. अपनी प्रतिभा के साथ न्याय करवाने का उनका अपना तरीका था. उनके ही अंदाज में कहा जाए तो, ‘इंटरव्यू चाहिए तो आओ कभी हवेली पर’.

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कोई और उनकी विरासत का वारिस नहीं बन पाया

हिंदी सिनेमा में विलेन के तौर पर सबसे प्रसिद्ध नाम ‘प्राण’ का आता है. मगर प्राण के बाद खलनायकी की विरासत को जब अपने कंधों पर अमरीश ने संभाला, तो सिनेमा का दौर बदल चुका था. 80 के दशक में उन्हे ‘नगीना’, ‘मिस्टर इंडिया’ और ‘यलगार’ जैसी फिल्मों में कॉस्ट्यूम विलेन के किरदार मिले. उनके पास प्राण की तरह महंगे बंद गले के सूट में हंटर से चमड़ी उधेड़ने वाला विलेन होने के मौके बड़े कम थे.

अजीबो-गरीब पोशाक में बेसिरपैर के वनलाईनर बोलने वाले किरदारों को सिर्फ वही जोकरनुमा होने से बचा सकते थे. और सिर्फ वही बचा पाए. अगर विश्वास न हो तो के.के. मेनन जैसे बेहतरीन अभिनेता को ‘द्रोणा’ में देखिए. अमरीश के बाद जिस किसी ने भी इस तरह के किरदार में हाथ डाला है नुकसान में ही रहा है.

थिएटर के बेहतरीन अदाकार रहे अमरीश पुरी के खाते में भले ही सिनेमा का कोई पुरस्कार हो न हो मगर उनके डायलॉग्स पर रोज बनते ढेर सारे मीम्स उनको लेजेंड बनाते हैं. एक ऐसा लेजेंड जिसके पत्थर जैसे चेहरे और जिस्म के अंदर मोम का दिल है. जो अपनी सारी सख्ती के बाद भी आखिरी मौके पर बोल उठता है. जा जी ले अपनी जिंदगी.

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